भूल-112
नेहरू और नेताजी सुभाष का रहस्य
वंशतंत्र, जो वंशवादी लोकतंत्र है, पूरी तरह से अनुचित है और लोकतंत्र की भावना के विपरीत है। यह योग्यता को नगण्य समझता है और सक्षम को रोकता है। वंशवादी प्रक्रिया के नतीजतन सामने आनेवाला नेतृत्व कभी अच्छा नहीं होता है। (कृपया भूल#99 भी देखें।) इसके अलावा, वंशतंत्र की एक और नकारात्मक बात यह है कि यह सच्चाई को दबाती है। राजवंश की निरंतरता के लिए आवश्यक है कि प्रभामंडल बनाए रखा जाए एवं इसके लिए आवश्यकता होती है—बुराइयों को छिपाए रखने की और सकारात्मकता को सामने लाने की और इसे अधिकतर कृत्रिम रूप से निर्मित किया जाता है। बुराइयों को छिपाने और निर्मित की हुई सकारात्मकता को सामने लाने के लिए सत्य के निरंतर दमन की आवश्यकता होती है। नेहरू और उनके राजवंश द्वारा सत्य के दमन का सबसे बड़ा उदाहरण है ‘नेताजी सुभाष की मृत्यु से जुड़ा रहस्य’, जिसके चलते अनुज धर को इस विषय से संबंधित अपनी पुस्तक का शीर्षक ही ‘इंडियाज बिगेस्ट कवर- अप’ रखना पड़ा। (ए.डी.)
कांग्रेस और नेहरू का हवाई दुर्घटना का दावा
यह दावा किया गया कि 18 अगस्त, 1945 को ताईपे में हुई एक विमान दुर्घटना में सुभाष चंद्र बोस की मृत्यु हो गई। उनकी अस्थियाँ टोक्यो के रेंकोजी मंदिर में रखी हैं। नेहरू तथा कांग्रेस ने इस परिकल्पना को स्वीकार कर लिया और नेताजी से संबंधित पहले दो जाँच आयोगों का निष्कर्ष भी बिल्कुल वैसा ही था, जिन्होंने आँखें मूँदकर सरकार की स्थिति का समर्थन किया, या कहा जा सकता है कि जान-बूझकर गलत जानकारी दी।
तथाकथित रूप से 17 अगस्त, 1945 को दोपहर के 2 बजे एक मित्सुबिशी केआई-21 हैवी बॉम्बर ने साईगॉन हवाई अड्डे से उड़ान भरी। उस बम-वर्षक विमान को परिवहन के लिए इस्तेमाल किया जाता था, लेकिन उसमें एक भी सीट नहीं थी (उसमें पैराशूट भी नहीं थे)। यात्रियों को फर्शपर ही तकिए डालकर बैठना पड़ता था। बम-वर्षक विमान के भीतर कुल 13 लोग मौजूद थे, जिनमें नेताजी सुभाष बोस और इंपीरियल जापानी सेना के लेफ्टिनेंट जनरल सुनामासा शिदेई भी शामिल थे। बोस के साथ उनके ए.डी.सी. और आई.एन.ए. के डिप्टी चीफ अॉफ स्टाफ लेफ्टिनेंट कर्नल हबीबुर रहमान भी थे।
विमान रात भर विएतनाम में रुकने के बाद ताइहोकू, फार्मोसा (अब ताइपे, ताइवान) में ईंधन भरने के लिए उतरा। 18 अगस्त, 1945 को ईंधन भरवाने के बाद विमान ने उड़ान भरी और कुछ ही क्षणों के बाद यात्रियों ने एक धमाके की आवाज सुनी। ग्राउंड क्रू ने पोर्टसाइड इंजन को गिरते हुए देखा और विमान क्रैश हो गया। पायलट और लेफ्टिनेंट जनरल शिदेई की मौके पर ही मौत हो गई। रहमान, जो चामत्कारिक रूप से बच गए थे, ने याद करते हुए बताया कि ‘विमान के क्रैश होने पर नेताजी पूरी तरह से पेट्रोल में भीग गए थे और इसके बाद उनके कपड़ों ने आग पकड़ ली थी। बुरी तरह से जले हुए नेताजी को तुरंत अस्पताल ले जाया गया, जहाँ जलने से हुए घावों के चलते कुछ ही घंटों बाद उनकी मृत्यु हो गई।’
लेकिन क्या उपर्युक्त कहानी सच हैं?
