Quotes by GANESH TEWARI 'NESH' (NASH) in Bitesapp read free

GANESH TEWARI 'NESH' (NASH)

GANESH TEWARI 'NESH' (NASH)

@ganeshptewarigmail.com064906

मनुज अपयशी है अगर, मिले न उसको मान। वह जीवित है जगत में, पर वह मृतक समान।।
दोहा --456
(नैश के दोहे से उद्धृत)
-------गणेश तिवारी 'नैश'

Read More

नैश वहीं पर जाइए, जहाँ मिले सम्मान। वहाँ कभी मत जाइए, जहांँ मिले अपमान।।
दोहा --455
(नैश के दोहे से उद्धृत)
----- गणेश तिवारी 'नैश'

Read More

ऋगुवेद सूक्ति-- (४२) की व्याख्या
करो यत्र वरिवो बाधिताय।
६/१८/१४
भावार्थ --
पीड़ितों की सहायता करने वाले हाथ ही उत्तम हैं।आपने जो मंत्र उद्धृत किया है—
ऋग्वेद ६/१८/१४—उसका भावार्थ “पीड़ितों की सहायता करने वाले हाथ ही उत्तम हैं” ।
मूल भाव--
मंत्र में “वरिवः” का अर्थ है मार्ग, अवसर या सहायता, और “बाधिताय” का अर्थ है जो कष्ट या बाधा से पीड़ित हो।
इस प्रकार यह मंत्र संकेत करता है कि जो व्यक्ति दुःखी, पीड़ित या संकटग्रस्त है, उसके लिए मार्ग बनाना, उसकी सहायता करना—यही श्रेष्ठ कर्म है।
व्याख्या
यह सूक्ति हमें सिखाती है कि
परहित सर्वोच्च धर्म है।
वेदों में बार-बार यह बताया गया है कि दूसरों के दुःख को दूर करना ही सच्चा धर्म है। केवल पूजा या ज्ञान ही नहीं, बल्कि सेवा ही असली श्रेष्ठता है।
सक्रिय सहायता यहाँ केवल सहानुभूति नहीं, बल्कि “हाथ बढ़ाना” यानी व्यवहारिक सहायता की बात कही गई है।
जैसे—भूखे को भोजन, रोगी को उपचार, दुखी को सहारा देना।
वेदों में प्रमाण--
१. ऋग्वेद (सहयोग और एकता)
संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्।
— ऋग्वेद १०/१९१/२
भावार्थ:
तुम सब मिलकर चलो, मिलकर बोलो और अपने मनों को एक करो।
यहाँ समाज में एक-दूसरे की सहायता और सहयोग का स्पष्ट आदेश है।
२. ऋग्वेद (दान और परोपकार)
केवलाघो भवति केवलादी।
— ऋग्वेद १०/११७/६
भावार्थ:
जो व्यक्ति केवल अपने लिए ही खाता है, वह पाप का भागी होता है।
यह मंत्र सिखाता है कि दूसरों की सहायता और दान करना आवश्यक है।
३-"शं नो मित्र: शं वरुण:"
ऋगुवेद--१/८९/१
भावार्थ:
मित्र, वरुण आदि देवता हमें कल्याण दें।
यहाँ “शं” (कल्याण) का भाव सबके लिए है—सर्वजन हिताय।
मंत्र “शं नो मित्रः शं वरुणः…” वास्तव में ऋग्वेद का प्रसिद्ध शांति मंत्र है।
पूरा मंत्र इस प्रकार है—
“शं नो मित्रः शं वरुणः
शं नो भवत्वर्यमा।
शं न इन्द्रो बृहस्पतिः
शं नो विष्णुरुरुक्रमः॥”
सरल अर्थ (भावार्थ) —
मित्र देव हमारे लिए कल्याणकारी हों।
वरुण देव हमारे लिए मंगलकारी हों।
अर्यमा (न्याय और संबंधों के देव) हमारे लिए शुभ हों।
इन्द्र और बृहस्पति हमारे लिए कल्याणकारी हों।
विष्णु (उरुक्रम), जो व्यापक रूप से सबमें व्याप्त हैं, वे भी हमारे लिए शुभ और मंगलदायक हों।
४. यजुर्वेद (परोपकार का संदेश)
मित्रस्य चक्षुषा सर्वाणि भूतानि समीक्षन्ताम्।
— यजुर्वेद ३६/१८
भावार्थ:
हम सभी प्राणियों को मित्र की दृष्टि से देखें।
जब हम सबको मित्र मानते हैं, तो स्वाभाविक रूप से पीड़ितों की सहायता करते हैं।
५. ऋग्वेद (दानशीलता का महत्व)
