Nehru Files - 106 in Hindi Book Reviews by Rachel Abraham books and stories PDF | नेहरू फाइल्स - भूल-106

Featured Books
Categories
Share

नेहरू फाइल्स - भूल-106

[ 10. नेहरू का वैश्विक नजरिया,‌ जिसने भारत को नुकसान पहुँचाया ]


भूल-106 
नेहरू का दूषित वैश्विक नजरिया 

नेहरू के दूषित वैश्विक नजरिए का अधिकांश भाग ऊपर उदाहरणों के साथ प्रस्तुत किया जा चुका है। अब हम उन पहलुओं को लेते हैं, जिन पर अब तक या तो नजर नहीं गई है या फिर जिन्हें ऊपर अपर्याप्त रूप से समाहित किया गया है। 

नेहरू का धुँधला मार्क्सवादी-वामपंथी वैश्विक नजरिया 
मार्क्सवाद और समाजवाद कुछ ऐसा था जिसकी चपेट में नेहरू 1920 के दशक में ही आ चुके थे। (नेहरूवादी अर्थशास्त्र/समाजवाद के बारे में विस्तृत जानकारी के लिए कृपया भूल#64- 70 देखें।) नेहरू ने सन् 1936 में कांग्रेस के लखनऊ अधिवेशन में अपने अध्यक्षीय भाषण में कहा— 
“मुझे इस बात का पूरा भरोसा है कि दुनिया की और भारत की सभी समस्याओं के समाधान की इकलौती कुंजी समाजवाद में निहित है और जब मैं इस शब्द का प्रयोग करता हूँ तो मेरा मतलब मानवीय तरीके से नहीं, बल्कि वैज्ञानिक और आर्थिक नजरिए में है। हालाँकि, समाजवाद एक आर्थिक सिद्धांत से कहीं अधिक है; यह जीवन का दर्शन है और मुझे ऐसे ही आकर्षित करता है। मुझे देश से गरीबी, चारों तरफ फैली बेरोजगारी, पतन और भारतीय लोगों की अधीनता को समाप्त करने के लिए समाजवाद के अलावा और कोई रास्ता नहीं दिखाई देता है। इसमें हमारी राजनीतिक एवं सामाजिक संरचना में व्यापक व क्रांतिकारी परिवर्तन लाना, भूमि और उद्योग में निहित स्वार्थों, साथ-ही-साथ सामंती और निरंकुश भारतीय राज्यों की व्यवस्था की खत्म करना शामिल है। इसका मतलब है—निजी संपत्ति का अंत, एक प्रतिबंधित तरीके के अलावा और सहकारी सेवा के उच्‍च आदर्श द्वारा वर्तमान समर्थक प्रणाली को बदलना। इसका अर्थ अंततः हमारी आदतों और इच्छाओं में बदलाव के रूप में होता है। संक्षेप में कहें, तो एक नई सभ्यता, जो मौजूदा पूँजीवादी व्यवस्था से पूरी तरह से अलग हो। हम इस नई सभ्यता की थोड़ी झलक सोवियत संघ के कुछ प्रदेशों में देख सकते हैं। वहाँ पर ऐसा बहुत कुछ हुआ है, जिसने मुझे काफी दुःखी किया है और मैं अपने नए युग की सबसे शानदार व आकर्षक सभ्यता के रूप में एक नए क्रम और एक नई सभ्यता को देखता हूँ। अगर भविष्य आशा से भरा हुआ है तो इसका बहुत बड़ा कारण सोवियत रूस और उसने जो किया है, वह है और मुझे पूरा भरोसा है कि अगर कोई बहुत बड़ी आपदा विघ्न नहीं डालती है तो यह बिल्कुल नई सभ्यता अन्य स्थानों पर भी पाँव पसारेगी और पूँजीवाद द्वारा पोषित किए जानेवाले अन्य युद्धों व संघर्षों को भी खत्म करेगी। इस प्रकार, समाजवाद मेरे लिए सिर्फ एक ऐसा आर्थिक सिद्धांत नहीं है, मैं जिसका पक्ष लेता हूँ; यह एक ऐसा महत्त्वपूर्ण सत्य है, जिसे मैं पूरे दिलो-दिमाग से अपनाता हूँ।” (यू.आर.एल.28) 

