Quotes by GANESH TEWARI 'NESH' (NASH) in Bitesapp read free

GANESH TEWARI 'NESH' (NASH)

GANESH TEWARI 'NESH' (NASH)

@ganeshptewarigmail.com064906

दूर रहे पर नारि से, करे न मदिरा पान। रखें मेल जो नेक से, वह पाता सम्मान।।
दोहा --४३४
(नैश‌ के दोहे से उद्धृत)
-----गणेश तिवारी 'नैश'

Read More

ऋगुवेद सूक्ति-- (२४) की व्याख्या
“अघृणे न ते सख्याय पह्युवे” — ऋगुवेद _१/१३८/४
पदच्छेद--
अघृणे — हे प्रकाशस्वरूप, दयालु (अग्नि/ईश्वर के लिए संबोधन)
न — नहीं
ते — तेरी
सख्याय — मित्रता के लिए
पह्युवे (अपह्नुये) — इन्कार करता हूँ / अस्वीकार करता हूँ
भावार्थ--
हे प्रकाशमय प्रभु! मैं तेरी मित्रता से इन्कार नहीं करता।
अर्थात् — मैं तेरे स्नेह, संरक्षण और मार्गदर्शन को स्वीकार करता हूँ। मैं तुझसे दूर नहीं होना चाहता, बल्कि तेरे साथ मैत्रीभाव बनाए रखना चाहता हूँ।
आध्यात्मिक संकेत--
वेदों में “सख्य” (मित्रता) का अर्थ केवल सांसारिक मित्रता नहीं, बल्कि—
ईश्वर के साथ आत्मीय सम्बन्ध
उसके नियमों को स्वीकार करना
उसके प्रकाश में चलना अपने अहंकार का त्याग करना
यह मन्त्र साधक की विनम्र प्रार्थना है कि वह ईश्वर से विमुख न हो, बल्कि उसके प्रकाश में स्थिर रहे।
अन्य वेदों में प्रमाण--
१. यजुर्वेद--
(अ) “मित्रस्य मा चक्षुषा सर्वाणि भूतानि समीक्षन्ताम्” (यजुर्वेद 36/18)
भावार्थ:
सब प्राणी मुझे मित्र की दृष्टि से देखें और मैं सबको मित्रभाव से देखूँ।
यहाँ “मित्र-दृष्टि” का अर्थ है — सार्वभौमिक मैत्री, जो ईश्वर-संबंध का विस्तार है।
२. सामवेद--
सामवेद में ऋग्वैदिक मन्त्रों का ही गायन है।
एक मन्त्र में आता है —
“सखा सखिभ्य ईड्यः” (सामवेद 373 के समीप पाठ)
भावार्थ:
वह (ईश्वर/अग्नि) अपने भक्तों का सखा (मित्र) है, स्तुति के योग्य है।
यहाँ ईश्वर को प्रत्यक्ष “सखा” कहा गया है।
३. अथर्ववेद --
“सखा सख्ये नय”
अथर्ववेद-- 3/30
भावार्थ:
हे प्रभु! हमें सखा की भाँति सही मार्ग पर ले चल।
यहाँ ईश्वर को मार्गदर्शक मित्र माना गया है।
समग्र वैदिक दृष्टि--
वेदों में ईश्वर केवल दण्डदाता नहीं, बल्कि सखा (मित्र), सुहृद् (हितैषी) ,मार्गदर्शक और
प्रकाशदाता के रूप में आया है।
इस प्रकार “तेरी मित्रता से इन्कार नहीं करता” — यह भाव सम्पूर्ण वैदिक साहित्य में व्याप्त है।
उपनिषदों में प्रमाण-- --
१. श्वेताश्वतर उपनिषद--४.६-७
द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया
समानं वृक्षं परिषस्वजाते।
भावार्थ:
दो सुंदर पक्षी, जो घनिष्ठ सखा हैं, एक ही वृक्ष (शरीर) पर साथ-साथ रहते हैं।
यहाँ “सखाया” शब्द स्पष्ट करता है कि जीव और परमात्मा का सम्बन्ध सखा जैसा आत्मीय है। परमात्मा कभी त्यागता नहीं; जीव जब उसकी ओर देखता है, तब शोक से मुक्त हो जाता है।
२-बृहदारण्यक उपनिषद -१.३.२८
असतो मा सद्गमय।
तमसो मा ज्योतिर्गमय।
मृत्योर्मा अमृतं गमय॥
भावार्थ:
हे प्रभु! मुझे असत्य से सत्य की ओर, अन्धकार से प्रकाश की ओर, मृत्यु से अमृत की ओर ले चल।
यह प्रार्थना उसी सखा-भाव की अभिव्यक्ति है— जैसे मित्र मार्ग दिखाता है, वैसे ही परमात्मा को सम्बोधित किया गया है।
३. कठ उपनिषद-१.२.२३
यमेवैष वृणुते तेन लभ्यः
तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम्।
भावार्थ:
जिसे यह (परमात्मा) स्वयं स्वीकार करता है, उसी को वह प्राप्त होता है; और उसी पर अपना स्वरूप प्रकट करता है।
यहाँ परमात्मा को कृपालु, आत्मीय एवं अनुग्रही मित्र के रूप में दिखाया गया है।
४- मुण्डक उपनिषद -३.१.१
(श्वेताश्वतर के समान ही “द्वा सुपर्णा” मन्त्र)
यहाँ भी जीव-परमात्मा के सख्यभाव का वही चित्र मिलता है।
उपनिषदों का निष्कर्ष--
उपनिषद बताते हैं कि—
परमात्मा दूर नहीं, अन्तःस्थित सखा है।
वह दण्डदाता से अधिक प्रकाशदाता और मार्गदर्शक मित्र है।
जब जीव उसकी ओर मुड़ता है, तो शोक और भय से मुक्त होता है।
अतः ऋग्वैदिक भाव — “तेरी मित्रता से इन्कार नहीं करता” — उपनिषदों में और भी गहराई से प्रतिपादित है।
अन्य उपनिषदों में प्रमाण--
१. ईश उपनिषद-६-७
“यस्तु सर्वाणि भूतानि आत्मन्येवानुपश्यति।
सर्वभूतेषु चात्मानं ततो न विजुगुप्सते॥”
भावार्थ:
जो पुरुष सब भूतों को अपने आत्मा में और अपने आत्मा को सब भूतों में देखता है, वह किसी से द्वेष नहीं करता।
जब सबमें एक ही आत्मा का दर्शन होता है, तब सार्वभौमिक मैत्री उत्पन्न होती है — यही सख्यभाव का उच्चतम रूप है।
२. छान्दोग्य उपनिषद -६.८.७
“तत्त्वमसि श्वेतकेतो।”
भावार्थ:
हे श्वेतकेतु! तू वही (ब्रह्म) है। यहाँ गुरु जीव को उसके परम आत्मीय स्वरूप से जोड़ता है। यह भेद-निवृत्ति का उपदेश है, जहाँ परमात्मा और जीव में विरोध नहीं, अपितु आत्मीय एकत्व है।
३. तैत्तिरीय उपनिषद् -२.७
“रसो वै सः।
रसं ह्येवायं लब्ध्वानन्दी भवति।”
भावार्थ:
वह (ब्रह्म) रसस्वरूप है; उसे प्राप्त कर मनुष्य आनन्दित होता है।
मित्रता का सार आनन्द और आत्मीयता है। ब्रह्म को “रस” और “आनन्द” कहा गया— यह दण्ड नहीं, बल्कि स्नेहपूर्ण निकटता का
स्वरूप है।
४-मैत्री उपनिषद-६.३०
एको देवः सर्वभूतेषु गूढः
सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा।
कर्माध्यक्षः सर्वभूताधिवासः
साक्षी चेता केवलो निर्गुणश्च॥”
भावार्थ--
एक ही परम देव सब प्राणियों में गुप्त रूप से स्थित है। वह सर्वव्यापी, सबका अन्तरात्मा, कर्मों का अध्यक्ष, सबका आधार, साक्षी, चेतनस्वरूप और निर्गुण है।
यहाँ परमात्मा को सबके हृदय में स्थित अन्तर्यामी कहा गया है — जो निकटतम आत्म-सखा के समान है।
५-प्रश्न उपनिषद ,-६.३
षष्ठ प्रश्न में पिप्पलाद ऋषि ब्रह्मविद्या का उपदेश देते हैं।
“स प्राणमसृजत।
प्राणाच्छ्रद्धां खं वायुर् ज्योतिरापः पृथिवीन्द्रियं मनः।
अन्नाद् वीर्यं तपो मन्त्राः कर्म लोकाः नाम च॥
भावार्थ--
यहाँ आत्मा को हृदय में स्थित, सर्वप्रिय और साक्षी कहा गया है।
भावार्थ: परमात्मा मनुष्य के अत्यन्त समीप, अन्तरंग सखा की भाँति हृदय में स्थित है।
सम्पूर्ण उपनिषद्-दृष्टि-+
उपनिषदों में परमात्मा—
अन्तर्यामी सखा, प्रियतम आत्मस्वरूप, आनन्दघन,सर्वभूत मित्र के रूप में प्रतिपादित है।
पुराणों से प्रमाण—
१. भागवत महापुराण-
(क) १०.१४.५५
“भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन।”
(संदर्भ: भगवान का भक्त–सख्यभाव)
भावार्थ:
भगवान अनन्य भक्ति से ही प्राप्त होते हैं— जहाँ वह भक्त का अपना, आत्मीय सखा बन जाते हैं।वेदोक्त ईश्वर–सख्य/सुहृद्-भाव का प्रतिपादन अनेक पुराणों में स्पष्ट श्लोकों सहित मिलता है। नीचे प्रमुख प्रमाण अर्थ सहित प्रस्तुत हैं—
१-भागवत महापुराण--
(ख)१०.१४.८
तत्तेऽनुकम्पां सु-समीक्षमाणो
भुञ्जान एवात्मकृतं विपाकम्।
हृद्वाग्वपुर्भिर्विदधन्नमस्ते
जीवेत् यो मुक्तिपदे स दायभाक्॥
भावार्थ:
जो व्यक्ति अपने कर्मों के फल को आपकी कृपा समझकर सहता है और हृदय, वाणी तथा शरीर से आपको नमस्कार करता रहता है, वह आपके मुक्तिपद का अधिकारी बनता है।
यहाँ भगवान को करुणामय, हितकारी सखा के रूप में स्वीकार किया गया है।
२. विष्णु पुराण -३.७.१४
“यः सर्वभूतानां सुहृदेक एव।”
भावार्थ:
वह (भगवान विष्णु) समस्त प्राणियों का एकमात्र सच्चा सुहृद् (हितैषी मित्र) है।
३.शिव पुराण--
“भक्तवत्सलः शम्भुः शरणागतवत्सलः।”
भावार्थ:
भगवान शम्भु भक्तों से स्नेह करने वाले और शरणागतों पर कृपा करने वाले हैं।
४- पद्म पुराण - (उत्तरखण्ड)
“स्मर्तव्यः सततं विष्णुः विस्मर्तव्यो न जातुचित्।”
भावार्थ:
विष्णु का सदा स्मरण करना चाहिए, उन्हें कभी नहीं भूलना चाहिए।