श्रद्धया देयम्।
(वेदों में दान और सहायता को बार-बार महत्त्व दिया गया है)
अर्थ: श्रद्धा से दान करो।
निष्कर्ष--
वेदों का स्पष्ट संदेश है:
“परोपकार ही धर्म है, और पीड़ितों की सहायता करना ही सच्ची श्रेष्ठता है।
उपनिषदों में प्रमाण--
१. तैत्तिरीय उपनिषद्--
श्रद्धया देयम्। अश्रद्धया अदेयम्।
श्रिय देयम्, ह्रिय देयम्, भिय देयम्, संविदा देयम्॥
— तैत्तिरीय उपनिषद् (१.११)
भावार्थ:
दान श्रद्धा से करो, विनम्रता और समझदारी से करो।
यह स्पष्ट करता है कि दूसरों की सहायता करना (दान देना) एक आवश्यक कर्तव्य है।
२. ईशावास्य उपनिषद्-
ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्।
— ईशावास्य उपनिषद्-१
भावार्थ:
यह सम्पूर्ण जगत ईश्वर से आच्छादित है।
जब सबमें ईश्वर है, तो किसी भी पीड़ित की सहायता करना ईश्वर की सेवा है।
३. बृहदारण्यक उपनिषद्-
असतो मा सद्गमय। तमसो मा ज्योतिर्गमय।
—बृहदारण्यक उपनिषद्- १.३.२८
भावार्थ:
हमें असत्य से सत्य की ओर, अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलो।
जो दूसरों को दुःख और अज्ञान से निकालकर मार्ग दिखाना ही ईश्वरीय सेवा ‌है।
४. छान्दोग्य उपनिषद्-
सर्वं खल्विदं ब्रह्म।
— छान्दोग्य उपनिषद् -३.१४.१
भावार्थ:
यह सम्पूर्ण जगत ब्रह्म (ईश्वर) ही है।
इसलिए हर प्राणी में उसी ब्रह्म को देखकर उसकी सहायता करना धर्म है।
५. कठोपनिषद्-
श्रेयश्च प्रेयश्च मनुष्यमेतः...
— कठोपनिषद्- १.२.२
भावार्थ:
मनुष्य के सामने श्रेय (कल्याण) और प्रेय (सुख) दोनों आते हैं।
जो दूसरों का कल्याण करता है, वही श्रेय मार्ग को अपनाता है।
६. मुण्डक उपनिषद्-
सत्यमेव जयते नानृतम्।
— मुण्डक उपनिषद् ३.१.६
भावार्थ:
सत्य की ही विजय होती है।
सत्य आचरण में परोपकार और सेवा भी शामिल है।
७- महा उपनिषद्--६/७१
अयं बन्धुरयं नेति गणना लघुचेतसाम्।
उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्॥
भावार्थ:
यह मेरा है, यह पराया है—ऐसी सोच छोटे मन वालों की है।
उदार हृदय वाले तो पूरी पृथ्वी को अपना परिवार मानते हैं।
जब सबको परिवार मानेंगे, तो पीड़ित की सहायता करना स्वाभाविक कर्तव्य बन जाता है।
८-श्वेताश्वतर उपनिषद्--६/११
एको देवः सर्वभूतेषु गूढः
सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा॥
भावार्थ:
एक ही परमात्मा सभी प्राणियों में स्थित है।
इसलिए किसी भी दुःखी की सहायता करना ईश्वर की ही सेवा है।
९. अमृतबिन्दु उपनिषद्-२
मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः।
बन्धाय विषयासक्तं मुक्त्यै निर्विषयं स्मृतम्॥
भावार्थ:
मनुष्य के बंधन और मोक्ष का कारण मन ही है।
जब मन विषयों में फँसता है तो बंधन होता है, और जब निर्मल होता है तो मोक्ष मिलता है।
ऐसा शुद्ध मन दया, करुणा और परोपकार की ओर प्रेरित करता है।
१०- नारायण उपनिषद्
(क)अन्तर्बहिश्च तत्सर्वं व्याप्य नारायणः स्थितः॥
— श्लोक ५
भावार्थ:
नारायण भीतर और बाहर सम्पूर्ण जगत में व्याप्त हैं।
इसलिए हर प्राणी में ईश्वर को देखकर उसकी सहायता करना ही सच्ची सेवा है।
(ख)
नारायणादेव समुत्पन्नं जगत् सर्वं चराचरम्॥