सोवियत मॉडल के प्रति नेहरू का तरुण आकर्षण, 
जिसने भारत को गंभीर नुकसान पहुँचाया 

“रूस एक गूढ़ प्रश्न के अंदर रहस्य में लिपटी एक पहेली है।” 
—विंस्टन चर्चिल 

“अगर भविष्य आशा से भरा हुआ है तो उसका एक बड़ा कारण सिर्फ रूस है।” 
—नेहरू 

सोवियत संघ की कठोर सच्‍चाई, जो विभिन्न चैनलों के जरिए बेहद तेजी से तथा प्रभावी रूप से पूरी दुनिया के सामने आई थी और नेहरू के समय में अच्छे से मशहूर थी, के बावजूद उन्होंने सोवियत प्रणाली को बढ़ावा देने, उसका बचाव करने, उसे तर्कसंगत बनाने एवं सबको उसके पक्ष में लाने, विशेषकर अपने हमवतनों को, पर पूरा जोर दिया और यह बात उनकी घोषणाओं, भाषणों और पुस्तकों से स्पष्ट है। 

नेहरू और उनके सहयोगी तथा चेले कृष्णा मेनन हेरॉल्ड लास्की को अपना गुरु मानते थे; और “ब्रिटिश लेबर पार्टी के हेरॉल्ड लास्की ने अपना पूरा जीवन सोवियत संघ के अपराधों के लिए क्षमा माँगने या उनके बारे में जानकारी देने में बिताया।” (एस.आर.जी.2/63) 

यहाँ तक कि स्टालिन के अपने हमवतन लोगों ने 6 मार्च, 1953 को उनके निधन पर राहत की साँस ली और ख्रुश्चेव ने सोवियत कम्युनिस्ट पार्टी की बीसवीं कांग्रेस में उनकी गंभीर रूप से निंदा की तो बेहद आश्चर्यजनक तरीके से (या वह जरा भी आश्चर्यचकित करनेवाला नहीं था) नेहरू ने, अगर कोई नेहरू द्वारा भारतीय संसद् में स्टालिन को दी गई श्रद्धांजलि पर ध्यान दे, खुद को अनाथ महसूस किया! 

स्पष्ट है कि नेहरू ने राक्षसी अत्याचारों के कई किस्सों को सुनने के अलावा, “कभी भी उन लाखों अनाथ बच्‍चों की चीख नहीं सुनी, जो पूरे सोवियत रूस में फैले हुए थे, जब स्टालिन के जबरन सामूहिकीकरण ने या तो उनके माता-पिता की जान ले ली थी या फिर उन्हें जबरन श्रमिक शिविरों में भेज दिया था। बाद में स्टालिन के आदेशों पर उनमें से कई बच्‍चों को शारीरिक रूप से खत्म कर दिया गया था, क्योंकि वे ‘बीमारी फैला रहे थे’। वे (नेहरू) कभी उन ‘बाल नायकों’ के बारे में भी नहीं जान पाए सोवियत प्रेस और सोवियत सरकार ने जिनकी प्रशंसा की थी, क्योंकि उन्होंने सोवियत सीक्रेट पुलिस के लिए अपने माता-पिता को भी धोखा दिया था।” (एस.आर.जी.2/57) 

“सीता राम जी ने बिल्कुल ठीक पता लगाया कि जवाहरलाल नेहरू एक ‘असाध्य बदमाश’ और एक ‘लाइलाज कायर’ भी थे। दोनों गुण, एक ही सिक्के के दो पहलू, शाही और बर्बर मरुस्थलीय संप्रदायों के प्रति अपूरणीय अभिलाषा और जोसफ स्टालिन जैसे महत्त्वपूर्ण जन- हत्यारे के प्रति उनके कभी न खत्म होनेवाले आकर्षण से पूरी तरह से स्पष्ट है। जवाहरलाल नेहरू शायद इकलौते ऐसे राष्ट्राध्यक्ष थे, जिन्होंने वास्तव में स्टालिन की मृत्युपर सार्वजनिक रूप से शोक मनाया था, जिन्हें उन्होंने भीरुतापूर्व ‘मार्शल स्टालिन’ कहकर पुकारा था और इस अवसर पर संसद् को स्थगित भी कर दिया था। उस समय, जब वे मुहम्मद अली जिन्ना एवं मुसलिम लीग के सामने रेंग रहे थे और झुक रहे थे, वे हिंदू महासभा को लेकर काफी घमंडी थे। बाद में वे आर.एस.एस. के खिलाफ गरज रहे थे और उसी समय वामपंथियों के आगे रेंग भी रहे थे, जो उन्हें अमेरिकी साम्राज्यवाद के प्रशंसक के रूप में बुरी तरह से फटकार रहे थे। उन्होंने कभी उस जूते को चाटने में झिझक नहीं महसूस की, जिसने उन्हें लात मारी; जबकि वे उन्हें अपमानित करने का कोई मौका नहीं छोड़ते थे, जो जवाबी हमला नहीं कर सकते थे।” (टी.डी.डी.) 

