Harisingh Harish ki Kavitayen v Samiksha - 4 in Hindi Book Reviews by राज बोहरे books and stories PDF | हरिसिंह हरीश की कविताएं व समीक्षा - 4

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हरिसिंह हरीश की कविताएं व समीक्षा - 4

हरिसिंह हरीश की कविताएं व समीक्षा

मेरा खत न मिलने पर 4

हरि सिंह हरीश एक  कर्मठ कवि थे। अपनी हैसियतों के भीतर लिखने वाले। अपने शब्दकोश के भीतर लिखने वाले और विषय के दायरे में भी लगभग सीमित रहने वाले। उनका मुख्य विषय था प्रेम और प्रेम। जब विषय रखेंगे तो प्रेमिका भी आएगी। प्रेमिका की याद भी आएगी। मिलन भी आएगा और मिलन के क्षणों की हरकतें भी याद आएंगे। प्रेमिका से उलझना भी याद आएगी। उनके द्वारा कविता और उपन्यास लिखने का काम पूजा की तरह किया जाता था। सुबह 6:00 बजे जाग जाते और लिखना शुरू कर देते। उन्होंने 39 उपन्यास लिखे। उनके पास 10000 गीत हैं। उनके लिखे 25000 मुक्तक हैं। उनकी लगभग 15000 गजल हैं। अगर गीत शास्त्र या ग़ज़ल के आलोचना शास्त्र से इन रचनाओं का आकलन करें तो शायद इनमें से कम ही खरे उतरेंगे ।लेकिन मनमौजी कवि थे । एक कस्बे का कवि। इसका देखने का दायरा , अनुभव करने का दायरा कस्बे के कवि की तरह ही था। न उंन्का   देश के किसी व्यक्ति से कंपटीशन था, न देश के किसी बड़े संस्थान से किताब छापने की लालसा। पत्रिका भी बड़ी नहीं चाहते थे वे। छोटे-मोटे पत्र पत्रिकाओं में छप लेते थे और कवि गोष्ठी में सुन लेते थे। उनके प्रकासन उनकी शुरुआत ‘कली भवरे और कांटे’ उपन्यास से हुई जो उनका 40 व उपन्यास था। पर इसके बाद के 39 उपन्यास अब प्रकाशित ही रह गए। उन्होंने ‘मन के गीत नमन के अक्षर”  के नाम से एक व्यक्ति गीत संग्रह भी प्रकाशित कराया था। इसके बाद फिर प्रोफेसर पर शुक्ला (परशुराम शुक्ल) की प्रेरणा मिली । डॉक्टर हरिहर गोस्वामी द्वारा दिया गया आशीर्वाद सहयोग और शहर के बहुत तेरे लोगों की अप्रिशिएसन से उन्होंने अपने अन्य किताबों का प्रकाशन शुरू किया। दतिया काव्य धारा 3 का उन्होंने संपादन किया और अपनी लगभग एक दर्जन किताबें उन्होंने विभिन्न संग्रह में शामिल की और छपाई। उनके एक रचना संग्रह पर यह टिप्पणी और टिप्पणी के साक्ष्य में उनकी रचनाएं प्रस्तुत हैं -

६१)

आज न बोलो, कल न बोलो, तो क्या फर्क निकलता है ? चुपके-चुपके देख रहे हो, तो क्या अर्थ निकलता है

लोगों की चिन्ता क्यों करते, वह भी प्यार के भूखे हैं ? उनके दिल में झांक कर देखो, वह दीदार के भूखे हैं। रात-रात भर जागा करते, तो क्या तर्क निकलता है ? चुपके-चुपके देख रहे हो, तो क्या अर्थ निकलता है ?

 

सबको ज़रूरत होती इसकी, प्यार बला की चीज़ है ये। दुनिया इसके कदमों में हैं, सबको बड़ा अज़ीज है ये। मिले खुशी होती न मिले तो मीठा दर्द निकलता है। चुपके-चुपके देख रहे हो, तो क्या अर्थ निकलता है ?