आखिर दुर्घटना के दावे संदिग्ध क्यों प्रतीत होते हैं
कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं।
हालाँकि, नेहरू ने बार-बार दुर्घटना के दावे को दोहराया था, लेकिन न तो ब्रिटेन (जो तब सत्ता में था) और न ही बाद की भारत सरकार द्वारा इसकी आधिकारिक पुष्टि की गई।
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“आप मुझसे नेताजी सुभाष चंद्र बोस की मृत्यु का प्रमाण भेजने के लिए कहते हैं, तो मैं आपको कोई सटीक और प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं भेज सकता।”
—1962 में सुरेश बोस से नेहरू
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मृत शरीर?
आखिर ऐसा कैसे संभव है कि नेताजी के अन्य सहयोगियों, जो एक दूसरी उड़ान में उनके पीछे आने वाले थे, ने कभी उनका शव नहीं देखा? आखिर क्यों घायल अवस्था में या फिर अस्पताल में उनके शव की कोई तसवीर नहीं खींची गई? कोई मृत्यु प्रमाण-पत्र क्यों नहीं जारी किया गया?
आई.एन.ए. के एक भरती अधिकारी की जीवनी
28 अगस्त, 2005 के ‘मुंबई मिरर’ में ‘नेहरू डिच्ड बोस!’(आर्ट) शीर्षक से छपे एक लेख में, जो आई.एन.ए. के एक भरती अधिकारी डॉ. वी.जे. धनन की जीवनी पर आधारित था, में कहा गया कि बोस की मृत्यु 18 अगस्त, 1945 को ताइवान में हुई उस कथित हवाई दुर्घटना में नहीं हुई थी। यह जापानियों द्वारा बोस को निर्वासन में सुरक्षित रखने के लिए तैयार की गई एक कहानी थी। सोवियत राजनयिकों ने दावा किया था कि बोस रूस में थे।
सरदार पटेल की प्रतिक्रिया
अहमद जाफर ने 31 अक्तूबर, 1946 की बैठक में अंतरिम सरकार के तत्कालीन गृह मंत्री सरदार पटेल से पूछा कि क्या सरकार के पास बोस की मृत्यु का कोई प्रमाण मौजूद है? पटेल का बेहद संक्षिप्त जवाब था, “नहीं!” अधिक दबाव देने पर पटेल ने जवाब दिया, “सरकार इस स्थिति में नहीं है कि वह इस विषय पर कोई आधिकारिक बयान दे सके।” जब पटेल का ध्यान नेहरू के उस निर्णायक बयान की तरफ दिलवाया गया कि बोस की मृत्यु हो चुकी है, तो पटेल ने खंडन करते हुए कहा कि सरकार का किसी भी प्रकार का कोई दृष्टिकोण नहीं है।
नेताजी के करीबी रिश्तेदारों के दावे
नेताजी के बड़े भाई शरत चंद्र बोस ने नेताजी की मौत के मामले में दो साल बाद अपनी चुप्पी तोड़ी (इस दौरान वे इस मामले की जाँच कर रहे थे) और वर्ष 1947 के अंत में यह कहा, “सुभाष जीवित हैं और जवाहरलाल यह बात जानते हैं।” शरत सन् 1950 में अपनी मृत्यु तक इसी बात पर विश्वास करते रहे। नेताजी की पत्नी एमिली शेंकल ने ‘विमान हादसे में मौत’ की कहानी पर भरोसा करने से इनकार कर दिया; बल्कि वे तो इस कहानी के इतना अधिक खिलाफ थीं कि जब सन् 1995 में तत्कालीन विदेश मंत्री प्रणव मुखर्जी ने नेताजी की अस्थियों को टोक्यो के रेंकोजी मंदिर से भारत लाए जाने के संबंध में चर्चा करने के लिए उनसे संपर्क किया तो उन्होंने मुखर्जी से मिलने तक से इनकार कर दिया।
