Adakaar - 27 in Hindi Crime Stories by Amir Ali Daredia books and stories PDF | अदाकारा - 27

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अदाकारा - 27

*अदाकारा 27*

मेतो दीवानी हो गई
प्यार तेरे खो गई
सुबह के नौ बजने आये थे।
ओर तभी शर्मिला के मोबाइल की रिंग बजने लगी।
शर्मिला गहरी मीठी नींदमे सो रही थीं।और फ़ोन की घंटी बजने से उसकी मीठी नींद टूट गई।उसने गुस्से से से मोबाइल की तरफ़ देखा। स्क्रीन पर निर्देशक मल्होत्रा का नंबर दिखाई दिया।
शर्मिला ने फ़ोन कलेक्ट करते हुए कहा।
"मैं ग्यारह बजे तक पहुँच जाऊँगी।"
"अरे मैडम।अपनी सुबह नौ बजे की बात हुवी थी?आप ग्यारह बजे आवोगी ऐसे कैसे चलेगा?"
"देखिए सर।मैं ग्यारह बजे से पहले शूटिंग पर कभी नहीं पहुँचूँगी।तो अभी भी ज़्यादा देर नहीं हुई है।अगर आप किसी और एक्ट्रेस को लेना चाहें,तो ले सकते हैं।मैं आपकी साइनिंग अमाउंट वापस करने को तैयार हूँ।"
शर्मिलाने मल्होत्रा को साफ साफ शब्दों में कह दिया।शर्मिला के स्पष्ट शब्दोंने मल्होत्रा को ढीला कर दीया।
"मैडम।*हो गए बर्बाद*की यह कहानी खास तौर पर आपको ध्यान में रखकर लिखी गई है।और आप ही यह फिल्म करेंगी। प्लीज़ अब से फिल्म छोड़ने का ज़िक्र मत करना।जल्दी आइए,हम आपका इंतज़ार कर रहे हैं।"
यह कहकर मल्होत्रा ने फ़ोन रख दिया।
आज शूटिंग का पहला दिन था। इस लिए ज्यादा कुछ करने को नहीं था।
दो-चार शॉट देने के बाद,शर्मिला छह बजे तक तो फ्री हो गईं।इसलिए उसने स्टूडियो से सीधे उर्मिला से मिलने जाने का फ़ैसला किया। उसने उर्मिला को फ़ोन किया।
"हेलो उर्मि..."
शर्मिला की आवाज़ सुनकर उर्मिला थोड़ी भावुक हो गईं।उसने थोड़ी नम आवाज़ में जवाब दिया।
"हाँ शर्मि। बोल.."
उर्मिला की नम आवाज़ सुनकर शर्मिला की आवाज़ भी नम हो गई।
"तुम्हारी आवाज़ इतनी ढीली क्यों है..उर्मि.."
"तुम्हारा लहजा भी तो नरम है.."
"मैं..मैं तुमसे मिलना चाहती हूँ।"
"तो आओ मेरी बहन... मैं भी तुमसे मिलने के लिए बेताब हूँ शर्मी।तुम कब आ रही हो?"
"मैं अभी आना चाहती हूँ..."
शर्मिलाने कहा।तो उर्मिलाने भी तुरंत हरी झंडी दे दी।
"तो फिर तुम कोनसा मुहरत ढूँढ रही हो? आओ,मैं दरवाज़े पर नज़र गड़ाए तुम्हारा इंतज़ार करूँगी।"
"लेकिन अगर जीजू नाराज़ हो गए तो?"
"अभी चिंता मत करो।वह आठ बजे से पहले घर नहीं आएंगे।"
"ठीक है।तो मैं डेढ़ घंटे में पहुँच जाऊँगी।"
और शर्मिला अपनी ज़ाइलो कार लेकर बीमानगर की ओर चल पड़ी।ट्रैफ़िक की वजह से शर्मिला आधे घंटे की बजाय एक घंटे में बीमानगर पहुँची।
उर्मिला के घर पहुँचते-पहुँचते सात बज चुके थे।उर्मिला बेसब्री से अपनी सहयोदर का इंतज़ार कर रही थी।
दोनों बहनें तीन साल के बाद मिल रही थीं। दोनों ने एक-दूसरे को गले लगाया।
शर्मिला धीरे से बोली।
"मुझे माफ़ कर दो उर्मि...मुझे...माफ़ कर दो। मैं...मैं हमेशा ग़लत थी..."
"मैंने भी गुस्सेमें तुम पर हाथ उठाया था शर्मि। तु भी मुझे माफ़ करना।..."
उर्मिला की बात बीच में ही काटते हुए शर्मिला बोली।
"तुम माफ़ी क्यों मांग रही हो?मैं तो उस डाँट की ही हकदार थी..."
ऐसा कहते हुए शर्मिलाने अपनी छोटी उंगली से उर्मिला के गालों पर से बहते आँसुओं को पोंछा।
"चलो उस पुरानी बात को भूल जाते हैं।और अपने रिश्ते को फिर से पहले जैसा सामान्य बनाते हैं।"
शर्मिला की बात सुनकर उर्मिला ने खुशी से शर्मिला के दोनों हाथ अपने हाथों में ले लिए।
"शर्मि।ओह शर्मि।तुम्हें नहीं पता कि तुमने आज मुझे कितनी बड़ी खुशी दी है। तुमने मेरी ज़िंदगी में वापस आकर मुझ पर सचमुच एक बहुत बड़ा एहसान किया है।"
"नहीं।नहीं उर्मि।मैंने तुम पर कोई एहसान नहीं किया।बल्कि अपनी गलती मानकर,मैंने तुम्हारे प्रति किए गए अपराध का पश्चाताप भी किया है।और साथ ही,मेरे जीवन में जो अकेलापन था,वह भी अब तुम्हारे सहयोग और साथ से दूर हो जाएगा।उर्मि।क्या तुम मेरा साथ दोगी?"
"ज़रूर शर्मिला।अब हम फिर से एक हो गए हैं।पहले की तरह,हम सुख-दुख में एक-दूसरे के साथ खड़े रहेंगे।"
"लेकिन जीजू?क्या वह मुझे माफ़ भी करेंगे?"
"मैं उन्हें मनाने की कोशिश करूँगी,शर्मिला।"
"और अगर वह नहीं माने तो?"
शर्मिला ने अपनी शंकाएँ व्यक्त कीं। 
तो उर्मिलाने उसका रास्ता निकालते हुए कहा।
"फिर हम एक-दूसरे से ऐसे मिलेंगे कि उन्हें पता ही न चले।कभी तुम्हारे घर पर तो कभी मेरे घर पर।"

(क्या सुनील शर्मिला को माफ़ कर पाएगा? क्या उर्मिला और शर्मिला फिर से पहले जैसी ज़िंदगी जी पाएँगे?)