 

इक न इक दिन बनना होगा बालगीर तुमको रानी । बात मानलो इस फक्कड़ की, कहता है दिलवर जानी । प्यार बिना सारी दुनिया का, बेड़ागर्क निकलता है । चुपके-चुपके देख रहे हो, तो क्या अर्थ निकलता है ?

 

मीठा-मीठा दर्द है इसका, एक बार लेकर देखो । दिल लेने-देने को होता, लेकर और देकर देखो । दर्द प्यार का पी के देखो, कैसा अर्क निकलता है ? चुपके-चुपके देख रहे हो, तो क्या अर्थ निकलता है ?

 

प्यार किये जा, प्यार किये जा, प्यार का अर्थ अजूबा है। प्यार है पन्दिर, प्यार है पूजा, प्यार ही काशी-काबा है। प्यार बिना तो जीवन सारा, बनके नर्क निकलता है । चुपके-चुपके देख रहे हो, तो क्या अर्थ निकलता है ?

 

इस शायर की बात मानलो, तो होगा उपकार बड़ा ।

 

स्वर्ग बनेगा इस धरती पर यह सुन्दर संसार बड़ा ।

 

नहीं सुनोगे बात जो इसकी, क्या निष्कर्ष निकलता है ?

 

चुपके-चुपके देख रहे हो, तो क्या अर्थ निकलता है ?

६२)

किस पर गीत लिखूं अब बोलो, यह मन मेरा सोच रहा है। पहले लिखे हुए गीतों को देख-देख मन कोच रहा है।

 

हर कली गीत बन गई प्यार का, हर फूल बना मनमीत हमारा । हर धड़कन दिल की बोल उठी है, लो, बनी आज संगीत तुम्हारा। कहां गए वह हंसी नज़ारे, यह मन मेरा खोज रहा है ? पहले लिखे हुए गीतों को देख-देख मन कोच रहा है।

 

मिट्टी, पत्थर, नदियां, नाले, सबको मैंने प्यार किया है। मोर, पपीहे, तोता, मैना, सबको ही स्वीकार किया है । आज उन्हीं की मीठी बोली, यह मन मेरा बोल रहा है। पहले लिखे हुए गीतों को देख-देख मन कोच रहा है।

 

गली-गली, कूचे-कूचे से मुझको सच्चा प्यार मिला है । सबको अपना कह देने का मुझे सदा अधिकार मिला है । आज उन्हीं गलियों-कूचों में, मन यह मेरा डोल रहा है। पहले लिखे हुए गीतों को देख-देख मन कोच रहा है ।

 

सारे दृश्य निकलकर मन से, आज सामने खड़े हुये हैं । मैं कितना छोटा लगता है, ये अब कितने बड़े हुये हैं ? जाने किस पहलू के यह मन पृष्ठ आज ये खोल रहा है ? पहले लिखे हुए गीतों को देख-देख मन कोच रहा है ?

 

६३

 

रत्ती-रत्ती जिगर जला है, राई राई दिल राख हुआ । मैंने साफ हक़ीकत कह दी है, मेरा जीवन खाक हुआ ।

 

मेरे अपने आग लगाकर, दूर खड़े मुस्काते हैं । मैं रोता हूं दर्द के मारे, वो पास तलक न आते हैं । अब न मिटेगा किसी तरह से, ऐसा दिल में दाग़ हुआ । मैंने साफ हक़ीकत कह दी है, मेरा जीवन खाक हुआ ।

 

उनको लाख हमारे जैसे, हमको वो हैं लाखों में । वही बसे हैं मेरे दिल में, वही बसे हैं आंखों में । वह हैं मुझे चांद से शीतल, मैं उन्हें दहकती आग हुआ । मैंने साफ हक़ीकत कह दी है, मेरा जीवन खाक हुआ ।

 

