Nehru Files in Hindi Anything by Rachel Abraham books and stories PDF | नेहरू फाइल्स - भूल-123

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नेहरू फाइल्स - भूल-123

भूल-123 
पुरुषोत्तम दास टंडन के प्रति दुर्व्यवहार और कैसे नेहरू ने निरंकुश शासन की कामना की 

बिल्कुल अलोकतांत्रिक तरीके से देश के पहले प्रधानमंत्री (कृपया भूल#6 देखें) बननेवाले ‘महान् लोकतांत्रिक’ नेहरू ने पटेल के निधन से पहले सन् 1950 में पार्टी पर अपने पूर्ण वर्चस्व के लिए अपनी पसंद के पार्टी अध्यक्ष को चुनकर पूरी मोर्चेबंदी कर ली। नेहरू ने एकतरफा रूप से जे.बी. कृपलानी को अध्यक्ष पद के उम्मीदवार के रूप में घोषित किया; हालाँकि वे और पटेल पूर्व में कृपलानी का समर्थन नहीं करने पर सहमति प्रदान कर चुके थे। पटेल बहुत आहत हुए और उन्होंने कहा, “मैं भीतर तक हिल गया हूँ। वह (नेहरू) कितना नीचे गिर गए हैं।” (मैक/297) 

पटेल ने अध्यक्ष पद के लिए पुरुषोत्तम दास टंडन को अपना पूरा समर्थन दिया। टंडन एक बेहद सम्मानित नेता के रूप में अपनी सादगी, ईमानदारी और निडरता के लिए प्रसिद्ध थे तथा एक ऐसे व्यक्ति के रूप में भी, जिन्हें दबाव में नहीं लिया जा सकता था—एक ऐसा लक्षण, जो शायद नेहरू को कसकता था। हालाँकि टंडन की उम्मीदवारी को कमजोर करने के लिए छद्म धर्मनिरपेक्ष नेहरू ने उन्हें सांप्रदायिक और पुनरुत्‍थानवादी के रूप में पेश करने की पूरी कोशिश की, जो पुराने मार्क्सवादी-कम्युनिस्ट-नेहरूवादी-समाजवादी तरीके का एक हिस्सा था। किसी पर छाप लगाने का काम नेहरू ने प्रारंभ किया। पहले आप किसी व्यक्ति को फासीवादी, सांप्रदायिक, रूढ़िवादी, आधुनिकता का विरोधी, पुनरुत्‍थानवादी इत्यादि के रूप में पेश करके बदनाम कर दो और फिर उससे छुटकारा पा लो। नेहरू की परिभाषा के अनुसार, भारत को बेतहाशा नुकसान पहुँचाने वाले कृष्णा मेनन और के.एम. पणिक्कर जैसे क्रिप्टो-कम्युनिस्ट अच्छे थे और वे उच्‍च सार्वजनिक पदों के याेग्य थे, लेकिन टंडन जैसे लोग नहीं। 

इस संदर्भ में, ध्यान देने योग्य बात यह है कि टंडन शीर्ष स्वतंत्रता सेनानियों में से एक थे, जिन्होंने देश के लिए कई बलिदान दिए थे। उन्होंने विभाजन का भी मुखर विरोध किया था। 14 जून, 1947 को उन्होंने जी.बी. पंत द्वारा विभाजन पर प्रस्तुत किए गए ए.आई.सी.सी. प्रस्ताव का विरोध किया था और उसके खिलाफ मतदान भी किया था। उन्होंने कहा था कि वे विभाजन की भारी कीमत चुकाने के बजाय कुछ और साल ब्रिटिशों की गुलामी को सहने के लिए तैयार हैं। उन्होंने दावा किया था कि नेहरू सरकार मुसलिम लीग के दबाव में है। जब उन्होंने अपने भाषण के अंत में कहा कि ‘आइए, हम मिलकर ब्रिटिश और (मुसलिम) लीग दोनों के खिलाफ लड़ें’, तो उनका स्वागत तालियों की गड़गड़ाहट से हुआ। (डी.डी./248) 

