Harisingh Harish ki Kavitayen v Samiksha - 5 in Hindi Book Reviews by राज बोहरे books and stories PDF | हरिसिंह हरीश की कविताएं व समीक्षा - 5

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हरिसिंह हरीश की कविताएं व समीक्षा - 5

हरिसिंह हरीश की कविताएं व समीक्षा

मेरा खत न मिलने पर 5

हरि सिंह हरीश एक  कर्मठ कवि थे। अपनी हैसियतों के भीतर लिखने वाले। अपने शब्दकोश के भीतर लिखने वाले और विषय के दायरे में भी लगभग सीमित रहने वाले। उनका मुख्य विषय था प्रेम और प्रेम। जब विषय रखेंगे तो प्रेमिका भी आएगी। प्रेमिका की याद भी आएगी। मिलन भी आएगा और मिलन के क्षणों की हरकतें भी याद आएंगे। प्रेमिका से उलझना भी याद आएगी। उनके द्वारा कविता और उपन्यास लिखने का काम पूजा की तरह किया जाता था। सुबह 6:00 बजे जाग जाते और लिखना शुरू कर देते। उन्होंने 39 उपन्यास लिखे। उनके पास 10000 गीत हैं। उनके लिखे 25000 मुक्तक हैं। उनकी लगभग 15000 गजल हैं। अगर गीत शास्त्र या ग़ज़ल के आलोचना शास्त्र से इन रचनाओं का आकलन करें तो शायद इनमें से कम ही खरे उतरेंगे ।लेकिन मनमौजी कवि थे । एक कस्बे का कवि। इसका देखने का दायरा , अनुभव करने का दायरा कस्बे के कवि की तरह ही था। न उंन्का   देश के किसी व्यक्ति से कंपटीशन था, न देश के किसी बड़े संस्थान से किताब छापने की लालसा। पत्रिका भी बड़ी नहीं चाहते थे वे। छोटे-मोटे पत्र पत्रिकाओं में छप लेते थे और कवि गोष्ठी में सुन लेते थे। उनके प्रकासन उनकी शुरुआत ‘कली भवरे और कांटे’ उपन्यास से हुई जो उनका 40 व उपन्यास था। पर इसके बाद के 39 उपन्यास अब प्रकाशित ही रह गए। उन्होंने ‘मन के गीत नमन के अक्षर”  के नाम से एक व्यक्ति गीत संग्रह भी प्रकाशित कराया था। इसके बाद फिर प्रोफेसर पर शुक्ला (परशुराम शुक्ल) की प्रेरणा मिली । डॉक्टर हरिहर गोस्वामी द्वारा दिया गया आशीर्वाद सहयोग और शहर के बहुत तेरे लोगों की अप्रिशिएसन से उन्होंने अपने अन्य किताबों का प्रकाशन शुरू किया। दतिया काव्य धारा 3 का उन्होंने संपादन किया और अपनी लगभग एक दर्जन किताबें उन्होंने विभिन्न संग्रह में शामिल की और छपाई। उनके एक रचना संग्रह पर यह टिप्पणी और टिप्पणी के साक्ष्य में उनकी रचनाएं प्रस्तुत हैं -

 

 

 

 

 

 

(८१)

 

कितनी दूर सनम से हम हैं ?

 

हमसे कितनी दूर सनम है?

 

चे दूरी चज़बूरी कैसी, इतनी बात बताये कोई ? हम क्या जाने भोले-भाले, आकर ये समझायें कोई ?

 

क्यों शामिल खुशियों में ग़म है ?

 

कितनी दूर सनम से हम हैं ?

 

हमसे कितनी दूर सनम है ?

 

आई बहारें खिजां लेकर के, अपना भी जीवन है कैसा ? जिसमें चेहरा तक न दिखाये, जीवन का दर्पण कैसा ?

 

ये क्या दुःखड़े बोलो कम है ?

 

कितनी दूर सनम से हम हैं ?

 

हमसे कितनी दूर सनम है ?

