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Fictional world

Fictional world

@shoaibshoaib151991
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Exploring the world means meeting all kinds of people—the good, the bad, the kind, and the cruel.

The choice is always yours: stay or leave.
There will always be people who make you feel valued, and people who make you question your worth.

If you choose to stay, stay because you find peace.
If you choose to leave, leave without guilt.

But never stay where your presence is tolerated, your voice is ignored, and your respect is forgotten.

You don't have to belong everywhere.
Know your worth, protect your peace, and when respect is no longer there—walk away without looking back.

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कहां पहुंचने थे रास्ते, कहां पहुंच गए
कहां चलनी थी जिंदगी, कहां चली गई।
अब बस इंतजार है एक नए रास्ते का,
जो भले मंजिल तक न पहुंचाए
पर अपना रुख कभी न बदले।
जिंदगी मंजिल को ढूंढे,
पर रास्ता मुझे ही ढूंढे।
और मंज़िल पर पहुंचाने से पहले मुझे अपनी खूबसूरत
वादियों में खुमाए।
और मंज़िल के आखिरी सफर में मेरे जाने पर मुझे मनाए।
- Shanaya khan

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ज़िंदगी, अब क्या कहूँ तुझे,
तूने बहुत दर्द दिया है मुझे।
अजीब बात है फिर भी—
तुझे ही जीना है मुझे।
- Shanaya khan

खामोशी

कभी-कभी खामोशी इतनी गहरी बातें कह जाती है,
कि लफ़्ज़ भी उनके सामने बेबस हो जाते हैं।
कुछ दर्द आवाज़ नहीं माँगते,
बस एक ख़ामोश नज़र ही उन्हें बयाँ कर देती है।
- Shanaya khan

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लोग कहते हैं—
जब बारिश बंद हो जाती है,
तो छतरी लेकर चलना लोगों को बोझ लगने लगता है।
जब उजाला हो जाता है,
तो मोमबत्ती की रोशनी की ज़रूरत नहीं रहती,
और वह किसी कोने में पड़ी रह जाती है।
और जब किसी अंधे की आँखों में रोशनी लौट आती है,
तो सबसे पहले वह अपनी लाठी को छोड़ देता है।
मगर समझदार लोग कहते हैं—
छतरी को बोझ मत समझो,
क्योंकि बारिश दोबारा शुरू हो सकती है।
मोमबत्ती को कोने में मत फेंको,
उसे किसी महफ़ूज़ जगह रख दो,
क्योंकि अँधेरा दोबारा आ सकता है।
और अगर किसी अंधे की आँखों में कभी रोशनी लौट आए,
तो ज़रूरी नहीं कि वह अपनी लाठी फेंक दे।
हो सकता है उसके लिए वह सिर्फ़ एक लाठी न हो—
बल्कि उस दौर की सबसे क़ीमती निशानी हो,
जब दुनिया धुँधली थी,
रास्ते अनजान थे,
और जब कोई साथ नहीं था,
तब वही उसके साथ थी।
इसलिए हर उस चीज़ को बेकार मत समझो
जिसकी ज़रूरत तुम्हें आज नहीं है।
कुछ चीज़ें वक़्त गुज़रने के बाद भी
अपनी क़ीमत नहीं खोतीं—
क्योंकि उनकी क़ीमत उनके काम में नहीं,
बल्कि इस बात में होती है कि
वह तुम्हारे बुरे वक़्त में तुम्हारे साथ थीं।

-Shanaya khan

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🇮🇳 Happy Independence Day! 🇮🇳

Freedom is not just the right to live freely; it is the responsibility to respect the sacrifices that made our freedom possible.

Let us remember those who gave everything so that we could breathe in a free nation, dream without fear, and build our own future.

May we always value our freedom, respect one another, stand against injustice, and do our part in making our country better.

Proud of our past. Grateful for our present. Hopeful for our future.

