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@softrebel

शीर्षक: एहसासों में जिता इश्क़

इश्क़ ऑनलाइन या ऑफलाइन नहीं होता,
इश्क़ तो बस इश्क़ होता है।

मीलों की दूरी को जो पल भर में मिटा दे,
वही उसके जज़्बातों का जोश होता है।

किसी की उपस्थिति से नहीं,
किसी के एहसासों में डूबकर जो हो जाए कोई मदहोश
वही दो प्रेमियों का सच्चा आगोश होता है।

और मैं तुम्हारे एहसासों में जीती हूं
तुम्हारी उपस्थिति इस अभागन के भाग्य में ही कहां..?
@softrebel


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शीर्षक: मैं तुलसी, तेरे आँगन की।

अपने स्नेह की आगर से
स्वयं सींचोगी रोज तुम मुझे,
क्योंकि इसके बाद
जब-जब भी जन्म लूँगी मैं—

पनपती रहूँगी
उसके हृदय में सदा,
जैसे पनप जाती है तुलसी
बिना खाद, बिना पानी के।

और बना देती है
सर्वस्व मिट्टी से भरी
धरती के हृदय को पावन—
ठीक वैसे ही लौट कर आऊंगी,
मैं तुलसी, तेरे आँगन की।
@softrebel

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शीर्षक: प्रेम एक विवाद

प्रेम क्या है
इक कौतूहल ही तो,
जो क्षण भर न दिखे
तो हृदय शोर से भर उठता है।

प्रेम वह आंतरिक द्वंद्व है
जिसमें न हार होती है, न जीत
हम जीतकर भी प्रेमी के आगे
नतमस्तक हो जाते हैं,
और हार का दोष
हाथों में न उकरे भाग्य-रेखाओं को दे आते हैं।

प्रेम वह समर्पण है
जिसमें ईश्वर की भक्ति बाद में आती है
पहले प्रेमी में ही
ईश्वर के दर्शन हो जाते हैं।

प्रेम वह संवाद है
जो कोसों की दूरियों,
टूटे हुए संपर्कों के बाद भी
एक-दूजे के हृदय में
संवेदनाओं को जन्म देता है।

प्रेम, प्रेम है
जिसे न बखानना संभव है,
न व्याख्या में बाँधा जा सकता है।
इसे तो केवल महसूस किया जा सकता है
और शायद
इसे लिखने या पढ़ने से पहले
महसूस किया जाना आवश्यक है,
जैसे तुम महसूस कर पा रहे होगे मुझे।
इसलिए तुम्हें अब तक लौट आना चाहिए,
क्योंकि तुम्हें स्मृतियों में संजोने की
कोई लालसा नहीं है मुझमें।
यदि कुछ है,
तो बस
तुम्हारी मौजूदगी को महसूस करने की
अनेक हसरतें
जो चुपचाप बसी हैं इस दिल में।

इसीलिए मुझे लगता है
प्रेम अधिकार नहीं, उपस्थिति है।
याद नहीं, अनुभूति है।
यह शब्द नहीं, मौन संवाद है।
मेरा तुमसे हो चुका,
दिल का दिल से एक विवाद है।
@softrebel

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छूट रहे हाथ सदा दे जाते हैं लौट आने की कई उम्मीदें 

जिनसे चमक उठता है सारा बदन 

और आंखों से बह कर ढह जाती हैं सारी वेदनाएं,

जिसमें छिपी होती हैं विरह में बिताई गई वो सारी रातें

केशों की तरह समेट ली जाती हैं
वे चंद घड़ियाँ जिसमें की गई हो प्रेम भरी वो असंख्य बातें।

और अंततः दे दी जाती है
विदाई हर परदेसी को प्रिय की सौगंध देकर
तुम लौटना मेरे फ़ौजी फहरता हुआ तिरंगा लेकर..।
- softrebel

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शीर्षक: शिव भी तुम,कृष्ण भी तुम,मेरे लिए प्रेम भी तुम,ईश्वर भी तुम।

तुम रत्नों में कोहिनूर हो,धातुओं में सोना।
मणियों में हीरा हो, फूलों में कमल का खिलना।

पक्षियों में सारस हो,पर्वतों में हिमालय।
नदियों में नेह की गंगा हो, सागरों में विष्णु के क्षीरालय।

तुम ही हो आकाश में चंद्रमा,अग्नि में ज्वाला।
वातावरण में प्राणवायु , ऋतुओं में वसंत की माला।

रंगों में केसरिया हो, रागों में भैरवी
शब्दों में मौन हो और भावों में प्रेम के रवि।

मेरे आँखों के काजल हो तुम्ही
रातों में प्रीत पूर्णिमा।
शहरों में काशी हो
घाटों में दशाश्वमेध की छीमा।

समयों में संध्या हो , आवाज़ों में बांसुरी।
हर स्पर्श में आगोश हो और ख़ामोशी में सुकून पूरी।

तुम ही मेरे अर्ध शरीर के ईश्वर हो शिव और तुम ही मेरे कृष्ण कन्हैया
तुम्हारे जैसा फिर ईश्वर ने दूजा जीव कहां बनाया।

@softrebel

#poetry #matrubharti

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शीर्षक: उस दिन जब पृथ्वी एक आग का गोला था।

अउर फिर साल बदलत-बदलत,
आदत अइसन बदल जाई,
खतम हो जाई इंसानन के भीड़ एहिजा से
अउर समस्त सृष्टि हो जाई फिर से शमशान।

जइसे जागल नयनन से लउके
पाथर हृदय, भीतर से खाली,
धूर-धक्कड़ से भरल रेतिला रेगिस्तान।
softrebel
#भाषा भोजपुरी
#भोजपुरी

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