 

सांस-सांस बेजार हो गई, हर धड़कन ग़म की मारी है। जाने कैसी है ये किस्मत, अपनी हर बाज़ी हारी है ?

 

हम पर जग के लाख सितम हैं।

 

कितनी दूर सनम से हम हैं ?

 

हमसे कितनी दूर सनम है।

 

जग के लाख लगे हैं मेले, फिर भी हम हैं कितने अकेले ? न कोई संगी, न कोई साथी, अपने तो दुःख-दर्द झमेले ।

 

क्या जाने क्या अपने करम हैं ?

 

कितनी दूर सनम से हम हैं ?

 

हमसे कितनी दूर सनम है ?

 

कितनी बार बिछुड़ कर रोये, फिर भी एक न होने पाए । हमको कुछ मालूम नहीं है, हम क्यों इस दुनिया में आए ?

 

जाने कितने और जनम हैं?

 

कितनी दूर सनम से हम हैं ?

 

हमसे कितनी दूर सनम है?

 

(८२)

 

हम तेरी मुहब्बत की खातिर, ये करते रहे, वो करते रहे। इस तरह जिये आंसू पीकर, कभी जीते रहे, कभी मरते रहे।

 

एक ख़्वाब सुहाना देखा था, उस ख़्वाब की ये ताबीर हुई । जो सूरत दिखी दिल के शीशे में, वो तेरी ही इक तस्वीर हुई ।

 

कुछ बेखौफ रहे, कुछ डरते रहे, कुछ ठण्डी आहें भरते रहे। इस तरह जिये आंसू पीकर, कभी जीते रहे, कभी मरते रहे।

 

एक चांद सा बदली से निकला, वो सूरत से तेरी मिलता था । मैंने हाथ बढ़ाया उसे छूने को, देखा फूल सुनहरा खिलता था ।

 

कुछ डूबे रहे, कुछ उभरते रहे, कुछ गिरते रहे, कुछ संवरते रहे। इस तरह जिये आंसू पीकर, कभी जीते रहे, कभी मरते रहे।

 

क्यों मेरा हाथ न पकड़ करके, तुमने सीने से लगा लिया ? मैं सोता था सुख सपनों में, तुमने जाने क्यों जगा दिया ?

 

मैं चुप ही रहा, तुम कहते रहे, तुम नदिया से ही बहते रहे । इस तरह जिये आंसू पीकर, कभी जीते रहे, कभी मरते रहे।

 

(

 

(८३)

ग़म के गीत कहां तक गाऊ ?

 कैसे अपना मन बहलाऊं ?

 

कब से मन पर बोड़ा घरे हूँ ?

 आशा और विश्वास करे हूं।

मन को अब कैसे समझाऊं ?

 गम के गीत कहां तक गाऊं ?

 

सांस-सांस ने दम तोड़ा है। हमको जिन्दा कम छोड़ा है। बोलो क्यों न मैं मर जाऊं ? गम के गीत कहां तक गाऊं ?

 

जो भी तुमने काम किया है। हमको ही बदनाम किया है। झूठी कसमें कब तक खाऊं ? ग़म के गीत कहां तक गाऊ ।?

 

भूखा तन है, भूखा मन है। भूखा सारा यह जीवन है । कैसे यह जग को बतलाऊं ? ग़म के गीत कहां तक गाऊं ?

 

यह है अपनी राम कहानी । ना जानू यह किसे सुनानी ? कैसे इसको अब झुठलाऊं ? ग़म के गीत कहां तक गाऊं ?

 

सथ हैं गैर न अपना कोई । जीवन का ना सपना कोई । बाती सा बुझ-बुझ मैं जाऊं । गम के गीत कहां तक गाऊं ?