नेहरू को बोस का पत्र और नेहरू का एटली को पत्र
कथित तौर पर वायसराय लॉर्ड ववे ले ने इस बात का उल्ख ले किया था कि नेहरू को बोस की कथित मतृ्यु की तारीख के बाद उनका एक पत्र मिला था। सन् 1970 में गठित किए गए ‘खोसला आयोग’ के सामने मेरठ के एक व्यक्ति श्यामल दास ने स्वीकार किया था कि नेहरू ने उन्हें 26/27 दिसंबर, 1945 की रात को (नेताजी की मतृ्यु कथित तौर पर 18 अगस्त को हुई थी) आसफ अली के निवास पर एक टाइपराइटर लेकर आने को कहा था और उन्हें एक पत्र टाइप करने को कहा था, जो इस प्रकार है (यू.आर.एल.56)—
श्रीमान क्लेमेंट एटली
ब्रिटिश प्रधानमंत्री
10, डाउनिंग स्ट्रीट, लंदन
प्रिय श्रीमान एटली,
मुझे सबसे विश्वसनीय सूत्रों से जानकारी मिली है कि सुभाष चंद्र बोस (आपके युद्ध अपराधी) को स्टालिन द्वारा रूसी क्षेत्र में घुसने की अनुमति प्रदान की गई है। यह रूसियों द्वारा धोखा और विश्वासघात है, क्योंकि रूस ब्रिटिश-अमेरिकियों का एक सहयोगी रहा है और उसे ऐसा नहीं करना चाहिए था। कृपया इस पर ध्यान दें और आपको जो उचित लगे, वह करें।
भवदीय
जवाहरलाल नेहरू
उपर्युक्त पत्र इस बात का सबसे बड़ा सबूत है कि बोस की मतृ्यु हवाई दुर्घटना में नहीं हुई थी और यह भी कि नेहरू इस बात को जानते थे। इससे भी अधिक ध्यान देनेवाली और चौंकाने वाली बात यह है कि उपर्युक्त पत्र में नेहरू द्वारा प्रयोग किया गया ‘...बोस, आपके युद्ध अपराधी ...’ शब्दों का प्रयोग। यह स्पष्ट रूप से नेताजी के प्रति नेहरू के तिरस्कार और अपमानजनक रवैए को दरशाता है। नेहरू की नजरों में बोस एक देशभक्त नहीं थे, जिन्होंने देश पर अपना सबकुछ न्योछावर कर दिया था, बल्कि वे एक युद्ध-अपराधी थे, जिनके साथ ऐसा व्यवहार किया जाना चाहिए था।
न्यायमूर्ति मुखर्जी आयोग (जे.एम.सी.) का सुस्पष्ट बयान
‘आउटलुक’ की एक रिपोर्ट के अनुसार—“ताइवान सरकार ने एक सदस्यीय नेताजी जाँच आयोग को सूचित किया है कि 18 अगस्त, 1945, वह तारीख जिस दिन माना जाता है कि नेताजी की मृत्यु हुई थी, को ताईहोकू में कोई विमान दुर्घटना ही नहीं हुई थी। (न्यायमूर्ति मुखर्जी) आयोग (जे.एम.सी.) की नियमित सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति एम.के. मुखर्जी ने पत्रकारों के सामने खुलासा करते हुए कहा कि ताइवान सरकार ने उनकी हालिया ताइवान यात्रा के दौरान आयोग के सामने इस बात की पुष्टि की है कि ताईहोकू में 14 अगस्त, 1945 और 20 सितंबर, 1945 के बीच कोई विमान दुर्घटना नहीं हुई है।” (यू.आर.एल.57)
जासूसी पर गुप्त सूची से हटाई गईं फाइलें
पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा 18 सितंबर, 2015 को गुप्त सूची से हटाई गई सभी 64 फाइलें नेताजी के परिवार के सदस्यों की जासूसी से जुड़ी हैं। इनमें मौजूद सामग्री से स्पष्ट होता है कि भारतीय सरकार के साथ-साथ नेताजी से जुड़ी कई विदेशी सरकारें भी इस बात को मानती थीं कि सुभाष बोस अभी जीवित हैं और यह कि विमान दुर्घटना में उनकी मृत्यु नहीं हुई थी।
विजयलक्ष्मी पंडित का कथित दावा
अनुज धर के मुताबिक— “बोस के विषय में सच्चाई की खोज के दौरान मैंने कई लोगों के मुँह से इस बात को सुना कि...विजयलक्ष्मी पंडित को सोवियत रूस में बोस की मौजूदगी के बारे में पता चल गया था। प्रचलित कहानी यह है कि वे जब मॉस्को से लौटकर आईं तो उन्होंने व्यक्तिगत तौर पर एक बयान दिया कि वे कुछ ऐसा जानती हैं, जिसका खुलासा ‘भारत में उजाला कर देगा और इसके परिणामस्वरूप प्राप्त होनेवाली खुशी उस खुशी से भी कहीं अधिक होगी, जिसका अनुभव लोगों ने 15 अगस्त, 1947 को किया था।’ इसी कहानी में आगे यह कहा जाता है कि नेहरू ने विजयलक्ष्मी से अपना मुँह बंद रखने को कहा। और चूँकि वे एक अच्छी बहन थीं, उन्होंने अपने फैसले को टाल दिया।” (यू.आर.एल./105)
जाँच आयोग
1. शाह नवाज कमेटी (एस.एन.सी.)
या नेताजी जाँच आयोग (एन.आई.सी.), 1956
“नेताजी सुभाष चंद्र बोस की मृत्यु की सच्चाई को लेकर मुझे जरा भी संदेह नहीं है—मुझे तब भी नहीं था और मुझे आज भी इस बात को लेकर तनिक भी संदेह नहीं है। इसको लेकर कोई जाँच नहीं हो सकती।”
—एच.वी. कामत द्वारा संसद् में प्रस्तुत किए गए
एक प्रश्न के उत्तर में 5 मार्च, 1952 को
नेहरू ने एक दशक तक नेताजी की मौत को लेकर जाँच को टालने का पूरा प्रयास किया। लेकिन जब वे ऐसा करने में नाकामयाब होने लगे तो उन्होंने एक जाँच समिति गठित करने का निर्णय लिया, जो उनके मन-माफिक रिपोर्ट दे। सन् 1956 में एक जाँच समिति का गठन किया गया, जिसकी अध्यक्षता शाह नवाज खान (24 जनवरी, 1914 से 9 दिसंबर, 1983), कांग्रेस के सांसद और आई.एन.ए. के एक पूर्व लेफ्टिनेंट कर्नल कर रहे थे। इसके अन्य सदस्य थे बंगाल सरकार द्वारा नामित एक आई.सी.एस. अधिकारी एस.एन. मैत्रा और दूसरे थे सुरेश चंद्र बोस, नेताजी के बड़े गैर-राजनीतिक भाई। इस समिति को ‘शाह नवाज कमेटी’ (एस.एन.सी.) या ‘नेताजी जाँच आयोग’ (एन.आई.सी.) के नाम से जाना गया। एस.एन.सी.व एन.आई.सी. ने अप्रैल एवं जुलाई 1956 के बीच भारत, जापान, थाईलैंड और विएतनाम में 67 गवाहों से पूछताछ की। पूछताछ किए जानेवाले लोगों में उस तथाकथित विमान दुर्घटना में जीवित बचे लोग शामिल थे, जिनमें से एक थे आई.एन.ए. के लेफ्टिनेंट कर्नल हबीबुर रहमान, जो तब तक पाकिस्तानी सेना का हिस्सा बन चुके थे।
