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आशुतोष से रौद्र✨ तुम इतने ऊंचे हो कि मैं मौन हूँ, उस ऊँचाई तक न पहुँचा, तो 'गौण' किया तुम्हें। 'गौण' स्वभाव नहीं तुम्हारा, माया तुम्हारी है, और खेल भी तुम्हारा! उपयोगी लगे तुम, तो घर ले आए, नहीं लगे—तो विसर्जन के नाम पर फेंक आए। तुम्हारी ही माया से, तुम्हारा मूल्य तय होता है; नदी कब नाला बन गई, आराधना कब कर्मकांड, और मूर्ति कब व्यापार बन गई? मानव सभ्यता की विद्रूपताएँ ऐसे सामने आईं, कि अब आना ही पड़ेगा तुमको! आओ सुधार के लिए; रूप प्रलय का हो, तो भी ठीक है। बजे डमरू, विध्वंस हो उस अहंकार का— और उससे उपजे इस समस्त संसार का। प्रलय अब नहीं, तो कब? अहंकार अब बेहोशी की सीमा पार कर रहा है, पंचभूतों पर भी अधिपत्य का प्रयास कर रहा है। आओ महादेव! इनके कष्ट हरो, तारो इन्हें और इस जग को भी। तुम जिस भी रूप में आओगे, स्वीकार्य होगा हमें, तुम जिस भी रूप में तारोगे, स्वीकार्य होगा हमें। स्थिति वहीं है, जहाँ 'आशुतोष' की परिभाषा का अंतिम चरण— और 'रौद्र' की परिभाषा का प्रारंभ है। अब उठो समाधि से, अब विलंब ठीक नहीं; बहुत सह लिया तुमने, और सहना अब ठीक नहीं। मैं वरदान माँगता हूँ... मैं विध्वंस माँगता हूँ! ~ कपिल तिवारी "यथार्थ"
असहज द्वंद्व✨ तुम्हें मैं क्या समझूँ? तुम्हें समाज ने सताया या तुमने समाज को? मैं डर जाता हूँ, जब तुम मुझे देखते हो। तुमने अपने चरित्र को ऐसा विचित्र बनाया, जिससे केवल विचलितता जन्म लेती है। तुम्हारे अजीब वस्त्र, गले में अनेकों मालाएं, शरीर पर राख, सिर पर टोपी और चश्मा, गले में लटकती सीटी—जब तुम चलते हो, तो सच यह है कि 'स्वस्थ मनुष्य' की परिभाषा, तुमसे कहीं मेल नहीं खाती। तुम कहीं भी मल त्याग करते हो, कहीं भी गंदगी, कहीं भी सो जाते हो; स्वच्छता से तुम दूर भागते हो। गालियाँ तुम्हारे मुख से धारा-प्रवाह फूटती हैं— कभी भी, किसी के लिए भी! तुम्हारी प्रजाति कम नहीं है, समय के साथ बढ़े हो तुम भी। कभी खुद को 'बाबा' कहते हो, कभी 'पागल', कभी कहते हो—"मैं दुनिया से परे हूँ," पर कभी शराब, तो कभी नाली में पड़े हो! तुम्हारे विचित्र चरित्र से जन्मी क्रियाएँ, मुझे गहरे तक असहज कर देती हैं। मैं स्वयं से प्रश्न करता हूँ कि— इस असहजता का जिम्मेदार आखिर कौन है? समाज, तुम, या मैं खुद? जो भी हो, मैं तुमसे सहजता की दोस्ती नहीं कर पाता। तुम मुझे ऐसे मत देखो... मैं जा रहा हूँ; तुम्हें तुम्हारी ही स्थिति में छोड़कर। मैं कामना कर सकता हूँ—तुम्हारे स्वस्थ होने की, या... स्वयं को तुम्हें समझने के लायक बनाने की। तुम स्वस्थ रहो! अलविदा। ~ कपिल तिवारी "यथार्थ"