जो कुछ होना हो सो हो ले, हमने उनको प्यार किया । साथ जियेंगे, साथ मरेंगे, यह हमने इकरार किया । वह मेरे हैं, मैं हूं उनका, लो, मेरा कहना साफ हुआ । मैंने साफ हक़ीकत कह दी है, मेरा जीवन खाक हुआ ।

 

तुमने खूब निभाई चाहत, झूठा प्रेम जताया है । जब-जब मिले कहीं हम दोनों, तुमने खूब रुलाया है। यह तेरा कैसा बतलादे, मेरे संग इंसाफ हुआ ? मैंने साफ हक़ीकत कह दी है, मेरा जीवन खाक हुआ ।

 

देख मानले बात हमारी, वर्ना तू पछतायेगा । मेरे संग ऐसा व কাই

 

६४)

जितना नीला अम्बर छाया । जितनी धरती की है काया। जितनी दुनिया की है पाया ।

 

इतना प्यार तुम्हें दे दूंगा, जो तुम मेरा हाथ पकड़ लो।

 

क्या है चांदी, क्या है सोना ? क्या दुनिया का रंग सलोना ? मेरी बन जाओ जो साथी, तो ला दूंगा चन्द्र खिलौना ।

 

ताजमहल तक बनवा दूंगा, जो तुम मेरा हाथ पकड़ लो ।

 

क्या है सूरज, क्या है चन्दा ? क्या माया का रेशम फन्दा ? सब कुछ बता तुम्हें मैं दूंगा । माना मैं हूं अदना बन्दा ।

 

स्वर्ग बना दूंगा क़दमों में, जो तुम मेरा हाथ पकड़लो ।

 

हीरा, पन्ना, लाल, जवाहर । कुंकुम, मेंहदी, रंग, महावर । सब ला दूंगा तुम्हें प्रियतमे । पाना मैं हूं अदना शायर ।

 

ये सारे वैभव दे दूंगा, जो तुम मेरा हाथ पकड़लो ।

 

तुम ही सचा, तुम ही सीता। तुम ही मानस, तुम ही गीता । तुम में रूप सभी दिखते हैं। तुम ही सुर, तुम ही संगीता ।

 

मन्दिर-मन्दिर तुम्हें बिठा दूं, जो तुम मेरा हाथ पकड़ लो।

 

६५)

तुमसे नहीं शिकायत, तुमसे नहीं गिला । तक़दीर ही है ऐसी, जो हमको ग़म मिला ।

 

मेरी यही दुआ है, तू खुश रहे सदा । मैं ग़म तेरे झेल लूंगा, होकर के अब जुदा । तेरी ज़िन्दगी का गुलशन, यूंही रहे खिला । तुमसे नहीं शिकायत, तुमसे नहीं गिला ।

 

मेरी ये ज़िन्दगी है, तेरी वो ज़िन्दगी । इक ओर ग़म का दरिया, इक ओर है खुशी । चलने दो ज़िन्दगी का अब यूंही सिलसिला । तुमसे नहीं शिकायत, तुमसे नहीं गिला ।

 

बरबादियों का मुझको, कोई भी ग़म नहीं । माना कि ज़िन्दगी मैं जीने का दम नहीं । जलने दो इस शमा को अब यूंही झिलमिला । तुमसे नहीं शिकायत, तुमसे नहीं गिला ।

 

आंसू मिले हैं हमको जामों से छलछलाते । हम इनको पी के देखो, फिरते हैं मुस्कुराते । जैसी हो तेरी मर्जी, हमें वैसे तू जिला । तुमसे नहीं शिकायत, तुमसे नहीं गिला ।

 

६६)

दर्द के हाथों न सौंपो, ज़िन्दगी की हर खुशी । ज़िन्दगी बेकार यूं जीने को तो होती नहीं ।

 

मौत को बदनाम करने से भला क्या फायदा ? यह नहीं है आदमी का, आदमी सा क़ायदा । क्यों अन्धेरों के गले में बांधते हो रोशनी ? दर्द के हाथों न सोंपो, ज़िन्दगी की हर ख़ुशी ।