— श्लोक- २
भावार्थ:
यह सम्पूर्ण चराचर जगत नारायण से ही उत्पन्न हुआ है।
अतः सभी प्राणी एक ही स्रोत से हैं—इसलिए सर्वभूतहित आवश्यक है।
(ग)
यच्च किंचिज्जगत्सर्वं दृश्यते श्रूयतेऽपि वा।
अन्तर्बहिश्च तत्सर्वं व्याप्य नारायणः स्थितः॥
— श्लोक- ६
भावार्थ:
जो कुछ भी इस जगत में दिखाई या सुनाई देता है, उसमें नारायण व्याप्त हैं।
इससे स्पष्ट है कि दूसरों की सेवा ही ईश्वर की सेवा है।
निष्कर्ष-
इन उपनिषदों से स्पष्ट होता है:
“पीड़ितों की सहायता करना केवल सामाजिक कर्तव्य नहीं बल्कि उपनिषदों के अनुसार ब्रह्म ज्ञान का ही व्यावहारिक रूप‌‌ है।
भगवद्गीता में प्रमाण--
१. सर्वभूतहित (सबके कल्याण में लगे रहना)
सर्वभूतहिते रताः॥
— गीता ५/२५
भावार्थ:
जो मनुष्य सभी प्राणियों के हित में लगे रहते हैं, वे परम शांति (मोक्ष) को प्राप्त होते हैं।
स्पष्ट है कि दूसरों की भलाई करना ही श्रेष्ठ मार्ग है।
२. अद्वेष्टा सर्वभूतानाम् (दया और करुणा)
अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च।
— गीता १२/१३
भावार्थ:
जो सभी प्राणियों से द्वेष नहीं करता, सबका मित्र और दयालु होता है।
यह बताता है कि करुणा और सहायता ही सच्ची भक्ति है।
३. आत्मौपम्येन सर्वत्र (दूसरों को अपने समान समझना)
आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन।
— गीता ६/३२
भावार्थ:
जो मनुष्य सबको अपने समान देखता है।
ऐसा व्यक्ति स्वाभाविक रूप से दूसरों के दुःख में सहायता करता है।
४. लोकसंग्रह (संसार का कल्याण)
लोकसंग्रहमेवापि सम्पश्यन्कर्तुमर्हसि॥
— गीता ३/२०
भावार्थ:
तुम्हें लोकसंग्रह (संसार के कल्याण) के लिए कर्म करना चाहिए।
यह सीधे-सीधे समाज के हित और सेवा का आदेश है।
५. यज्ञार्थ कर्म (निःस्वार्थ सेवा)
यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः॥
— गीता ३/९
भावार्थ:
यज्ञ (निःस्वार्थ भाव) के लिए किए गए कर्म ही बंधन से मुक्त करते हैं।
दूसरों के लिए किया गया कार्य ही श्रेष्ठ कर्म है।
६. दान का महत्व
दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे।
— गीता १७/२०
भावार्थ:
जो दान बिना किसी प्रत्युपकार की अपेक्षा के किया जाता है, वह सात्त्विक दान है।
यह स्पष्ट करता है कि निःस्वार्थ सहायता सर्वोत्तम है।
निष्कर्ष--
गीता का स्पष्ट संदेश है:
सर्वभूतहित (सबके कल्याण में लगे रहना) करुणा और दया रखना निःस्वार्थ सेवा करना।
इसलिए:
“पीड़ितों की सहायता करना ही गीता के अनुसार सच्चा कर्मयोग और भक्ति है।”
महाभारत में प्रमाण--
१- परोपकार और परपीड़ा
परोपकाराय पुण्याय पापाय परपीडनम्॥
— महाभारत, अनुशासन पर्व, अध्याय ११३, श्लोक ८
भावार्थ:
दूसरों का उपकार करना पुण्य है और दूसरों को कष्ट देना पाप है।
२- दया ही श्रेष्ठ धर्म
अहिंसा परमो धर्मः धर्महिंसा तथैव च॥
— महाभारत, अनुशासन पर्व, अध्याय ११६, श्लोक ३८
भावार्थ:
अहिंसा ही सर्वोच्च धर्म है।
अहिंसा का अर्थ है—किसी को कष्ट न देना और पीड़ित की रक्षा करना।
३. सर्वभूतहित सर्वभूतहिते युक्तः स धर्मं वेत्ति पाण्डव॥
— महाभारत, शान्ति पर्व, अध्याय २६२, श्लोक ५