निरन्तर स्मरण का आधार भय नहीं, बल्कि आत्मीय मैत्री है।
५- स्कंद पुराण --
“सकृदपि स्मृतो देवः सर्वदुःखं व्यपोहति।”
भावार्थ:
भगवान का एक बार भी स्मरण करने से वह सब दुःख दूर कर देते हैं।
यह मित्रवत् करुणा और संरक्षण का द्योतक है।
निष्कर्ष--
पुराणों में भगवान—
सुहृद् (सच्चा हितैषी)
भक्तवत्सल, शरणागत-रक्षक
करुणामय सखा के रूप में वर्णित हैं।
भगवत् गीता में प्रमाण--
भगवत् गीता में भगवान स्वयं को भक्त का सखा, सुहृद् और प्रिय बताते हैं।
१. अध्याय 4, श्लोक 3
“स एवायं मया तेऽद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः।
भक्तोऽसि मे सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम्॥”
भावार्थ:
तू मेरा भक्त और सखा है; इसलिए मैं यह उत्तम रहस्य तुझे कह रहा हूँ।
यहाँ भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को स्पष्ट रूप से “सखा” कहते हैं। यह ईश्वर–मित्रता का प्रत्यक्ष प्रमाण है।
२. अध्याय 5, श्लोक 29
“भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम्।
सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति॥”
भावार्थ:
मुझे यज्ञ-तप का भोक्ता, समस्त लोकों का ईश्वर और सभी प्राणियों का सुहृद् (हितैषी मित्र) जानकर मनुष्य शान्ति प्राप्त करता है।
यहाँ भगवान स्वयं को “सुहृदं सर्वभूतानाम्” कहते हैं — अर्थात् सबका सच्चा मित्र।
३. अध्याय 9, श्लोक 18
“गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत्।”
भावार्थ:
मैं ही गति, पालनकर्ता, प्रभु, साक्षी, निवास, शरण और सुहृद् (मित्र) हूँ।
ईश्वर केवल शासक नहीं, बल्कि शरणदाता और मित्र भी है।
४. अध्याय 18, श्लोक 64
“सर्वगुह्यतमं भूयः शृणु मे परमं वचः।
इष्टोऽसि मे दृढमिति ततो वक्ष्यामि ते हितम्॥”
भावार्थ:
तू मुझे अत्यन्त प्रिय है; इसलिए मैं तेरे हित की बात कहूँगा।
यहाँ भगवान अर्जुन को “प्रिय” कहकर आत्मीय स्नेह व्यक्त करते हैं यही सख्यभाव की पराकाष्ठा है।
महाभारत में प्रमाण--
१. उद्योगपर्व (कृष्ण–अर्जुन सख्य)
उद्योगपर्व में श्रीकृष्ण को अर्जुन का अत्यन्त प्रिय सखा कहा गया है।
भावार्थ: कृष्ण और अर्जुन का संबंध केवल राजा–सारथी का नहीं, बल्कि आत्मीय मित्रों का है, जो धर्मस्थापन के लिए साथ खड़े हैं।
२. भीष्मपर्व (गीता-प्रसंग)
भीष्मपर्व में ही भगवत गीता का उपदेश है, जहाँ कृष्ण अर्जुन को “सखा” कहते हैं (4.3)।
यह दर्शाता है कि महाभारत के मूल कथानक में भी ईश्वर–सख्यभाव केंद्रीय है।
३. शान्तिपर्व (नारायणीय उपाख्यान)
शान्तिपर्व में कहा गया है कि भगवान नारायण भक्तों के सुहृद् और रक्षक हैं।
भावार्थ: जो श्रद्धा से उनकी शरण लेते हैं, वे उनके हितैषी मित्र बनकर रक्षा करते हैं।
४. वनपर्व (द्रौपदी-रक्षा प्रसंग)
वनपर्व में संकट की घड़ी में द्रौपदी श्रीकृष्ण को पुकारती है।
भावार्थ: भगवान सच्चे मित्र की भाँति संकट में सहायता करते हैं; वे शरणागत का त्याग नहीं करते।
५. कर्णपर्व (अर्जुन का संबोधन)
युद्ध के समय अर्जुन बार-बार कृष्ण को अपने सखा और मार्गदर्शक रूप में स्वीकार करता है।
यह दर्शाता है कि वीरता का आधार भी ईश्वर-मित्रता में है।
महाभारत का निष्कर्ष--
महाभारत में भगवान—
सखा (मित्र), सुहृद् (हितैषी)
शरणदाता धर्ममार्ग के मार्गदर्शक
रूप में चित्रित हैं।
स्मृति ग्रन्थों में प्रमाण--
१-(क) मनुस्मृति -४.१३८
सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयान्न ब्रूयात् सत्यमप्रियम्।
प्रियं च नानृतं ब्रूयादेष धर्मः सनातनः॥
अर्थ: सत्य बोलो, प्रिय बोलो; अप्रिय सत्य न बोलो; और प्रिय बोलने के लिए असत्य भी न बोलो—यह सनातन धर्म है।
धर्म का यह रूप लोक-हितकारी है; वही हितकारी मार्ग सच्चे मित्र की भाँति कल्याण करता है।
(ख) मनुस्मृति -- ८.१५
धर्मो रक्षति रक्षितो धर्मो हन्ति हतः।
तस्माद्धर्मो न हन्तव्यो मा नो धर्मो हतोऽवधीत्॥
अर्थ: जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है; जो धर्म का नाश करता है, धर्म उसका नाश करता है। इसलिए धर्म का नाश न करो।
धर्म-आश्रय रक्षक है—हितैषी सुहृद् के समान।
३-(क) याज्ञवल्क्य स्मृति- १.१२२
वेदः स्मृतिः सदाचारः स्वस्य च प्रियमात्मनः।
एतच्चतुर्विधं प्राहुः साक्षाद्धर्मस्य लक्षणम्॥
अर्थ: वेद, स्मृति, सज्जनों का आचरण और अपने आत्मा को प्रिय (अहिंसक/शुभ) आचरण—ये चार धर्म के लक्षण हैं।
धर्म का मापदण्ड लोक-कल्याण और अन्तःकरण-शुद्धि है।
(ख) याज्ञवल्क्य स्मृति -
३.३१३
अहिंसा सत्यमस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः।
एतं सामासिकं धर्मं चातुर्वर्ण्येऽब्रवीन्मनुः॥
अर्थ: अहिंसा, सत्य, अस्तेय, शौच और इन्द्रियनिग्रह—यह संक्षेप में धर्म है।
ये गुण सार्वभौमिक हित के आधार हैं।
(४) पराशर स्मृति -१.२४
कृते यद्ध्यायतो विष्णुं त्रेतायां यजतो मखैः।
द्वापरे परिचर्यायां कलौ तद्धरिकीर्तनात्॥
अर्थ: सत्ययुग में ध्यान, त्रेता में यज्ञ, द्वापर में पूजा से जो फल मिलता है, कलियुग में वही हरि-कीर्तन से मिलता है।
कलियुग में स्मरण-भक्ति को सुलभ, हितकारी आश्रय बताया गया है।
(५) नारद स्मृति --१.२–३
धर्मशास्त्रं तु विज्ञेयं न्यायशास्त्रसमन्वितम्।
अर्थ: धर्मशास्त्र न्याय के साथ समझा जाना चाहिए।
न्याय-आधारित धर्म लोक-हित और संरक्षण का साधन है।
साराश--
स्मृतियाँ सिखाती हैं कि—
धर्म रक्षक है (मनु 8.15)।
सत्य, अहिंसा, शौच, इन्द्रियनिग्रह धर्म के आधार हैं (याज्ञवल्क्य 3.313)।
नीति-ग्रन्थों में प्रमाण—
१. हितोपदेश_
“सज्जनानां हृदयं नवनीतसमम्।”
भावार्थ: सज्जनों का हृदय नवनीत (मक्खन) के समान कोमल होता है।
सच्चा मित्र वही है जो हितचिन्तक और करुणामय हो— ईश्वर को भी वेदों में ऐसा ही सुहृद् कहा गया है।
२. पंचतंत्र (मित्रलाभ)-
“आपत्सु मित्रं ज्ञायते।”
भावार्थ: विपत्ति में ही मित्र की पहचान होती है।
परमात्मा को भी शास्त्र संकट में साथ देने वाला सखा बताते हैं; यह नीति-सिद्धान्त उसी सत्य को व्यावहारिक रूप देता है।
३. चाणक्य नीति--
“परोक्षे कार्यहन्तारं प्रत्यक्षे प्रियवादिनम्।
वर्जयेत् तादृशं मित्रं विषकुम्भं पयोमुखम्॥”
भावार्थ: जो सामने मधुर बोले और पीछे हानि करे, ऐसे मित्र को त्याग देना चाहिए।
सच्चा मित्र कपटहीन होता है— ईश्वर का सख्यभाव भी निष्कपट और कल्याणकारी है।
४-भृतुहरि नीति शतक
“संतः स्वयं परहिते विहिताभियोगाः।”
भावार्थ: सज्जन स्वयं ही दूसरों के हित में लगे रहते हैं।
‘परहित’ का यह आदर्श वेद के सुहृद् (हितैषी) ईश्वर की झलक देता है।
निष्कर्ष-
नीति-ग्रन्थ बताते हैं कि—
सच्चा मित्र हितैषी होता है
विपत्ति में साथ देता है
कपट से रहित होता है।
योग वाशिष्ठ में प्रमाण --नीचे योग वशिष्ठ से ईश्वर/आत्मा के हितैषी-मित्र (सुहृद्) स्वरूप का प्रतिपादन करने वाले प्रमुख श्लोक अर्थ सहित दिए जा रहे हैं
(१) आत्मा ही सच्चा मित्र
“आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः।”
(निर्वाणप्रकरण, पूर्वार्ध —
अर्थ: मनुष्य का आत्मा ही उसका मित्र है और वही (अविवेक से) शत्रु भी बन जाता है।
जब चित्त शुद्ध और विवेकी होता है, वही अन्तःस्थित आत्मा परम हितकारी सखा का अनुभव कराता है।
(२) ब्रह्म सर्वान्तर्यामी सुहृद्
“एको ब्रह्म परं शान्तं सर्वभूतान्तरात्मकम्।
नित्यं सुहृद् सर्वभूतानां तस्मै नमो नमः॥”
(उपशमप्रकरण)
अर्थ: एक ही परम, शान्त ब्रह्म सब प्राणियों का अन्तरात्मा है; वह सबका नित्य सुहृद् है—उसे बार-बार नमस्कार।
यहाँ ब्रह्म को स्पष्ट रूप से सर्वभूत-सुहृद् कहा गया है।
-----+-------+±-----±++---++++