एन.आई.सी. के दो सदस्य—शाह नवाज खान और एस.एन. मैत्रा इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि बोस की मृत्युविमान दुर्घटना में हो गई थी। हालाँकि तीसरे सदस्य (सुरेश चंद्र बोस) की राय जुदा थी। उन्हें इस बात का भरोसा नहीं था और उन्होंने एक असहमति नोट पेश किया। उन्होंने दावा कि कुछ महत्त्वपूर्ण साक्ष्यों को उनसे छिपाया गया था और यह भी कि समिति के दूसरे सदस्यों और साथ-साथ पश्चिम बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री बी.सी. रॉय ने उन पर अंतिम रिपोर्ट पर हस्ताक्षर करने के लिए दबाव डाला था। सुरेश बोस ने आरोप लगाया, “दोनों सरकार से जुड़े हुए मेरे दोनों सहयोगियों ने साक्ष्यों को अपने कब्जे में करने और उनमें हेर-फेर करने के पूरे प्रयास किए, ताकि वे प्रधानमंत्री के बयानों को सच साबित कर सकें।” संयोग से, शाह नवाज खान ने वर्ष 1952 से 1977 के बीच कई बार मंत्री पद सँभाला। क्या उन्हें खरीद लिया गया था?
2. खोसला आयोग, 1970-74
कई दिशाओं से लगातार पड़ रहे संदेह और दबावों के चलते सन् 1970 में पंजाब उच्च न्यायालय के एक सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश जी.डी. खोसला की अध्यक्षता में एक सदस्यीय जाँच आयोग स्थापित किया गया। इसने सन् 1974 में अपनी रिपोर्टपेश की। न्यायमूर्ति खोसला ने सुभाष बोस की मतृ्यु के प्रमुख तथ्यों पर ‘शाह नवाज कमेटी’ की पहले की रिपोर्ट का ही पक्ष लिया।
‘जस्टिस मुखर्जी आयोग’ (कृपया नीचे देखें) ‘खोसला आयोग’ द्वारा डॉ. सत्यनारायण सिन्हा द्वारा नेताजी से जुड़े रहस्य को उजागर करने के लिए दिए गए महत्त्वपूर्ण सुरागों को नजरअंदाज करने को लेकर बेहद निराश थे।
3. जस्टिस मुखर्जी जाँच आयोग (जे.एम.सी.) 1999-2005
वाजपेयी के एन.डी.ए. के शासनकाल के दौरान कलकत्ता उच्च न्यायालय के आदेश का पालन करते हुए सन् 1999 में ‘जस्टिस मुखर्जी जाँच आयोग’ का गठन किया गया था। इसकी अध्यक्षता उच्चतम न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश मनोज कुमार मुखर्जी कर रहे थे। आयोग ने कई देशों में बोस की मृत्यु से जुड़ी सैकड़ों फाइलों का अध्ययन किया और जापान, रूस एवं ताइवान का दौरा किया। इसने वर्ष 2005 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की। आयोग के कई निष्कर्ष थे—
1. विमान दुर्घटना को लेकर दर्ज किए गए मौखिक बयान विश्वसनीय नहीं थे।
2. बोस की मौत उस तथाकथित विमान दुर्घटना में नहीं हुई थी। ताइवान द्वारा दिए गए सहयोग की बदौलत जे.एम.सी. इस बात को प्रमाणित कर सका कि 18 अगस्त, 1945 को कोई विमान दुर्घटना हुई ही नहीं थी। अमेरिकी विदेश विभाग ने भी उस दिन ताइवान में कोई विमान दुर्घटना नहीं होने की बात का समर्थन किया था।
