हरिसिंह हरीश की कविताएं व समीक्षा
मेरा खत न मिलने पर 1
हरिसिंह 'हरीश' :
परिचय
: 1 अगस्त, 1935 (दतिया म.प्र.)
शिक्षा
: एम.ए. (हिन्दी) तक ग्वालियर जीवाजी विश्वविद्यालय से ।
मानद
: विद्यावाचस्पति (पी-एच.डी.)सम्मान
विद्या सागर (डी. लिट्)
: 1994 में नव चेतना साहित्य एवं कला संस्थान, झांसी (उ.प्र.) द्वारा 'काव्य कलाधर' की उपाधि ।
: 1996 में भारतीय दलित साहित्य अकादमी, फर्रुखाबाद (उ.प्र.) द्वारा स्वामी अछूतानंद अति विशिष्ट सम्मान ।
: 1994 में कानपुर साहित्य सम्मेलन, कानपुर द्वारा सम्मान ।
अध्यक्ष: सर्व धर्म पार्टी, इकाई दतिया ।
अध्यक्ष: 'बातचीत मंच' दतिया ।
अध्यक्ष एवं संरक्षकः 'सिरमौर साहित्य सभा' दतिया ।
संप्रति : स्वतंत्र लेखन
साहित्य सृजन : कली भँवरे और कांटे (1967) उपन्यास (प्रकाशित)
मन के गीत नमन के अक्षर (भक्ति काव्य) 1986 (प्रकाशित)
श्री गुरु चरणों के फूल 1988 (प्रकाशित)
श्री गुरु मां चरणों की धूल1999 (प्रकाशित)
दर्द की सीढ़ियां (ग़ज़ल संग्रह) 26 जनवरी 2002 (प्रकाशित)
संपादन: दतिया काव्यधारा भाग-1-2
अप्रकाशित: 40 उपान्यास, 2 कहानी संग्रह, 10 गीत संग्रह
संपर्क : सुमन साहित्य सदन नया दरवाजा, गांधी मार्ग, दतिया (म.प्र.) 475661
हरि सिंह हरीश एक कर्मठ कवि थे। अपनी हैसियतों के भीतर लिखने वाले। अपने शब्दकोश के भीतर लिखने वाले और विषय के दायरे में भी लगभग सीमित रहने वाले। उनका मुख्य विषय था प्रेम और प्रेम। जब विषय रखेंगे तो प्रेमिका भी आएगी। प्रेमिका की याद भी आएगी। मिलन भी आएगा और मिलन के क्षणों की हरकतें भी याद आएंगे। प्रेमिका से उलझना भी याद आएगी। उनके द्वारा कविता और उपन्यास लिखने का काम पूजा की तरह किया जाता था। सुबह 6:00 बजे जाग जाते और लिखना शुरू कर देते। उन्होंने 39 उपन्यास लिखे। उनके पास 10000 गीत हैं। उनके लिखे 25000 मुक्तक हैं। उनकी लगभग 15000 गजल हैं। अगर गीत शास्त्र या ग़ज़ल के आलोचना शास्त्र से इन रचनाओं का आकलन करें तो शायद इनमें से कम ही खरे उतरेंगे ।लेकिन मनमौजी कवि थे । एक कस्बे का कवि। इसका देखने का दायरा , अनुभव करने का दायरा कस्बे के कवि की तरह ही था। न उंन्का देश के किसी व्यक्ति से कंपटीशन था, न देश के किसी बड़े संस्थान से किताब छापने की लालसा। पत्रिका भी बड़ी नहीं चाहते थे वे। छोटे-मोटे पत्र पत्रिकाओं में छप लेते थे और कवि गोष्ठी में सुन लेते थे। उनके प्रकासन उनकी शुरुआत ‘कली भवरे और कांटे’ उपन्यास से हुई जो उनका 40 व उपन्यास था। पर इसके बाद के 39 उपन्यास अब प्रकाशित ही रह गए। उन्होंने ‘मन के गीत नमन के अक्षर” के नाम से एक व्यक्ति गीत संग्रह भी प्रकाशित कराया था। इसके बाद फिर प्रोफेसर पर शुक्ला (परशुराम शुक्ल) की प्रेरणा मिली । डॉक्टर हरिहर गोस्वामी द्वारा दिया गया आशीर्वाद सहयोग और शहर के बहुत तेरे लोगों की अप्रिशिएसन से उन्होंने अपने अन्य किताबों का प्रकाशन शुरू किया। दतिया काव्य धारा 3 का उन्होंने संपादन किया और अपनी लगभग एक दर्जन किताबें उन्होंने विभिन्न संग्रह में शामिल की और छपाई। उनके एक रचना संग्रह पर यह टिप्पणी और टिप्पणी के साक्ष्य में उनकी रचनाएं प्रस्तुत हैं -
(१)
मेरा खत न मिलने पर तुम्हें कैसा लगता है ? ऐसा लगता है, या वैसा लगता है ?