 

इन दृगों के मोतियों को मत लुटाओ दोस्तो । ग़म का यह बोझा बिखर कर मत दिखाओ दोस्तो । यह नहीं है आदमी की, आदमी से दोस्ती । दर्द के हाथों न सोंपो, ज़िन्दगी की हर ख़ुशी ।

 

भाग्य को मत दोष दो तुम, होश में आओ ज़रा । क्यों बने बैठे हो मुर्दा, जोश में आओ ज़रा ? ज़िन्दगी के फूल की ले लो ज़रा सी ताज़गी । दर्द के हाथों न सोंपो, ज़िन्दगी की हर खुशी ।

 

प्यार सच्चा है कहां पर, इस जहां में आजकल ? यार सच्चा देखिये मिलता कहां पर आजकल ? होंठों पर तो इसलिए आती नहीं अब तो हंसी । दर्द के हाथों न सोंपो, ज़िन्दगी की हर ख़ुशी ।

 

यह हमारा मशवरा लेकर तो थोड़ा देखिये । प्यार अपना हर किसी को देकर तो थोड़ा देखिये । प्यार पाकर खिल उठेगी हर कहीं पर जिन्दगी । दर्द के हाथों न सोंपो, ज़िन्दगी की हर

 

(६७)

 

ख़त लिखा रखा है, कहां भेजें हम ? तुम्हारा पता हो, वहां भेजें हम ।

 

न ख़त ही दिया, न पता ही दिया । हमें तुमने आखिर, भुला ही दिया । पड़े ग़म के छाले, निशां भेजें हम । तुम्हारा पता हो, वहां भेजें हम ।

 

न शहर का पता है न घर का पता । न गली का पता है न दर का पता । कहां है ठिकाना, जहां भेजें हम ? तुम्हारा पता हो, वहां भेजें हम ।

 

हम तुम्हारा ठिकाना नहीं जानते । सिर्फ तुमको ही केवल हम पहचानते । बतादो फिर किसके मकां भेजे हम ? तुम्हारा पता हो, वहां भेजें हम ।

 

बड़े संगदिल हो न आते यहां । न हमें ही कभी तुम बुलाते वहां । बता ऐसे किसके ठिकां भेजें हम ? तुम्हारा पता हो, वहां भेजें हम ।

 

 

(६८)

 

सारी रात तड़पते बीती, रो-रो हो गई बावरी । मन का सागर रीता-रीता, भरे कहां से गागरी ? दुःख ददों ने ऐसे घेरा, जैसे कुचली आंगुरी । तुम्हीं बताओ कैसे गाऊं, खुशियों की ये लांगुरी ?

 

कुंकुम सी काया का रंग ये कोयल जैसा हो गया । मन का मधुवन मुरझाया तो मरघट जैसा सो गया । अंखियन अश्रु टपककर भींगी, तन की देखो कामरी । मन का सागर रीता-रीता, भरे कहां से गागरी ?

 

सांसों से कान्हा की बंशी जैसी पीड़ा बोलती । फिरे बवरिया राधा जैसी उमर प्यार की डोलती । घोर निराशा भरे खड़ी है देखो अपनी मांग री । मन का सागर रीता-रीता, भरे कहां से गागरी ?

 

पग-पग पर ठोकर देती है किस्मत अपनी फोड़ रे । आशा बीच निराशा आकर मन को देती मोड़ रे । भूल भुलैयों में खोई है देखो जीवन डागरी । पन का सागर रीता-रीता, घरे कहां से गागरी ?

 

झुलस गया है तन-मन अपना, तेरे गम की आगी में। राग-विराग तू कुछ न जाने, फंसी हूं तुझ अनुरागी में। खेल रही है किस्सत अपनी, शोषित की ये फाग री । मन का सागर रीता-रीता, भरे कहां से गागरी ?