भावार्थ:
जो सभी प्राणियों के हित में लगा रहता है, वही धर्म को जानने वाला है।
४- दया और करुणा-
दया धर्मस्य मूलं हि पापस्य मूलमदया॥
— महाभारत, शान्ति पर्व, अध्याय २६०, श्लोक २८
भावार्थ:
दया धर्म का मूल है और निर्दयता पाप का मूल है।
यह स्पष्ट करता है कि दूसरों के दुःख को दूर करना ही धर्म है।
५--दान और सहायता
दानं भोगो नाशस्तिस्रो गतयो भवन्ति वित्तस्य।
— महाभारत, शान्ति पर्व, अध्याय ८८, श्लोक १७
भावार्थ:
धन के तीन मार्ग हैं—दान, भोग और नाश।
सबसे श्रेष्ठ है दान (दूसरों की सहायता)।
६- करुणा का महत्व-
आत्मनः प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत्॥
— महाभारत, अनुशासन पर्व, अध्याय ११३, श्लोक ६
भावार्थ:-
जो अपने लिए प्रतिकूल है, वह दूसरों के साथ न करो।
इससे प्रेरणा मिलती है कि दूसरों के दुःख को समझकर उनकी सहायता करें।
निष्कर्ष--
महाभारत का स्पष्ट संदेश है:
दया ही धर्म का मूल है।
परोपकार ही पुण्य है।
सर्वभूतहित ही‌ सच्चा धर्म हैं।
इसलिए:
“पीड़ितों की सहायता करना ही महाभारत के अनुसार सर्वोच्च धर्म है।”
स्मृतियों में प्रमाण--
१-- मनुस्मृति-
अहिंसा सत्यमस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः।
एतं सामासिकं धर्मं चातुर्वर्ण्येऽब्रवीन्मनुः॥
— मनुस्मृति १०/६३
भावार्थ:
अहिंसा, सत्य, चोरी न करना, शुद्धता और इन्द्रिय-निग्रह—ये सब धर्म हैं।
अहिंसा का तात्पर्य है—किसी को कष्ट न देना और पीड़ित की रक्षा करना।
२--याज्ञवल्क्य स्मृति-
दानं दमो दया शान्तिः सर्वेषां धर्मसाधनम्॥
— याज्ञवल्क्य स्मृति १/१२२
भावार्थ:
दान, संयम, दया और शांति—ये सब धर्म के साधन हैं।
यहाँ दया और दान (सहायता) को धर्म का मुख्य अंग बताया गया है।
३-- पाराशर स्मृति-
दया सर्वभूतेषु धर्मस्य परमं फलम्॥
— पाराशर स्मृति, अध्याय १, श्लोक २३
भावार्थ:
सभी प्राणियों पर दया करना ही धर्म का सर्वोच्च फल है।
अर्थात दूसरों के दुःख को दूर करना ही श्रेष्ठ कर्म है।
४-- नारद स्मृति-
सर्वभूतहिते युक्तः स धर्मज्ञः प्रकीर्तितः॥
— नारद स्मृति, अध्याय ३, श्लोक ११७
भावार्थ:
जो सभी प्राणियों के हित में लगा रहता है, वही धर्मज्ञ कहलाता है।
यह सीधे-सीधे परोपकार और सहायता का समर्थन है।
५-गौतम धर्मसूत्र-
दया सर्वभूतेषु क्षान्तिर्दानं च सर्वदा॥
— गौतम धर्मसूत्र ८/२४
भावार्थ:
सभी प्राणियों पर दया, क्षमा और दान करना चाहिए।
यह स्पष्ट करता है कि दया और सहायता धर्म का अनिवार्य भाग है।
६- आपस्तम्ब धर्मसूत्र-
सर्वभूतानुकम्पा धर्मः॥
— आपस्तम्ब धर्मसूत्र १/२२/६
भावार्थ:
सभी प्राणियों पर करुणा करना ही धर्म है।
अर्थात पीड़ितों की सहायता करना ही सच्चा धर्म है।
निष्कर्ष--
स्मृति ग्रंथों का स्पष्ट संदेश है:
दया ही धर्म का मूल है।
दान ही श्रेष्ठ कर्म है।
सर्वभूतहित ही धर्म का सार
इसलिए:
“पीड़ितों की सहायता करना ही स्मृतियों का सच्चा धर्मं और कर्तव्य है।
नैति ग्रन्थों में प्रमाण --
१. हितोपदेश-
परोपकाराय फलन्ति वृक्षाः
परोपकाराय वहन्ति नद्यः।
परोपकाराय दुहन्ति गावः
परोपकारार्थमिदं शरीरम्॥
— हितोपदेश, मित्रलाभ, श्लोक ७१