 

(૮૪)

 

ताजमहल फीका लगता है, तेरी सूरत देखकर । खजूराहों भी नतमस्तक है, तेरी मूरत देखकर ।

 

सावन के घन से लहराये, केश तुम्हारे कांथों पर । कदली भी लज्जित होती है, तेरी सुन्दर जांघों पर । चांद निकलता तुम्हें देखने, मधुर महूरत देखकर । ताजमहल फीका लगता है, तेरी सूरत देखकर ।

 

नैन तुम्हारे नीलम जैसे, दमके दिन औ' रातों में । सुन्दर गीला तन दिखता है, सावन की बरसातों में । जान लुटाने खड़े दीवाने तेरी सीरत देखकर । ताजमहल फीका लगता है, तेरी सूरत देखकर ।

 

मोती जैसे चमक रहे हैं दांत तुम्हारे चांदी से । लहराते आंचल की उपमा झूठी लगती आंधी से । इंसां क्या ललचायें फरिश्ते, खास ज़रूरत देखकर । ताजमहल फीका लगता है, तेरी सूरत देखकर ।

 

इकटक होकर देख रहे सब तेरी भरी जवानी को । पागल जैसे सभी हो रहे, रब की लख नादानी को । हैरां तभी सभी दिखते हैं, यहीं हक़ीकत देखकर । ताजमहल फीका लगता है, तेरी सूरत देखकर ।

 

शायर रूप रंग पर तेरे, गीत कई रच डालेगा । खण्डकाव्य औ' महाकाव्य लिख यह सबकर सच डालेगा । जाने क्या-क्या नहीं करेगा तेरी चाहत देखकर । ताजमहल फीका लगता है, तेरी सूरत देखकर ।

८५)

 

पत्र को मंत्र ही रहने दो, कहानी न करो । अपनी बदनाम ज़माने में, जवानी न करो।

 

मेरे हमदम, मेरे हमराज, मेरी मान भी ले। मेरा दिल तेरा है, तू मुझे पहचान भी ले । अपनी आंखों से मेरी दूर निशानी न करो । अपनी बदनाम ज़माने में, जवानी न करो ।

 

सांस लेने दो अभी, मरने को तैयार नहीं । छोड़ देंगे तेरी दुनिया मुझे इन्कार नहीं । इतनी जल्दी मेरे सरकार मेहरबानी न करो । अपनी बदनाम ज़माने में, जवानी न करो ।

 

दर्द में डूब गए, सांस भी ले पाते नहीं । फिर भी हम प्यार को तेरे तो भुला पाते नहीं । सर से ऊपर ग़म-ए-हालात का पानी न करो । अपनी बदनाम ज़माने में, जवानी न करो ।

 

पत्र तो पत्र है, कोई बड़ी तहरीर नहीं । फाड़ डालो इसे, कोई बड़ी जंजीर नहीं । अपनी बरबाद जवानी मेरी रानी न करो । अपनी बदनाम ज़माने में, जवानी न करो ।

 

भूल जाओ कभी हम प्यार में दीवाने थे । अपनी चाहत के जवां हर कहीं अफसाने । फिरसे ये याद दिलाने की नादानी न करो । अपनी बदनाम ज़माने में, जवानी न करो ।

 

हम तो हालात के हाथों में फंसे बैठे हैं। हम तो सर से पांव तलक गम में घंसे बैठे हैं। इन्हें पढ़-पढ़के अपने जिस्य की हानी न करो । अपनी बदनाम ज़माने में, जवानी न करो ।

 

फाड़ डालों तुम इन्हें शोलों में हवन कर डालो । बेझिझक अब तो इन्हें चाहत का कफ़न कर डालो । इनको सीने से लगा, अपना लहू-पानी न करो । अपनी बदनाम ज़माने में, जवानी न करो ।

 

अपना मिलना नहीं मुमकिन है ज़माने में कभी । नाम जुड़ सकता नहीं, अपना फसाने में कभी । इन्हें रख-रख के अपने पास, बेईमानी न करो । अपनी बदनाम ज़माने में, जवानी न करो ।

 

भूल जाओ मैंने कभी ख़त भी तुम्हें डाले थे । भूल जाओ तुमने कभी ख़त मेरे संभाले थे । भूल जाओ इसमें लिखी हर बात जुबानी न करो। अपनी बदनाम जमाने में, जवानी न करो ।

