तारा का जवाब देना उसे अपना अपमान लग रहा था। बिना बात के ही उन दोनों में तू तू मैं मैं शुरू हो गई।
जतिन बोला… हम अच्छा कमाते हैं, हमारे हिसाब से सबकुछ है। तुम सामाजिक कार्य करना छोड़ क्यों नहीं देती? आख़िर दूसरों की मदद करने से तुम्हें क्या मिलता है? मेरे सारे दोस्तों की शादी हो गई है। सब अपने बीबी बच्चों के साथ खुश हैं।
हमारे देखो अभी तक बच्चा नहीं है। क्या तुम नहीं चाहती कि हमारा परिवार पूरा हो।
कुछ देर शांत रहने के बाद तारा ने कहा… मैं अपना काम नहीं छोडूंगी, मुझे सुकून मिलता है। तुम क्या जानो दूसरों की मदद करना क्या है? दूसरों का दर्द बांटने से क्या मिलता है।
और हां तुम्हें बच्चे चाहिए। तो मैंने सोचा है हम अनाथालय से एक बच्ची गोद लेंगे। प्यारी सी नन्ही परी, मैंने उसका नाम भी सोच लिया है – दीया।
अच्छा है न। उसकी बात सुनकर जतिन को और गुस्सा आया, बोला मुझे कोई बच्ची गोद नहीं लेनी।
अपना बच्चा अपना होता है। ऐसे कैसे में किसी को भी अपने घर ले आऊं।
क्या तुम्हें पहले से नहीं पता? मुझे खुद का बच्चा नहीं चाहिए। जब हम दूसरे अनाथ बच्चों का जीवन बेहतर कर सकते हैं। तो हमें खुद का बच्चा क्यों चाहिए। दुनिया में न जाने कितने बच्चें हैं, जिनके माता पिता उनसे बचपन में ही बिछड़ जाते हैं। और कुछ तो जानबूझ कर उन्हें रास्ते में छोड़ जाते हैं। मैंने पहले से ही सोच रखा था कि मैं उन्हीं बच्चों को अपने बच्चों की तरह प्यार दूंगी। मुझसे जितना होगा उतना करूंगी।
उसकी बातें जतिन के सिर के ऊपर से जा रही थी। एक छोटी सी बात न जाने कब इतनी बड़ी हो गई।
तुम्हें क्या पता ज़िंदगी क्या है? और यहां कोई अपना नहीं होता सिवाय अपनी औलाद के। तुम चार किताबें पढ़ कर और चार लोगों से क्या मिली खुद को मदर टेरेसा समझने लगी, जतिन ने गुस्से में बोला।
उसकी बातें सुनकर तारा आग बबूला हो गई। जब तुम्हें पता था मैं ऐसी ही हूँ तो क्यों शादी की मना कर देते। ढूंढ लेते अपने लिए कोई संस्कारी पत्नी जो तुम्हारी गुलामी करती तुम जैसे चाहो वैसा करती, और खुश रहते। मेरे साथ तो बाहर निकलने में भी शर्म आती है। अगर कोई और पति होता, तो अपनी पत्नी के साथ खड़ा होता। उसके काम की सराहना करता, लेकिन तुम दूसरों की बातें सुनते हो, ये नहीं सोचते क्या सही है और क्या गलत।
जो चार लोगों ने कह दिया तुम्हारे लिए वो सही है।
तारा को बहुत गुस्सा आ रहा था।
हां मेरी तो किस्मत ही खराब है जो तुमसे शादी हुई। जब देखो अपनी ही मर्ज़ी चलती है। दूसरे बच्चे को घर लाना चाहती है। मैं कहता हूं क्या जरूरत है? किसी अनाथ बच्चे को गोद लेने की। जब हम खुद के बच्चे को पाल सकते हैं। और क्या पता वो बड़ा हो कर हमारे साथ क्या करें? मैं इस बात से सहमत नहीं हूं। ये कह जतिन कुर्सी पर बैठ गया।
