Tea at the Crossroads in Hindi Classic Stories by Ritik Sandilya books and stories PDF | चौराहे की चाय

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चौराहे की चाय

सुबह का अंधेरा जब धुंध में घिरा होता है, तब किसी चौराहे पर रखी डिबिया की हल्की-सी रोशनी चारों ओर जीवन का आभास दिलाती है। नींद से बोझिल आंखे,और उबासी लिए लोग उसी रोशनी की ओर खींचे चले आते हैं। वहाँ उन्हें जो खींच लाता है, वह सिर्फ रौशनी नहीं बल्कि “चाय” की खुशबू है।

हमारे यहाँ चाय केवल एक पेय पदार्थ नहीं, बल्कि एक भावना है। यह ऐसा एहसास है जो गले से उतरते ही सुकून दे जाता है। चाय वह डोर है जो परिवारों को जोड़ती है—सुबह की शुरुआत से लेकर शाम की थकान तक। यह मेहमानों को थोड़ी देर और बैठाए रखने का बहाना भी है और दोस्तों की लंबी गुफ्तगू का साथी भी।

ऐसी ही एक चाय की टपरी की कहानी मेरे मन में बसती है। मेरे एक सहपाठी की यह छोटी-सी दुकान है जहाँ हर सुबह धुएँ के साथ चाय की महक फैलती है और लोग खुद-ब-खुद चले आते हैं। वहां अक्सर समूहों में बैठे लोग समाज की समस्याओं से लेकर देश के गंभीर मुद्दों तक का समाधान कर देते हैं। ग्रामीण समाज की यही खूबसूरती है कि हर दूसरा व्यक्ति एक-दूसरे को पहचानता है, और चाय की चुस्कियाँ उनके बीच छिपे राज़ों को खोल देती हैं।

जब भी मैं शहर से अपने गाँव लौटता हूँ, तो सबसे पहले अपने उस मित्र से मिलने उसकी दुकान पहुँचता हूँ। वह हमेशा मुस्कुराकर मेरा स्वागत करता है, और फिर हमारी बेतुकी लेकिन गहरी बातें शुरू हो जाती हैं। उन बातों के बीच चाय का आना उतना ही तय है जितना दिल की धड़कनों के बीच विराम।

चौराहे पर बिकने वाली चाय हमेशा सस्ती रखी जाती है ताकि हर इंसान उसका स्वाद ले सके। वहाँ अक्सर दुकानदार और ग्राहकों के बीच प्यारी-सी नोकझोंक भी देखने को मिलती है—
“आज चाय फीकी है।”
“कल वाली ज्यादा अच्छी थी।”
“भाई, अभी तीन ही रुपए हैं… बाकी कल दे दूँगा।”
और इन मीठी बहसों के बीच दोस्ती और अपनापन और गहरा हो जाता है।

क्योंकि हम स्कूल के साथी रहे हैं, इसलिए उसके साथ बैठकर पुरानी शरारतें याद करना हमे हमारे पुराने दिनों को याद दिलाता है। उसे पता है मैं ज्यादा चाय नहीं पीता, फिर भी वह मुझे आधा कप पकड़ाता है और खुद भी उतनी ही निकाल लेता है ताकि मैं अकेला महसूस न करूँ। उसकी यह आदत मुझे हमेशा दोस्ती की सच्ची गर्माहट का एहसास कराती है।

कई बार मुझे लगता है कि लोगों के लिए चाय किसी प्रेम कहानी से कम नहीं। यह गले से उतरते ही ऐसा सुख देती है जैसे कोई प्रेमिका की गोद में सिर रखकर विश्राम कर रहा हो।

आजकल भले ही लोग महंगे रेस्तरां में जाकर स्टेटस दिखाने वाली फीकी चाय पीना पसंद करते हों, लेकिन मेरे लिए चाय का असली स्वाद वहीं है जहाँ दिल से अपनापन मिले। मैं तो यही कहूँगा कि अपने प्रियजनों के साथ लंबी यात्राओं में, किसी ढाबे या टपरी पर बैठकर चाय पीने का आनंद ही अलग है।

मेरी किस्मत देखो—दोस्तों के साथ चाय बाँटना मुझे बेहद अच्छा लगता है, और संयोग से मेरे सबसे प्यारे दोस्त की ही चाय की टपरी है।

सचमुच, “ये बात पुरानी है, चाय एक कहानी है।”