सीता राम गोयल ने नेहरू के स्वतंत्रता पूर्व के रवैए पर लिखा— 
“लेकिन कांग्रेस ने अपने सबसे शीर्ष नेतृत्व पर एक पूरी तरह से सोवियत-प्रेमी को बिठा दिया है, साथ ही उन्हें विदेश नीति के इकलौते प्रवक्ता और साथ ही पार्टी के दूसरे सबसे बड़े जन-नेता बनने का मौका दिया है। कांग्रेस को इसकी कीमत चुकानी पड़ेगी। इसे सितंबर 1939 से लेकर अगस्त 1942 तक पंगु स्थिति में रहना पड़ा। इस अवधि के दौरान कांग्रेस द्वारा की गई एकमात्र काररवाई पं. नेहरू द्वारा तैयार किए गए एक अन्य प्रस्ताव के निर्देशन में, जिसे अक्तूबर 1939 में कांग्रेस कार्य समिति द्वारा पारित किया गया था, अपने सभी प्रांतीय मंत्रालयों का इस्तीफा लेना। राजनीतिक काररवाई के उसके बाकी के सभी काम, चाहे वह वर्ष 1940 के प्रारंभ में राजाजी द्वारा सुझाए गए ब्रिटिश सरकार के साथ सहयोग का प्रयास हो या व्यक्तिगत सविनय अवज्ञा के माध्यम से सीधी काररवाई का प्रयास—दोनों ही आधे-अधूरे मन से किए गए काम थे, जिनमें आत्मविश्वास की कमी साफ झलकती थी।” (एस.आर.जी.2/153) 

 “और कांग्रेस ने मानव स्वतंत्रता के लिए सेनानियों के एक संगठन के रूप में अपनी नैतिक प्रतिष्ठा को धूमिल कर दिया, जब उसने ‘स्टालिन-हिटलर संधि’ (1939), सोवियत लाल सेना द्वारा पोलैंड व फिनलैंड के आक्रमण के खिलाफ और आधे पोलैंड के तथा तीन स्वतंत्र बाल्टिक राज्यों—लातविया, लिथुआनिया, एस्टोनिया के सोवियत दास साम्राज्य में शामिल होने के खिलाफ एक भी शब्द कहने से स्पष्ट इनकार कर दिया।” (एस.आर.जी.2/153-54)

 “इस पूरी स्थिति में, जो वास्तव में शानदार था, वह सोवियत संघ (नेहरू) का डॉन क्विक्सोट था। उन्होंने अपने जीवन के दौरान सलीके से गले में हार डलवाकर जेल जाने तथा सलीके से गले में हार डलवाकर जेल से बाहर आने के अलावा और कुछ भी नहीं सीखा था। लेकिन उनमें इतनी हिम्मत थी कि वे एक निहत्थे और कुचले हुए देश (भारत) को एक कारण (सोवियत संघ) के पक्ष में लड़ने को कहें, जो अब देश के अधिकांश नागरिकों को अपराधी जैसा लगता था। सोवियत संघ या उसके विशाल कॉमिंटर्न नेटवर्क में से किसी ने भी भारत की स्वतंत्रता के मामले में समर्थन का एक भी शब्द नहीं कहा था।” (एस.आर.जी.2/161) 

“ऐसा दुर्घटनावश नहीं हुआ था कि वामपंथी युद्ध-कालीन साप्ताहिक ‘पीपुल्स वॉर’ में नेहरू के विरोध में एक भी शब्द नहीं छपा था, जबकि महात्मा गांधी और अन्य कांग्रेसी नेताओं को जमकर कोसा गया था। इस साप्ताहिक में सुभाषचंद्र बोस को फासीवादी सेना में एक गधे, एक कुत्ते, एक चूहे और एक दुष्ट के रूप में दरशाया गया था। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने कांग्रेस के समाजवादियों और फॉरवर्ड ब्लॉकिस्टों की निंदा जर्मन-जापानी साम्राज्यवाद के एजेंटों के रूप में की तथा ब्रिटिश पुलिस को नियमित रूप से उनकी गतिविधियों की जानकारी प्रदान करवाते रहे। लेकिन इस पूरे दौर में (वर्ष 1940 के बाद) वामपंथियों ने प्रशंसा करने के लिए पं. नेहरू और मौलाना आजाद को चुना।” (एस.आर.जी.2/167) 