६९)

 

तिनकों से उड़े हैं दिन, और सालें बादल सीं । सांसों की क्या गिनती, ये तो ठहरी पागल सी ?

 

बचपन भी बीत गया, और बीती जवानी भी । अब ख़त्म फसाना है, और ख़त्म कहानी भी । वो बोली भी नहीं मीठी जिसे कहते कोयल सी। सांसों की क्या गिनती, ये तो ठहरी पागल सी ?

 

वो कैसी जवानी थी, वो कैसा जमाना था ? हर ओर हमारा ही होंठों पर तराना था । हर चूड़ी जख़्मी थी, हर पायल घायल सी । सांसों की क्या गिनती, ये तो ठहरी पागल सी ?

 

हम आवारा भंवरे थे, और कलियां सैलानी । लोगों ने बहुत टोका, पर हमने कहां मानी । हम बैठे जिस दिल में, इक शमा गई जल सी । सांसों की क्या गिनती, ये तो ठहरी पागल सी ?

 

हम गांव-गांव घूमे, और शहर-शहर छाना । गलियों-कूचों में भी हमने गाया गाना । पर व्यर्थ हुआ सबकुछ, इमको न पड़ी कल सी । सांसों की बया गिनती, ये तो ठहरी पागल सी ?

 

७०)

 

आंसू तेरी आंखों से बहने कभी न दूंगा । किसी ग़म को तेरे दिल में रहने कभी न दूंगा।

 

आंखों में छुपा लूंगा, मैं तेरी हंसीन सूरत । नाज़ों के बल रखूंगा, तेरी महजबीन सूरत । दुनिया के गम अकेले सहने कभी न दूंगा । किसी ग़म को तेरे दिल में रहने कभी न दूंगा।

 

बाहों तले मैं तुझको रखूंगा सुला करके । यूँही देखता रहूंगा, दुनिया को भुला करके । तनहाइयों में तनहा रहने कभी न दूंगा । किसी ग़म को तेरे दिल में रहने कभी न दूंगा ।

 

ये नर्म-नर्म गेसू छू सकता नहीं कोई । ये गर्म-गर्म सांसें ले सकता नहीं कोई । किसी दूसरे को तेरा कहने कभी न दूंगा । किसी राम को तेरे दिल में रहने कभी न दूंगा ।

 

तुफान हो, भंवर हो, या हो कोई किनारा । चाहूंगा तेरी हरदम, बाहों का मैं सहारा । दीवार-ए-ज़िन्दगी को बहने कभी न दूंगा । किसी राम को तेरे दिल में रहने कभी न दूंगा।

७१)

 

की महक हैं मेरे जीवन में । सकरहना पड़ता है इसको सावन में ।

 

हर पल घिरा रहूं मैं गम से, ये चाहत कैसी है? इन आंखों में नींद नहीं है, ये राहत हत कैसी है ?

 

कसक रही हैं टीसें आकर, मेरे मृदु यन में। प्यासा तक रहना पड़ता है, हमको सावन में।

 

वह कजरारी अंखियां मेरी, आंखों में झूमें। कभी पकड़ कर हाथ हमारा, होंठों से चूमें।

 

पग-पायलिया छम-छम करती, डोले आंगन में। प्यासा तक रहना पड़ता है. हमको सावन में।

 

वह पीठे-मीठे बबन तुम्हारे, अव तक चहक थे। मेरे मन की इस बगिया में, अव तक महक रहे।

 

समा गई तु आकर मेरे, तन, मन, जीवन में। प्यासा तक रहना पड़ता है. हमको

(७२)

 

जिन्दगी मायूस होकर जल रही है। ऐ खुदा ! ये चाल कैसी चल रही है ?

 

मैं यहां आंसू स्वयं के पी रहा हैं । पीते-पीते खून अपना जी रहा हूं । शूल संग दिल की कली ये पल रही है। ऐ खुदा । ये चाल कैसी चल रही है ?