पहले के ख़तों में तो मुझे अपना बनाया था।उम्मीद के लम्हों से एक सपना सजाया था ।
यह बात अगर आये तो कैसा लगता है ?ऐसा लगता है, या वैसा लगता है ?
यह प्यार तुम्हारा तो पहलू में छुपा बैठा। कभी सामने आ जाता, कभी सीने लगा बैठा ।
अब दूर-दूर रहकर, तुम्हें कैसा लगता है ? ऐसा लगता है, या वैसा लगता है ?
सच मानो तुम मुझको, कभी भूल नहीं सकते । मेरे प्यार बिना तुम तो, कभी झूल नहीं सकते ।
यूं दूर बने रहकर, तुम्हें कैसा लगता है ? ऐसा लगता है, या वैसा लगता है ?
यह भीगा हुआ मौसम, रिमझिम की फुहारों का । तुम्हें बाद बता होगा, मौसम वो बहारों का ।
कभी पतझड़ की रितु में, तुम्हें कैसा लगता है ? ऐसा लगता है, वा वैसा लगता है?
२)
तुमसे यह उम्मीद नहीं थी, खत भी नहीं लिखोगे हमको ।एक बार दर्शन दे करके, सदियों नहीं दिखोगे हमको ।
पहले ख़त कितने लिखते थे, सपनों में कितना दिखते थे ?पत्र हजारों लिख कर भी तो, ज़रा नहीं फिर भी थकते थे।
आज अचानक यह परिवर्तन, सपने नहीं तकोगे हमको । एक बार दर्शन दे करके, सदियों नहीं दिखोगे हमको ।
कसमें वादे तोड़ दिये हैं, सभी इरादे छोड़ दिये हैं। पंज़िल पर आकर के तुमने, रस्ते सारे मोड़ दिये हैं।
पहले तुम अपना कहते थे, अब तो नहीं कहोगे हमको ।एक बार दर्शन दे करके, सदियों नहीं दिखोगे हमको ।
तुम क्यों इतने दूर हुये हो, मिलने से मजबूर हुये हो ?मेरी तरह बताओ कैसे, दुःख से चकनाचूर हुये हो ?
नयन-कोटरों, बीच बसाकर, इतने दूर रखोगे हमको । एक बार दर्शन दे करके, सदियों नहीं दिखोगे हमको ।
यह तो ठीक नहीं है यारा, ग़म दे करके हमको मारा ।डूब चुके हैं हमतो ग़म में, यह अहसां हो गया तुम्हारा ।
सदियां कई गुजर जाने पर, ख़त तक नहीं लिखोगे हमको ।। एक बार दर्शन दे करके, सदियों नहीं दिखोगे हमको ।
चाहत का यह खेल कठिन है, करना इसका मेल कठिन है।मुझ दीपक बिन तुझ बाती का, तनहा जलना बहुत कठिन है।
तेरे बिना तनहा बैठा हूं, क्या आकर नहीं मिलोगे हमको ?एक बार दर्शन दे करके, सदियों नहीं दिखोगे हमको ।
३)
सदियां बीत गई हैं देखो, बिन दर्शन के यार तुम्हारे । कबसे पहन नहीं हम पाये, कर कमलों के हार तुम्हारे ?