भारतीय राजदूत के प्रति सोवियत संघ का उदासीन रवैया 
यहाँ तक कि स्टालिन द्वारा सोवियत संघ में भारतीय राजदूत के साथ किया गया अनुचित व्यवहार भी सोवियत प्रणाली के प्रति नेहरू के विश्वास को हिलाने में नाकामयाब रहा। 

स्वतंत्रता के दौरान और उसके बाद भारत की प्रशंसा करने के बजाय माॅस्को के वामपंथी लेखक भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (आई.एन.सी.) पर भारत को ‘आंग्ल-अमेरिकी साम्राज्यवाद’ के हाथों सौंपने के आरोप लगाते रहे। (एस.आर.जी.2/82) माॅस्को भारत को एक वास्तविक स्वतंत्र देश के रूप में स्वीकारने को तैयार ही नहीं था। भले ही सोवियत संघ में भारत की पहली राजदूत विजयलक्ष्मी पंडित (भाई-भतीजावाद नेहरू की जीन्स में बसा था) नेहरू की बहन थीं, क्रेमलिन ने उन पर जान-बूझकर ध्यान नहीं दिया। बार-बार अनुरोध करने के बावजूद स्टालिन ने उन्हें मिलने का समय देने से इनकार कर दिया। वे अपना कार्यकाल पूरा होने पर स्टालिन से बिना एक भी बार मिले वापस भारत लौटीं। यहाँ तक कि छोटे-से-छोटे मामले पर भी माॅस्को का रवैया स्वार्थी और शत्रुतापूर्ण था। उसने नए भारतीय दूतावास को फर्नीचर देने से इनकार कर दिया, जिसे बाद में उन्हें काफी बड़ी कीमत पर स्टॉकहोम से आयात करना पड़ा! इसके बावजूद, जब इस मामले को भारत में उठाया गया तो नेहरू ने इस मसले को टालने का विचार किया और इसे ठीक साबित करते हुए दबाने की कोशिश की। (एस.आर.जी.2/82) 

नेहरू ने उस देश (सोवियत संघ) के तलवे चाटने की कोशिश की, जिसने 1940 एवं 1950 के दशक की शुरुआत में आपको धोखा दिया; आपकी आलोचना, अनदेखी व अपमान किया (ख्रुश्चेव के आने के बाद स्थितियाँ कुछ बदलीं) और दोस्ताना व्यवहार करनेवाले अमेरिका और इजराइल जैसे देशों पर जान-बूझकर ध्यान नहीं दिया। ऐसा व्यक्ति खुद को महान् ‘अंतरराष्ट्रीयवादी’ और ‘विदेशी मामलों का विशेषज्ञ’ मानता था; उससे भी अधिक शानदार बात यह थी कि बुद्धिमान महात्मा (गांधी) और कई अन्य कांग्रेसी दिग्गज (वास्तविक बुद्धिमान सरदार पटेल को छोड़कर) भी ऐसा ही सोचते थे। 

नेहरू की पुस्तकें उनके मार्क्सवादी-साेवियत पागलपन को दिखाती हैं 
नेहरू ने कुल पाँच प्रमुख पुस्तकें लिखीं। उन सभी की विषय-वस्तु प्रमुखतः मार्क्सवादी वैश्विक नजरिया था, जिनमें साथ में सोवियत प्रणाली के प्रति न बदला जानेवाला पागलपन मिला था। उन्होंने निश्चित तौर पर वित्त या अर्थशास्त्र या फिर प्रतिस्पर्धी (कहीं अधिक सफल और सिद्ध) आर्थिक व राजनीतिक व्यवस्थाओं का अध्ययन करने में समय न ‘बरबाद’ करने का फैसला किया। एक बार मार्क्सवाद का आदी बननेवाला व्यक्ति अन्य सभी पहलुओं को खारिज कर देता है, यहाँ तक कि अगर तथ्य आपके विचारों को झुठला दें—यह एक विशेष प्रकार की ‘वैज्ञानिक’ सी सोच थी। नीचे नेहरू की पुस्तकों से उन प्रमुख अंशों को लिया गया है, जो इस नेहरूवादी-मार्क्सवादी सोच को प्रदर्शित करते हैं और उनकी नीतियों पर प्रतिकूल प्रभाव डाला तथा भारत को गंभीर नुकसान पहुँचाया। 