 

(८६)

 

(८६)

 

जया गीत सुनाऊं तुमको सनम, हर जनम तुम्हें खो आया हूं ? ऐसा कमजोर हूं दिल का, जब-तब ही रो आया हूं।

 

उस जनम मिले, इस जनम मिले । पर फिर भी अधूरे सनम मिले । क्या ऐसे ज़माने में जीना ? जहां लाख तरह के सितम मिले ।

 

- बार यही दौर चलता रहा, हर बार निराश हो आया हूं ।

 

या गीत सुनाऊं तुमको सनम, हर जनम तुम्हें खो आया हूँ ?

 

आज जो भी खुशी लहराती है। कल वो ही मिटके रह जाती है। क्या ऐसे मुकद्दर से जीना ? जिसमें हर आशा ढह जाती है।

 

कल तुमको पाया था हमने जो, आज तुमसे ही हाथ थो आया हूं।

 

क्या गीत सुनाऊं तुसको सनम, हर जनम तुम्हें खो आया हूं?

 

८७)

 

गीत सा मुखड़ा तुम्हारा, औ' गज़ल सा बांकपन । होठ हैं कलियों के जैसे, तन तुम्हारा है सुमन ।

 

आंखें मय के हैं प्याले, छलछला यौवन रहा । खिल रहे हैं गुल हजारों, खिलखिला गुलशन रहा। मधु सरीखी तेरी बोली, सांस में मीठी अगन । होंठ हैं कलियों के जैसे, तन तुम्हारा है सुमन ।

 

है हिरनी जैसी तेरी प्रियतमे खूब ये पतली कमर । लग रही तेरी तो सोलह बसन्तों सी उमर । देवता तक थम जाते हैं जब सुनाती हो भजन । होंठ हैं कलियों के जैसे, तन तुम्हारा है सुमन ।

 

तेरे पग जिस पथ पे पड़ते, वह प्रिय पावन लगे । हो चाहे मौसम कोई सा वो सुखद सावन लगे । देखलें तुझको फरिश्ते, हों उठे वह भी मगन । होंठ हैं कलियों के जैसे, तन तुम्हारा है सुमन ।

 

(८८)

 

घांद लगे पूनम का फीका, तेरे रूप सलोने से । दुनिया जगमग हुई हमारी, साथी तेरे होने से ।

 

तेरा हाथ पकड़कर मैंने, जग का सबकुछ पाया है। दुनिया अब तो लगे न अच्छी, जब से तू मन भाया है। जीवन भर खेलूंगा अब तो, तेरे रूप खिलौने से । दुनिया जगमग हुई हमारी, साथी तेरे होने से ।

 

नख़ से शिख तक तुम्हें निहारा, अब क्या देखूं आंखों से ? चंदन जैसी तेरी खुशबू, लेली है जब सांसों से । सुन्दरतम तुम लगो प्रियतमे ! तन मन खूब भिगोने से । दुनिया जगमग हुई हमारी, साथी तेरे होने से ।

 

रब ने तुमको मेरी खातिर, भेजा है इस दुनिया में । हमको उसने किया है पैदा, तुमको पाने दुनिया में । प्रेम कहानी पूरी होगी, यूंही प्यार संजोने से । दुनिया जगमग हुई हमारी, साथी तेरे होने से ।

 

रब की हम पर बड़ी कृपा है, जो तुमको रचकर भेजा है। मेरा सुखद सुहाना सपना यूं अब सचकर भेजा है। मुझको भेज दिया है उसने तेरा अपना होने से । दुनिया जगमग हुई हमारी, साथी तेरे होने

 

(८९)

तमसे मिले हुए युग बीता, सुख का सारा सागरा अब क्या पड़े प्यार की बोलो, हम अपने जीवन गीता

 