तारा अंदर से आई बोली, इस बात की क्या गारंटी है की हमारी खुद की औलाद हमें अच्छे से रखेंगी। हो सकता है कि वो हमें छोड़कर चला जाए।
जतिन ने चिल्लाते हुए कहा… मैं कुछ नहीं जानता।
मैं तंग आ गया तुमसे, तुम इतना ज्ञान लाती कहां से हो? जब देखो सबको ज्ञान बांटती रहती हो। ऐसे तो मैं तुम्हारे साथ नहीं रह सकता। अगर तुम्हें मेरे साथ रहना है, मेरी बात माननी होगी।
जतिन उसके साथ रहना नहीं चाहता था, और ये बात उसके मन में बहुत दिनों से चल रही थी।
लेकिन आज मौका देख कर उसने बोल दी। तारा को उसकी बात सुनकर बहुत बुरा लगा। बोली जहां मेरे पति को ही मेरे अच्छे कामों में अपना अपमान लगता है। वहां रहने का क्या फायदा। मेरा ज्यादा पढ़ा लिखा होना, दूसरों के लिए सही है मेरे पति के लिए नहीं।
ठीक है मैं वापस अपने घर जा रही हूं। मगर अपना काम नहीं छोडूंगी। मेरी पढ़ाई लिखाई से दूसरों का भला होता है तो मैं पीछे नहीं हटूंगी। ये मेरे जीवन का उद्देश्य है।
और तुम ढूंढना अपने लिए एक समझदार बीबी जो तुम्हारी हर बात माने। जो तुमसे कम पढ़ी लिखी हो। तुम “ज़िंदगी की खोज!” करना और अपने लिए कुछ बेहतर तलाशना।
ये कह कर तारा अपने पिता जी के घर चली गई। उसने कभी नहीं सोचा था कि जतिन उसके बारे में ये सोचता है। वह हमेशा उसकी तारीफों के पुल बांधती थी। लेकिन आज उसका भ्रम टूट गया।
तारा के चले जाने के बाद जतिन बालकनी में बैठा सोच रहा था… आज सिर दर्द कम हुआ, अच्छा हुआ जो वो अपने घर चली गई। उसकी वजह से मेरे दोस्त जाने मुझे क्या क्या बोलते थे? अब कोई कुछ नहीं बोलेगा।
कुछ महीनों बाद जतिन दफ्तर से लौटा, तो उसके दरवाज़े के सामने एक लिफाफा रखा था। उसे उठाकर वह अंदर चला गया। कुछ दिनों पहले उन दोनों ने कोर्ट में तलाक की अर्जी दी थी। उसने जब लिफाफा खोला उसमें तलाक का नोटिस था। पहले तो वह चौंक गया। एक लम्बी सांस लेते हुए बोला क्या तारा सच में तलाक लेना चाहती है?
वैसे ठीक भी है… उसकी और मेरी सोच बहुत अलग है। वो तो खुद को मदर टेरेसा समझती है।
तारा को पहले से ही उम्मीद थी कि जतिन उसे तलाक देने से मना नहीं करेगा। जब वे दोनों कोर्ट में हस्ताक्षर करने पहुंचे, जतिन ने तारा से पूछा क्या तुम खुश हो? तारा मुस्कुराकर बोली अगर तुम्हें खुशी है मुझसे अलग होने की तो हां मैं खुश हूं।
हस्ताक्षर करने के बाद तारा ने कहा… नई ज़िंदगी मुबारक हो! तुम्हें भी तारा!