3. विमान दुर्घटना बोस को सुरक्षित निकल जाने देने के लिए जापान और ताइवान द्वारा खेली गई एक चाल थी। यह जापानी अधिकारियों और हबीबुर रहमान (जिन्होंने विमान दुर्घटना की गवाही दी) की जानकारी में बोस के लिए सोवियत संघ पहुँचने का एक सुरक्षित मार्ग सुनिश्चित करने के लिए एक गुप्त योजना थी। रिपोर्ट के अनुसार— “उपर्युक्त मुद् से दे जुड़ी तमाम परिस्थितियों और तथ्यों के आधार पर यह स्थापित होता है कि 17 अगस्त, 1945 को साईगॉन में हवाई जहाज पर चढ़ते समय नेताजी छद्म वेश में मित्र देशों की सेना से बचने और उनकी पहुँच से दूर निकलने में कामयाब रहे तथा इसके बाद हवाई यात्रा, उसके परिणामस्वरूप नेताजी की मृत्यु और उनके अंतिम संस्कार की पूरी कहानी जापानी सेना के अधिकारियों एवं दो डॉक्टरों तथा हबीबुर रहमान द्वारा बनाई गई और उसे 23 अगस्त, 1945 को फलैा दिया गया।”
4. भारत सरकार को बाद में उनके बच निकलने का पता चल गया, लेकिन उसने रिपोर्ट को दबाने का फैसला किया।
5. जापान के रेंकोजी मंदिर में रखी हुई अस्थियाँ, जो बोस की बताई जाती हैं, असल में एक जापानी सैनिक की हैं, जिसकी मौत दिल का दौरा पड़ने से हो गई थी।
6. जे.एम.सी. ने रूसी कनेक्शन की गहन जाँच के लिए कहा, जिसमें दावा किया गया था कि बोस को साइबेरियाई शिविर में हिरासत में लिया गया था।
7. जे.एम.सी. को इस बात का कोई सबूत नहीं मिला कि ‘गुमनामी बाबा/भगवानजी’, सन् 1985 में अपनी मृत्यु तक फैजाबाद में रहनेवाले एक साधु, वास्तव में वेश बदलकर रह रहे बोस थे। (हालाँकि, न्यायमूर्ति मुखर्जी ने बाद में कहा, ‘यह मेरी व्यक्तिगत भावना है, लेकिन मुझे इस बात का पूरा यकीन है कि वे नेताजी ही हैं।’)
17 मई, 2006 को यूपीए-1 के शासनकाल के दौरान गृह राज्यमंत्री एस. रघुपति द्वारा संसद् में की गई काररवाई संबंधी रिपोर्ट (ए.टी.आर.) और जे.एम.सी. की रिपोर्ट रखी गई। ए.टी.आर. में अन्य बातों के अलावा इस बात का उल्लेख था कि सरकार ने 8 नवंबर, 2005 को सौंपी गई आयोग की रिपोर्ट का विस्तार से अध्ययन कर लिया है—“और इस निष्कर्ष से सहमत नहीं है कि नेताजी की मृत्युविमान हादसे में नहीं हुई थी और रेंकोजी मंदिर में रखी हुई अस्थियाँ नेताजी की नहीं हैं।” जैसाकि उम्मीद थी, सरकार ने बिना कोई विशेष कारण बताए आयोग की रिपोर्ट खारिज कर दी। आखिरकार, वह यूपीए-1/कांग्रेस की सरकार थी।
यह भी वास्तविकता है कि आयोग को न तो भारत सरकार का सहयोग मिला और न ही उन देशों का, जिनकी उसने यात्रा की, सिवाय ताइवान के। ब्रिटिश, रूसी, जापानी और भारतीय सरकारों का प्रतिकूल रवैया सच्चाई को दबाने के लिए एक अंतरराष्ट्रीय साजिश का संकेत दे रहा था। भारत सरकार ने गोपनीयता के नाम पर कई महत्त्वपूर्णफाइलों और दस्तावेजों को जे.एम.सी. के साथ साझा करने से इनकार कर दिया। इससे निराश होकर जे.एम.सी. को अपनी अधूरी रिपोर्ट को ही कांग्रेस के तत्कालीन गृह मंत्री शिवराज पाटिल को सौंपना पड़ा।
क्या ‘भगवानजी’ या ‘गुमनामी बाबा’ ही सुभाष थे?