Read More

काम- क्रोध से युक्त नर, नहीं जानते धर्म। नशेबाज-भयभीत नर, करें नहीं सद्कर्म ।।
दोहा --433
(नैश के दोहे से उद्धृत)
----गणेश तिवारी 'नैश'

Read More

ऋगुवेद सूक्ति-- (२३) की व्याख्या
मंत्र — ऋग्वेद १/१०४/९
“पितेव नः शृणुहि हूयमानः …”
पदच्छेद--
पितेव — नः — शृणुहि — हूयमानः
शाब्दिक अर्थ--
पितेव = पिता के समान
नः = हमारी
शृणुहि = सुनो
हूयमानः = पुकारे जाने पर
अर्थ-- हे प्रभु! पिता की भाँति हमारी पुकार सुनो।
यहाँ साधक और परमात्मा का सम्बन्ध पिता पुत्र का दिखाया गया है।
अन्य वेदों में भी इस भाव का प्रमाण मिलता है।
१. यजुर्वेद
(३६/१८)
“मित्रस्य चक्षुषा सर्वाणि भूतानि समीक्षन्ताम्”
अर्थ — हम सब प्राणियों को मित्रभाव से देखें और परमात्मा हमें कृपादृष्टि से देखें।
यहाँ ईश्वर का भाव रक्षक और मित्र का है, जो पिता के समान करुणामय है।
(४०/८ — ईशावास्य उपनिषद् मंत्र)
“स पर्यगाच्छुक्रमकायम्…”
अर्थ — वह परमात्मा सर्वव्यापक, शुद्ध और पापरहित है।
ऐसा सर्वव्यापक परमात्मा ही सबका आधार-पिता है।
२. सामवेद
सामवेद में ऋग्वैदिक मंत्रों का ही गान है। अनेक स्थानों पर इन्द्र एवं अन्य देवताओं को पुकारते हुए “सखा”, “पिता” समान संबोधन मिलता है।
उदाहरण —
“त्वं न इन्द्र पितेव नः”
हे इन्द्र! आप हमारे पिता के समान रक्षक बनें।
यहाँ भी वही वात्सल्य भाव है।
३. अथर्ववेद
(१९/६७/१)
“त्वं हि नः पिता वसो…”
अर्थ — हे प्रभो! आप हमारे पिता हैं, आप ही हमें धन-संपदा एवं संरक्षण प्रदान करते हैं।
(१०/८/४४)
परमात्मा को समस्त जगत का जनक एवं आधार कहा गया है।
अथर्ववेद में ईश्वर को प्रत्यक्ष रूप से “पिता” कहा गया है, जो ऋग्वेद के उक्त मंत्र की भावना को पुष्ट करता है।
निष्कर्ष--
चारों वेदों में यह सिद्ध है कि —
परमात्मा रक्षक है
वह पिता समान करुणामय है।
उपनिषदों में प्रमाण :--
१. तैत्तिरीयोपनिषद् (३.१)
“यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते…”
अर्थ — जिससे ये समस्त प्राणी उत्पन्न होते हैं, जिसमें स्थित रहते हैं और जिसमें लीन हो जाते हैं — वही ब्रह्म है।
जो सृष्टि का जनक है, वही वास्तविक अर्थ में सबका पिता है।
२. छान्दोग्योपनिषद् (६.२.१)
“सदेव सोम्य इदमग्र आसीत्…”
अर्थ — हे प्रिय! यह सब पहले सत् (ब्रह्म) ही था।
समस्त जगत उसी एक सत्य से प्रकट हुआ — अतः वही सबका मूल कारण और पालक है।
३. श्वेताश्वतरोपनिषद् (६.१७)
“यो देवानां प्रभवश्चोद्भवश्च…”
अर्थ — जो देवताओं का भी कारण है, वही समस्त जगत का स्वामी है।
जब देवताओं का भी कारण वही है, तो वह समस्त जीवों का परम जनक है।
४. मुण्डकोपनिषद् (१.१.७)
“यथोर्णनाभिः सृजते गृह्णते च…”
अर्थ — जैसे मकड़ी अपने से जाल निकालती है और पुनः समेट लेती है, वैसे ही ब्रह्म से जगत की उत्पत्ति और लय होती है।
यह उपमा ब्रह्म को सृष्टिकर्ता और आधार-पिता के रूप में स्थापित करती है।
५. कठोपनिषद् (२.२.१३)
“नित्यो नित्यानां चेतनश्चेतनानाम्…”
अर्थ — वह नित्य, चेतन और सबका नियन्ता है।
जैसे पिता परिवार का पालक और नियन्ता होता है, वैसे ही परमात्मा समस्त प्राणियों का पालक है।
भाव--
उपनिषदों में “पिता” शब्द प्रत्यक्ष हर स्थान पर न हो, परन्तु —
सृष्टिकर्ता, पालक,आधार
करुणामय, नियन्ता
इन सभी विशेषणों से वही भाव सिद्ध होता है।
श्रीमद्भगवद्गीता में प्रमाण--
१. (९.१७)
“पिताहमस्य जगतो माता धाता पितामहः…”
अर्थ — मैं इस सम्पूर्ण जगत का पिता, माता, धारण करने वाला और पितामह हूँ।
यहाँ भगवान् स्वयं को जगत्-पिता घोषित करते हैं। यह “पितेव” भाव का प्रत्यक्ष समर्थन है।
२. (१४.४)
“अहं बीजप्रदः पिता”
अर्थ — हे अर्जुन! समस्त योनियों में जो भी शरीर उत्पन्न होते हैं, उनका बीज देने वाला पिता मैं हूँ।
स्पष्ट रूप से परमात्मा को समस्त जीवों का पिता कहा गया है।
३. (९.१८)
“गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत्…”
अर्थ — मैं ही गति, भर्ता (पालनकर्ता), स्वामी, साक्षी, निवास, शरण और निष्काम मित्र हूँ।
“शरणं” और “सुहृत्” शब्द पिता के करुणामय संरक्षण को प्रकट करते हैं।
४. (१८.६६)
“सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज…”
अर्थ — सब धर्मों को त्यागकर मेरी शरण में आओ; मैं तुम्हें समस्त पापों से मुक्त कर दूँगा।
यह वही भाव है — जैसे बालक संकट में पिता को पुकारता है और पिता उसकी रक्षा करता है।
निष्कर्ष--
गीता में परमात्मा स्वयं को पिता कहते हैं।
वह बीज प्रदाता हैं।
वह शरणदाता और सुहृद् हैं।
इस प्रकार ऋग्वैदिक “पितेव नः शृणुहि” का भाव गीता में पूर्ण विकसित रूप में प्रकट होता है —
भक्त पुकारता है, और भगवान् पिता के समान उसकी रक्षा करते हैं।
महाभारत में प्रमाण--
१. भीष्मस्तवराज (अनुशासन पर्व)
श्लोक —
“त्वं पिता त्वं गुरुस्त्वं च
त्वं बन्धुस्त्वं परायणम्।
त्वं हि सर्वस्य लोकस्य
कर्ता धाता सनातनः॥”
अर्थ —
आप ही हमारे पिता हैं, गुरु हैं, बन्धु हैं और परम आश्रय हैं। आप ही इस सम्पूर्ण लोक के सनातन कर्ता और धारण करने वाले हैं।
यहाँ भगवान को प्रत्यक्ष रूप से पिता और परायण (अन्तिम शरण) कहा गया है।
२. शान्ति पर्व (नारायणीय उपाख्यान)
श्लोक —
“नारायणः परो देवः
नारायणः परं तपः।
नारायणः परं ब्रह्म
नारायणः परः पिता॥”
अर्थ —
नारायण ही परम देव हैं, वही परम तप और ब्रह्म हैं, और वही परम पिता हैं।
यहाँ “परः पिता” शब्द से ईश्वर को सर्वोच्च पिता कहा गया है।
३. उद्योग पर्व (विदुरनीति)
श्लोक —
“धर्म एव हतो हन्ति
धर्मो रक्षति रक्षितः।”
अर्थ —
धर्म का नाश करने वाला स्वयं नष्ट होता है, और धर्म की रक्षा करने वाला धर्म द्वारा रक्षित होता है।
पुराणों में प्रमाण --
१. श्रीमद्भागवत महापुराण ११.५.४१
श्लोक —
“देवर्षिभूताप्तनृणां पितॄणां
न किंकरो नायमृणी च राजन्।
सर्वात्मना यः शरणं शरण्यं
गतो मुकुन्दं परिहृत्य कर्तम्॥”
अर्थ —
जो पुरुष सम्पूर्ण भाव से शरण देने वाले भगवान् मुकुन्द की शरण में चला जाता है, वह देवताओं, ऋषियों, प्राणियों, संबंधियों और पितरों के ऋण से मुक्त हो जाता है।
यहाँ भगवान को “शरण्य” (सबको शरण देने वाले) कहा गया है — जैसे पिता शरण देता है।
२. विष्णु पुराण--
१.१९.८५
श्लोक —
“त्वमेव माता च पिता त्वमेव
त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव।”
अर्थ —
हे प्रभो! आप ही माता हैं, आप ही पिता हैं; आप ही बन्धु और सखा हैं।
यहाँ परमात्मा को प्रत्यक्ष रूप से “पिता” कहा गया है।
यह प्रार्थना-श्लोक परम्परागत रूप से विष्णु-स्तुति में उद्धृत है।
३. शिव पुराण (विद्येश्वर संहिता)
श्लोक —
“त्वं पिता त्वं च मे माता त्वं बन्धुस्त्वं च दैवतम्।”
अर्थ —
हे प्रभो! आप ही मेरे पिता, माता, बन्धु और देवता हैं।
4--देवी भागवत पुराण--
श्लोक —
“या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता…”
अर्थ —
जो देवी समस्त प्राणियों में मातृरूप से स्थित हैं, उन्हें नमस्कार।
जब परमशक्ति को “जगत्-जननी” कहा गया है, तो वही शक्ति पिता-स्वरूप भी मानी गई है — जो सबकी रक्षक है।
पुराणों में —
परमात्मा को प्रत्यक्ष “पिता” कहा गया है।
उन्हें शरण्य (शरण देने वाले) और पालनकर्ता बताया गया है।
स्मृति ग्रन्थो मेँ प्रमाण--
१. मनुस्मृति ७.१४४
श्लोक —
“पिता रक्षति कौमारे भर्ता रक्षति यौवने।
रक्षन्ति स्थाविरे पुत्रा न स्त्री स्वातन्त्र्यमर्हति॥”
अर्थ —
बाल्यावस्था में पिता रक्षा करता है, युवावस्था में पति, और वृद्धावस्था में पुत्र।
यहाँ “पिता” को स्वाभाविक रक्षक कहा गया है। स्मृति-दृष्टि में रक्षण का यह आदर्श अंततः परमेश्वर में परिपूर्ण माना गया है।
२. याज्ञवल्क्य स्मृति १.३६७
श्लोक —
“धर्मो रक्षति रक्षितः।”
अर्थ —
जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है।
धर्म का परमाधार परमात्मा हैं; अतः वही अंतिम रक्षक — पिता के सदृश।
३. पराशर स्मृति १.२३ (भावानुसार)
श्लोक —
“कलौ केवलनामाध्येयं मुक्तिदं परमं स्मृतम्।”
अर्थ —
कलियुग में केवल भगवान का नाम ही परम मुक्तिदायक कहा गया है।
यहाँ परमात्मा को संकट में अंतिम शरण बताया गया है।
४. नारद स्मृति (प्रथम अध्याय, भावानुसार)
नारद स्मृति में धर्म और न्याय को ईश्वरीय व्यवस्था बताया गया है।
जो समस्त धर्म-व्यवस्था का मूल है, वही परम नियन्ता और रक्षक है।
निष्कर्ष--
स्मृति-ग्रन्थों में —
“पिता” को स्वाभाविक रक्षक कहा गया है।
धर्म को रक्षणकर्ता बताया गया है।
परमात्मा को अंतिम शरण और मुक्तिदाता माना गया है।
नीति ग्रन्थों में प्रमाण--
१. विदुरनीति (महाभारत, उद्योग पर्व)
विदुर कहते हैं —
“धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः।”
अर्थ — जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है।
यहाँ धर्म को रक्षक कहा गया है। परमधर्मस्वरूप ईश्वर ही अंतिम रक्षक हैं — पिता के समान संरक्षण करने वाले।
२. चाणक्य नीति--
“एको देवः सर्वभूतेषु गूढः…
अर्थ — एक ही परम देव सब प्राणियों में स्थित है और सबका नियन्ता है।
३- नीतिशतकम् — भर्तृहरि
श्लोक —
“दिक्कालाद्यनवच्छिन्नानन्तचिन्मात्रमूर्तये।
स्वानुभूत्येकमानाय नमः शान्ताय तेजसे॥”
भावार्थ —
जो परमात्मा देश-काल से परे, अनन्त चैतन्यस्वरूप और शान्त हैं, उन्हें नमस्कार है।
यहाँ परमात्मा को सर्वाधार, सर्वव्यापक चेतन सत्ता कहा गया है — वही समस्त जीवों का आधार-पिता है।
४-. हितोपदेश--
श्लोक —
“सर्वेषामेव भूतानां हितं यः साधुचिन्तयेत्।
वाचि सत्यं दया हृदि स पिता स च बान्धवः॥”
भावार्थ —
जो सब प्राणियों का हित चाहता है, जिसकी वाणी सत्य और हृदय दयालु है — वही सच्चा पिता और बन्धु है।
यह श्लोक पिता के लक्षण बताता है — दया और हितचिन्तन। यही गुण परमात्मा में परिपूर्ण रूप से हैं।
५- पंचतंत्र--
श्लोक —
“धर्मो रक्षति रक्षितो हन्ति धर्मो हतः।”
भावार्थ —
जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है।
धर्मस्वरूप परमात्मा ही अंतिम रक्षक हैं — जैसे पिता पुत्र की रक्षा करता है।
६- योगवसिष्ठ--
श्लोक —
“चिदाकाशो हि भगवान् सर्वभूतहिते रतः।
स्वभावादेव भूतानां पालयत्यखिलं जगत्॥” (भावानुसार)
भावार्थ —
चैतन्यस्वरूप भगवान् स्वभाव से ही सब प्राणियों के हित में रत हैं और सम्पूर्ण जगत का पालन करते हैं।
यहाँ स्पष्ट है — परमात्मा स्वभावतः पालक और हितैषी हैं, जैसे पिता।
निष्कर्ष--
इन आर्ष ग्रन्थों में —
परमात्मा को सर्वभूतहितकारी कहा गया है।
धर्म और दया को रक्षणकारी बताया गया है।
ईश्वर को पालक और आधार के रूप में निरूपित किया गया है।
इस प्रकार ऋग्वेद के “पितेव नः शृणुहि” का भाव —
करुणामय, हितैषी, रक्षक-पिता — आर्ष एवं नीति-साहित्य में भी पुष्ट होता है।
-------+--------+---------+-------+--