🇮🇳 Happy Independence Day, India! 🇮🇳
Jai Hind! ❤️
- Shanaya khan

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अब क्या बचा

जब ज़िंदगी बस ख़ामोश हो जाए,
और दिल की धड़कनों का शोर ही सबसे ऊँचा सुनाई देने लगे—
इतना ऊँचा कि अपने ही कानों को परेशान करने लगे।

जब हर बात पर साँसें गहरी होने लगें,
आँखें बस उदास ख़यालों में उलझी रहें,
और हाथ सिर थामे बैठे रहें—
या शायद ख़ुद को काँपने से रोक रहे हों।

जब ज़ुबान बोलना भूल जाए,
मगर ख़यालों में न जाने कितने शब्द जन्म लेते रहें।

जब दिमाग़ दिल को डाँटे,
ज़ुबान से कहे—“बोलो,”
काँपते हाथों से नाराज़ हो,
और हर गहरी साँस के साथ
ख़ुद भी थककर चलने लगे।

लेकिन अकेले चलते-चलते
अब दिमाग़ भी थक गया है।
उसके बस में नहीं रहा
हर चीज़ को काबू में रखना।

अब बस ज़िंदगी चल रही है—
जैसे किसी अनजाने रास्ते पर
बिना मंज़िल के चलती हुई कोई परछाईं।

न जाने कब
इन सब उलझे हुए रिश्तों के बीच
कोई रिश्ता सुलझेगा—
दिल और दिमाग़ का,
ख़ामोशी और शब्दों का,
दर्द और साँसों का।

और शायद यही बात
उस बची-खुची ख़ुशी को भी खा रही है...

क्योंकि उसने तो
इन सबको छोड़ दिया है।

अब...
क्या बचा?
- Fictional world

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उस दर्द का मज़ाक कभी मत उड़ाना, जिसे तुमने कभी नहीं झेला।
- Fictional world

मैं क्या हूँ?
कैसे कहूँ मैं क्या हूँ?
एक उम्मीद हूँ, जिसकी जड़ें आज भी मज़बूत हैं,
मगर जिसका पूरा पेड़ उजड़ चुका है।
साल बीतते हैं, दिन बीतते हैं, रातें भी गुज़र जाती हैं,
मगर वह पेड़ अब भी अपनी उम्मीद की जड़ों को थामे बैठा है।
दर्द के उस सैलाब को समय के साथ सहता बैठा है।
अब जड़ें और वक़्त—दोनों एक साथ इंतज़ार कर रहे हैं
कि शायद उम्मीद का मौसम फिर लौट आए।
मगर मौसम भी जाने किस बात पर मुँह फेरे बैठा है।
जड़ें अपनी मज़बूती की कहानी कह रही हैं
और वक़्त, उन जड़ों के साथ मिलकर
एक अलग ही दास्तान लिख रहा है।
लेकिन दास्तान लिखते-लिखते
जड़ों में नाउम्मीदी अपना घर बनाने लगी है,
और जड़ें पहले से कहीं ज़्यादा कोशिश करने लगी हैं—
शायद खुद को टूटने से बचाने की।
पर क्या करें?
न पेड़,
न जड़ें,
न वक़्त,
और न ही वह मज़बूती
मौसम को वापस ला पा रही है।
उम्मीद के इस घर में
अब उम्मीद ही मेहमान बन गई है।
और उम्मीद
अपने ही घर में
नाउम्मीदी की किरायेदार बन गई है।
वक़्त मानो उसके लिए थम गया है,
मज़बूती ने भी उसका हाथ छोड़ दिया है।
जिस मौसम का इंतज़ार था,
अब वहाँ केवल गरजते हुए बादल हैं।
उस सुनहरी वसंत की धूप का
जड़ों ने इंतज़ार करना छोड़ दिया है,
और वक़्त ने भी अपना रुख़ मोड़ लिया है।
अब बस कुछ ख़ाली जड़ें हैं—
जो अपने ईमान को बचाए बैठी हैं।
और उनके भीतर
नाउम्मीदी के ख़िलाफ़
एक आख़िरी जंग अभी बाकी है।
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तुलना: सबसे महँगा ज़हर

दुनिया में कुछ ज़हर ऐसे होते हैं जो शरीर को नष्ट कर देते हैं, और कुछ ऐसे जो इंसान के भीतर बसे आत्मविश्वास, संतोष और आत्मसम्मान को धीरे-धीरे खत्म कर देते हैं। तुलना उसी दूसरे प्रकार का ज़हर है।

यह ज़हर एक ही पल में नहीं मारता। यह धीरे-धीरे असर करता है। पहले यह इंसान से उसकी खुशी छीनता है, फिर उसका आत्मविश्वास, और अंत में उससे उसकी पहचान भी छीन लेता है। सबसे दुखद बात यह है कि अक्सर हमें पता भी नहीं चलता कि हम इसकी गिरफ्त में आ चुके हैं।