 

आज की दुनिया ये कितनी है बुरी ? देखकर भी तो न चलाती है छुरी । आज अपनों का ही जालिम छल रही है। ऐ खुदा ! ये चाल कैसी चल रही है ?

 

मेरे दिल की हर तमन्ना खाक में मिल ही गई । दुशमनों की इस तरह दिल की कली खिल ही गई। अपनी तो ऐसे ही जवानी ढल रही है । ऐ खुदा । ये चाल कैसी चल रही है ?

 

(७३)

 

 

कुन्दन सा तन, नीलम सा मन, कलियों सी मुस्कानें। नैन कटीले, होंठ रसीले, छूकर ही हम माने ।

 

रोम-रोम सुरभित है तेरा, महके पूरनमासी । तेरा रूप सलोना जग में, बात यही है खासी । कोई नहीं है जग में ऐसा, जो न तुझको जाने ? कुन्दन सा तन, नीलम सा मन, कलियों सी मुस्कानें ।

 

रची हथेली हथेली मेंहदी मेंहदी तेरे, तेरे पांवों लगा महावर । धीरे-धीरे चलती है तू, फिरभी है जग जाहिर । मैं ही केवल नहीं अकेला, सारा जग सनमाने । कुन्दन सा तन, नीलम सा मन, कलियों सी मुस्कानें ।

 

कुंकुम बिन्दी भाल पे सोहे, बिन्दिया माथे झूमे । घन से हैं कजरारे गेसू, जो गालों को चूमे । नई बसन्ती चूनर झूमे, गाए सौ अफसाने । कुन्दनं सा तन, नीलम सा मन, कलियों सी मुस्कानें ।

 

(७४)

 

तारीफ करूं मैं क्या तेरी, तू सुर्ख गुलाब का फूल लगे ? जो भी सूरत देखे तेरी, तू उसके ही अनुकूल लगे ।

 

बालों में सावन झूम रहा । तेरे गालों को चूम रहा।

 

तू दूर-दूर भागे फिर भी, मन-भँवरा लोभी घूम रहा ।

 

आँखों में जाम छलकते हैं, तू मधु सी मुझे समूल लगे । जो भी सूरत देखे तेरी, तू उसके ही अनुकूल लगे ।

 

रख देखे तो गश खा जाये। जो एक झलक ही पा जाये ।

 

वह जान लुटादे क़दमों में, जो थोड़ा तू मुसका जाये।

 

सच कहता हूँ यह झूठ नहीं, तुझे उसने बनाया भूल लगे । जो भी सूरत देखे तेरी, तू उसके ही अनुकूल लगे ।

 

दाँतों में मोती सी लड़ियाँ । बातों से झूठे फुलझड़ियाँ । ये आँखें हैं. सा. हीरे हैं-या है ये दो नीलम मणियों ।

 

तेरी सुन्दरता के आगे तो ये दुनिया मुझको धूल लगे । जो भी मूरत देखे तेरी, उसके ही अनुकुल लगे ।

 

 

 

७५

 

तुम एक गुलाब हो । बहुत लाजवाब हो । पढ़ते रहें तुम्हें हम-ऐसी किताब हो ।

 

आंखों में जाम छलके । बोझिल हैं तेरी पलके । सावन की हैं घटायें, रेशम सी तेरी अलके ।

 

मदहोश बना देतीं, तुम वो शराब हो ।

 

ग़म के मिटें अंधेरे । ख़ुशियों के हों उजेरे । रातों की हो विदाई, उल्फ़त के हों सबेरे ।

 

तुम चाँद हो पूनम का, या आफताब हो ।

 

तुम हूर या परी हो । मूरत या मरमरी हो । सब तेरा जिक्र करते, तुम स्वप्न-सुन्दरी हो ।

 

दुनिया के सवालों का, तुम एक जवाब हो ।

 

नाता रहे न जग से, मंज़िल मिले जो तुम से।

 