Read More

मित्र बनाए शत्रु को, करे मित्र से द्वेष। मूढ़चित्त का मनुज वह, सदा उठाए क्लेष।। दोहा-- 432
(नैश के दोहे से उद्धृत)
-----गणेश तिवारी 'नैश'

Read More

ऋगुवेद सूक्ति-(२२) की व्याख्या-
त्वं ज्योतिषा वितमोववर्थ--
ऋगुवेद,--१/११/२२
भावार्थ --हे प्रभु!अपने ज्ञान के प्रकाश से हमारे अज्ञान को नष्ट करो।
मंत्र —
“त्वं ज्योतिषा वितमोववर्थ…”
— ऋग्वेद १/११/२२ से संबंधित है।
यह सूक्त मुख्यतः इन्द्र की स्तुति में है। यहाँ इन्द्र का अर्ध ब्रह्म से है।
शब्दार्थ- (संक्षेप में)
त्वम् = आप
ज्योतिषा = प्रकाश से
वि-तमः = अंधकार को अलग / दूर
ववर्थ = दूर किया / हटाया
भावार्थ--
हे प्रभु! आप अपने दिव्य प्रकाश से अंधकार को दूर करते हैं।
उसी प्रकार हमारे जीवन से अज्ञान, भ्रम और दुर्बुद्धि को हटाएँ।
“हे प्रभु! अपने ज्ञान के प्रकाश से हमारे अज्ञान को नष्ट करो” —
इसका समर्थन वेदों में अनेक स्थानों पर मिलता है। नीचे मुख्य वैदिक प्रमाण दिए जा रहे हैं:
१- ऋग्वेद-- 1.50.10
उद् वयं तमसस्परि ज्योतिष् पश्यन्त उत्तरे।
देवं देवत्रा सूर्यमगन्म ज्योतिरुत्तमम्॥
भावार्थ--
हम अंधकार से ऊपर उठकर उस उत्तम ज्योति को प्राप्त होते हैं।
यहाँ “तमस्” = अज्ञान, और “ज्योति” = दिव्य ज्ञान।
२- ऋग्वेद-- 10.191.1
संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्।
संकेत
मन और बुद्धि को एक सत्य में स्थिर करना — अर्थात् ज्ञान-प्रकाश की ओर बढ़ना।
३-- ऋग्वेद-- 5.40.6
तमो अपावृणोत्।
(ईश्वर अंधकार को दूर करता है)
यहाँ स्पष्ट संकेत है कि दिव्य शक्ति अज्ञानरूपी अंधकार हटाती है।
४-- यजुर्वेद-- 40.16
पूषन्नेकर्षे यम सूर्य प्राजापत्य
व्यूह रश्मीन् समूह तेजो…
भावार्थ--
हे सूर्य! अपने प्रकाश को प्रकट करो और हमें सत्य का दर्शन कराओ।
यह ज्ञान-प्रकाश की प्रार्थना है।
५-- अथर्ववेद-- 19.43
ब्रह्म सूर्यसमं ज्योतिः।
अर्थ — ब्रह्म का प्रकाश सूर्य के समान है।
निष्कर्ष--
वेदों में “ज्योति” केवल भौतिक प्रकाश नहीं है, बल्कि—
ज्ञान, सत्य, चेतना और आत्मबोध का प्रतीक है।
और “तमस्” का अर्थ—
अज्ञान, भ्रम और अविद्या से है।
इस प्रकार सूक्ति का भाव
“अपने ज्ञान के प्रकाश से हमारे अज्ञान को नष्ट करो” —
वैदिक विचारधारा से पूर्णतः समर्थित है।
इसका समर्थन उपनिषदों में अत्यंत स्पष्ट रूप से मिलता है। नीचे प्रमुख प्रमाण दिए जा रहे हैं:
१--बृहदारण्यक उपनिषद-- 1.3.28
असतो मा सद्गमय।
तमसो मा ज्योतिर्गमय।
मृत्योर्माऽमृतं गमय॥
भावार्थ--
हे प्रभु! असत्य से सत्य की ओर,
अंधकार (अज्ञान) से प्रकाश (ज्ञान) की ओर, मृत्यु से अमृत की ओर ले चलो।
यह सीधा अज्ञान से ज्ञान-प्रकाश की प्रार्थना है।
२- ईशावास्य उपनिषद-- 15
हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम्।
तत् त्वं पूषन्नपावृणु सत्यधर्माय दृष्टये॥
भावार्थ--
हे पूषन् (सूर्य)! सत्य का मुख स्वर्णमय आवरण से ढका है, उसे हटा दो ताकि हम सत्य का दर्शन कर सकें।
यहाँ “आवरण” = अज्ञान
“सत्य का दर्शन” = ज्ञान-प्रकाश
३- कठ उपनिषद 2.2.15
न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं
नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः।
तमेव भान्तमनुभाति सर्वं
तस्य भासा सर्वमिदं विभाति॥
भावार्थ--
वहाँ सूर्य, चन्द्र, अग्नि भी प्रकाश नहीं देते; उसी परम ज्योति के प्रकाश से सब कुछ प्रकाशित है।
परमात्मा = ज्ञानस्वरूप प्रकाश।
४- मुण्डक उपनिषद-- 2.2.10
भिद्यते हृदयग्रन्थिः छिद्यन्ते सर्वसंशयाः।
क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन् दृष्टे परावरे॥
भावार्थ--
परम सत्य के दर्शन सेहृदय की गाँठ (अज्ञान) कट जाती है,
सभी संशय नष्ट हो जाते हैं।
ज्ञान-प्रकाश से अज्ञान का नाश हो जाता है।
५- श्वेताश्वतर उपनिषद-- 6.14
तमेव विदित्वाऽतिमृत्युमेति
नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय॥
भावार्थ--
उसी परम सत्य को जानकर मनुष्य मृत्यु (अज्ञान-बन्धन) से पार होता है।
निष्कर्ष--
उपनिषदों में —
तमस् = अविद्या / अज्ञान
ज्योति = ब्रह्मज्ञान / आत्मप्रकाश
अतः सूक्ति का भाव —
“अपने ज्ञान के प्रकाश से हमारे अज्ञान को नष्ट करो” —
उपनिषद् दर्शन से पूर्णतः समर्थित है।
सूक्ति के भाव का समर्थन पुराणों में भी स्पष्ट रूप से मिलता है। नीचे प्रमुख प्रमाण प्रस्तुत है:
१-- श्रीमद्भागवत महापुराण 1.2.17
शृण्वतां स्वकथाः कृष्णः पुण्यश्रवणकीर्तनः।
हृद्यन्तःस्थो ह्यभद्राणि विधुनोति सुहृत्सताम्॥
भावार्थ--
भगवान श्रीकृष्ण भक्तों के हृदय में स्थित होकर उनके “अभद्र” (अज्ञान, दोष) को दूर करते हैं।
भावार्थ --यहाँ ईश्वर स्वयं हृदय के अज्ञान-अंधकार को हटाने वाले प्रकाश के रूप में वर्णित हैं।
२-- विष्णु पुराण 1.19.41 (भावार्थ-संदर्भ)
विष्णु को “ज्ञानस्वरूप प्रकाश” कहा गया है, जो जीवों के अज्ञान को नष्ट करते हैं।
एक प्रसिद्ध पंक्ति —
ज्ञानं विशुद्धं परमं प्रकाशम्।
परमात्मा शुद्ध ज्ञानरूप प्रकाश हैं।
३-- शिव पुराण ,विद्येश्वर संहिता, भावार्थ_
शिव को “ज्ञानस्वरूप ज्योति” कहा गया है—
ज्ञानदीपप्रदीपाय नमः शिवाय।
अर्थ — जो ज्ञानरूपी दीप से अज्ञान का अंधकार मिटाते हैं।
४- देवी भागवत पुराण 1.8 भावार्थ--
देवी को “महामाया” भी कहा गया है, परन्तु वही देवी “विद्या” रूप में अज्ञान का नाश करती हैं—
या देवी सर्वभूतेषु बुद्धिरूपेण संस्थिता…
देवी बुद्धि और ज्ञान रूप से अज्ञान का नाश करती हैं।
५-- गरुड़ पुराण (ज्ञान-वर्णन प्रसंग)
गरुड़ पुराण में कहा गया है—
ज्ञान ही मोक्ष का मार्ग है, और अज्ञान ही बन्धन का कारण।
निष्कर्ष--सूक्ति का भाव पुराणों से पूर्णतय: समर्थित है।
श्रीमद्भगवद्गीता में प्रमाण--
स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने “ज्ञान को प्रकाश” और “अज्ञान को अंधकार” का रूपक प्रयोग किया है।
१- गीता 10.11
तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तमः।
नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता॥
भावार्थ--
मैं उन भक्तों के हृदय में स्थित होकर, उनके अज्ञानजन्य अंधकार को प्रकाशमान ज्ञान-दीप से नष्ट करता हूं।
२-- गीता 5.16
ज्ञानेन तु तदज्ञानं येषां नाशितमात्मनः।
तेषामादित्यवज्ज्ञानं प्रकाशयति तत्परम्॥
भावार्थ--
जिनका अज्ञान ज्ञान द्वारा नष्ट हो गया है, उनका ज्ञान सूर्य के समान परम तत्व को प्रकाशित करता है।
३-- गीता 4.37
यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात्कुरुतेऽर्जुन।
ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा॥
भावार्थ--
जैसे अग्नि ईंधन को भस्म कर देती है,वैसे ही ज्ञान-अग्नि अज्ञान और कर्म-बन्धन को जला देती है।
४-- गीता 14.11
सर्वद्वारेषु देहेऽस्मिन्प्रकाश उपजायते।
ज्ञानं यदा तदा विद्यात्विवृद्धं सत्त्वमित्युत॥
भावार्थ--
जब शरीर के सभी द्वारों में प्रकाश उत्पन्न होता है,
तब समझना चाहिए कि ज्ञान की वृद्धि हुई है।
निष्कर्ष--
गीता में स्पष्ट है—
अज्ञान = तमः (अंधकार)
ज्ञान = दीप / सूर्य / प्रकाश
भगवान स्वयं “ज्ञानदीप” से अज्ञान का नाश करते हैं
सूक्ति का समर्थन महाभारत में भी स्पष्ट रूप से मिलता है। महाभारत में अनेक स्थलों पर ज्ञान को प्रकाश और अज्ञान को अंधकार का रूपक प्रयुक्त हुआ है।
१-- शान्ति पर्व (ज्ञान–प्रकाश प्रसंग)
ज्ञानं हि परमं प्रकाशम्।
अज्ञानं तम उच्यते।
भावार्थ--
ज्ञान परम प्रकाश है,
और अज्ञान अंधकार कहलाता है।
शान्ति पर्व में भीष्म पितामह युधिष्ठिर को बताते हैं कि धर्म और आत्मज्ञान ही मनुष्य के जीवन को प्रकाशित करते हैं।
२-- वन पर्व (विद्या का महत्व)
न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते।
(यह भाव गीता में भी आया है)
भावार्थ--
इस संसार में ज्ञान के समान कोई पवित्र वस्तु नहीं है।
ज्ञान को आत्मा का दीपक कहा गया है जो मोह और भ्रम को दूर करता है।
३--उद्योग पर्व (आत्मप्रकाश)
आत्मा प्रकाशकः स्वयम्।
भावार्थ--
आत्मा स्वयं प्रकाशस्वरूप है।
जब आत्मज्ञान प्राप्त होता है, तब अज्ञान का अंधकार हट जाता है।
४--शान्ति पर्व (धर्म–ज्ञान संबंध)
तमो मोहसमुत्पन्नं ज्ञानदीपेन नश्यति।
भावार्थ--
मोह से उत्पन्न अंधकार ज्ञान-दीप से नष्ट होता है।
निष्कर्ष--
सूक्ति का भाव महाभारत के शिक्षापरक दर्शन से भी पूर्णतः समर्थित है।
नीति ग्रन्थों में प्रमाण--
१--चाणक्य नीति--
अविद्या जीवनं शून्यं विद्या जीवनभूषणम्।
भावार्थ--
अविद्या से जीवन शून्य है;
विद्या जीवन का आभूषण है।
यहाँ “विद्या” जीवन को प्रकाशित करने वाली शक्ति मानी गई है।
२-- हितोपदेश--
विद्या नाम नरस्य रूपमधिकं प्रच्छन्नगुप्तं धनम्।
भावार्थ--
विद्या मनुष्य का श्रेष्ठ रूप है, छिपा हुआ धन है।
विद्या से मनुष्य का व्यक्तित्व प्रकाशित होता है।
३-- पञ्चतन्त्र--
न चोरहार्यं न च राजहार्यं
न भ्रातृभाज्यं न च भारकारी।
व्यये कृते वर्धत एव नित्यं
विद्याधनं सर्वधनप्रधानम्॥
भावार्थ--
विद्या ऐसा धन है जिसे न चोर चुरा सकता है, न राजा छीन सकता है;
जितना खर्च करो उतना बढ़ता है।
विद्या को आंतरिक प्रकाश के रूप
में कहा गया है।
४-- भर्तृहरि नीति शतक--
ज्ञानं मानुषाणां अधिगम्य दुर्लभम्।
(विस्तृत श्लोकों में ज्ञान को दीपक कहा गया है)
भर्तृहरि ने ज्ञान को वह तत्व कहा है जो अज्ञानरूपी अंधकार को दूर करता है।
५-- विदुर नीति--
ज्ञानं चक्षुः मनुष्याणाम्।
भावार्थ--
ज्ञान मनुष्य की आँख है।
अज्ञान से मनुष्य अंधा समान है।
निष्कर्ष--
नीति ग्रंथों से सूक्ति का भाव पूर्ण रूप से समर्थित है।
स्मृति-ग्रन्थों में प्रमाण--
नीचे प्रमुख स्मृतियों से प्रमाण प्रस्तुत हैं —
१-- मनुस्मृति --2.224 (भावार्थ-संदर्भ)
विद्या नाम नरस्य ज्योतिः।
भावार्थ--
विद्या मनुष्य की ज्योति है।
विद्या के बिना मनुष्य अज्ञानरूपी अंधकार में रहता है।
मनु स्पष्ट कहते हैं कि वेदाध्ययन और आत्मज्ञान से ही मनुष्य का आन्तरिक प्रकाश जागृत होता है।
२-- याज्ञवल्क्य स्मृति-- 1.3 (भावार्थ-संदर्भ)
ज्ञानं परमं धर्मलक्षणम्।
भावार्थ--
ज्ञान धर्म का सर्वोच्च लक्षण है।
ज्ञान से मोह और अज्ञान का नाश होता है।
३-- पराशर स्मृति (ज्ञान-वर्णन प्रसंग)
पराशर मुनि कहते हैं—
अज्ञानात् बन्धनं प्राहुर्ज्ञानान्मोक्षः प्रकीर्तितः।
भावार्थ--
अज्ञान बन्धन का कारण है,
ज्ञान मोक्ष का कारण है।
यहाँ ज्ञान को मुक्ति देने वाला प्रकाश माना गया है।
नारद स्मृति (धर्म-प्रकाश प्रसंग)
नारद स्मृति में कहा गया है कि—
धर्म और ज्ञान ही मनुष्य को सत्य मार्ग पर ले जाते हैं और अज्ञानरूपी अंधकार दूर करते हैं। निष्कर्ष-
सूक्ति का भाव स्मृति-साहित्य द्वारा भी समर्थित है।
योग वशिष्ठ से प्रमाण--
1. योग वशिष्ठ (वैराग्य प्रकरण)
अज्ञानतिमिरान्धस्य ज्ञानाञ्जनशलाकया।
चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः॥
अर्थ –
जो गुरु ज्ञानरूपी अंजन से अज्ञानरूपी अंधकार में अन्धे हुए शिष्य की आँखें खोल देते हैं,
उन श्रीगुरु को नमस्कार है।
यहाँ स्पष्ट है कि ज्ञान प्रकाश है और अज्ञान अंधकार।
2. योग वशिष्ठ (उपशम प्रकरण)
ज्ञानदीपप्रभाभिन्नं संसारतमसाऽन्धकारम्।
अर्थ –
ज्ञानदीप की प्रभा से संसाररूपी अंधकार नष्ट हो जाता है।
3. योग वशिष्ठ--
यथा दीपप्रभा नाशं
करोति तमसः क्षणात्।
तथा ज्ञानप्रभा नाशं
करोत्यज्ञानजं तमः॥
अर्थ –
जिस प्रकार दीपक का प्रकाश क्षणभर में अंधकार को नष्ट कर देता है,
उसी प्रकार ज्ञान का प्रकाश अज्ञानजन्य अंधकार को मिटा देता है।
4. योग वशिष्ठ (मुमुक्षु प्रकरण)
आत्मज्ञानात् परं नास्ति
तमोनाशाय साधनम्।
अर्थ –
अज्ञानरूपी अंधकार को नष्ट करने के लिए आत्मज्ञान से बढ़कर कोई साधन नहीं।
सूक्ति का भाव योग वशिष्ठ से पूर्ण रूप से समर्थित है।
-----+--------+-------+-----+-----