तुमने दर्द दिया क्यों हमको, यह हम अब तक न पाये ? तुम हो गैर किसी के प्रियवर ! यह हम अब तक मान न पाये। यह भी खूब अजूबा लगता, तुम बिन क्यों अब तक मैं जीता? अब क्या पढ़ें प्यार की बोलो, हम अपने जीवन गीला

 

कल तक तुम ही ख्वाव में आये, मेरी रातें मधुर बनाने । अब क्यों दूर खड़े हो हमसे आए तुम न हमें मनाने । हमको नहीं गमों से फुरसत तुम्हें खुशी का रहा सुभीता । अब क्या पढ़ें प्यार की बोलो, हम अपने जीवन में गीता

 

हार गया मैं तुमसे बाजी, बैठे क्यों शतरंज विछाये ? करूं तभी तारीफ तुम्हारी, अब क्या तुमको करना बाकी, अब क्या पढ़ें प्यार की बोलो, तुमने मोहरे खूब सजाये । मेरा तो कर दिया फजीता ? हम अपने जीवन में गीता ?

 

छींन रहे हो मेरे ग़म को, याद दिला कर ज़रा खुशी की । फिर भी मेरी बात कही ना, क्यों करते हो बात सभी की ? कभी हाथ से छींना होता, ग़म का प्याला क्यों मैं पीता ? अब क्या पढ़ें प्यार की बोलो, हम अपने जीवन में गीता ?

 

सुर वंशी से नहीं छेड़ता, कृष्ण अगर द्वापर में आकर । त्रेता में श्रीराम न आते, क्यों आता 'हनु' लंक जलाकर ? तो राधा ना राधा होती, तो हरती क्यों बोलो सीता ? अब क्या पढ़ें प्यार की बोलो, हम अपने जीवन में गीता ?

 

वन-वन क्यों फिरता मैं बोलो, शहर-शहर क्यों अलख जगाता । तुम्हें ढूंढता गांव-गली में, गीत बिरह के क्यों मैं गाता ? मैं क्या जानूं पाप-पुण्य को, तुम्हें चाहकर पाक-पुनीता ? अब क्या पहें प्यार की बोलो, हम अपने जीवन में गीता

 

(९०)

 

कितने जनम हाय सनम, तुम्हें पाते-पाते चले गये । हम तो तड़प कर रो बैठे, तुम गाते-गाते चले गये ।

 

हमने बुलाया तुम मुस्कुराये, हम समझे तुम आओगे । हिलमिल करके बातें होंगीं, कोई गीत सुनाओगे । फिर जाने क्या तुम्हें हो गया, कि आते-आते चले गये ? हम तो तड़प कर रो बैठे, तुम गाते-गाते चले गये ।

 

एक रात को ख़्बाव में देंखा,, तुमने हमें पसन्द किया । दिल के पिंजड़े में इस दिल को, तुमने हंसकर बन्द किया । आंख खुली तो हमने देखा, तुम भाते-भाते चले गये । हम तो तड़प कर रो बैठे, तुम गाते-गाते चले गये ।

 

कली-कली मुस्कुराई इक दिन, फूल-फूल पर रंग चढ़ा । पात-पात पर आई बहारें, शाख-शाख का अंग बढ़ा । फिर जाने क्यों अरमानों पर, छाते-छाते चले गये ? हम तो तड़प कर रो बैठे, तुम गाते-गाते चले गये ।

 

जाने वाले अब तो आजा, मधुमय बातें करने को । मेरी बिरह-व्यथा के दुःख को दर्शन देकर हरने को । काली चूड़ी इस दुल्हन को लाते-लाते चले गये । हम तो तड़प कर रो बैठे, तुम गाते-गाते चले

 

(९१)

 

मन हमारे तुम्हारे सनम एक हैं। धड़कनों में धड़कते ये दम एक हैं।

 

इक दिल हैं हमारे तो इक जान हैं। इक हमारा तुम्हारा ये ईमान है। जिन्दा रहने की खातिर यूं हम एक हैं। धड़कनों में धड़कते ये दम एक हैं।