जिस बंधन में हमें खुशी न मिले उसमें क्यों रहना। वैसे भी एक ही जिंदगी है क्यों न इसी पर प्रयोग किया जाए। इसी में अच्छी ज़िंदगी खोजी जाए।
तारा ने कहा।
दोनों खुशी खुशी अपने अपने रास्ते चले गए।
तारा अपने काम में व्यस्त रहने लगी। जतिन भी अपने आप में खुश था। उसे तलाश थी तो एक ऐसी लड़की की जो उससे कम पढ़ी लिखी हो। एक दिन उसका दोस्त आया। उसने जतिन को शादी के लिए एक लड़की बताई – मीरा। वो उसकी दूर की बहन थी। मीरा शांत शर्मिली लड़की थी जो ज्यादा पढ़ी लिखी तो नहीं थी, लेकिन घर के सारे काम उससे अच्छे से आते थे।
जतिन ने शादी के लिए हां बोल दिया। उसे ऐसी ही लड़की की तलाश थी।
कुछ दिनों बाद उन दोनों की शादी हो गई। शादी के बाद पता चला मीरा की मोटी बुद्धि है। उसकी सोचने समझने की क्षमता एक दम शून्य थी। खाने में नमक की जगह शक्कर डाल देती। कपड़े प्रेस करते करते दूसरा काम करने लगती। किसी भी सामान वाले को रोक लेती। उसकी इन हरकतों से जतिन बहुत परेशान था। पड़ोसी भी मीरा की बहुत शिकायतें करते थे। जतिन ने अपने दोस्त को बताना चाहा लेकिन उसका घर ओर फोन दोनों बंद मिलते। उसके दोस्त ने उसे धोखा दिया। उसकी जिंदगी खराब कर दी। ये बात उसे अंदर से खाई जा रही थी।
उसे तारा की कही बात याद आती, अकेले में बैठा खुद से बातें करता… अच्छी ज़िंदगी की खोज में मैंने सबसे अच्छी चीज तो खो दी। अब पछताने के सिवाय मेरे पास कोई चारा नहीं है।
जब मीरा से शादी कर ली थी, अब तो उसी के साथ रहना था। किसी तरह बस ज़िंदगी कट रही थी।
कोहरा धीरे धीरे छटने लगा था। स्टेशन पर पहुंचकर ट्रेन रुक गई। जतिन ने अपना बैग उठाया और अपने दफ्तर पर चला गया। दफ्तर से लौटकर जब वह घर आया,, तो मीरा ने बताया… उसके सामने वाले घर में एक पांच साल की छोटी बच्ची रहने आई है।
जतिन ने उसकी बात सुनी खाना खाया और अपने कमरे में जा कर सो गया।
अगली सुबह… छोटी बच्ची अपनी बालकनी में खेल रही थीं। देखने में बहुत सुंदर थी उसकी मीठी सी आवाज बड़ी प्यारी थी। खेलते हुए उसकी बोल जतिन के बालकनी में आ गिरी। वह छोटी बच्ची अपनी बोल लेने जतिन के घर आई।
उसने कहा… अंकल आप मुझे मेरा बाल दे दीजिए जो ऊपर आपके घर आ गई है। उसकी बोली इतनी प्यारी थी कि जतिन उसी की बात सुनता रहा। बोल देते हुए पूछा… बेटा तुम्हारा नाम क्या है? दीया, छोटी बच्ची ने बताया। दीया नाम सुनकर उसे तारा की याद आई।
खैर जाने दो इस बात को कई साल बीत गए। अब तो न जाने तारा कहां होगी?