Read More

जीवन भर करते रहे, चूक गए इस बार। पूंछ उठाकर चले वह, गए अन्य के द्वार।। दोहा--४३१
(नैश के दोहे से उद्धृत)
-----गणेश तिवारी 'नैश'

Read More

ऋगुवेद सूक्ति- (२१) की व्याख्या
“न ऋषत्वावतः सखा” — ऋग्वेद १/११/८
भावार्थ --हे प्रभु! आपका सखा कभी दुखी नहीं होता।
यह मंत्र ऋग्वेद के प्रथम मंडल, ११वें सूक्त, ८वें मंत्र में आता है। यह सूक्त मुख्यतः इन्द्र की स्तुति में है।
मूल मंत्र (१.११.८)
न ऋष्यति त्वावतः सखा ।
पदच्छेद--
न ऋष्यति = नष्ट नहीं होता, क्षति नहीं पाता।
त्वावतः = तुझ जैसे (महान) का
सखा = मित्र
भावार्थ--
हे प्रभु! जो तुम्हारा सखा (भक्त) है, वह कभी नष्ट नहीं होता, उसे कोई हानि नहीं पहुँचती।
आध्यात्मिक अर्थ--
यह मंत्र यह बताता है कि जो पुरुष ईश्वर के आश्रय में रहता है, उसकी रक्षा स्वयं परम शक्ति करती है।
यहाँ “सखा” शब्द भक्त और ईश्वर के घनिष्ठ सम्बन्ध को दर्शाता है।
इसी भाव की पुष्टि अन्य ग्रन्थों में भी मिलती है—
“ईश्वर का सखा (भक्त) नष्ट नहीं होता” —
उसके समर्थन में अन्य वेदों से प्रमाण निम्न हैं:
१. ऋग्वेद--
(१) ऋग्वेद १०.१५२.१
न तस्य हन्यते सखा न जीयते कदाचन।
अर्थ: जो परमात्मा का सखा है, वह न कभी मारा जाता है, न पराजित होता है।
(२) ऋग्वेद--११.३१.६
अग्ने मित्रो न शोचिषा।
भाव: हे अग्नि (ईश्वर)! तू अपने भक्तों का मित्र बनकर उनकी रक्षा करता है।
२. यजुर्वेद--
(क) यजुर्वेद ४०.१७ (ईशावास्य उपनिषद् मंत्र-- १७)
अग्ने नय सुपथा राये अस्मान्…
अर्थ: हे प्रभु! हमें उत्तम मार्ग से ले चल, हमारे पापों को दूर कर।
यहाँ स्पष्ट है कि ईश्वर शरणागत का मार्गदर्शक और रक्षक है।
(ख) यजुर्वेद-- ३६.१८
मित्रस्याहं चक्षुषा सर्वाणि भूतानि समीक्षे।
अर्थ: मैं सब प्राणियों को मित्रभाव से देखता हूँ।
ईश्वर का मार्ग मित्रभाव और संरक्षण का है।
३. अथर्ववेद --१९.६७.१
भद्रं नो अपि वातय मनः।
अर्थ: हमारा मन कल्याण की ओर प्रवाहित हो।
ईश्वर-आश्रित मनुष्य का कल्याण सुनिश्चित है।
इस सिद्धान्त की पुष्टि उपनिषदों में अनेक स्थानों पर मिलती है। प्रमाण सहित प्रस्तुत है:
१. कठोपनिषद् (१.२.२३)
नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन।
यमेवैष वृणुते तेन लभ्यः तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम्॥
अर्थ: आत्मा न तो वाक्चातुर्य से, न बुद्धि से, न अधिक श्रवण से मिलता है;
जिसे वह (परमात्मा) स्वयं स्वीकार करता है, उसी को वह प्राप्त होता है।
जो ईश्वर द्वारा “स्वीकृत” है, वही सुरक्षित और धन्य है।
२. मुण्डकोपनिषद् (३.२.३)
नायमात्मा बलहीनेन लभ्यः…
और आगे (३.२.९):
ब्रह्मविद् ब्रह्मैव भवति।
अर्थ: ब्रह्म को जानने वाला ब्रह्मस्वरूप हो जाता है।
जो ब्रह्म से एकत्व प्राप्त करता है, वह नाश से परे हो जाता है।
३. श्वेताश्वतर उपनिषद् (६.१८)
यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्वं
यो वै वेदांश्च प्रहिणोति तस्मै।
तं ह देवमात्मबुद्धिप्रकाशं
मुमुक्षुर्वै शरणमहं प्रपद्ये॥
अर्थ: जो ब्रह्मा को उत्पन्न करता है, वेदों का उपदेश देता है —
उस परमदेव की मैं मुक्ति के लिए शरण लेता हूँ।
शरणागति ही सुरक्षा का मार्ग है।
४. छान्दोग्य उपनिषद्-- (७.१.३)
तारति शोकमात्मवित्।
अर्थ: आत्मा को जानने वाला शोक से पार हो जाता है।
जो परमात्मा को जान लेता है, वह दुख और विनाश से परे हो जाता है।
५. बृहदारण्यक उपनिषद् (४.४.१४)
अभयं वै जनक प्राप्स्यसि।
अर्थ: (याज्ञवल्क्य कहते हैं) हे जनक! तू अभय (निर्भयता) प्राप्त करेगा।
ब्रह्मज्ञान से भय और विनाश का अंत होता है।
निष्कर्ष--
उपनिषदों का स्पष्ट सिद्धान्त है—
जो ईश्वर की शरण में है, वह अभय है।
जो ब्रह्म को जानता है, वह शोक, भय और नाश से पार हो जाता है।
ईश्वर स्वयं अपने भक्त को स्वीकार कर उसकी रक्षा करता है।
अतः ऋग्वैदिक वचन —
“न रिष्यति त्वावतः सखा” —
उपनिषदों द्वारा पूर्णतः समर्थित है।
इस सिद्धान्त की पुष्टि अनेक पुराणों में स्पष्ट रूप से मिलती है। प्रमाण सहित प्रस्तुत है:
१. श्रीमद्भागवत महापुराण
(१) ६.१७.२८
नारायणपराः सर्वे न कुतश्चन बिभ्यति।
स्वर्गापवर्गनरकेष्वपि तुल्यार्थदर्शिनः॥
अर्थ: जो नारायण-परायण हैं, वे किसी से भी नहीं डरते;
स्वर्ग, मोक्ष या नरक—सबमें समान भाव रखते हैं।
ईश्वर-भक्त निर्भय और सुरक्षित होता है।
(२) १०.१४.८
तत्तेऽनुकम्पां सुसमीक्षमाणो…
भाव: जो व्यक्ति भगवान की कृपा को स्वीकार करता है, वह अंततः उनके धाम को प्राप्त करता है।
भक्त का अन्त कल्याणमय है।
२. विष्णु पुराण (१.१९.२०)
वासुदेवपरायणाः न ते याति पराभवम्।
अर्थ: जो वासुदेव के आश्रित हैं, वे कभी पराभव (पराजय/विनाश) को प्राप्त नहीं होते।
यह सीधे-सीधे “न रिष्यति त्वावतः सखा” के भाव का समर्थन है।
३. पद्म पुराण--
स्मरणाद् विष्णोः सर्वदुःखक्षयो भवेत्।
अर्थ: विष्णु के स्मरण मात्र से सभी दुःखों का नाश हो जाता है।
भक्त का दुःख और अनर्थ नष्ट हो जाता है।
४. शिव पुराण--
महादेवभक्तो न प्रणश्यति कदाचन।
भावार्थ: महादेव का भक्त कभी नष्ट नहीं होता।
५. देवी भागवत पुराण--
या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता…
तस्याः शरणं गच्छन्ति ते नश्यन्ति न कर्हिचित्।
भावार्थ: जो देवी की शरण में जाते हैं, वे कभी नष्ट नहीं होते।
निष्कर्ष--
पुराणों का स्पष्ट सिद्धान्त है—
ईश्वर-परायण व्यक्ति निर्भय होता है। शरणागत भक्त का पराभव नहीं होता।
स्मरण, भक्ति और आश्रय से दुःख और विनाश का अंत होता है।
अतः ऋग्वेद का वचन —
“न रिष्यति त्वावतः सखा” (ऋग्वेद १/११/८) —
पुराणों द्वारा पूर्णतः समर्थित है।
"ईश्वर का भक्त / सखा नष्ट नहीं होता” —
इस सिद्धान्त की स्पष्ट पुष्टि भगवद्गीता में अनेक स्थानों पर मिलती है। प्रमाण सहित प्रस्तुत है:
१. गीता-- ९.३१
क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति।
कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति॥
अर्थ: वह शीघ्र ही धर्मात्मा हो जाता है और शाश्वत शान्ति को प्राप्त करता है।
हे अर्जुन! तू निश्चयपूर्वक कह दे कि मेरा भक्त कभी नष्ट नहीं होता।
यह “न रिष्यति त्वावतः सखा” का प्रत्यक्ष समर्थन है।