आज का समय तुलना का समय बन चुका है। सोशल मीडिया खोलते ही हमें किसी की सफलता, किसी की खूबसूरती, किसी की दौलत, किसी की उपलब्धियाँ और किसी की मुस्कान दिखाई देती है। धीरे-धीरे हम अपनी पूरी ज़िंदगी की तुलना दूसरों की कुछ चुनिंदा झलकियों से करने लगते हैं। हम यह भूल जाते हैं कि हम उनकी पूरी कहानी नहीं देख रहे, केवल उसका वह हिस्सा देख रहे हैं जिसे वे दुनिया को दिखाना चाहते हैं।

तुलना कभी निष्पक्ष नहीं होती।

वह आपकी पहली सीढ़ी की तुलना किसी और की मंज़िल से करती है। वह किसी की सफलता के पीछे छिपी असफलताओं, संघर्षों और त्याग को नज़रअंदाज़ कर देती है। उसे केवल परिणाम दिखाई देता है, यात्रा नहीं।

यही कारण है कि तुलना का सबसे बड़ा नुकसान यह नहीं कि वह हमें दूसरों से प्रभावित करती है, बल्कि यह कि वह हमें स्वयं से असंतुष्ट बना देती है।

जिस दिन हम अपनी यात्रा को दूसरों की यात्रा से तौलना शुरू कर देते हैं, उसी दिन अपने छोटे-छोटे कदमों की कीमत भूल जाते हैं। हमारी उपलब्धियाँ छोटी लगने लगती हैं, हमारी खुशियाँ फीकी पड़ जाती हैं और हमारी नज़र हमेशा उस चीज़ पर टिक जाती है जो हमारे पास नहीं है।

प्रकृति हमें एक गहरा सबक सिखाती है। कोई सूर्योदय कभी चाँद से ईर्ष्या नहीं करता, कोई नदी पहाड़ बनने की कोशिश नहीं करती और कोई तारा समुद्र से अपनी चमक की तुलना नहीं करता। हर एक का अपना समय, अपना उद्देश्य और अपनी सुंदरता होती है। केवल मनुष्य ही ऐसा प्राणी है जो अपनी विशिष्टता भूलकर किसी और जैसा बनने की कोशिश में अपना जीवन बिता देता है।

प्रेरणा और तुलना में बहुत बड़ा अंतर है।

प्रेरणा कहती है—"यदि वह कर सकता है, तो मैं उससे सीख सकता हूँ।"

तुलना कहती है—"यदि वह इतना अच्छा है, तो मैं कभी पर्याप्त नहीं हो सकता।"

यही एक विचार इंसान को आगे भी बढ़ा सकता है और भीतर से तोड़ भी सकता है।

सच्चाई यह है कि हर व्यक्ति एक ऐसी लड़ाई लड़ रहा है जिसे दुनिया नहीं देख सकती। किसी की मुस्कान के पीछे दर्द छिपा है, किसी की सफलता के पीछे वर्षों का संघर्ष और किसी की शांति के पीछे अनगिनत त्याग। लेकिन हम अपनी वास्तविकता की तुलना दूसरों की दिखाई देने वाली सफलता से करते हैं और फिर स्वयं को कमतर मानने लगते हैं।

तुलना की सबसे बड़ी कीमत यही है कि यह हमें हमारी अपनी संभावनाओं से दूर कर देती है। यह हमें दूसरों के सपनों का पीछा करने पर मजबूर करती है, जबकि हमारे अपने सपने हमारी प्रतीक्षा कर रहे होते हैं।

शायद जीवन का सबसे सुंदर क्षण वह होता है जब हम यह पूछना छोड़ देते हैं कि "मैं उसके जैसा क्यों नहीं हूँ?" और यह पूछना शुरू करते हैं कि "क्या मैं कल से बेहतर इंसान बना हूँ?"

क्योंकि जीवन कभी भी दूसरों से आगे निकलने की दौड़ नहीं था। जीवन तो स्वयं के भीतर छिपे सर्वश्रेष्ठ रूप तक पहुँचने की यात्रा है।

तुलना सबसे महँगा ज़हर इसलिए नहीं है कि वह आपसे आपकी उपलब्धियाँ छीन लेती है, बल्कि इसलिए कि वह आपको यह विश्वास दिला देती है कि जो आपके पास है, वह कभी पर्याप्त नहीं होगा

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