गुमनामी बाबा उर्फ भगवानजी एक साधु थे, जो 16 दिसंबर, 1985 को अपनी मृत्यु होने से पहले 30 वर्षों उत्तर प्रदेश के लखनऊ, फैजाबाद, सीतापुर, बस्ती और अयोध्या में रहे थे। उन्होंने आई.एन.ए. के पूर्व शीर्ष सीक्रेट सर्विस एजेंट डॉ. पवित्र मोहन रॉय से संपर्क बनाए रखा।
भगवानजी की मृत्यु के पश्चात् उनके निजी इस्तेमाल की चीजों (जर्मन दूरबीन, सोने के फ्रेम का चश्मा, बिल्कुल सुभाष के चश्मे जैसा, बँगला पुस्तकें और खोसला आयोग द्वारा सुभाष चंद्र बोस को आयोग के समक्ष प्रस्तुत होने के लिए जारी किए गए समन की मूल प्रति, नेताजी सुभाष की पारिवारिक तसवीरों का एक एल्बम, नेताजी की ‘मृत्यु’ से जुड़ी जाँचों से जुड़ी अखबारों की कतरनें, नेताजी के अनुयायियों के पत्र इत्यादि) से संकेत मिलता है कि वे खुद बोस ही थे! भगवानजी की जन्मतिथि 23 जनवरी थी और नेताजी की भी वही थी।
मुखर्जी आयोग ने भगवानजी और बोस की लिखावट के नमूने फोरेंसिक विशेषज्ञ डॉ. बी. लाल को भेजे थे। उनकी रिपोर्ट के अनुसार, दोनों नमूने आपस में मेल खाते थे। टी.ओ.आई. की एक रिपोर्ट के अनुसार— “एक शीर्ष अमेरिकी हस्तलेख विशेषज्ञ इस नतीजे पर पहुँचे थे कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस स्वतंत्रता के बाद कई दशकों तक एक तपस्वी, गुमनामी बाबा के वेश में भारत में रहे। विशेषज्ञ कार्ल बोगेट बोस और गुमनामी बाबा दोनों द्वारा लिखे गए पत्रों का गहन अध्ययन करने के बाद अपने इस निष्कर्ष पर पहुँचे।” (डब्ल्यू.आई.एच.6)
आखिर ऐसा कैसे संभव है कि भगवानजी के जीते-जी सरकार ने सच्चाई जानने का प्रयास ही नहीं किया? या फिर, अगर उसके द्वारा ऐसा किया भी गया तो वह उसे लेकर इतनी गोपनीय क्यों रही? भगवानजी के साथ सरकार का क्या संबंध था?
भगवानजी की मृत्यु के बाद भी सच जानने की दिशा में कोई कदम क्यों नहीं उठाया गया, विशेषकर तब, जब उनके व्यक्तिगत सामानों से ऐसा प्रतीत होता था कि मृतक ही शायद नेताजी हैं? अगर सच्चाई पहले से ही पता थी या पता लगा लिया गया था तो उसे सार्वजनिक क्यों नहीं किया गया? नेताजी के रूप में भगवानजी का स्वास्थ्य-लाभ या स्वागत क्यों नहीं किया गया? उनके रिश्तेदारों तक को अँधेरे में क्यों रखा गया?
आखिर, भगवानजी अनजान या ‘गुमनामी’ क्यों बने रहना चाहते थे? उनकी ऐसी क्या मजबूरियाँ थीं कि उन्होंने अपने आप को वास्तविक रूप में सामने लाने से गुरेज किया?
भारत के महान् सपूतों में से एक के साथ हुई इस त्रासदी का सच कैसे सामने लाया जा सकता है, जबकि उनके हमवतन और राजनेता दशकों से मूक और उदासीन गवाह बने हुए हैं?