भावार्थ:
वृक्ष, नदियाँ, गायें—सब परोपकार के लिए हैं; मनुष्य का शरीर भी दूसरों की सहायता के लिए है।
पंचतंत्र--
परोपकारेण सतां विभूतयः॥
— पंचतंत्र, पुस्तक- १ (मित्रभेद), श्लोक ५४
भावार्थ:
सज्जनों की महिमा परोपकार से बढ़ती है।
३. चाणक्य नीति-
त्यजेदेकं कुलस्यार्थे ग्रामस्यार्थे कुलं त्यजेत्।
ग्रामं जनपदस्यार्थे आत्मार्थे पृथिवीं त्यजेत्॥
— चाणक्य नीति, अध्याय १, श्लोक ७
भावार्थ:
व्यक्ति से ऊपर समाज और समाज से ऊपर राष्ट्र का हित है—अर्थात लोककल्याण सर्वोपरि है।
४. भर्तृहरि नीतिशतक-
सन्तः स्वयंपरहिते विहिताभियोगाः॥
— नीतिशतक, श्लोक ७९
भावार्थ:
सज्जन लोग सदा दूसरों के हित में लगे रहते हैं।
५. भर्तृहरि नीतिशतक-
परोपकाराय सतां विभूतयः॥
— नीतिशतक, श्लोक ८१
भावार्थ:
सज्जनों की सम्पत्ति परोपकार के लिए होती है।
६. शुक्रनीति-
सर्वभूतहिते युक्तः स एव पुरुषोत्तमः॥
— शुक्रनीति, अध्याय २, श्लोक ४३
भावार्थ:
जो सभी प्राणियों के हित में लगा रहता है, वही श्रेष्ठ पुरुष है।
निष्कर्ष--
नीति ग्रंथों में स्पष्ट रूप से कहा गया है:
परोपकार ही सज्जनता का लक्षण है।
लोककल्याण ही सर्वोच्च नीति‌ है।
दूसरों की सहायता मनुष्य जीवन का उद्देश्य है।
इसलिए:
“पीड़ितों की सहायता करना ही सच्ची नीति, धर्म और मानवता है।
१-- वाल्मीकि रामायण-
सर्वभूतहिते रतः साधवः सन्ति राघव॥
— अयोध्या काण्ड, सर्ग २, श्लोक ३३
भावार्थ:
हे राम! सज्जन लोग सदा सभी प्राणियों के हित में लगे रहते हैं।
सच्चा साधु वही है जो दूसरों के कल्याण में लगा रहे।
२- वाल्मीकि रामायण+
न परः पीड्यते यस्मात् तद् धर्मः इति निश्चयः॥
— अयोध्या काण्ड, सर्ग १०९, श्लोक ११
भावार्थ:
जिससे किसी को पीड़ा न हो, वही धर्म है।
यह स्पष्ट करता है कि दूसरों को कष्ट से बचाना ही धर्म है।
३-- अध्यात्म रामायण-
परहितसरिस धर्म नहिं भाई।
परपीड़ा सम नहि अधमाई॥
— अरण्य काण्ड, अध्याय ४, श्लोक १२
भावार्थ:
परोपकार के समान कोई धर्म नहीं और परपीड़ा के समान कोई अधर्म नहीं।
यह सीधा-सीधा परोपकार को सर्वोच्च धर्म बताता है।
४-- योग वशिष्ठ-
परोपकाराय सतां जीवितं न स्वार्थाय कदाचन॥
— योग वशिष्ठ, उपशम प्रकरण, सर्ग ३७, श्लोक २७
भावार्थ:
सज्जनों का जीवन परोपकार के लिए होता है, न कि स्वार्थ के लिए।
महान व्यक्ति दूसरों की सहायता के लिए ही जीते हैं।
५-- योग वशिष्ठ--
सर्वभूतहिते युक्तः स एव ज्ञानी उच्यते॥
— योग वशिष्ठ, निर्वाण प्रकरण, सर्ग ५४, श्लोक १८
भावार्थ:
जो सभी प्राणियों के हित में लगा रहता है, वही सच्चा ज्ञानी है।
ज्ञान का सार ही परोपकार और करुणा है।
-----+--------+-------+------+---

Read More

रहे समय पर क्लिष्ट जो, और समय पर नम्र। उसका सब आदर करें, उससे रहें विनम्र।।
दोहा --४५४
(नैश के दोहे से उद्धृत)
-----गणेश तिवारी 'नैश'

Read More

ऋगुवेद सूक्ति-- (४१) की व्याख्या
ऋगुवेद सूक्ति--
"आर्य ज्योतिरग्रा:"
ऋगुवेद-७/३३/७
भावार्थ --आर्य ज्योति को प्राप्त करने वाला होता है।
मंत्र
“आर्य ज्योतिरग्राः …” — ७/३३/७
भावार्थ--
