Quotes by Anamika in Bitesapp read free

Anamika

Anamika

@niharikabehera251459
(41.1k)

घुमुरा की प्रतिध्वनि❤️

कलाहांडी के सुंदर पहाड़ी क्षेत्र, घने साल के वृक्षों की छाया और कल-कल बहती नदी के किनारे एक आदिवासी युवक गोविंद और चंचल युवती माधवी का निश्छल प्रेम पनपा था।

गोविंद घुमुरा वादन में निपुण था। उसके हाथों की थाप से घुमुरा से निकलने वाली गंभीर ध्वनि पहाड़ियों की सीमाओं को पार कर सीधे माधवी के हृदय को छू जाती थी। घुमुरा की एक विशेष ताल और उसकी ध्वनि ही उनके गुप्त मिलन का संकेत थी।

लेकिन उनके गाँवों के बीच चली आ रही पुरानी दुश्मनी उनके प्रेम की राह में बाधा बन गई। दोनों गाँवों के मुखियाओं ने उनके मिलन को स्वीकार करने से इनकार कर दिया। माधवी को अपने ही गाँव की सीमा के भीतर रहने के लिए बाध्य कर दिया गया।

फिर चैत्र पर्व की रात आई।

वर्ष की उस विशेष रात में सभी गाँववासी एकत्र होकर नृत्य और गीतों का उत्सव मनाते थे। उसी रात घुमुरा के वादन की गूँज चारों ओर फैलने लगी।

गोविंद अपने घुमुरा में अपना सारा विरह और दर्द उड़ेलकर बजाने लगा। उसकी गंभीर थाप में जैसे प्रेम की पुकार, विरह की पीड़ा और एक निश्छल हृदय की व्याकुलता समाई हुई थी।

वह आवाज़ सुनकर माधवी स्वयं को और रोक नहीं सकी। घुमुरा की प्रतिध्वनि का अनुसरण करते हुए वह उस शांत रात में जंगल की पगडंडी से दौड़ती हुई चली गई।

मांदल और घुमुरा की तेज होती ताल के बीच वह उत्सव के मंच तक पहुँची और सबके सामने गोविंद के सामने आ खड़ी हुई।

घुमुरा की थाप पर दोनों का मिलन हुआ। फिर दोनों ने ऐसा मनमोहक नृत्य किया कि उन्हें देखकर वहाँ उपस्थित ग्रामीणों के मन से वर्षों पुराना क्रोध जैसे धीरे-धीरे मिटने लगा।

घुमुरा की उस पवित्र ध्वनि ने दो शत्रु गाँवों को एक-दूसरे के करीब ला दिया।

उस दिन के बाद कलाहांडी की लोककथाओं में घुमुरा केवल एक वाद्य नहीं रहा, बल्कि वह ऐसे अमर प्रेम का प्रतीक बन गया, जिसने विरह को मिलन में बदल दिया।

~अनामिका✍️

Read More

क्षमा कीजिए, यह कहानी मैंने पहले ओड़िया में लिखी थी, इसलिए आप सभी इसे समझ नहीं पाए। अब उसी कहानी का हिंदी अनुवाद आपके सामने है। आशा है, इस बार यह कहानी आपके दिल तक ज़रूर पहुँचेगी। 🤍

एक गाँव के नदी किनारे एक गरीब लड़की रहती थी—काशपुष्प (कांशतंडी)। सरल चेहरा और शांत स्वभाव वाली वह लड़की एक दिन राजकुमार शरद की नज़रों में आ गई।

धीरे-धीरे नदी किनारे दोनों की मुलाकात होने लगी। कोई बड़ा वादा नहीं था, बस दोनों के बीच एक सरल-सा प्रेम पनप रहा था।

लेकिन राजा ने इस संबंध को स्वीकार नहीं किया। शरद को राजमहल ले जाया गया और काशपुष्प को उसी नदी किनारे मार दिया गया।

कहा जाता है, जाने से पहले काशपुष्प ने कहा था—
“हर साल शरद ऋतु आने पर, मैं इसी नदी किनारे तुम्हारा इंतज़ार करूँगी।”

कुछ दिनों बाद, काशपुष्प को खोकर शरद ने भी अपने प्राण त्याग दिए।

आज भी लोग कहते हैं, बारिश खत्म होकर जब शरद ऋतु आती है, तो नदी किनारे खिलने वाले सफेद काशपुष्प (कांशतंडी) काशपुष्प के उसी इंतज़ार का प्रतीक हैं। 🌾🤍

~अनामिका ✍️

Read More

सत्रह की उम्र थी, जब उसने पहली बार कहा था—
“जब हम शादी करेंगे, मैं तुम्हें हमेशा खुश रखूँगा…” ❤️

उसकी बात सुनकर तब बस मुस्कुरा दी थी मैं,
क्या पता था, ये छोटी-सी बात एक दिन मेरी पूरी ज़िंदगी बन जाएगी। 🥹❤️