मेरा जन्म ✨ तुमने मुझे जन्म दिया न जाने किस स्वार्थ बस, कहते हो जन्म देना आवश्यक हैं न जाने किस स्वार्थ बस। जन्म आपने दिया पर मैं विद्रोह न कर सका, जन्म लेना आपके यहां ये मेरा चुनाव न बन सका। अगर चुनाव होता तो सच में "मैं "जन्म न लेता, कारण मात्र एक खुद को खोने से बचा लेता। तुमने मुझे जैसा पाला - पोसा मैं बड़ा हुआ, तुमने मुझे जैसा खड़ा किया मैं खड़ा हुआ। हा तुमने दिया मुझे बो सब जो तुम दे सकते थे। तुमने मुझे, जन्म, अहंकार, वृत्ति, कामना आदि दिए क्योंकि यही दे सकते थे। हा तुमने मुझे बो सिखाया जो तुम सिखा सकते थे। तुमने मुझे, तुम्हारी बड़ी जाति, रोते नहीं, बड़ी इज्जत, पद, प्रतिष्ठा आदि क्योंकि यही सिखा सकते थे। तुमने मुझे सिखाया.... काम कम, दाम ज्यादा से ज्यादा। मेहनत कम, सुरक्षा ज्यादा से ज्यादा। तथ्य कम, बकवास ज्यादा से ज्यादा। शांति कम, दिखावा ज्यादा से ज्यादा। वास्तविकता कम, बनावटी ज्यादा से ज्यादा। सत्य कम, प्रतिष्ठा ज्यादा से ज्यादा। क्योंकि तुम मुझे यही सिखा सकते थे। तुम्हारी स्वार्थ भरी कामनाएं मुझे दबाती गई, तुम्हारी अपनापन की नीति मेरे अहंकार को बढ़ाती गई। हे समाज तुमने वो क्यों न सिखाया, जो सर्वोच्च है। क्या ये सर्वोच्चता अभी भी तुम्हारे पास हैं? अगर हैं तो बो सिखाओ अथवा ऐसे अहंकार के पिंडो को मत बढ़ाओ। अगर तुम सिखा सकते हो तो सिखाओ, सत्य, बोध, ये भूख हमारी हमेशा रहेगी, कारण मात्र एक अज्ञात के साथ अंधी दौड़..........। तुम्हे लग रहा हैं , मैं बढ़ रहा हूं । मुझे लग रहा हैं , मैं मिट रहा हूं। मेरे "मैं "का अंत ही प्रारंभ है, प्रारंभ में ही हैं नवीनता, प्रारंभ में ही हैं विलीनता। विलीनता में हैं शून्यता, शून्यता में हैं अनन्ता, अनन्ता में ही अंत हैं , अंत ही प्रारंभ हैं । - यथार्थ
नींद✨ तुम सो रही हों, पर मैं नहीं। मन तो हैं कि मैं तुमको जगा दूं , पर जगाऊंगा नहीं। मुझे पता है तुम बोलोगे कुछ नहीं, पर मैं तुमसे तुम्हारा निंद्रा का अधिकार छीनूंगा तो नहीं। हा तुमने मुझे अधिकार दिए हैं तो सही, पर मैं उन्हें संभाल पाऊं तो सही, मेरा मन जूझ रहा हैं तुम्हारी यादों से, यादें तो कहती हैं जगा दूं तुम्हे, पर विवेक नहीं। जगाऊंगा तो यादें विजय होगी, पर अधिकार का अर्थ ये तो नहीं। अंततः नहीं जगाता हूँ। सोओगे जब तुम विवेक से, तब अधिकार मात्र जगाना होगा। जब जाओगे तुम दूर खुद से, तब अधिकार मात्र लौटाना होगा। -यथार्थ
विचार ✨ आज समय फिर खेल खेल रहा है, फिर से वही पुरातन विचार ! क्यों उठते हो बार बार ,जब मैं हरा चुका कई बार ! क्या तुम्हारा अंत होगा कभी? शायद नहीं। आज मन में फिर वही विचार उठा ! क्यों उठता है ये मन में, कि कुछ ठीक नहीं हैं। क्या यह उचित विषय है, या मात्र विचार है। क्यों उठता है ये मन में, कि मिटा दूं खुद को ! तुम कहते हो सब ठीक हैं, क्या वास्तव में सब ठीक है! मेरे मिटने से अंततः सब ठीक होगा क्या? अगर हॉ तो मिटाऊं खुद को, अगर न तो फिर क्यूं? क्या ख़ुद की ओर जाने का सिर्फ यही एक रास्ता है? ख़ुद को मिटा कर अगर शांति मिलेगी भी तो किसे ? मैं विकल्प खोज रहा हूं देह में रहकर शांतमय होने का, यात्रा जारी है.................................. ख़ुद की ओर। - यथार्थ