तुम हो मेरी कहानी, पूछे कोई जो हमसे ।

 

रव की पलक न झपके, तुम वो शबाब हो

७६)

 

तुमने अगर पुकारा होता, तो हम साथ तुम्हारे होते । तूफानों में नहीं भटकते, हम-तुम खड़े किनारे होते ।

 

सभी यही कहा करते हैं, कभी न मिलते नदी किनारे । फिर भी हम तो यही कहेंगे, आ जाओ मन मीत हमारे । ऐसा अगर कहीं हो जाये, तो ख़ुशियों से झोली भरलूं । फूलों के घर रहूं शान से, साथी सभी हमारे होते । तूफांनों में नहीं भटकते, हम-तुम खड़े किनारे होते ।

 

मेरी अपनी राम कहानी, सुनता जग ये कभी बैठकर । मैं हसंता-मुस्कुराता उनसे, औ' कभी खीजता खूब चेंटकर । काश ! तुम्हारा मन भी होता, मेरे जैसा चाहत वाला । तो जग सारा होता अपना, जो तुम प्राण प्यारे होते । तूफांनों में नहीं भटकते, हम-तुम खड़े किनारे होते ।

 

मेरे साथ विषमताओं का नंगा नाच हुआ जीवन भर । दुःख दर्दों से सने रहे हम, सुख से जिये कभी न क्षण भर । यह सब हुआ तुम्हारी खातिर, ओ मेरे निर्मोही साथी, ग़र तुम हाथ हमारा गहते, तो कब बिना सहारे होते ? तूफांनों में नहीं भटकते, हम-तुम खड़े किनारे होते ।

 

मेरा क्या जी लिया तड़प कर, पर तुम कैसे जी पाओगे ? मेरी तरह बताओ साथी, आंसू कैसे पी पाओगे ? लेकिन तुम तो रास-रंग में, डूबे रहते होश गंवा कर, अगर दर्द को पीते हम सा, तो तुम 'हाय' पुकारे होते । तूफांनों में नहीं भटकते, हम-तुम खड़े किनारे होते ।

७७)

 

कैसे-कैसे देखे मैंने सुखद-सुहाने सपने ?

 मैं तेरा हो गया प्रियतमे, तुम हो गए हो. अपने ।

 

तेरा हाथ पकड़ कर मैंने, झट से चूम लिया है।

तुम्हें उठा बाहों में अपनी, अम्बर घूम लिया है।

तेरे शीतल होंठ चूमकर, अंग लगा मेरा तुमने ।

 मैं तेरा हो गया प्रियतम ! तुम हो गए हो अपने ।

 

तुम्हें बिठा कर सामने अपने, सूरत देख रहा हूँ।

 ऐसा लगता जैसे मैं कोई मूरत देख रहा हूँ।

मन ही मन मुसका कर मैं तेरा नाम लगा हूँ जपने ।

 मैं तेरा हो गया प्रियतम ! तुम हो गए हो अपने ।

 

दुल्हन तुम्हें बनाकर लाया, मैं पागल चूनर को देखूं, ऐसे-ऐसे देखे मैंने, फूलों की डोली में । मन खोया चोली में । सुखद-सुहाने सपने । मैं तेरा हो गया प्रियतमे ! तुम हो गए हो अपने ।

 

फूलों की शैया पर तेरा, घूंघट खोल रहा हूँ। तुम कुछ भी न बोल रही हो, मैं ही बोल रहा हूँ। लगता तुम घवराई हुई हो, अंग लगा जो तपने । मैं तेरा हो गया प्रियतमे ! तुम हो गए हो अपने ।

 

नील गगन पर चाँद के ऊपर, हम तुम झूल रहे हैं। इस दुनिया की सारी बातें हम तुम भूल रहे हैं। झुककर जो नीचे को देखा, तो अंग लगा है कपने । मैं तेरा हो गया प्रियतमे ! तुम हो गए हो अपने ।