नेहरू की पुस्‍तक-1 
‘सोवियत रशिया : सम रेंडम स्केचिस ऐंड इंप्रेशंस’ 
इसे नेहरू के सन् 1927 में माॅस्को से लौटने के बाद नेहरू द्वारा लिखे गए लेखों की एक शृंखला से 1929 में संकलित किया गया था। नेहरू ‘सोवियत प्रयोग’ से बेहद गद्गद थे और उन्होंने इसके बारे में प्रशंसापूर्वक लिखा—सबकुछ उन पर बरसाए गए सोवियत आधिकारिक कागजात के आधार पर और उनके सिर्फ माॅस्को तक ही सीमित बेहद सावधानी के साथ प्रबंधित किए गए दौरे के आधार पर और वह भी सिर्फ तीन या चार दिनों के लिए! क्या यह एक ‘वैज्ञानिक मस्तिष्क’ वाले व्यक्ति के लक्षण हैं कि वे बिना वस्तुनिष्ठ तथ्यों को जाँच और अन्य स‍्रोतों से स्वतंत्र रूप से उपलब्ध नकारात्मक एवं चौंकाने वाली सूचनाओं को नजरअंदाज करके उत्साहित हो जाएँ? 

रूस की भयावह स्थितियों से जुड़ी खबरों के थोक में सामने होने के बावजूद नेहरू ने उनसे आँखें मूँद लीं। डॉ. एन.एस. राजाराम ने लिखा—“मजे की बात यह है कि नेहरू की प्रशंसा माॅस्को की कुख्यात जेल लब्यंका तक भी पहुँच गई। नेहरू ने लिखा—‘बिना किसी शक के यह बात कही जा सकती है कि रूसी जेल में होना किसी भारतीय कारखाने में एक श्रमिक होने से कहीं बेहतर है। यह भी एक सच्‍चाई है कि यहाँ पर ऐसी जेलें मौजूद हैं, जैसी हमने अभी देखी नहीं हैं। वे अपने आप में ऐसी हैं कि जिन पर सोवियत सरकार को गर्व होना चाहिए।’ एक ऐसा व्यक्ति, जो सोवियत जेलों की प्रशंसा कर सकता है, उसके लिए योजना तैयार करने की सोवियत प्रणाली की प्रशंसा करना और अपनाना कोई बड़ी बात नहीं है।” (डब्‍ल्यू.एन.7) 

अब इसकी तुलना उससे करें, जो बरट्रेंड रसेल ने रूस की अपनी यात्रा के बाद लिखा— 
“ ...मेरे द्वारा रूस में बिताया गया समय लगातार बढ़ते दुःस्वप्नों जैसा था। मैं यह बात लिखित में दे चुका हूँ कि देखने में तो मुझे यह सच लगता था, लकिे न मैंने डर की उस भावना को प्रकट नहीं किया, जो मुझे तब महसूस होती थी, जब मैं वहाँ था। क्रूरता, गरीबी, संदेह, पीछा उस हवा में घुला हुआ था, जिसमें हम साँस लेते थे। हमारी तमाम बातचीतों की जासूसी होती थी। समानता एक पाखंडी ढोंग था। मुझे ऐसा प्रतीत हुआ कि मानवीय जीवन में मेरे लिए जो कुछ भी महत्त्वपूर्ण था, वह एक चिकने और संकीर्ण दर्शन के चलते नष्ट हो रहा था और इस प्रक्रिया में लाखों लोगों को दुःखी किया जा रहा था।” (बी.एन.एस./191-92) 

नेहरू की पुस्‍तक-2 
‘ग्लिंप्सेंस अ‍ॉफ वर्ल्डहिस्टरी’ 
नेहरू ने वर्ष 1930 से 1933 के बीच नैनी जेल में ‘ग्लिंप्सेंस अ‍ॉफ वर्ल्ड हिस्टरी’ लिखी। इसे सन् 1934 में प्रकाशित किया गया। सीता राम गोयल ने पुस्‍तक को लेकर यह टिप्पणी की— 
“जब नेहरू भारत में एक अद्वितीय शक्ति और स्थिति में पहुँच गए, तब उनके चेलों ने इस पुस्‍तक (ग्लिंप्सेस अ‍ॉफ वर्ल्ड हिस्टरी) को हमारे विश्वविद्यालयों में इतिहास के अग्रवर्ती छात्रों के लिए एक विश्वसनीय संदर्भ कार्य के रूप में अनुशंसित किया। चूँकि इस पुस्‍तक को कई बार पुनर्मुद्रित किया जा चुका है, भारत की कई भाषाओं में अनुवादित किया जा चुका है और यह भारतीय बुद्धिजीवियों की कई पीढ़ियों को बरबाद कर चुकी है, इसके द्वारा वामपंथ और सोवियत रूस को लेकर पेश किए जानेवाले विचार विशेष रुचि के हैं और उन्हें विस्तार से पेश किया जाना चाहिए। वे इस पुस्‍तक में समाजवाद के गैर- मार्क्सवादी स्कूलों को एक ही अध्याय में खारिज कर देते हैं और मार्क्स तथा मार्क्सवाद को दो अध्याय समर्पित करते हैं।” (एस.आर.जी.2/44) 