 

प्यार करते हैं हम, प्यार करते रहें । एक दूजे पे हम यूंही मरते रहें । एक पूजा हमारी, धरम एक है । धड़कनों में धड़कते ये दम एक हैं।

 

ये ज़माना हमें प्यार करने न दे । इक-दूजे पे हमको ये मरने न दे । जो होता है हमपर सितम एक है । धड़कनों में धड़कते वे दम एक हैं।

 

मिल गए ज़िन्दगी में तो बिछुड़े नहीं । हम कभी एक-दूजे से झगड़ें नहीं । खुदा का ये हम करम एक है । धड़कनों में धड़कते ये दम एक हैं।

 

 

(९२)

 

तन से चंदन महक रहा है, मन से महक गुलाब की। गर्दन लगे सुराही जैसी, मस्ती भरे शराब की ।

 

होठ लाल गुलमोहर जैसे, अंखियन काजल कोर है। जुल्फों में हैं शाम तुम्हारे, औ' मुखड़े में भोर है। तू मेरी क्या बन सकती है, आशा रहे जवाब की ? गर्दन लगे सुराही जैसी, मस्ती भरे शराब की ।

 

तेरा आंचल जल सा लहरे, भाव तरंग हैं पानी से । जले जा रहे दुनिया वाले, तेरी मस्त जवानी से । क्या तारीफ करेगा कोई तेरे हंसी शबाब की ? गर्दन लगे सुराही जैसी, मस्ती भरे शराब की ।

 

फूल झड़े जब-जब तू बोले, कोयल सुन शरमाती है। वह दीवाना हो ले तेरा, जिसको तू दिख जाती है। पढ़-पढ़ थके न कोई भाषा, तेरे रूप किताब की । गर्दन लगे सुराही जैसी, मस्ती भरे शराब की ।

 

 

(९३)

 

ऐ हंसीन जिन्दगी, तुझको मेरा सलाम । लिख डाले गीत मैंने तेरी ज़िन्दगी के नाम ।

 

तेरे करीब आकर मचलने लगा है दिल । सच कह रहा हूं, खूब उछलने लगा है दिल । हाथों में आ गया है ये छलकता हुआ सा जाम । लिख डाले गीत मैंने तेरी ज़िन्दगी के नाम ।

 

जन्नत मेरी आंखों को नज़र आने लगी है। जबसे तू मेरी जान इधर आने लगी है । मैं गिरने लगा झूम करके, आकरके मुझे थाम। लिख डाले गीत मैंने तेरी ज़िन्दगी के नाम ।

 

मैं कैसे अपने दिल की हक़ीकत बयां करूं ? जो तुमसे हुई मेरी मुहब्बत बयां करूं । चमके हैं ज़िन्दगी में सितारे मेरे तमाम । लिख डाले गीत मैंने तेरी ज़िन्दगी के नाम ।

 

तू कहदे दिल निकाल के तुझको दिखादूं अब । सीने से अपने दिल को दिल में लगादूं अब । तुझे पाने के लिए तो आसान है ये काम । लिख डाले गीत मैंने तेरी ज़िन्दगी के नाम ।

 

 

 

९४)

 

दीवाने लोग हो गए तेरे शबाब पर । ठहरी है हर किसी की नज़र इस गुलाब पर ।

आंखों में मस्तियां हैं, होंठों पर तबस्सुम । ये झूमता मयखाना है, या गुलिस्तां हो तुम ।

 लिखा है तेरा नाम दिलों की किताब पर । ठहरी है हर किसी की नज़र इस गुलाब पर ।

तेरे करीब आकर ज़माना ठहर गया । तेरा ख्याल जिस्मों जिगर में उतर गया ।

 ठहरे हैं लोग तेरे 'हां', 'ना' के जवाब पर । ठहरी है हर किसी की नज़र इस गुलाब पर ।

बोले तेरी पायलिया तो सरगम सुनाई दे । तेरी नज़र पड़े जहां शबनम दिखाई दे ।

 टिकती नहीं किसी नज़र रुखे-आफताब पर । ठहरी है हर किसी की नज़र इस गुलाब पर ।

 