वे दिन अब कब लौट सकेंगे, जिन में हम-तुम साथ रहे थे। इक दूजे के प्राण प्रिय बन, साथ-साथ दिन-रात रहे थे । अब तक मन में बसे हुवे हैं, चाहत के उपहार तुम्हारे । कबसे पहन नहीं हम पाये, कर कमलों के हार तुम्हारे ?
प्रेष पूर्ण सुलझाई हमने, अलकें सौ-सौ बार तुम्हारी । चूमी खूब प्यार से हमने, पलके सौ-सौ बार तुम्हारी ।
अब तक भूले नहीं देखिये, वह देखो उपकार तुम्हारे ।कब से पहन नहीं हम पाये, कर कमलों के हार तुम्हारे ?
नयनों में झांका है हमने, खोल हृदय की प्रेम किबड़िया । तुम्हें बिठाया मन-मन्दिर में, बना प्रेम की सुन्दर मड़िया ।
पूजा-अर्चन हेतु देखिये, सजा रखे घर द्वार तुम्हारे । कब से पहन नहीं हम पाये, कर कमलों के हार तुम्हारे ?
होली, दोज, दीवाली, सावन, तेरे बिन हम नहीं मनाते ।जो कहना है हमको यारा, बोलो तुम बिन किसे सुनाते ?
इतनी बड़ी धरी दुनिया में, सदा रहे लाचार तुम्हारे । कब से पहन नहीं हम पाये, कर कमलों के हार तुम्हारे ?
तेरे बिन तो सच कहता हूं, यह दुनिया सूनी है सारी । संत साधुओं के ही जैसी, यह दुनिया धूनी है सारी । मुझको सारे पर्व सपन हैं, जग के सब त्यौहार तुम्हारे । कब से पहन नहीं हम पाये, कर कमलों के हार तुम्हारे ?
४)
माथे की लकीरों को गिनने को चले आओ । इक बार मेरे घर तुम, मिलने को चले आओ ।
मेरा हाल पूछ लेते तो क्या तुम्हारा जाता ? मन पेरा झूम करके, फिर गीत वो ही गाता ।
जो तुमने सुना था हमसे, सुनने को चले आओ । इक बार मेरे घर तुम, मिलने को चले आओ ।
तेरा चेहरा हुआ कैसा, इक मुरझाये फूल जैसा ? तुम आकर के बता जाओ, वहां हाल तेरा कैसा ?
इक बार मेरा चेहरा पढ़ने को चले आओ । इक बार मेरे घर तुम, मिलने को चले आओ ।
तुम खुशनसीब दिल के, मैं बदनसीब दिल का । तुम हो अमीर दिल के, इन दूरियों के पथ पर,
इक बार मेरे घर तुम, मैं हूं गरीब दिल का । बढ़ने को चले आओ । मिलने को चले आओ ।
चाहत का महल अपना, कहीं बन न जाये सपना । वर्ना पड़ेगा हमको, रो-रो के बस तड़पना ।
यह सोच करके आहे, भरने को चले आओ । इक बार मेरे घर तुम, मिलने को चले आओ ।
पेरा कसूर क्या है, बोलो हुजुर क्या है ? मेरे पास क्या नहीं है, फिर दूर-दूर क्या है ?