नेहरू की पुस्‍तक-3 
‘एन अ‍ॉटोबायोग्राफी’ 
नेहरू ने बरेली और देहरादून जेलों में वर्ष 1934-35 के दौरान ‘एन अ‍ॉटोबायोग्राफी’ लिखी। यह 1936 में प्रकाशित हुई। नेहरू इस पुस्‍तक में भी मार्क्सवाद-साम्यवाद के प्रति अपने आकर्षण के साथ बने रहे। नेहरू ने लिखा— 
“बोल्‍शेविक राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय वजहों के चलते गलती कर सकते हैं या असफल भी हो सकते हैं, लेकिन वामपंथी सिद्धांत फिर भी ठीक हो सकता है। रूस के अलावा मार्क्सवाद के सिद्धांत और दर्शन ने मेरे दिमाग के अँधेरे कोने को रोशन कर दिया है। मेरे लिए इतिहास का मतलब ही बदल गया है। मार्क्सवादी व्याख्या ने इस पर एक बिल्कुल नई रोशनी डाली और यह सुव्यस्थित एक नया नाटक बनकर सामने आया, इसके पीछे चाहे जो कोई भी हो। अतीत और वर्तमान की भयावह बरबादी के बावजूद भविष्य आशावान् और उज्ज्वल था; हालाँकि कई खतरों ने हस्तक्षेप किया। यह मार्क्सवाद की हठधर्मिता और वैज्ञानिक (?) दृष्टिकोण से जरूरी आजादी थी, जिसने मुझे आकर्षित किया।” (जे.एन.2) (एस.आर.जी.2/66) 

नेहरू की पुस्‍तक-4
 ‘यूनिटी अ‍ॉफ इंडिया’ 
यह पुस्‍तक वर्ष 1935-40 के दौरान नेहरू के लेखों और भाषणों का एक संग्रह है, जो 1941 में प्रकाशित हुई थी। सोवियत संघ को उजागर करनेवाले थोक में मौजूद साक्ष्यों को नजरअंदाज करते हुए और उसने पोलैंड के साथ जो किया, नेहरू उसका बचाव करते रहे। नेहरू ने लिखा— 
“मेरे मन में रूस की आंतरिक घटनाओं को लेकर चाहे जो भी संदेह रहे हों, मैं उसकी विदेश नीति को लेकर बिल्कुल स्पष्ट था। यह लगातार शांति वाली थी और इंग्लैंड एवं फ्रांस के विपरीत, अंतरराष्ट्रीय दायित्वों को पूरा करने और विदेशों में लोकतंत्र का समर्थन करनेवाली थी। सोवियत संघ यूरोप और एशिया में फासीवाद के खिलाफ एक वास्तविक प्रभावी गोलबंदी के रूप में खड़ा था। आज सोवियत संघ के बिना यूरोप की स्थिति क्या होती? फासीवादी प्रतिक्रिया की हर जगह जीत होगी और लोकतंत्र एवं स्वतंत्रता एक बीते युग के सपने बन जाएँगे।” (एस.आर.जी.2/73) 