हर रेशे से महक तेरे आती है फूल की । तारीफ करने लगता हूं तब उसकी भूल की । हैरान सा रह जाता हूं उसके हिसाब पर । ठहरी है हर किसी की नज़र इस गुलाब पर ।

 

 

(९५)

 

पड़ता रहता तुमको हरदम तुमतो एक किताब हो । महक रही यौवन की बगिया, तुम तो खिला गुलाब हो ।

 

रूप तुम्हारा परियों जैसा, मन ने वे अनुमान लिया । तुम ही मेरी बन सकती हो, यह भी मैंने जान लिया। मेरे लाख सवालों का तुम सचमुच एक जवाब हो । महक रही यौवन की बगिया, तुम तो खिला गुलाब हो ।

 

आसमान के देख फरिश्ते, ललचाते जलयानों में । तू ऐसी बेटोक बढ़ रही, दुनिया में तूफानों में। तेरा क्या कहना तुम अनुपम जादू भरा शबाब हो ? महक रही यौवन की बगिया, तुम तो खिला गुलाब हो ।

 

सांस सांस से तेरे खुश्बू चंदन जैसी आती है। तेरी प्यारी बोली सुनकर कोयल भी शरमाती है। तुमको वर लूं स्वप्न-सुन्दरी, मेरा तुम्ही ख़्वाब हो । महक रही यौवन की बगिया, तुम तो खिला गुलाब हो ।

 

तेरी आंखों से मधु छलके, तेरी सांसों भरा नशा । तेरे ऊपर हो दीवाना, मैं तो तेरी राह बसा । बिना सुराही वाली तुम तो छलकी हुई शराब हो । महक रही यौवन की बगिया, तुम तो खिला गुलाब हो।

 

(९६)

 

केसर जैसी तेरी काया, चंदा जैसा रूप । रूप तुम्हारा बना हुआ है, सचमुच आज अनूप ।

 

माथे पर कुंकुम का टीका, जैसे चाँद उगा हो । हिले-डुले न यह तो इक पल, इक ही ठौर तगा हो । बिखरे कुन्तल तो घनछाये, आशा के अनुरूप । रूप तुम्हारा बना हुआ है, सचमुच आज अनूप ।

 

नील-झील सी इन अँखियों में सागर लहराये । जग उन्मत्त हुआ लख करके, कैसा ललचाये ? यौवन की प्यारी सी निखरी, कैसी सुखमय धूप ? रूप तुम्हारा बना हुआ है, सचमुच आज अनूप ।

 

अधर लाल गुलमोहर जैसे, दन्त अनार के दाने । पहन रखे हैं मुक्ताओं ने मुस्कानों के बाने । अवर्णीय सारे का सारा तेरा आज सरूप । रूप तुम्हारा बना हुआ है, सचमुच आज अनूप ।

 

(९७)

 

आज तो तुम फुलझड़ी सी लग रही हो। मोतियों की इक लड़ी सी लग रही हो ।

 

चाँद सा मुखड़ा ये नीलम से नयन । मीठे-मीठे प्रेममय तेरे बयन । प्रेम की तुम हथकड़ी सी लग रही हो । मोतियों की इक लड़ी सी लग रही हो ।

 

होठ गुलमोहर से लगते है तुम्हारे । देह में अनगिन जड़े लगते सितारे । स्वर्ण से तुम तो मढ़ी सी लग रही हो । मोतियों की इक लड़ी सी लग रही हो ।

 

ले नहीं सकता कोई, अनमोल हो तुम । प्रेम में डूबा हुआ सा बोल हो तुम । प्रेम में तुम तो जड़ी सी लग रही हो । मोतियों की इक लड़ी सी लग रही हो ।

 