तुम्हारा नाम तो बड़ा प्यारा है किस ने रखा जतिन ने मुस्कुराते हुए पूछा? मेरी मम्मी ने रखा है। मेरी मम्मी बहुत ही अच्छी है। दीया ने अपनी मम्मी के बारे में बहुत अच्छी अच्छी बात जतिन को बताई।
हमे भी आपकी मम्मी से मिलना है वह बोला।
दीया ने बताया… मिल लेना हम तीन चार दिन यहां रुकेंगे।
तारा कई सालों बाद उस शहर में आई थी। उसे नहीं पता था जतिन अब यहां रहता है। जब वो आई थी तब मीरा से उसकी मुलाकात हुई थी।
मीरा ने बताया था वो अपने पति के साथ यहां रहती है।
अपनी मम्मी की आवाज सुनकर दीया बोल लेकर अपने घर चली गई।
जतिन भी तैयार होकर अपने दफ्तर चला गया। मीरा पहले से ही अपने काम में व्यस्त थी।
जतिन को दीया से बात करना अच्छा लगता था। तारा को पता था सामने वाले घर में जतिन रहता है। शाम के समय दीया अपनी मम्मी के साथ शहर घुमाने गई।
दीया ने पार्क में झूले पर झूलने की जिद्द की पहले तो उसकी मां ने उसे मना किया, लेकिन बाद में उसे झूलने दिया।
बैच पर बैठी वो दीया को देख कर मुस्कुरा रही थी। दीया उसकी पूरी दुनिया थी।
जतिन भी वहीं पार्क में था। उसने दीया को खेलते देखा तो वह उसके पास आ गया। उसने पूछा तुम यहां किस के साथ आई हो? बेटा। मम्मी के साथ दीया ने अपनी मां की ओर इशारा करते हुए कहा।
जतिन की मुलाकात जब दीया की मां से हुई। वह चुप चाप खड़ा, बस सामने देखता रहा। सालों बाद तारा उसके सामने खड़ी थी। तुम यहां कैसे? तारा भी उसे देख कर ठिठक गई। उन दोनों ने कभी नहीं सोचा था, उनकी मुलाकात इसी शहर में और ऐसे होगी। थोड़ी देर तक वे दोनों चुप रहे, किसी ने एक दूसरे से कुछ नहीं बोला।
तभी भाग कर दीया अपनी मम्मी के पास आई, बोली… अंकल ये है मेरी सुपर मम्मी। जो सबकी मदद करती हैं।
पहले तो जतिन को विश्वास नहीं हुआ, कि तारा उसकी मां है। मुस्कुरा कर कहा… सच में तुम्हारी मम्मी बहुत अच्छी है। दीया मुस्कुराई और झूला झूलने चली गई।
जतिन ने तारा से पूछा… क्या तुमने शादी कर ली? और दीया तुम्हारी बेटी है?
किसने कहा बच्चों के लिए शादी करना जरूरी है। तारा ने मुस्कुराते हुए कहा।
हां दीया मेरी बेटी है। मैंने उसे जन्म तो नहीं दिया, पर मेरे लिए वो सबकुछ है। तुम्हीं ने कहा था… अपने बच्चे अपने होते हैं। क्या दीया मेरी बेटी नहीं लगती? क्या वो अच्छी नहीं है? तुमने ही मेरी सोच को गलत बताया, इसी कारण हमारा झगड़ा हुआ था,, और तुमने मुझे जाने को कहा था।
तलाक़ के बाद मैंने कुछ नहीं छोड़ा, दिल से लोगो की मदद की। नए नए लोगों को अपने साथ जोड़ा और अलग अलग नामो से एनजीओ शुरू किये। अपने काम को जरूरतमंद लोगों तक पहुंचना ही मेरा लक्ष्य बन चुका था।
और ऐसे ही एक अनाथालय से मैंने दीया को गोद लिया। तुम्हारे लिए तो अपने बच्चे ही सबकुछ है। आज भी तुम्हें मेरी सोच खराब लगती होगी? पर मुझे ज़िंदगी से और कुछ नहीं चाहिए। मेरी खुद की पहचान है, मेरी एक बेटी है, मैं खुश हूं उसके साथ। मुझे अब किसी की जरूरत नहीं है। तुम्हारे जाने के बाद मेरा शादी में विश्वास नहीं रहा,, मुझे नहीं लगता था कोई मेरी बात समझेगा।