इन सारे सवालों पर लड़ने को चले आओ । इक बार मेरे घर तुम, मिलने को चले आओ ।
वादों को निभाना है, कसमों को निभाना है। चाहत की सारी धूली, तुम भी मेरी तरह से,
इक बार मेरे घर तुम, रसमों को निभाना है। मरने को चले आओ । मिलने को चले आओ ।
(५)
तुम्हारा कर रहे हैं यार, हम इंतजार थोड़ा सा । घुला है इस प्रतीक्षा में तुम्हारा प्यार थोड़ा सा ।
तुम्हें आना पड़ेगा यार, अब वादा निभाने को । वहां किस हाल में हो तुम, हमें इतना बताने को ।
इसी से रहता है अक्सर दिल बेकरार थोड़ा सा । घुला है इस प्रतीक्षा में तुम्हारा प्यार थोड़ा सा ।
हमें मालूम तो होले, तुम्हारा क्या इरादा है ? रहेंगे साथ हम दोनों, तुम्हारा हमसे वादा है।
हमारे सामने आकर करो इकरार थोड़ा सा । घुला है इस प्रतीक्षा में तुम्हारा प्यार थोड़ा सा ।
कहा करते थे तुम हमसे, तुम्हीं पर जान दे देंगे । अजी यह जान क्या है चीज़, हम ईमान दे देंगे ।
यही सुनने खड़े हैं यार, हम इकबार थोड़ा सा । घुला है इस प्रतीक्षा में तुम्हारा प्यार थोड़ा सा ।
अगर आजाओ तुम तो, प्यार की मंज़िल पे दम लेंगे। हजारों लांघ के तूफां कि हम, साहिल पे दम लेंगे।
तभी तेरा करेंगे यार हम शुक्र गुजार थोड़ा सा । घुला है इस प्रतीक्षा में तुम्हारा प्यार थोड़ा सा ।
तुम्हारे यार ऊपर हैं, सभी यह प्यार का जिम्मा । तुम्हारा हूं में परवाना, कि मेरी हो तुम्हीं शमां ।
करो जलकर-जलाकर, यार यह स्वीकार थोड़ा सा । घुला है इस प्रतीक्षा में तुम्हारा प्यार थोड़ा सा ।
६)
मेरी अपनी राम कहानी सुनने वाला कोई नहीं । मेरी बात प्यार से सुनके, गुनने वाला कोई नहीं ।
हैं पेरी आखों में आंसू, कोई इन्हें निहारे तो । मैं बैठा हूं तन्हा कब से, कोई मुझे पुकारे तो ।
घेरे दुःख के इन कांटों को, चुनने वाला कोई नहीं । मेरी बात प्यार से सुनके, गुनने वाला कोई नहीं ।
मेरा दर्द समन्दर जैसा, फैला चारों ओर अरे । जाऊँ कैसे इस रस्ते पर, दर्द है चारों ओर घरे ।
मेरी प्रेम चदरिया देखो, बुनने वाला कोई नहीं । मेरी बात प्यार से सुनके, गुनने वाला कोई नहीं ।
मुझे देखकर कौन बताओ, अपना प्यार लुटायेगा ? मेरी राम कहानी सुनने कौन यहां पर आयेगा ?
