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प्रेम या छलावा।। तुमसे प्रेम करना, मेरे जीवन में आई तमाम नकारात्मकताओं के बाद भी बची हुई ईश्वर की आरती-सी शुद्धता है जिसकी तपिश न सही राख भी मेरे लिए घर ले जाना सोना है। हृदय के किसी कोने में मेरा अस्तित्व बनकर बस गया है तुम मुझमें। ये ठीक वैसा ही है— जैसे जीवन की भागदौड़ से थका व्यक्ति अचानक अपने भीतर का जज़्बा फिर से पा ले। ये वैसा ही है— जब कोई तेज़ हवा सब कुछ उजाड़ कर चली जाए, फिर भी मन में पुनः बसाने, संवारने की चाह छोड़ जाए। ये वैसा ही है जहाँ पीड़ा, वैराग्य, विरह, वेदना जैसे सब शब्द हार मान लेते हैं, क्योंकि मेरे हृदय में तुम्हारे नाम का प्रेम हर बार जीत जाता है। उस क्षण से जब शायद पहली बार तुम्हारा ख्याल सहेजा होगा मैंने अपने किसी बाल्यकाल में, या उस पल से जब खिलाया होगा पत्तों का पहला निवाला तुम्हे खेल खेल में। या उस समय से— जब मिलन का कोई अनकहा संयोग रचा होगा हमने। हाँ, उस पल से भी— जब तुम्हारी कमियाँ, खामियाँ देखीं होगी मैंने, और फिर भी उन्हें दुनिया से छुपाकर अपने भीतर ही सहेज लिया होगा। और एक बार फिर, पूरे सहृदय से तुम्हें अपनाया मैंने। मैं हर बार इसी तरह अपनाऊँगी तुम्हें— सदैव अपनाती रहूँगी, तुममें छुपे “हम” को। क्योंकि तुम्हें अपनाना कोई बदलाव नहीं— ये मेरा चुनाव है, मेरे भीतर छुपे “मैं” का चुनाव। मै हर बार हार जाती हूं, तुम्हारी इस निष्ठुरता से तुम मेरे भीतर सदैव जीत जाते हो हमारे भीतर छुपी कोमलता से। ये कहना यक़ीनन अतिश्योक्ति होगी की मुझे तुम से प्रेम है शिव ये मानवीय उपकरणों से वशीभूत नहीं होता जरूर कुछ दैवीय है शिव। इसलिए मुझे तुमसे प्रेम नहीं है कदापि नहीं यह तो केवल छलावा है मेरा,मुझसे किया गया सबसे बड़ा छल। Softrebel #matrubharti #hindi #prem #love
शीर्षक: दिल दरिया में..। किसी के आलिंगन की छाँव में सोना कितना सुखदायी होता है, न न खौफ बाहरी आक्रांताओं का, न ही नींद टूट जाने की कोई बेचैन-सी परेशानी। कटती हैं रातें बिना मच्छर, बिना शोर के, और हो जाती है सारी रात रूमानी। चिंताओं की जब सज जाती हैं चिताएँ, संकोच नहीं रहता कि कोई हमसे कर रहा है कोई बेईमानी। बस वो उसकी धड़कनें, वो गर्म स्पर्श, और ढेर सारा सुकून। जैसे दिल दरिया में और दरिया में पानी। softrebel #matrubharti #hindi #love
बेटियां होठों की हँसी, चेहरे की किलकारियाँ, आँगन में बन के चहचहाए वो चिड़िया। नटखट नदियों-सी,सुगंधित फूलों की क्यारियां, अपने संस्कारों से पैरों को पखारती है, बस ऐसी होती है बिटिया कलेजे का टुकड़ा आँखों की पुतलियाँ। माथे पे आँचल, हाथों में मेहंदी रची, हल्दी के रंग में आज रंगी है वो गुड़िया। लोरियों में पली, सपनों में ढली, आज किसी और के घर की है वो धूपिया। होठों की हँसी, चेहरे की किलकारियाँ, आँगन में बन के चहचहाए वो चिड़िया। नटखट नदियों-सी,सुगंधित फूलों की क्यारियां, अपने संस्कारों से पैरों को पखारती है, बस ऐसी होती है बिटिया कलेजे का टुकड़ा आँखों की पुतलियाँ। माँ की दुआ बन हर साँस में बहती है, पापा की उम्मीद पलकों में चमकती है। भाई-बहन, सखियों की हँसी साथ लिए, हर रिश्ते में वो अपनी खुशबू बिखेरती है। होठों की हँसी, चेहरे की किलकारियाँ, आँगन में बन के चहचहाए वो चिड़िया। नटखट