लेकिन हां, तुमने तो शादी कर ली होगी न? और अब तो तुम खुश होंगे अपनी जिंदगी में, अपने परिवार के साथ।
तुम्हें तो मेरे काम और मेरी सोच से परेशानी थी।
जतिन नीचे ज़मीन पर देख रहा था… जैसे उसके पास आज कोई जवाब नहीं है। धीमी सी आवाज में बोला बस जिंदगी कट रही है। अच्छी ज़िंदगी के लिए शादी की, सोचा परिवार के साथ खुशी खुशी रहूंगा।
लेकिन जो हम सोचते है वो होता नहीं और जो नहीं सोचते वो हो जाता है। कुछ बेहतर पाने के लालच में हम कुछ खास खो देते हैं।
जो खो गया बस उसका मलाल है, जो नहीं मिला उसका क्या मलाल करना है। शायद मेरी किस्मत ही ऐसी है। तारा बोली… ख़राब कुछ नहीं होता। बस हमारा नज़रिया गलत होता है, कुछ चीज़ें हम जानबूझ कर ख़राब कर देते हैं। और तुमने सच ही कहा है… हम बेहतर पाने के लिए जो हमारे पास है उससे नजरंदाज करते हैं। जब वो सब चला जाता है तब उसका मलाल करते हैं, अफ़सोस करते हैं। अच्छी ज़िंदगी की खोज करते करते, न जाने कितने कीमती पलो को गवा देते हैं।
पर सच तो ये है… कि खुशियां सब जगह होती है बस हम ढूंढते नहीं। मैंने ढूंढनी उन चेहरों में जिन्हें कोई देखना नहीं चाहता, उन अनाथ बच्चों में जिनका कोई नहीं होता, उन बुजुर्गों में जिनके बच्चे उन्हें छोड़ देते हैं।
तारा की बातों में एक सुकून था, उसके चेहरे पर संतोष की हँसी थी जो सबकुछ मिल जाने पर मिलती है।
जतिन को एहसास हो रहा था उसने क्या खोया!
उनसे तारा से पूछा… तुम कब जा रही हो? मेरी आज रात की ट्रेन ने है, तारा ने बताया।
उसने दीया को घर चलने के लिए कहा… दीया प्यारी सी मुस्कान के साथ बोली… अंकल आप भी हमारे घर आना।
उसने अंकल को बाय; बोला और चली गई। जतिन ने मुस्कुराते हुए कहा,, ठीक है।
तारा ने वापस आकर अपना सामान लिया ओर अपने घर चली गई।
उसे पता था मीरा जतिन की पत्नी है। जब वो पहली बार मीरा से मिली तो तारा ने उसकी आंखो में चुलबुलापन देखा। उसे जरूरत थी,, ऐसे लोगों की जो उसे समझ सकें। उसकी कमियां तो सब गिनाते हैं, लेकिन कोई उसके साथ उन्हें ठीक नहीं करता। इसलिए सब उसे मोटी बुद्धि कहते हैं। तारा ने मीरा को समझा था।
और यही बात वो जतिन को समझाना चाहती थी,,, कि खुशियों सब जगह होती हैं, मगर हम ढूंढने की कोशिश नहीं करते।
जतिन पर तारा की बातों का बहुत असर हुआ। उसे समझ आ रहा था,, तारा क्या कहना चाहती थी। धीरे धीरे वह मीरा को समझने लगा,, अगर उससे कोई गलती हो जाती तो उसे सही करता, उस के साथ बाहर घूमने जाता। यही तो मीरा को चाहिए था कोई उसे समझे।
वक्त के साथ सब कुछ ठीक हो रहा था। जिस अच्छी ज़िंदगी को जतिन खोज रहा था, वो पहले से ही उसके पास थी।
वो अब मीरा के साथ खुश था,,, लेकिन आज भी उसे अच्छी ज़िंदगी की खोज थी।
तारा दीया के साथ खुश थी, वो एक स्वतंत्र नारी थी। जो अपने फैसले ख़ुद लेती है।
जिस ज़िंदगी को हम जीना चाहते हैं,, वो अच्छे पल गुजर जाते हैं,, और हम अच्छी ज़िंदगी की खोज में लगे रहते हैं।।
जीवन का आनंद लेना भूल जाते हैं।।।