मेरी बात ध्यान से सुनकर कहने वाला कोई नहीं । मेरी बात प्यार से सुनके, गुनने वाला कोई नहीं ।
मेरा सूना सूना अन्तर, प्यार मुहब्बत रिश्तों का । कोई इस पर कर्ज़ नहीं है, हो देना जिसको किस्तों का ।
मेरे सुने इस अन्तर में बसने वाला कोई नहीं । मेरी बात प्यार से सुनके, गुनने वाला कोई नहीं ।
मेरी मंशा जैसा कोई रूप दिखाये रातों को । जब जब चाहूं तब तब छेड़े, गुज़रे कल की बातों को ।
मेरे तन में, मेरे मन में रखने वाला कोई नहीं । मेरी बात प्यार से सुनके, गुनने वाला कोई नहीं ।
राम न जानें मेरे पन की, मंशा पूरी कब होगी ? हंसकर आकर कहदे कोई, लो में आई ये अब होगी ।
वर्ना मेरे जैसा जग में, रहने वाला कोई नहीं । मेरी बात प्यार से सुनके, गुनने वाला कोई नहीं ।
(७)
हम जैसे लोगों की आशा, अब तक हुई न पूरी रे। इसीलिए ये राम कहानी, अब तक रही अधूरी रे ।
हमने ग़म का ज़हर पिया है, यह हम तुम्हें बताते हैं। हां, अश्नु सहेजे कितने हमने, यह हम तुम्हें दिखाते हैं।
यह अपने जीवन की गाथा, यह अपनी मज़बूरी रे । इसीलिए वे राम कहानी, अब तक रही अधूरी रे ।
दर-दर हम ठुकराये गए हैं, यही मिला है दुनिया से । नहीं किसी ने अपना समझा, यही गिला है दुनिया से ।
इसीलिए सारी दुनिया से, है यह अपनी दूरी रे । इसीलिए ये राम कहानी, अब तक रही अधूरी रे ।
हमको प्यार चाहिए केवल, यही हमेशा कहते हैं। हम तो इसी प्रेम नगरी में, सदा बिचरते रहते हैं।
नफ़रत करने की दुनिया को मिली तभी मंजूरी रे । इसीलिए ये राम कहानी, अब तक रही अधूरी रे ।
हम तो प्यार सभी से करते, देखें नहीं पराया रे । नफ़रत करने वाला नगमा हमने कभी न गाया रे ।
प्यार मांगने नहीं कभी भी करते जी हुजूरी रे । इसीलिए ये राम कहानी, अब तक रही अधूरी रे ।
प्यार-मुहब्बत रब की थाती, इसीलिए हम करते हैं। कुछ न कहना मुझको यारा, जो हम तुम पर मरते हैं।
इसीलिए तो हम अश्कों की पीते रहे अंगूरी रे । इसीलिए ये राम कहानी, अब तक रही अधूरी रे
८)
तुमने अच्छा नहीं किया, ख़त का उत्तर नहीं दिया । मेरी लाख वफाओं का, सिला प्रेम से नहीं दिया ।
मैं दीवाना तेरा था, मुझे ग़मों ने घेरा था। भटक रहा था इधर-उधर, चारों ओर अंधेरा था ।
मेरा हाथ पकड़ करके, मुझे सहारा नहीं दिया। मेरी लाख वफ़ाओं का, सिला प्रेम से नहीं दिया ।
झूठे तेरे वादे हैं, कच्चे सभी इरादे हैं। तूने मुझे दिखाये जो, सपने वो सब आधे हैं।
तू 'सब-कुछ' है गैरों की, मुझे इशारा नहीं दिया। मेरी लाख वफ़ाओं का, सिला प्रेम से नहीं दिया ।
मेरा सपना टूट गया, भाग हमारा मैं भी बड़ा अभागा हूं, जो तू मुझसे तेरी चाहत वाला वह
, मुझे नज़ारा मेरी लाख वफ़ाओं का, सिला प्रेम से फूट गया । रूठ गया । नहीं दिया । नहीं दिया ।
तेरे गांव न आऊंगा, तेरी छांव न आऊंगा । तेरे घर की राहों पर, चलकर पांव न आऊंगा ।
अपनी चाहत का वह मुझको, हंसीं सितारा नहीं दिया
९)
तुम जब भी वहां आओ, हम द्वार खड़े होंगे । तुम्हें देखने को प्रियवर, तैयार खड़े होंगे ।