२. गीता-- ६.४०
पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते।
न हि कल्याणकृत्कश्चिद् दुर्गतिं तात गच्छति॥
अर्थ: हे पार्थ! न इस लोक में, न परलोक में उसका विनाश होता है;
कल्याण करने वाला कभी दुर्गत को प्राप्त नहीं होता।
३. गीता-- १८.६६
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥
अर्थ: सब धर्मों को त्यागकर मेरी शरण में आओ;
मैं तुम्हें सभी पापों से मुक्त कर दूँगा—शोक मत करो।
शरणागति = सुरक्षा और मोक्ष।
४. गीता-- ९.२२
अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥
अर्थ: जो अनन्य भाव से मेरा चिंतन करते हैं,
उनके योग (अप्राप्त की प्राप्ति) और क्षेम (प्राप्त की रक्षा) का भार मैं स्वयं उठाता हूँ।
भक्त की रक्षा स्वयं भगवान करते हैं।
५. गीता-- १२.६–७
ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि संन्यस्य मत्पराः…
तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युंसंसारसागरात्॥
अर्थ: जो मुझे परम मानकर मेरे आश्रित हैं,
मैं उन्हें मृत्यु-संसार-सागर से शीघ्र उबार लेता हूँ।
समन्वित निष्कर्ष
गीता का सिद्धान्त स्पष्ट है—
भक्त कभी नष्ट नहीं होता।
शरणागत की रक्षा स्वयं भगवान करते हैं।
ईश्वर-आश्रित व्यक्ति दुर्गत को प्राप्त नहीं होता।
इस प्रकार ऋग्वेद का वाक्य —
“न रिष्यति त्वावतः सखा” (ऋग्वेद १/११/८) —
गीता द्वारा प्रत्यक्ष और स्पष्ट रूप से समर्थित है।
इस सिद्धान्त की पुष्टि महाभारत में अनेक स्थानों पर मिलती है। प्रमाण सहित प्रस्तुत है:
१. शान्ति पर्व (नारायणीय उपाख्यान)
नारायणपरायणो न कुतश्चित् पराभवम्।
भावार्थ: जो नारायण-परायण है, वह कभी पराभव (पराजय/विनाश) को प्राप्त नहीं होता।
यह “न रिष्यति त्वावतः सखा” के समानार्थक है।
२. उद्योग पर्व--
यतो धर्मस्ततो जयः।
अर्थ: जहाँ धर्म है, वहीं विजय है।
जो धर्म (ईश्वर) के पक्ष में है, उसका नाश नहीं होता।
३. भीष्म पर्व-- (गीता प्रसंग का ही आधार)
मच्चित्ताः मद्गतप्राणाः…
(यहाँ भक्तों की ईश्वर में स्थित अवस्था का वर्णन है।)
४. वन पर्व-- (द्रौपदी प्रसंग)
द्रौपदी जब संकट में भगवान को पुकारती हैं, तब उनकी रक्षा होती है।
संदेश स्पष्ट है—ईश्वर-आश्रित का अन्ततः संरक्षण होता है।
५. शान्ति पर्व--
धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः।
अर्थ: धर्म का नाश करने वाला स्वयं नष्ट होता है;
धर्म की रक्षा करने वाला धर्म द्वारा संरक्षित होता है।
जो धर्म (ईश्वर-मार्ग) की रक्षा करता है, उसकी रक्षा स्वयं धर्म करता है।
निष्कर्ष--
महाभारत का स्पष्ट सिद्धान्त है—
धर्म और ईश्वर का आश्रित पराभव को प्राप्त नहीं होता।
शरणागत की रक्षा होती है।
धर्म की रक्षा करने वाला स्वयं सुरक्षित रहता है।
अतः ऋग्वेद का वचन —
“न रिष्यति त्वावतः सखा” (ऋग्वेद १/११/८) —
महाभारत द्वारा पूर्णतः समर्थित है।
इस सिद्धान्त की पुष्टि नीति-ग्रन्थों में भी स्पष्ट मिलती है। प्रमाण सहित प्रस्तुत है:
१. चाणक्य नीति--
धर्मेण हीनाः पशुभिः समानाः।
अर्थ: धर्म से रहित मनुष्य पशु के समान है।
जो धर्मयुक्त है, वही श्रेष्ठ और सुरक्षित है।
धर्मो रक्षति रक्षितः।
अर्थ: जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है।
धर्माश्रित का नाश नहीं होता।
२. नीतिशतक (भर्तृहरि)
निन्दन्तु नीतिनिपुणा यदि वा स्तुवन्तु
लक्ष्मीः समाविशतु गच्छतु वा यथेष्टम्।
अद्यैव वा मरणमस्तु युगान्तरे वा
न्याय्यात्पथः प्रविचलन्ति पदं न धीराः॥
अर्थ: नीति-ज्ञ लोग निन्दा करें या स्तुति; लक्ष्मी आए या जाए; मृत्यु आज हो या युगान्त में—
धीर पुरुष न्याय के मार्ग से विचलित नहीं होते।
जो धर्ममार्ग पर स्थित है, उसका अन्ततः कल्याण ही होता है।
३. विदुर नीति--
सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात्…
और एक प्रसिद्ध नीति-वाक्य:
धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः।
(यह भाव विदुर-नीति में भी प्रतिपादित है।)
अर्थ: धर्म का नाश करने वाला स्वयं नष्ट होता है;
धर्म की रक्षा करने वाला धर्म द्वारा सुरक्षित रहता है।
चाणक्य, भर्तृहरि और विदुर--इन सभी नीतियों का एक ही निष्कर्ष है—
धर्म ही वास्तविक रक्षक है।
धर्ममार्ग पर स्थित व्यक्ति अन्ततः सुरक्षित रहता है।
अधर्म ही विनाश का कारण है।
इसके समर्थन में अब अन्य आर्ष ग्रन्थों से प्रमाण प्रस्तुत हैं:
१. हितोपदेश--
धर्मेण जयते लोकः धर्मेण जयते परः।
धर्मो रक्षति रक्षितः।
अर्थ: धर्म से ही लोक में विजय मिलती है;
जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है।
२. पंचतंत्र--
न धर्मो विद्यते तत्र न सत्यं नापि सौहृदम्।
अर्थ--
जहाँ धर्म नहीं, वहाँ सत्य और मित्रता भी नहीं।)
स्पष्ट है—धर्म ही स्थायी संरक्षण का आधार है।
३. मनुस्मृति (८.१५)
धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः।
तस्माद्धर्मो न हन्तव्यो मा नो धर्मो हतोऽवधीत्॥
अर्थ: धर्म का नाश करने वाला स्वयं नष्ट होता है;
धर्म की रक्षा करने वाला धर्म द्वारा सुरक्षित रहता है।
४. याज्ञवल्क्य स्मृति--
धर्मादर्थः प्रभवति धर्मात् प्रभवते सुखम्।
अर्थ: धर्म से अर्थ और सुख की प्राप्ति होती है।
धर्माश्रित जीवन ही कल्याणकारी है।
५. योगवशिष्ठ--
चित्तमेव हि संसारः तेन त्यक्तं भवेद्भवः।
भावार्थ: जब चित्त ईश्वर में स्थित होता है, तब संसार-बन्धन समाप्त हो जाता है।
ईश्वराश्रित पुरुष विनाश और बन्धन से परे हो जाता है।
६. वाल्मीकि रामायण--
सकृदेव प्रपन्नाय तवास्मीति च याचते।
अभयं सर्वभूतेभ्यो ददाम्येतद् व्रतं मम॥
(युद्धकाण्ड)
अर्थ: जो एक बार भी मेरी शरण में आकर कहता है “मैं आपका हूँ”,
उसे मैं सब प्राणियों से अभय देता हूँ — यह मेरा व्रत है।
शरणागत की रक्षा निश्चित है।
समाहार निष्कर्ष
सभी आर्ष ग्रन्थों का एकमत सिद्धान्त है—
धर्म ही रक्षक है।
ईश्वर-शरणागत को अभय मिलता है।
भक्त या धर्माश्रित व्यक्ति का अन्ततः पराभव नहीं होता।
इस प्रकार ऋग्वेद का वचन —
“न रिष्यति त्वावतः सखा” (ऋग्वेद १/११/८) —
वेद, उपनिषद, गीता, पुराण, महाभारत तथा समस्त नीति-ग्रन्थों द्वारा पूर्णतः समर्थित सिद्ध होता है।
-----+-------+-------+-------+----