मैं कुछ खोज रहा हूं ✨ जब नहीं मिले थे तुम तब बैचेन था, और अब भी हूं। था लगा मुझे कि सुकून (चैन) हो तुम, लेकिन मैं गलत था। मैंने अनगिनत प्रयोग किए, बेचैनी को चैन में बदलने के, परिणाम मात्र एक, बेचैनी का और उन्नयन हुआ, प्रयोगों में शामिल थे तुम और सारा जहाँ (संसार), जहाँ (जगह) मैं प्रयोग कर रहा था। लक्ष्य मात्र एक , बैचेनी को चैन में स्थापित करना। क्या यह बाहरी प्रयोगों से संभव है भी ? अगर होता तो फिर इतनी बेचैनी क्यों ? हर प्रयोग में गलती मात्र यही, कि ख़ुद पर प्रयोग नहीं, जब खुद को उतारा ख़ुद पर , आलोकन हुआ खुद का, अवलोकन का परिणाम मात्र एक, अवलोकन करने वाला ही आलोकमय हुआ। - यथार्थ
मैं तुमसे क्यों डरूं? ✨ है तुम्हारे पास दौलत , शोहरत ज्यादा, और ज्यादा अहंकार भी, पर मैं भी अस्तित्वहीन नहीं हूँ , फिर मैं क्यों डरूं? डरो तुम क्योंकि विकास के आड़े विनाश किया तुमने, डरो तुम क्योंकि झूठे वादे के आड़े लूट की तुमने। तुम ऐसे अग्यानी हो कि तुम्हे अपनी अज्ञानता का भी भान नहीं, तुम्हे अपनी झूठी बकवास के सामने सच्चाई का भी भान नहीं। तुम बन बैठें हो उन चन्द लोगों में बादशाह, तुमने चला लिया है उन्हें अपने चंद कदमों पर, तुम ये भ्रम पाल बैठे हो कि अब दुनिया चले तुम्हारे कदमों पर। झुकाया होगा तुमने, और झुके भी होगे लोग, लूटा होगा तुमने, और लुटे भी होगे लोग। पर ये चाल तुम्हारी ज्यादा न चल सकेगी, समय बदलेगा झुके को उठाएगा, लुटेरों को सबक सिखाएगा। तुम कर लो अपनी मनमानियां पर तुम मुझसे इज्जत न पा सकोगे, तुम कर लो जितना जुल्म कर सकते हो पर मुझे न झुका सकोगे। रहना,खाना तुमने सब छीन लिया, फिर कैसे तुमने ख़ुद को महान बना लिया, मेरी चीत्कार दया की भीख मांगेगी नहीं, तुम सोच रहे हों बंधक बना कर अपना बना लिया। शरीर तुमने बांध लिया क्या अब मेरा शौर्य भी बांधोगे, वेदना से तड़पते शरीर से क्या अब इज्जत भी मांगोगे। तुम कर लो कोशिश फिर भी न झुका पाओगे, तुम तन को नष्ट करके भी मन को नष्ट न कर पाओगे। बहुत कर ली तुमने अपनी मनमानी, कोई कहता हुआ ये आएगा, मै विद्रोह करूंगा, तुमसे, ऐसी व्यवस्था से ये कहता हुआ आएगा। लोगों में फिर से विश्वास जन्म लेगा सत्य के लिए, लोगों में फिर से विद्रोह जन्म लेगा असत्य के लिए। चिर काल तक यही गूंज गूंजती रहेगी, क्षणिक लोगों की पुकार सत्य के लिए गूंजती रहेगी। युद्धस्व ! युद्धस्व ! युद्धस्व ! ~ यथार्थ