कई सदियां गुजर गईं पर तुमको न मना पाये । इक पल के लिए तुमको अपना न बना पाये ।
यह बात सोच करके लाचार खड़े होंगे । तुम्हें देखने को प्रियवर, तैयार खड़े होंगे ।
फिर रूप रंग तेरा छाया हुआ आंखों में । फिर प्यार तेरा दौड़े मेरी इन्हीं सांसों में ।
तेरी इक झलक को हम बेकरार खड़े होंगे । तुम्हें देखने को प्रियवर, तैयार खड़े होंगे ।
बाहों में तुझे लेकर हम बार चलो घूमें । तुम लाख शरम खाओ हम फिर भी तुम्हें चूमें ।
तुम आओ सनम मिलने, हम इस पार खड़े होंगे । तुम्हें देखने को प्रियवर, तैयार खड़े होंगे ।
इक रोज सुना हमने, तुम दुल्हन सी सजी बैठीं । किसी अजनबी की तुम तो जीवन ही बनी बैठीं ।
यह बात अरे सुन कर, तुम्हें देखने को प्रियवर! बेजार खड़े होंगे । तैयार खड़े होंगे ।
१०)
हमने कितना दर्द सहेजा, प्रिय तुमहारे प्यार में । डूब गए हम दों-गम में, अश्क़ों की मझधार में ।
तुपने खुशी छीनकर मेरी, दर्दो-गम की थाती दी। अनुबन्यों के कठिन योग की ऐसी लिखकर पाती दी।
बैठा हूँ मैं जनम से देखो तेरे इन्तज़ार में। डूब गए हम दर्दी-ग़म में, अश्क़ों की मझधार में ।
सच का जामा झूठ के तन पर तुमने खूब सजाया है। हमें रुलाकर सौ-सौ आंसू खुद को खूब हंसाया है।
सारे दुःख मेरे हैं हिस्से, सुख तेरे इख़्तियार में । डूब गए हम ददों-ग़म में, अश्क़ों की मझधार में।
मेरी सीधी रामकहानी वन-वन जाकर भटक रही । फिर भी तुमको रास न आयी, ऐसी तुमको खटक रही।
दर्द, कसक, आहे, आंसू ही हमें मिले उपहार में । डूब गए हम दर्दो-ग़म में, अश्क़ों की मझधार में ।
घर पर बुला किशन को राधे माखन चोर बनाया है। चोर-चोर चिल्लाकर तुमने कितना शोर मचाया है ?
कितने जुल्म-सितम डाये हैं, कान्हा के सत्कार में । डूब गए हम दर्दो-ग़म में, अश्क़ों की मझधार में।
प्रेम पीर न जानी तुमने, केवल इसका स्वांग रचा । यही हमेशा तुम्हें प्रियतमे । जीवन में क्या खूब रुचा ।
खुश रहना तुम जनम जनम तक, शब्द यही आभार में । डूब गए हम दर्दो-ग़म में अश्क़ों की मझधार में ।
कवि को कलम थमाकर तुमने, मरने-जीने नहीं दिया । इसको मीरा के ही जैसा विष घट पीने नहीं दिया ।
तेरी खातिर कलम चलाने आया इस संसार में । डूब गए हम दों-ग़म में अश्क़ों की मझधार में ।
रूप रंग और नाम बदलकर, तुमने हरदम ठगा मुझे । तू मेरी है, मैं तेरा हूं, फिर भी ऐसा लगा मुझे ।
कितना फर्क आ गया देखो, अब तेरे व्यवहार में ? डूब गए हम दर्दो-ग़म में, अश्क़ों की मझधार में ।
वादे-कसमें भूल गई हो, तुमको कुछ न ध्यान रहा । तेरी चाहत के अन्तर में मेरा अब न मान रहा ।
किया कलंकित नारी मन को, तुमने इस इकरार में। डूब गए हम दों-ग़म में, अश्क़ों की मड़ाधार में ।
द्वापर वाली राधा का भी ध्यान न तुमको तनिक रहा । उसने अपने प्यार की खातिर देखो कितना दर्द सहा ?
बनकर तुम कलयुग की राधा, नफरत करती प्यार में। डूब गए हम दर्दो-ग़म में, अश्क़ों की मझधार में ।