 

७८)

 

हमारी समझ में नहीं आ रहा है। ज़माना गुज़रता चला जा रहा है।

 

हुआ प्यार तुमसे, किवा तो नहीं था । बदले में उसके लिया तो नहीं था । ज़माने में फिर क्या सुना जा रहा है ? ज़माना गुज़रता चला जा रहा है।

 

वो रंगीं ज़माने भुला क्यों दिये हैं ? चराग़ों को तुमने सुला क्यों दिये हैं ? अंधेरा गज़ब का हुआ जा रहा है। ज़माना गुज़रता चला जा रहा है ।

 

हसरत थी दिल की तुम्हें अपना कहते । कि सब कुछ लुटाकर तेरे साथ रहते । इसी आरज़ू में सब लुटा जा रहा है। ज़माना गुज़रता चला जा रहा है ।

 

न फरियाद करते, न शिकवा-शिकायत । न ग़म दिल को मिलता, न होती मुहब्बत । इसी ग़म में दम ये घुटा जा रहा है। ज़माना गुज़रता चला जा रहा है ।

 

तुम्हारे ही क़दमों पर हम जान देंगे । तुम्हारी कसम तुम पर ईमान देंगे । जो होना ही है, वो हुआ जा रहा है । ज़माना गुज़रता चला जा रहा है ।

 

(७९)

 

मेरी बात सुनकर बहारों न रोना । कसम मेरे दिल की नज़ारो न रोना ।

 

मुझे प्यार करके तो अपनों ने लूटा । अपनी ही रातों के सपनों ने लूटा । अब टूटे हुये से सहारो न रोना । कसम मेरे दिल की नज़ारो न रोना ।

 

न किश्ती बची है, न पतवार कोई । न इस पार कोई, न उस पार कोई । इस हालत पे मेरी किनारो न रोना । कसम मेरे दिल की नज़ारो न रोना ।

 

किसी का मुझे जब सहारा मिला था । मेरे दिल का सारा गुलिस्तां खिला था । अब जुदाई में उनके सितारो न रोना । कसम मेरे दिल की नज़ारो न रोना ।

 

(८०)

 

सुख के सपने बिखर गए सब, दुःख के रंग हजार हुए। हम ऐसे आंसू दुनिया में, जो गिरकर बेकार हुए, ।

 

आशाओं ने विदा मांग ली, हमसे आज अकेले में । खुशियां तनहा छोड़ गई हैं, दुःख के मुझे झयेले में । अपने सभी पराये हो गए, दूर सभी परिवार हुए । हम ऐसे आंसू दुनिया में, जो गिरकर बेकार हुए ।

 

मन की मन में रही हमारे, फूलों को चुनने की आस । मुसकाने होठों से खोई, दर्द रह गए केवल पास । सुर-बेसुर सब हुए हृदय के, टूटे हर इक तार हुए । हम ऐसे आंसू दुनिया में, जो गिरकर बेकार हुए ।

 

जाने कैसे पलट गए दिन, तूफानों के हाथों से ? दुःख ही केवल उमड़ रहा है, अब तो सबकी बातों से । यार हमारा क्या रूठा है, कि फूल सभी बन खार हुए । हम ऐसे आंसू दुनिया में, जो गिरकर बेकार हुए ।

 

मानव ने मानवता छोड़ी, दानवता का रूप लिया । गैरों जैसा अपनों ने भी, देखो आज सरूप लिया । पलक बीच विठलाया जिनको, उनको ही हम भार हुए। हम ऐसे आंसू दुनिया में, जो गिरकर बेकार हुए ।

 

सुख की कहीं नहीं अब बस्ती, दुःखमय है सारा संसार । नफ़रत-नफ़रत सभी जगह है, कहीं नहीं है सच्चा प्यार । नारी की कूखों से जन्में, दानव के अवतार हुए । हम ऐसे आंसू दुनिया में, जो गिरकर बेकार हुए ।