समय ✨ आज मैं फिर भाग रहा हूँ, किससे और किसके लिए, कदाचित स्वयं से स्वयं के लिए। मैं एकांत के पीछे भाग रहा हूँ, या चुनौतियों से भाग रहा हूँ। भागने से होगा क्या? क्या होगा न भागने से भी? मैं (शरीर)नहीं भागूंगा, तो भी कोई है (समय) जो भागेगा। वो (समय) भाग रहा है, पर मैं नहीं। ठहराव अच्छा है, अगर सही व्यस्तता के तले हो। लेकिन ठहराव बहाना भी तो है , खुद को व्यस्त बताने का, गलत व्यस्तता जीवन को नीरस बना देती है, और नीरस जीवन भी, क्या कोई जीवन होता है ? कोशिश कर रहा हूँ तेरे बहाव (समय) में सही व्यस्तता खोजने की। कोशिश कर रहा हूँ तेरे बहाव (समय)में सही चुनौती खोजने की। कोशिश कर रहा हूँ तेरे बहाव(समय) में सही एकांत खोजने की। मैं तेरे बहाव में जाग्रत जीवन चाहता हूँ। मैं तेरे बहाव में एक जीवन युक्त आनंद चाहता हूँ। मैं तेरे बहाव में खो जाऊ उससे पहले मैं तुम्हे समझना चाहता हूँ। - यथार्थ
शांति ✨ अज्ञात मैं चाहता क्या हूँ? मैं क्या सोचकर सोचना चाहता हूँ, इल्म है तो बस इतना कि, मैं अनुचित ढर्रे में नहीं फसना चाहता हूँ। मैं (मेरा मन)आज भी विचलित होता हूँ , द्वंद के समुद्र में फसता हूँ, मैं ख़ुद को दुनिया में और दुनिया को खुद में खोजता हूँ। इसी खोज का परिणाम कि आज मैं तुम्हारे (प्रकृति)सामने हूँ। हे प्रकृति तुम कितनी शांत हो, तुम्हारे आवाज में भी शांति है। मात्र शांति होना(प्रकृति का शांत), शांत होने(मन का शांत) का परिणाम तो नहीं, अशांत होना भी, शांत होने का परिणाम तो नहीं । शांत होने का परिणाम मात्र एक ,शांत रहना (शांति में स्थापित) है। अशांति का विकल्प मात्र एक शांत रहना है। अपरिवर्तनीय शांति (प्रकृति का शांत होना), शांत होने (आंतरिक शांति) में सहायक मात्र हैं, घोर अशांति (बाहरी शोर)में भी, शांत रहना(आंतरिक शांति) यही एक विकल्प मात्र हैं। हर एक कदम शांत होने के और क़रीब लाता हैं, हर एक कदम ख़ुद को ख़ुद के और क़रीब लाता हैं। ये मुसाफ़िर इस यात्रा का निरंतर अनुगमन करता हैं, जहां वह ख़ुद को खो(बेचैनी) कर ख़ुद को(शांति) पाता हैं । ~ यथार्थ
अस्तित्व का व्यापार ✨ मेरी गुड़िया, परी, चिरैया— समाज ने गढ़े हैं ये तमाम नाम। नामकरण की इस प्रक्रिया से, भूल की उसने तुम्हारे अस्तित्व का अधिपति बनने की। रचा गया इसी नामकरण से झूठे प्रेम का प्रथम अध्याय, और बुनी गईं वे मुखौटा-युक्त कहानियाँ— सुशील, शांत और ‘चरित्रवान’ होने की। समाज बना पहला ‘चोर-पहरेदार’, जिसने सिखाया—अकेली रहो, दूर रहो, उन सबसे जो अनजान हैं। जबकि वे पहरेदार स्वयं... तुम्हारी सुशीलता और शांति का लाभ लेते रहे। पहरेदारों का यह मुखौटा बना रहे, इसलिए वे तुम्हें एक अनजान को सौंप आए। एक ऐसा ‘अनजान’, जहाँ न प्रेम है, न बोध, न ज्ञान। यदि पहरेदार यह आयोजित विवाह न रचाते, न होता इसमें वह व्यापारिक लेन-देन; न होता पहरेदारों के कानून में विवाह का अर्थ—शारीरिक संबंध, तो क्या फिर कोई विवाह हो पाता? क्या विवाह के नाम पर यह संभोग बाध्य हो पाता? क्योंकि प्रेम के मार्ग से किसी के अंतर्मन तक पहुँचना, साधारण नहीं है। प्रेम से, स्त्री-पुरुष के शरीर तक की यात्रा, सुलभ नहीं है। पर पहरेदारों ने एक चाल चली, और शरीर तक पहुँचना... बहुत आसान कर दिया। आयोजित विवाह ! - कपिल तिवारी "यथार्थ"
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