आज इतने सालों बाद,
जब उसे सामने देखती हूँ तो फिर मुस्कुरा देती हूँ… 🌸
क्योंकि उसने सिर्फ़ कहा नहीं था,
उसने अपने उस वादे को सच करके दिखाया है। ❤️

आज भी उसका खयाल रखने का अंदाज़ वही है,
जो उन दिनों हुआ करता था… 🫶🏻
बस तब वो मेरा होने का वादा करता था,
और आज… वो मेरा पति बनकर
हर रोज़ उस वादे को निभाता है। ❤️♾️

~अनामिका✍️

Read More

कहते हैं, ज़िंदगी समर्पण का नाम है,
थोड़ा समझौता, थोड़ा सामंजस्य,
और बहुत सारी समझदारी का नाम है… 🌿

मगर एक सवाल है—
इन सारी समझदारियों की उम्मीद
हर बार औरत से ही क्यों की जाती है? 🤔

बड़ी बहन हो—
“तुम बड़ी हो, तुम समझ जाओ।”

छोटी बहन हो—
“तुम छोटी हो, तुम संभल जाओ।”

बेटी हो—
“घर की इज़्ज़त हो, थोड़ा समझदारी से चलो।” 🏠

बहू हो—
“नया घर है, तुम समझदारी दिखाओ।”

बीवी हो—
“रिश्ता निभाना है, तुम समझो।” 💍

माँ हो—
“बच्चों के लिए तुम्हें संभलना होगा।”

और सास हो—
“अब तुम घर की बड़ी हो, तुम्हें ही समझदारी रखनी होगी।”

भूमिकाएँ बदलती रहती हैं,
उम्र बदलती रहती है,
मगर अपेक्षा अक्सर वही रहती है—

“तुम औरत हो… तुम समझ जाओ।” 🌸

मगर कभी ये क्यों नहीं कहा जाता—

“तुम आदमी हो… तुम भी समझो।”
“तुम भी संभलकर चलो।”
“तुम भी अपने हिस्से की समझदारी निभाओ।” ⚖️

क्योंकि समझदारी का कोई लिंग नहीं होता,
समझौता किसी एक की जिम्मेदारी नहीं होता,
और रिश्तों को निभाने की समझ
सिर्फ़ औरतों की विरासत नहीं है।

अगर समझदारी ज़रूरी है,
तो वह दोनों से अपेक्षित होनी चाहिए।

हर बार औरत ही क्यों समझे?
कभी आदमी से भी तो कहा जाए—
“तुम समझो।” 🌿

~अनामिका✍️

Read More

उनकी छोटी-छोटी फिक्र तब मुझे ‘ओवर’ लगती थी,
सोचती थी, बस बीमार हूँ… माँ क्यों इतना डरती थीं। 🥺

मेरी मामूली-सी तकलीफ़ पर भी वो सहम जाती थीं,
मुझसे ज़्यादा तड़प और परेशानी उनके चेहरे पर आती थी। 💔

आज जब अपने बच्चे को बीमार देखा, तो समझ में आया… 🥹

माँ का वो ध्यान, वो बेचैनी…

सिर्फ़ बेइंतहा प्यार था, जो तब समझ नहीं आया। ❤️‍🩹

~ अनामिका✍️

Read More

​कंधों पर पूरे घर का वो भार उठाता है, 👨‍👩‍👧‍👦🏠
थकावट छुपाकर चेहरा मुस्कुराता है। 😔😊

बच्चों की हंसी, माता-पिता का वो साया है, 👶👴👵
उसने हर फ़र्ज़ को अपनी जाँ से निभाया है। 📜❤️

मैं चाहती हूँ उसकी थकावट को बाँटना, 🤲🤝
उसकी तन्हाइयों को अपने हाथों से छाँटना। 🕊️✨

वो खुद को मज़बूत दिखाकर सब संभाल लेता है, 🛡️💪
मेरा हर दर्द चुपके से अपने नाम कर लेता है। 🫂💖

उसके इस हौसले और प्यार पर मुझे गुरूर है, 👑🧿
मेरा हमसफ़र मेरे लिए खुशियों का नूर है। 💍✨

~अनामिका✍️

Read More

​सब कहते थे शादी के बाद टूट जाते हैं सपने, 💔
पर मुझे मिला वो हमसफ़र, जिसने संवारे ख़्वाब मेरे अपने। 💞
​थामकर हाथ मेरा, उसने हर मोड़ पर मुझे संभाला है, 👫
मेरी आँखों के हर अधूरे ख़्वाब को, उसने सच कर दिखाया है! 👩‍❤️‍👨✨
​
~ अनामिका ✍️

Read More

जिम्मेदारियों के दरमियां, अपनी पहचान बचा रखी है, 💫
मैंने ख्वाबों की शमा, अपने सीने में जला रखी है। 🔥✨
​पति और बच्चों की खुशियों में गुज़रती है दिन-रात ज़िंदगी, 👨‍👩‍👧‍👦❤️
पर काग़ज़ पर उकेर कर कहानियां, लेखिका अनामिका ने अपनी उड़ान बनाए रखी है। 📝📖🕊️

Read More