नेहरू की पुस्‍तक-5 
‘डिस्कवरी अ‍ॉफ इंडिया’ 
नेहरू ने ‘डिस्कवरी अ‍ॉफ इंडिया’ अहमदनगर किला जेल में वर्ष 1942 से 1945 के बीच लिखी थी। यह 1946 में प्रकाशित हुई थी। नेहरू ने इसके पहले अध्याय में लिखा—
 “मार्क्स और लेनिन के अध्ययन ने मेरे दिमाग पर एक शक्तिशाली प्रभाव उत्पन्न किया तथा मुझे इतिहास और वर्तमान मामलों को एक नई रोशनी में देखने में मदद की। इतिहास और सामाजिक विकास की लंबी शृंखला का कुछ अर्थ दिखाई दिया, कुछ क्रम और भविष्य का अँधेरा काफी हद तक छँट गया। सोवियत संघ की व्यावहारिक उपलब्धियाँ भी काफी प्रभावशाली थीं। मुझे अकसर वहाँ की कुछ घटनाएँ या तो पसंद नहीं थीं या मेरी समझ में नहीं आती थीं और मुझे लगता था कि वह अवसरवाद या मौजूदा सत्ता की राजनीति से बहुत करीबी से जुड़ा हुआ है। लेकिन इन सभी विकासों और मानव-हित के लिए मूल जुनून की संभावित विकृतियों के बावजूद मुझे इसमें कोई संदेह नहीं था कि सोवियत क्रांति ने मानव समाज को कहीं आगे पहुँचा दिया था और एक उज्ज्वल ज्योति जलाई थी, जिसे दबाया नहीं जा सकता था और यह कि उसने इस ‘नई सभ्यता’ की नींव रखी थी, जिस पर दुनिया को आगे बढ़ना था।” (जे.एन.) (एस.आर.जी.2/76-77) 

रूसी अनुवाद और रॉयल्टी 
नेहरू द्वारा अपनी पुस्तकों के जरिए मार्क्सवाद के निरंतर स्तुति-गान और सोवियत संघ की प्रशंसा एवं बचाव को देखते हुए यह कोई बड़ी बात नहीं है कि सोवियत संघ ने उनकी पुस्तकों का न सिर्फ रूसी भाषा में अनुवाद करवाया (निकिता ख्रुश्चेव के रूस का राष्ट्रपति बन जाने के बाद), बल्कि उन्हें 15 प्रतिशत की शानदार रॉयल्टी भी दी (कुछ ऐसा, जो वह अन्य लेखकों और पुस्तकों के लिए नहीं करता था)। (डब्‍ल्यू.एन.8) 

कुमार चेल्लप्पन ने 14 नवंबर, 2014 के ‘डेली पायनियर’ में लिखा—“कांग्रेस का नेतृत्व जवाहरलाल नेहरू की 125वीं जयंती बड़ी धूमधाम से मना रहा है। यह बात अभी तक रहस्य ही बनी हुई है कि पूर्व प्रधानमंत्री ने अपनी पुस्तकों ‘डिस्कवरी अ‍ॉफ इंडिया’ (1946), ‘ग्लिंप्सेस अ‍ॉफ वर्ल्ड हिस्टरी (1934), ‘एन अ‍ॉटोबायोग्राफी’ (1936) और ‘लेटर्स फ्रॉम ए फादर टू हिज डॉटर’ (1929) की रॉयल्टी से बेशुमार धन कैसे कमाया? हालाँकि, नेहरू के खासमखास और विशेष सहायक एम.ओ. मथाई ने खुलासा किया कि नेहरू ने कुल मिलाकर पश्चिमी देशों से जितनी रॉयल्टी प्राप्त की, उससे कहीं अधिक उन्हें सिर्फ वामपंथी देशों से मिली। अपनी पुस्‍तक ‘रिमिनिसेन्सिस अ‍ॉफ नेहरू एज’ (1978) में मथाई ने इस बारे में विस्तार से बताया है कि कैसे उन्होंने तत्कालीन सोवियत संघ के साथ नेहरू द्वारा लिखित पुस्तकों का अनुवाद रूसी भाषा में करने के लिए सौदा करवाया और यह सुनिश्चित किया कि नेहरू को भारतीय रुपयों में 15 प्रतिशत रॉयल्टी प्राप्त हो; जबकि उस दौरान सोवियत संघ किसी को भी रॉयल्टी के रूप में एक पैसे का भी भुगतान नहीं करता था। 

भाजपा के वरिष्ठ नेता सुब्रमण्यम स्वामी का मानना है कि नेहरू के लिए देश के प्रधानमंत्री के पद पर रहते हुए सोवियत संघ को अपनी पुस्तकों के अनुवाद के अधिकार बेचना पूरी तरह से अनुचित था। स्वामी ने ‘पाॅयनियर’ से कहा, “बैंक अ‍ॉफ चाइना की कोलकाता शाखा में नेहरू के पारिवारिक खाते में बड़ी राशि के हस्तांतरण की बात मेरी जानकारी में है। यह एक अनैतिक काम किया गया है।” (डब्‍ल्यू.एन.8) 

मार्क्सवादी-वामपंथी गठजोड़ की मदद करना 
नेहरू मार्क्सवादियों-वामपंथियों और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के प्रति सहानुभूतिपूर्ण एवं मददगार रहे और उनका राजवंश भी, वह भी निम्नलिखित कोरी सच्‍चाइयों के बावजूद। 