नेहरू ने इस बात पर भी आपत्ति उठाई थी कि टंडन ने शरणार्थियों के सम्मेलन में भाग लिया था, जिसका कोई मतलब ही नहीं था। अभिमानी नेहरू ने देशभक्त टंडन को तीखे और दिखावटी तौर पर नैतिक शब्द लिखे— “आपका चुनाव भारत में कुछ ऐसी ताकतों के लिए एक बड़ा प्रोत्साहन साबित होगा, जो मेरी नजर में हानिकारक है।” (मैक/251) ब्रिगेडियर बी.एन. शर्मा ने लिखा— “नेहरू के मन में अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, हिंदी भाषा के संरक्षण और हमारी पुरानी परंपराओं के आधार पर अपनी भारतीय पहचान या दर्शन के लिए जाने जानेवाले किसी भी व्यक्ति के प्रति एक नापसंदगी की भावना थी।” (बी.एन.एस./281) 

नेहरू की असभ्य, अभद्र और असंस्कृत टिप्पणियों के ठीक विपरीत टंडन ने 12 अगस्त, 1950 को नेहरू को लिखे अपने सुरुचिपूर्णपत्र में लिखा—
 “आप मुझे संकीर्ण सांप्रदायिकता से जोड़ते हैं, जिसे आप पुनरुत्थानवाद कहते हैं।...कुछ ऐसे मामले रहे हैं, जिन पर आपका और मेरा आमना-सामना नहीं हुआ है—हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में अपनाना और देश का विभाजन (टंडन ने इसका विरोध किया था) तथा इसके परिणामस्वरूप सामने आनेवाले मुद्दे उनमें से प्रमुख थे। महान् व्यक्तियों के लिए भी अपनी बातों पर टिके रह पाना, मौलिक सिद्धांतों की अपनी याेग्यता साबित करना मुश्किल हो रहा है। लेकिन मैं आपसे इस मुद्दे को एक बिल्कुल अलग नजरिए से देखने की गुजारिश करता हूँ। किसी भी मामले में उन लोगों के प्रति संकीर्णता का भाव रखना आवश्यक क्यों है, जो आपसे अलग सोच रखते हैं?...पुनरुत्थानवाद एक भ्रमित करनेवाली अभिव्यक्ति है। इसका अर्थ पुनर्जागरण हो सकता है और इसका अर्थ प्रतिक्रियावाद हो सकता है। मैं आज उन कुछ महान् आध्यात्मिक मानकों को पुनरुज्जीवित करूँगा, जिनके लिए हमारा देश अतीत में खड़ा था। मैं उन्हें अनमोल विरासत मानता हूँ। साथ ही मैं उन तर्कहीन हठधर्मियों को भी खारिज करता हूॅं, जो किसी भी काररवाई के लिए हिंदू धर्म और इसलाम दोनों को घेरते हैं।...मेरा ऐसा मानना है कि तमाम धार्मिक उपदेशों को बुद्धि से तौलना चाहिए और उनमें से किसी एक को भी सिर्फ एक पुस्तक के आधार पर स्वीकार नहीं कर लेना चाहिए।...” (मैक/282) 


नेहरू ने टंडन के अध्यक्ष चुने जाने की दशा में पद से इस्तीफा देने की धमकी दी। नेहरू ने 25 अगस्त, 1950 को पटेल को लिखा— “मैं अपने मन में इस बात को लेकर पूरी तरह से स्पष्ट हूँ कि टंडन के अध्यक्ष चुने जाने की स्थिति में मैं इसे अपने प्रति कांग्रेसियों द्वारा अविश्वास मानूँ या फिर कम-से-कम उनके द्वारा, जो अध्यक्षीय चुनाव में मतदान करते हैं। इसके परिणामस्वरूप, मैं कांग्रेस कार्य समिति या अन्य पदों पर काम नहीं कर पाऊँगा। इससे आगे मैं प्रधानमंत्री के रूप में जारी नहीं रखना चाहूँगा।” (मैक/294) 

नेहरू की धमकियों और षड्‍यंत्रों के बावजूद टंडन ने कृपलानी के 1,092 के मुकाबले 1306 वोट प्राप्त कर जीत हासिल की। जैसाकि उम्मीद थी, सत्तालोलुप नेहरू ने अपने पद से इस्तीफा नहीं दिया। चुनावी नतीजों के अगले दिन जब राजाजी पटेल से मिलने गए तो पटेल ने मजाक में उनसे पूछा, “क्या आप जवाहरलाल का इस्तीफा लाए हैं?” (मैक/300) संयोग से, चुनाव से ठीक एक दिन पूर्व रफी अहमद किदवई (नेहरू के खासमखास) ने राजाजी को बताया था, “अगर टंडन जीत जाते हैं और वे (नेहरू) इस्तीफा नहीं देते हैं तो मैं सार्वजनिक तौर पर कहूँगा कि वे एक अवसरवादी हैं।” (मैक/300) 