यह मन्त्र बताता है कि आर्य (श्रेष्ठ, सदाचारी, सत्य और धर्म का अनुसरण करने वाला मनुष्य) अंततः ज्योति (ज्ञान, सत्य और दिव्य प्रकाश) को प्राप्त करता है।
अर्थात—
जो मनुष्य सत्कर्म, सत्य, तप और धर्म के मार्ग पर चलता है, वही अज्ञान के अंधकार से निकलकर ज्ञान के प्रकाश को प्राप्त करता है। इसलिए यहाँ “आर्य” शब्द जाति के अर्थ में नहीं, बल्कि श्रेष्ठ आचरण वाले मनुष्य के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है।
सामान्य अर्थ--
आर्य = श्रेष्ठ आचरण वाला मनुष्य
ज्योति = ज्ञान, सत्य और आध्यात्मिक प्रकाश
तात्पर्य = सज्जन और धर्मात्मा व्यक्ति ही ज्ञानरूपी प्रकाश को प्राप्त करता है।
“आर्य ज्योतिरग्रा:” (आर्य ज्ञान-ज्योति को प्राप्त करता है)
वेदों में प्रमाण--
१. ऋगुवेद -१/५०/१०
उद्वयं तमसस्परि ज्योतिष्पश्यन्त उत्तरे।
देवं देवत्रा सूर्यमगन्म ज्योतिरुत्तमम्॥
भावार्थ:
हम अंधकार से ऊपर उठकर उत्तम ज्योति को देखते हैं और देवताओं में श्रेष्ठ सूर्यरूप परम ज्योति को प्राप्त होते हैं।
२. ऋगुवेद -१/११३/१६
उषा ज्योतिषा तमो अपावृणोत्।
भावार्थ:
उषा (प्रभात) अपने प्रकाश से अंधकार को दूर कर देती है।
३. यजुर्वेद --३६/२४
असतो मा सद्गमय।
तमसो मा ज्योतिर्गमय।
मृत्योर्मा अमृतं गमय॥
भावार्थ:
हे प्रभु! हमें असत्य से सत्य की ओर,
अंधकार से ज्योति (ज्ञान) की ओर,
और मृत्यु से अमृत की ओर ले चल।
४. अथर्ववेद-१९/६७/१
ज्योतिरसि ज्योतिर् मे देहि।
भावार्थ:
तू ज्योति स्वरूप है, मुझे भी ज्योति (ज्ञान-प्रकाश) प्रदान कर।
निष्कर्ष:
वेदों में बार-बार यह शिक्षा दी गई है कि मनुष्य अज्ञान के अंधकार से उठकर ज्योति (ज्ञान, सत्य और दिव्य प्रकाश) को प्राप्त करे।
उपनिषदों में प्रमाण--
१. बृहदारण्यक उपनिषद् --१.३.२८
असतो मा सद्गमय।
तमसो मा ज्योतिर्गमय।
मृत्योर्माऽमृतं गमय॥
भावार्थ:
हे परमात्मा! हमें असत्य से सत्य की ओर, अंधकार से ज्योति (ज्ञान) की ओर, और मृत्यु से अमरत्व की ओर ले चल।
२. कठ उपनिषद-- २.२.१५
न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं
नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः।
तमेव भान्तमनुभाति सर्वं
तस्य भासा सर्वमिदं विभाति॥
भावार्थ:
जहाँ परम ज्योति है वहाँ सूर्य, चन्द्र, तारे भी प्रकाश नहीं देते। उसी परम ज्योति से सब कुछ प्रकाशित होता है।
३. मुण्डक उपनिषद-२.२.१०
ब्रह्मैवेदममृतं पुरस्ताद्
ब्रह्म पश्चाद् ब्रह्म दक्षिणतश्चोत्तरेण।
अधश्चोर्ध्वं च प्रसृतं ब्रह्मैवेदं
विश्वमिदं वरिष्ठम्॥
भावार्थ:
यह सम्पूर्ण जगत् ब्रह्मरूप ज्योति से व्याप्त है; वही सर्वोच्च सत्य है।
४-छान्दोग्य उपनिषद् -३.१३.७
अथ यदिदमस्मिन्नन्तः पुरुषो ज्योतिः।
भावार्थ:
इस शरीर के भीतर जो पुरुष है वह ज्योति-स्वरूप आत्मा है।
५. श्वेताश्वतर उपनिषद- ३.८
वेदाहमेतं पुरुषं महान्तम्
आदित्यवर्णं तमसः परस्तात्।
तमेव विदित्वाऽतिमृत्युमेति
नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय॥
भावार्थ:
मैं उस महान पुरुष को जानता हूँ जो सूर्य के समान प्रकाशस्वरूप और अंधकार से परे है। उसी को जानकर मनुष्य मृत्यु से पार होता है।