उन्होंने (कम्युनिस्टों ने) सन् 1942 में राज के साथ हाथ मिलाया और देशभक्तों की जासूसी की तथा बदले में ब्रिटिश संरक्षण प्राप्त किया। (एस.आर.जी.2/12)

 उन्होंने वर्ष 1942-47 के बीच पाकिस्तान की माँग का समर्थन किया और मुसलिम लीग को अपनी माँग के समर्थन में तर्क एवं आँकड़े उपलब्ध करवाने में मदद की। इसके अलावा, उन्होंने भारत को संप्रभु राज्यों के रूप में बाँटने की भी वकालत की। 

उन्होंने श्री रामकृष्ण परमहंस को एक समलैंगिक विकृत के रूप में, स्वामी विवेकानंद को हिंदू साम्राज्यवादी, श्रीअरविंद को एक युद्धोन्मादी के रूप में, रवींद्रनाथ टैगोर को एक दलाल के रूप में और स्वतंत्रता संग्राम के दिग्गजों—जैसे सरदार पटेल को सूअरों की संतान तथा बिरला एवं टाटा को ‘बास्टर्ड’ के रूप में प्रस्तुत किया। 

जब चीन ने सन् 1950 में तिब्बत पर कब्जा किया तो वे खुलकर चीन के समर्थन में आ गए और बाद में चीन ने जब 1959 में दलाई लामा को उनके हजारों समर्थकों के साथ खदेड़ दिया तब भी। (एस.आर.जी.2/12)

 सीता राम गोयल ने अपनी पुस्‍तक ‘जिनेसिस ऐंड ग्रोेथ अ‍ॉफ नेहरूइज्म’ में जो लिखा है, वह नेहरू के साम्यवादी पूर्वाग्रह और अभिव्यक्ति की आजादी विरोधी रवैए तथा उनके तानाशाही भरे तरीकों को दरशाता है— 
“मुझे फरवरी 1955 में फार्मोसा में एशियाई पीपुल्स-कम्युनिस्ट-लीग के आगामी सम्मेलन में भाग लेने का निमंत्रण मिला। मैंने पूरे पत्राचार को, जिसमें मुझे राष्ट्रपति च्यांग काई-शेक द्वारा व्यक्तिगत रूप से लिखा गया एक बेहद स्नेहपूर्ण पत्र भी शामिल था, यह कहते हुए अपने विदेश मंत्रालय को भेज दिया कि मैं उनकी सलाह के तहत ही निमंत्रण को स्वीकार करूँगा। कई महीने बीत जाने के बाद भी दिल्ली से कोई जवाब नहीं आया। इस बीच मैंने कलकत्ता के क्षेत्रीय पासपोर्ट कार्यालय में पासपोर्ट के लिए आवेदन कर दिया, ताकि अगर मुझे जाने की हरी झंडी मिल जाती है तो मेरे दस्तावेज पूरे हों। आमतौर पर, क्षेत्रीय पासपोर्ट कार्यालय द्वारा अपने अधिकार-क्षेत्र में रहनेवाले नागरिकों को पासपोर्ट जारी किया जाता है। लेकिन जब मैंने दो महीने से अधिक का समय बीत जाने के बाद अपने मामले में स्थिति का पता लगाने के लिए कार्यालय से संपर्क साधा तो उन्होंने मुझे गोपनीय रूप से बताया कि मेरे मामले में स्वयं प्रधानमंत्री रुचि ले रहे हैं। मैंने 3 मई को प्रधानमंत्री को एक अति आवश्यक पत्र लिखा और उसके बाद एक टेलीग्राम भेजा। फार्मोसा के लिए मेरा विमान टिकट पहले ही आ चुका था। 21 मई को ही मुझे विदेश मंत्रालय से एक पंक्ति का संदेश प्राप्त हुआ, जिसमें कहा गया था कि ‘श्री सीता राम गोयल को सूचित किया गया है कि आवेदन की गई पासपोर्ट सुविधा नहीं दी जा सकती।’ लेकिन सैकड़ों कम्युनिस्टों तथा साथी यात्रियों को इस अवधि के दौरान और बहुत तेजी से पासपोर्ट दिए गए थे—ऐसे प्रतिनिधिमंडल में शामिल होने के लिए, जो लगभग हर हफ्तेविभिन्न कम्युनिस्ट राजधानियों में जा रहे थे।”