हालाँकि, 15 दिसंबर, 1950 को पटेल के देहावसान के तुरंत बाद नेहरू ने टंडन को पद से हटाने के लिए अपने षड्‍यंत्रों की शुरुआत कर दी। नेहरू ने धमकी दी कि अगर सी.डब्‍ल्यू.सी. उनके हिसाब से काम नहीं करती है तो वे इससे अलग हो जाएँगे, यह देखते हुए कि ऐसा करना कांग्रेस अध्यक्ष का विशेषाधिकार था। यह एक अनुचित माँग थी। 

पटेल के देहांत के बाद नेहरू के लिए दबाव बनाना जरा भी मुश्किल नहीं रहा; क्योंकि वे प्रधानमंत्री थे, जो ऐसी स्थिति में थे कि बेशुमार लाभ पहुँचा सकते थे और टुकड़े फेंक सकते थे। इसके अलावा, वे वर्ष 1952 के आगामी चुनावों में टिकट वितरण में एक महत्त्वपूर्ण भूमिका भी निभाने वाले थे। टंडन ने नेहरू की चालों का विरोध करने का पूरा प्रयास किया; लेकिन नेहरू के कहने पर विभिन्न दिशाओं से पड़नेवाले दबाव के चलते उन्होंने हथियार डाल दिए और 9 सितंबर, 1951 को इस्तीफा दे दिया। नेहरू ने तुरंत ही अध्यक्ष के रूप में पदभार सँभाल लिया, जबकि वे पहले से ही प्रधानमंत्री के पद पर आसीन थे और यह कांग्रेस के ‘एक व्यक्ति एक पद’ के सिद्धांत की पूर्ण अवहेलना था। इसके बिल्कुल उलट, गांधी के समय में जब कांग्रेस अध्यक्ष नेहरू, 1946 में अंतरिम सरकार के प्रधानमंत्री चुने गए थे तो उन्हें पार्टी अध्यक्ष का पद छोड़ना पड़ा था। इसके अलावा, अध्यक्ष का एक वर्ष का कार्यकाल पूरा होने के बाद भी उस पर बने रहे और वर्ष 1951 के बाद तीन और साल तक पार्टी अध्यक्ष बने रहे तथा उसके बाद उन्होंने अपने विश्वासपात्र ढेबर को पार्टी अध्यक्ष बनाया, जो वर्ष 1954 से 1958 तक इस पद पर आसीन रहे। उनके बाद नेहरू की बेटी इंदिरा इस गद्दी पर बैठीं। इंदिरा के बाद नेहरू के ही एक और विश्वासपात्र नीलम संजीव रेड्डी कांग्रेस अध्यक्ष बने, जो वर्ष 1960 से लेकर 1963 तक इस पद पर बने रहे। बेशक, रेड्डी ने बाद में शिकायत की कि उनसे ‘श्रीमती गांधी के चपरासी’ जैसा व्यवहार किया गया। (आर.एन.पी.एस./24) नेहरू ने न सिर्फ अपना प्रभुत्व सुनिश्चित किया, बल्कि अपने राजवंश का भी! 

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता डी.पी. मिश्र ने यह कहते हुए विरोध-स्वरूप इस्तीफा दे दिया— “जिस प्रकार से श्री पुरुषोत्तम दास टंडन को उनके पद से हटाया गया है और नेहरू खुद उनके स्थान पर कांग्रेस अध्यक्ष बन बैठे हैं, हमारे प्रधानमंत्री अब पूरी तरह से तानाशाह बन गए हैं। मैं इस पूरे घटनाक्रम के बाद कांग्रेस में बने रहने को देश के साथ विश्वासघात मानता हूँ। कल हुई एक राजनीतिक हत्या कांग्रेस में लोकतंत्र की हत्या है। यह भारत में लोकतंत्र के कत्लेआम की शुरुआत भी है।” (मैक/308) 

टंडन को कांग्रेस अध्यक्ष के पद से हटाने की उपर्युक्त दुर्भाग्यपूर्ण घटना के बाद नेहरू एकछत्र बादशाह बन गए, क्योंकि वे सरकार (प्रधानमंत्री के रूप में) और पार्टी (अध्यक्ष के रूप में) दोनों को सँभाल रहे थे। उन्होंने जैसे चाहा, वैसे राजनीतिक खेल खेला। उसके बाद कोई भी नेहरू का विरोध करने का साहस नहीं जुटा पाया।