नदियों-सी,सुगंधित फूलों की क्यारियां, अपने संस्कारों से पैरों को पखारती है, बस ऐसी होती है बिटिया कलेजे का टुकड़ा आँखों की पुतलियाँ। वो जा तो रही है, पर दूर नहीं हो रही , दो घरों की रौशनी बन दो आँगनों में चमक रही है। एक घर की धड़कन, दूजे की सुबह, हर दिल के आसमान में अपनी जगह लालिमा सी बिखेर रही है। होगा ये घर कल उदास, पर आज इस घर के हर कोने में अंजोरिया सी पसर रही है। होठों की हँसी, चेहरे की किलकारियाँ, आँगन में बन के चहचहाए वो चिड़िया। नटखट नदियों-सी,सुगंधित फूलों की क्यारियां, अपने संस्कारों से पैरों को पखारती है, बस ऐसी होती है बिटिया कलेजे का टुकड़ा आँखों की पुतलियाँ। @softrebel #matrubharti #hindi #betiyan
दो दोस्तों में प्रेम पनप सकता है किन्तु दो दोस्तों के बीच उत्पन्न प्रेम दोस्ती को भी दूषित कर देता है। - softrebel
___नए युग की स्त्रियाँ___ मस्तिष्क में द्वंद्व, हृदय में तूफ़ान लिए बैठे हैं, हाँ—हाल तुमने पूछा तो होठों पे मुस्कान लिए बैठे हैं। स्त्री हैं जाति के, काँधे पे किसी और का मकान लिए बैठे हैं, हर क़दम पर देखो— हम तुम्हारा अहसान लिए बैठे हैं। गोरे हैं, काले हैं—ये भेद बाद की बात है, हाँ, हम जब से जन्मे हैं तुम्हारी जान लिए बैठे हैं। बोझ कहो या रखो जूते की नोक पर, स्त्री हैं जाति के— तुम्हारे घर का सारा सम्मान लिए बैठे हैं। सह कर ढेरों अपमान, तुम्हारे सीने का गुमान लिए बैठे हैं। नए युग की स्त्रियाँ हैं हम, विद्रोह हमारी प्रवृत्ति है— विश्वास नहीं होता तो आज़मा कर देख लो, पार्वती के अंग में काली की ज़ुबान लिए बैठे हैं। @softrebel #matrubharti #poem #striya
___निशाग्नि___ मन के पीर, जिया के रीढ़ बन, स्मृतियाँ सारी उभर रही हैं हृदय-पटल पर। आँखों के अश्रु सब सूख, कर्पूर की बाती जस जलन रहे हैं हर दस्तक पर। आज इन नेत्रों में निद्रा नहीं, निशाग्नि नाच रही है मेरे मस्तक पर, अंतर्मन की चेतना भी हिल उठी है अब तो अंतस पर।
माँ जैसी स्त्रियाँ माँ जैसी स्त्रियाँ माएँ रूपांतरित हो जाती हैं पत्नी, बेटी और बहन के रूप में; पर बाप, भाई, पति का रूपांतरण आज तक न हो सका माँ के रूप में। अर्थात पुरुषों को माँ के पश्चात भी माँ जैसी स्त्रियाँ मिल जाती हैं, किन्तु स्त्रियों के स्त्रीत्व के हाथों कभी लग न सकी ये स्त्रियाँ। पर कभी सोचा है क्यों..? softrebel
*पारस जइसन प्रेम* भरल वसंत में बरसल सारस जइसन, प्रेम होखे ना सबके पारस जइसन। मोह वास और काम के इच्छा भरल बा सबमें पैतृक जायदाद के जइसन, होखे ना लोगवा प्रेम से परिचित, कऽ देला सब कुछ मवाद के जइसन। जे जियेला उहे जानेला अमृत के हाल, मीरा से पूछऽ काहे लागेला अवसाद के जइसन। softrebel
_मौन की चीख_ तल्फ़त मन के भार से, जठराग्नि हुई है अब तो तृप्त, सेवा-मेवा कुछ भी, मन के आगे सब भीख। अशक्त हो गए हैं अश्रु मेरे, जब भाव भरे हैं मुझमें रिक्त, स्तब्ध है जब हृदय की स्पंदन, फिर कानों में कैसी ये चीख। - softrebel
आँख के तेज चेहरा के चमक देख, हमार गुस्सा हो जाला फिका। कद काठी मे हमरा से लमहर बाड़े, पर बाड़े जइसे गोदी मे छोटहन लइका। हिया से हुलसत दिया से अँजोर, भईल बा कौनो जादू टोना बेजोड़। अब तूँ न जनबऽ तऽ का जनहिहे माई कमइछा! - softrebel
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