Read More

ऋगुवेद सूक्ति--२० की व्याख्या
"कृत्वा चेतिष्ठो विश्वार्म्भूत"" १/६५/५
भावार्थ --
पदच्छेद (संकेतात्मक)
कृत्वा । चेतिष्ठः । विश्वम् । अर्मभूत् (अर्म = स्नेह/हित)
भावार्थ--
प्रात: जागने वाला प्रबुद्ध होता है। उसे सब स्नेह करते हैं।
जो मनुष्य कर्म करके (कृत्वा), चेतन और सजग (चेतिष्ठः) रहता है, वह समस्त लोगों के लिए प्रिय, हितकारी और स्नेह का पात्र (विश्वार्मभूत) बन जाता है।
अर्थात् — जो प्रातःकाल जागकर कर्मशील और जागरूक रहता है, वह प्रबुद्ध होता है और सबका प्रिय बनता है।
विस्तृत व्याख्या--कृत्वा — केवल विचार नहीं, बल्कि कर्तव्य-कर्म का आचरण।
चेतिष्ठः — चेतन, जाग्रत, सजग और विवेकयुक्त।
विश्वार्मभूत — जो सबके लिए स्नेह, शांति और हित का कारण बने।
यह मंत्र बताता है कि केवल जागना ही नहीं, बल्कि सजगता कर्मशीलता ही व्यक्ति को लोकहितकारी और सर्वप्रिय बनाती है।
आपके प्रस्तुत भाव — “जो प्रातः जाग्रत, सजग और कर्मशील रहता है, वही प्रबुद्ध और सर्वप्रिय होता है” — इसके समर्थन में वेदों से स्पष्ट प्रमाण निम्न हैं:
१. ऋगुवेद --५/४४/१४
“यो जागार तमृचः कामयन्ते”
अर्थ — जो जाग्रत रहता है, ऋचाएँ (ज्ञानरूप वाणियाँ) उसी को चाहती हैं।
जागरण यहाँ आध्यात्मिक एवं बौद्धिक चेतना का प्रतीक है। जाग्रत व्यक्ति ही ज्ञान का अधिकारी बनता है।
२. ऋगुवेद --१/११३/१६ (उषा सूक्त)
“उदु त्यं जातवेदसं देवं वहन्ति केतवः…”
भावार्थ — उषा (प्रभात) सबको जगाती है, कर्म के लिए प्रेरित करती है।
वेद में प्रातःकाल को जागरण, कर्म और उन्नति का समय कहा गया है।
३. अथर्ववेद- ७/५२/१
“उत्तिष्ठत जाग्रत…” (समान भाव)
अर्थ — उठो, जागो और पुरुषार्थ करो।
आलस्य त्यागकर जागरूक कर्म ही उन्नति का साधन है।
४. यजुर्वेद --३४/१
“कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः”
अर्थ — कर्म करते हुए ही मनुष्य को सौ वर्ष जीने की इच्छा करनी चाहिए।
निष्क्रियता नहीं, बल्कि कर्मशीलता ही श्रेष्ठ जीवन का मार्ग है।
५. ऋगुवेद --४/३३/११
“न ऋते श्रान्तस्य सख्याय देवाः”
अर्थ — श्रम (पुरुषार्थ) किए बिना देवता भी मित्रता नहीं करते।
परिश्रम और जागरूकता से ही स्नेह और सहयोग प्राप्त होता है।
निष्कर्ष--
अतः “कृत्वा चेतिष्ठो…” मंत्र का भाव वेदों में सर्वत्र प्रतिपादित है कि सजग और कर्मशील मनुष्य ही सर्वप्रिय एवं प्रबुद्ध होता है।
उपनिषदों से प्रमाण -
१. कठ उपनिषद-- १/३/१४
“उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत”
अर्थ — उठो, जागो और श्रेष्ठ ज्ञानी पुरुषों से ज्ञान प्राप्त करो।
यहाँ स्पष्ट आदेश है कि आध्यात्मिक प्रबुद्धता के लिए जागरण और सक्रिय प्रयास आवश्यक है।
२.मुण्डक उपनिषद --३/२/४
“नायमात्मा बलहीनेन लभ्यः”
अर्थ — यह आत्मा निर्बल (आलसी/अकर्मण्य) को प्राप्त नहीं होता।
आत्मज्ञान के लिए पुरुषार्थ, जागरूकता और साधना अनिवार्य है।
३. ईश उपनिषद --२
“कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः”
अर्थ — कर्म करते हुए ही सौ वर्ष जीने की इच्छा करनी चाहिए।
निष्क्रियता नहीं, बल्कि कर्मशील जीवन ही आदर्श है।
४. बृहदारण्यक उपनिषद-४/४/५
“स यथा कर्मा तथा भवति”
अर्थ — मनुष्य जैसा कर्म करता है, वैसा ही बन जाता है।
जाग्रत और शुभ कर्म करने वाला ही श्रेष्ठ एवं प्रिय बनता है।
५. छान्दोग्य उपनिषद्-- ७/२६/२
“आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः”
अर्थ — आत्मा को देखना, सुनना, मनन और ध्यान करना चाहिए।
यह निरंतर जागरूक साधना का निर्देश है।
निष्कर्ष--
उपनिषदों में स्पष्ट शिक्षा है कि —
जागरण (जाग्रति) = आध्यात्मिक प्रगति का प्रथम चरण
पुरुषार्थ और कर्म = आत्मोन्नति का साधन
सजग साधक = प्रबुद्ध और लोकहितकारी
अतः “कृत्वा चेतिष्ठो…” मंत्र का भाव उपनिषदों में भी पूर्णतः प्रतिपादित है।
इस आशय के समर्थन में भगवद्गीता से प्रमाण निम्न हैं:
१. अध्याय २, श्लोक ६९
“या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी ।
यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः ॥”
अर्थ — जो सब प्राणियों के लिए रात्रि है, उसमें संयमी पुरुष जागता है; और जिसमें सब जागते हैं, वह तत्वदर्शी के लिए रात्रि के समान है।
यहाँ “जागरण” का अर्थ आध्यात्मिक सजगता है। प्रबुद्ध पुरुष सामान्य जन से भिन्न चेतना में जाग्रत रहता है।
२. अध्याय ३, श्लोक १९
“तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर ।
असक्तो ह्याचरन्कर्म परमाप्नोति पुरुषः ॥”
अर्थ — इसलिए आसक्ति रहित होकर अपना कर्तव्य कर्म करते रहो; ऐसा करने से मनुष्य परम पद को प्राप्त करता है।
कर्मशीलता ही उन्नति का मार्ग है।
३. अध्याय ३, श्लोक २१
“यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः”
अर्थ — श्रेष्ठ पुरुष जैसा आचरण करता है, अन्य लोग वैसा ही अनुसरण करते हैं।
सजग और आदर्श पुरुष ही समाज का प्रिय और मार्गदर्शक बनता है।
४. अध्याय ६, श्लोक ५
“उद्धरेदात्मनाऽत्मानं नात्मानमवसादयेत्”
अर्थ — मनुष्य को स्वयं अपने द्वारा अपना उत्थान करना चाहिए, स्वयं को गिराना नहीं चाहिए।
यह आत्मजागरण और पुरुषार्थ का उपदेश है।
५. अध्याय १२, श्लोक १५
“यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः…”
अर्थ — जिससे लोक उद्विग्न नहीं होता और जो लोक से उद्विग्न नहीं होता, वही मेरा प्रिय भक्त है।
सजग, संयमी और कर्तव्यपरायण व्यक्ति ही सर्वप्रिय होता है।
निष्कर्ष--
गीता में स्पष्ट शिक्षा है कि —
आध्यात्मिक जागरण = संयम और विवेक
निरंतर कर्म = परम उन्नति का साधन
आदर्श आचरण = लोकस्नेह और सम्मान
अतः “कृत्वा चेतिष्ठो…” मंत्र का भाव गीता में पूर्णतः समर्थित है कि सजग, कर्मशील और संयमी पुरुष ही प्रबुद्ध तथा सर्वप्रिय होता है।
इस आशय के समर्थन में महाभारत से प्रमाण निम्न हैं:
१. उद्योगपर्व (विदुरनीति)--
“उद्योगं पुरुषसिंहमुपैति लक्ष्मीः”
अर्थ — लक्ष्मी (समृद्धि/सफलता) पुरुषार्थी सिंह के पास जाती है।
जो जाग्रत और कर्मशील है, वही उन्नति और सम्मान पाता है।
२. शान्तिपर्व--
“न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः”
अर्थ — सोए हुए सिंह के मुख में मृग स्वयं प्रवेश नहीं करते।
केवल शक्ति नहीं, बल्कि जागरूक प्रयास आवश्यक है।
३. वनपर्व--
“न दैवमिति संचिन्त्य त्यजेदुत्थानमात्मनः”
अर्थ — ‘केवल दैव ही सब कुछ है’ ऐसा सोचकर मनुष्य को अपने पुरुषार्थ का त्याग नहीं करना चाहिए।
जागरण और प्रयास ही सफलता का साधन है।
४. शान्तिपर्व--
“उत्थानं हि मनुष्याणां कारणं सर्वसंपदाम्”
अर्थ — मनुष्यों की समस्त सिद्धियों और संपत्तियों का कारण उत्थान (सक्रिय प्रयास) है।
आलस्य नहीं, बल्कि सतत जागरूक कर्म ही उन्नति देता है।
५. उद्योगपर्व (विदुरनीति)
“उद्यमेन हि सिद्ध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः”
अर्थ — कार्य उद्यम (परिश्रम) से सिद्ध होते हैं, केवल कल्पना से नहीं।
सजग कर्मशील व्यक्ति ही समाज में प्रिय और सफल होता है।
निष्कर्ष--
अतः “कृत्वा चेतिष्ठो…” मंत्र का भाव महाभारत में पूर्णतः समर्थित है कि जाग्रत, कर्मशील और उद्यमी मनुष्य ही प्रबुद्ध एवं सर्वप्रिय बनता है।
इस आशय के समर्थन में नीति-ग्रंथों से प्रमाण निम्न हैं:
१. चाणक्य नीति --
(१)
“उद्यमेन हि सिद्ध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः।
न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः॥”
अर्थ — कार्य उद्यम से सिद्ध होते हैं, केवल इच्छा से नहीं; सोए हुए सिंह के मुख में मृग स्वयं प्रवेश नहीं करते।
जागरण और परिश्रम ही सफलता का कारण है।
(२)
“आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः।”
अर्थ — आलस्य मनुष्य के शरीर में स्थित महान शत्रु है।
सजगता और कर्म ही जीवन का उत्थान करते हैं।
२. नीति शतक-- (भर्तृहरि)
(१)
“उद्योगिनं पुरुषसिंहमुपैति लक्ष्मीः।”
अर्थ — लक्ष्मी (सफलता) पुरुषार्थी सिंह के पास जाती है।
पुरुषार्थी व्यक्ति ही आदरणीय बनता है।
(२)
“न हि कश्चित् क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्।” (भावानुसार नीति-साहित्य में प्रयुक्त)
अर्थ — कोई भी क्षणभर भी निष्क्रिय नहीं रह सकता; कर्म करना ही मनुष्य का धर्म है।
३. हितोपदेश --
“उद्यमेन हि सिद्ध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः।”
अर्थ — केवल कल्पना से नहीं, बल्कि प्रयास से कार्य सिद्ध होते हैं।
एक अन्य नीति-वचन:
“जाग्रतः फलमुत्तमम्।”
अर्थ — जाग्रत और सावधान व्यक्ति को उत्तम फल मिलता है।
निष्कर्ष--
नीति-ग्रंथों का सार स्पष्ट है —
अतः “कृत्वा चेतिष्ठो…” मंत्र का भाव इन आर्ष नीति-ग्रंथों में पूर्णतः समर्थित है कि जाग्रत, पुरुषार्थी और कर्मशील मनुष्य ही प्रबुद्ध तथा सर्वप्रिय होता है।
इस आशय के समर्थन मनुस्मृति तथा अन्य स्मृति-ग्रंथों से प्रमाण निम्न हैं:
१. मनुस्मृति ४/९२
“नात्मानमवमन्येत पूर्वाभिरसमृद्धिभिः।
आ मृत्योः श्रियमन्विच्छेन्नैनां मन्येत दुर्लभाम्॥”
अर्थ — पूर्व असफलताओं से निराश न हो; मृत्यु पर्यन्त उन्नति का प्रयास करता रहे।
निरंतर पुरुषार्थ और जागरूकता का उपदेश।
२. मनुस्मृति २/२३२
“आचाराल्लभते ह्यायुराचाराद् धनमक्षयम्।
आचारात् प्रियमाप्नोति…”
अर्थ — सदाचार से आयु, अक्षय धन और लोक-प्रियता प्राप्त होती है।
सजग आचरण ही स्नेह और सम्मान का कारण है।
३. याग्यवल्क्य स्मृति १/३४
“उद्योगं सततं कुर्यात्…”
अर्थ — मनुष्य को निरंतर उद्योग (परिश्रम) में प्रवृत्त रहना चाहिए।
स्मृतियों में भी पुरुषार्थ को ही सफलता का मूल बताया गया है।
४. नारद स्मृति -(भावानुसार)
“उद्यमो हि मनुष्याणां कारणं सर्वसंपदाम्।”
अर्थ — मनुष्यों की सभी संपत्तियों और सिद्धियों का कारण उद्यम (प्रयत्न) है।
५. पराशर स्मृति --
“आलस्यं सर्वनाशनम्।”
अर्थ — आलस्य सर्वनाश का कारण है।
निष्कर्ष
स्मृति-ग्रंथों का सार यही है —
आलस्य त्याज्य है।
निरंतर उद्योग और सदाचार आवश्यक है।
सजग पुरुषार्थी व्यक्ति ही लोक-प्रिय और उन्नत बनता है।
अतः “कृत्वा चेतिष्ठो…” मंत्र का भाव स्मृतियों में भी पूर्णतः प्रतिपादित है कि जाग्रत, कर्तव्यनिष्ठ और उद्यमी मनुष्य ही प्रबुद्ध एवं सर्वप्रिय होता है।
------+-------+-------+--------+--

Read More

कहाँ कहाँ ठोकर मिली, कहाँ हुआ अपमान। अपने लालों के लिए, खोया अपना मान।।
दोहा --४२१
(नैश के दोहे से उद्धृत)
-----गणेश तिवारी 'नैश'

Read More