दिल हमारा हो गया तेरी अंगूठी । बात सच्ची है नहीं बिल्कुल ये झूठी । इक नगीना सा जड़ी सी लग रही हो । मोतियों की इक लड़ी सी लग रही हो ।

 

 

(९८)

 

के हुए नयनों में जादू, खुले हुए अधरों पर छंद । लिख डाले तुमने चितवन से, नेहों के कई एक प्रबंध ।

 

तेरे कर की हरी चूड़ियाँ, और गले का हीरक हार । मेरा प्यार समर्पित तुमको, ले लेना मेरा उपहार । तेरी साँसों से आती है, चंदन सी मनमोह सुगंध । लिख डाले तुमने चितवन से, नेहों से कई एक प्रबंध ।

 

तेरा यौवन छू नहीं सकता, पागल ये सहज़ोर पवन । ओ सीता सी पावन देवी, तुमको शत-शत कोटि नमन । पूजा और अर्चना का क्रम, करुं नहीं जीवन में बंद । लिख डाले तुमने चितवन से, नेहों के कई एक प्रबंध ।

 

कुंकुम, काजल, मेंहदी, गजरा, तेरा रूप संवार रहे । चमन छोड़कर भँवरे लोभी, इकटक तुम्हें निहार रहे । तुम्हें देखले यदि रचनाकर तो तोड़े सारे अनुबंध । लिख डाले तुमने चितवन से, नेहों के कई एक प्रबंध ।

 

९९)

 

घन मोह रहा देखो श्रृंगार तुम्हारा । बाहों में सिमट आया है, प्यार तुम्हारा ।

 

होठों पे होठ रख दूं, या तन तुम्हारा छू लूं ? जुल्फें तुम्हारी देखें, या मन तुम्हारा छू लूं । हर अंग लगे सुन्दर अय यार तुम्हारा । बाहों में सिमट आया है, प्यार तुम्हारा ।

 

काजल लगा के तीखा, तुमने गजब किया है। होठों को लाल करके, तुमने सितम किया है। मैं चेहरा देखता हूँ बार-बार तुम्हारा । बाहों में सिमट आया है, प्यार तुम्हारा ।

 

चोली कसी हुई है, चुनरी कमाल की है। ऊपर से उम्न तेरी सिर्फ सोलह साल की है। यौवन से उठ रहा है उभार तुम्हारा । बाहों में सिमट आया है, प्यार तुम्हारा ।

 

तुम्हें सामने बिठाकर, आँखों में छुपा लूंगा । तू सांस जो भी लेगी, साँसों में छुपा लूंगा । सारी उमर करूँगा, मैं दीदार तुम्हारा । बाहों में सिमट आया है, प्यार तुम्हारा ।

 

शायर की हर ग़ज़ल का, मतला तुम्हीं तो हो । जबसे फिदा हुआ हूं, मक़ता तुम्हीं तो हो । अए-जान-ए-शायरी है इन्तज़ार तुम्हारा । बाहों में सिमट आया है, प्यार तुम्हारा ।

 

(१००)

 

तुम कविता हो, गीत ग़ज़ल हो । तुम मंदिर हो, ताजमहल हो ।

 

तुम खजुराहो की प्रतिमा हो । तुम खूबसूरत एक शमा हो । मेरे लिए बहुत ही भोली-भाली और सरल हो ।

 

मेरी सुबह-शाम की पूजा । सीता और राम की पूजा । मेरी प्रेम-साधना का तुम, एक मात्र संबल हो ।

 

तुम से मिलकर मैं जी लूंगा, तेरा दर्द सभी पी लूंगा । मेरे लिए भँवर से बचकर, तुम ही तो साहिल हो ।

 

मेरी राधा, मेरी सीता । मेरी मानस, मेरी गीता । तेरे बिना अधूरा जीवन, जिसका तुम प्रतिफल हो ।

 

काशी-काबा, गंगा-यमुना । सत्यं शिवं सुन्दरं सपना । मेरी लिए तुम्हीं वृन्द्रावन, मथुरा और गोकुल हो ।