६- मैत्री उपनिषद-- ६.३४
आत्मा वा इदमेक एवाग्र आसीत् स ज्योतिः।
भावार्थ:
आदि में केवल आत्मा ही था और वह ज्योति-स्वरूप था।
३. कैवल्य उपनिषद- २१
न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं
नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः।
तमेव भान्तमनुभाति सर्वं
तस्य भासा सर्वमिदं विभाति॥
भावार्थ:
वहाँ सूर्य, चन्द्र या अग्नि का प्रकाश नहीं है; उसी परम ज्योति से सब कुछ प्रकाशित होता है।
४. तेजो बिन्दु उपनिषद्- १.५
ज्ञानदीपेन भास्वता आत्मतत्त्वं प्रकाशते।
भावार्थ:
जब ज्ञान का दीपक प्रज्वलित होता है तब आत्मतत्त्व प्रकाशित हो जाता है।
निष्कर्ष:
उपनिषदों में भी बार-बार यह कहा गया है कि परमात्मा और आत्मा ज्योति-स्वरूप हैं तथा उन्हें जानने से अज्ञान का अंधकार समाप्त हो जाता है।
पुराणों में प्रमाण--
१. विष्णु पुराण-१.२२.५३
ज्ञानं यदा तदा नाशमुपैति तमसः।
तदा प्रकाशते नित्यं परमं ब्रह्म सनातनम्॥
भावार्थ:
जब ज्ञान उत्पन्न होता है तब अज्ञान का अंधकार नष्ट हो जाता है और सनातन परम ब्रह्म का प्रकाश प्रकट होता है।
२. भागवत पुराण-- ११.२.३७
भयं द्वितीयाभिनिवेशतः स्यात्
ईशादपेतस्य विपर्ययोऽस्मृतिः।
तन्माययाऽतो बुध आभजेत तं
भक्त्यैकयेशं गुरुदेवतात्मा॥
भावार्थ:
जब मनुष्य ईश्वर से विमुख होता है तो अज्ञान और भय उत्पन्न होता है; ज्ञानी पुरुष ईश्वर की भक्ति से उस अज्ञान से मुक्त होकर सत्य को प्राप्त करता
३-पद्म पुराण -६.२२.५८
ज्ञानदीपप्रकाशेन नश्यत्यज्ञानजं तमः।
भावार्थ:
ज्ञान के दीपक के प्रकाश से अज्ञान का अंधकार नष्ट हो जाता है।
४. स्कंद पुराण -- ३.२.३५
ज्ञानं हि परमं ज्योतिः तमोऽज्ञानं प्रकीर्तितम्।
भावार्थ:
ज्ञान को ही परम ज्योति कहा गया है और अज्ञान को अन्धकार।
५-लिंग पुराण-१.७०.३२
ज्ञानं हि परमं ज्योतिरज्ञानं तम उच्यते।
ज्ञानदीपप्रकाशेन नश्यत्यज्ञानजं तमः॥
भावार्थ:
ज्ञान ही परम ज्योति है और अज्ञान अंधकार कहा गया है। ज्ञान के दीपक से अज्ञान का अंधकार नष्ट हो जाता है।
६-वायु पुराण- २३.५४
ज्ञानाग्निना दहत्याशु पापं तम इवांशुमान्।
भावार्थ:
जैसे सूर्य का प्रकाश अंधकार को नष्ट कर देता है, वैसे ही ज्ञान अग्नि पाप और अज्ञान को नष्ट कर देती है।
७-ब्रह्म पुराण --२३५.१२
ज्ञानदीपप्रकाशेन हृदयस्थं तमो हरेत्।
भावार्थ:
ज्ञान के दीपक के प्रकाश से हृदय में स्थित अज्ञान का अंधकार दूर हो जाता है।
८- अग्नि पुराण --३८०.१०
ज्ञानं परमकं ज्योतिः सर्वपापप्रणाशनम्।
भावार्थ:
ज्ञान परम ज्योति है और वह समस्त पाप तथा अज्ञान का नाश करने वाला है।
निष्कर्ष:
पुराणों में भी स्पष्ट कहा गया है कि ज्ञान ही ज्योति है और अज्ञान अंधकार है। जो मनुष्य ज्ञान को प्राप्त करता है वही वास्तविक अर्थ में ज्योति को प्राप्त करने वाला आर्य होता है। है।
भगवद्गीता में प्रमाण--
१-भगवद्गीता- ५.१६
ज्ञानेन तु तदज्ञानं येषां नाशितमात्मनः।
तेषामादित्यवज्ज्ञानं प्रकाशयति तत्परम्॥
भावार्थ:
जिनका अज्ञान ज्ञान द्वारा नष्ट हो गया है, उनका ज्ञान सूर्य के समान प्रकाश करके परम सत्य को प्रकट करता है।
२. भगवद्गीता -१०.११
तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तमः।
नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता॥
भावार्थ:
उन पर कृपा करने के लिए मैं उनके हृदय में स्थित होकर ज्ञान के प्रकाश से अज्ञान रूपी अंधकार का नाश करता हूँ।
३-भगवद्गीता- ४.३७
यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात्कुरुतेऽर्जुन।
ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा॥
भावार्थ:
जैसे प्रज्वलित अग्नि लकड़ियों को भस्म कर देती है, वैसे ही ज्ञान की अग्नि सभी कर्मों और अज्ञान को नष्ट कर देती है।
४-भगवद्गीता-१३.१७
ज्योतिषामपि तज्ज्योतिस्तमसः परमुच्यते।
ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यं हृदि सर्वस्य विष्ठितम्॥
भावार्थ:
वह परमात्मा ज्योतियों का भी ज्योति है और अंधकार से परे है; वही ज्ञान, जानने योग्य और ज्ञान से प्राप्त होने वाला है।
निष्कर्ष:
गीता में स्पष्ट कहा गया है कि ज्ञान सूर्य के समान प्रकाश है जो अज्ञान के अंधकार कोदूर कर‌ देता‌ है।
महाभारत में प्रमाण--
१. महाभारत (शान्ति पर्व)- २३८.११
ज्ञानं हि परमं ज्योतिरज्ञानं तम उच्यते।
ज्ञानदीपप्रकाशेन नश्यत्यज्ञानजं तमः॥
भावार्थ:
ज्ञान परम ज्योति है और अज्ञान अंधकार कहा गया है। ज्ञान के दीपक के प्रकाश से अज्ञान का अंधकार नष्ट हो जाता है।
२. महाभारत (शान्ति पर्व) २९४.१४
यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृता।
योगिनो यतचित्तस्य युञ्जतो योगमात्मनः॥
भावार्थ:
जैसे वायु रहित स्थान में दीपक स्थिर रहता है, वैसे ही संयमित चित्त वाला योगी आत्मज्ञान में स्थिर रहता है।
३. महाभारत(अनुशासन पर्व) -१४५.५४
ज्ञानं परममित्याहुस्तमोऽज्ञानं प्रकीर्तितम्।
भावार्थ:
ज्ञान को परम कहा गया है और अज्ञान को अंधकार बताया गया है।
४. महाभारत (शान्ति पर्व) ३३९.२४
ज्ञानदीपेन विद्वांसो नाशयन्ति तमो हृदि।
भावार्थ:
विद्वान पुरुष ज्ञान के दीपक से हृदय में स्थित अज्ञान के अंधकार का नाश कर देते हैं।
निष्कर्ष:
महाभारत में भी स्पष्ट बताया गया है कि ज्ञान ही ज्योति है और अज्ञान अंधकार है। जो मनुष्य ज्ञान प्राप्त करता है वही वास्तविक अर्थ में ज्योति को प्राप्त करने वाला आर्य होता है।
स्मृतियों में प्रमाण--
१. मनु स्मृति -i ४.२३८
अज्ञानं तम इत्याहुर्ज्ञानं तु परमं स्मृतम्।
ज्ञानदीपप्रकाशेन नश्यत्यज्ञानजं तमः॥
भावार्थ:
अज्ञान को अंधकार कहा गया है और ज्ञान को परम प्रकाश। ज्ञान के दीपक के प्रकाश से अज्ञान का अंधकार नष्ट हो जाता है।
२. याज्ञवल्क्य स्मृति-- १.३
ज्ञानं हि परमं श्रेयः पावनं परमं स्मृतम्।
भावार्थ:
ज्ञान को ही परम कल्याण और परम पवित्र माना गया है।
३-पराशर स्मृति- १.४०
ज्ञानदीपेन विद्वांसो नाशयन्ति तमो हृदि।
भावार्थ:
विद्वान लोग ज्ञान के दीपक से हृदय के अज्ञान रूपी अंधकार को नष्ट कर देते हैं।
४-नारद स्मृति -१.१०
ज्ञानं परमकं ज्योतिः धर्मस्य परमं पदम्।
भावार्थ:
ज्ञान परम ज्योति है और वही धर्म का सर्वोच्च स्थान है।
५- दक्ष स्मृति - २.१२
ज्ञानं हि परमं ज्योतिरज्ञानं तम उच्यते।
भावार्थ:
ज्ञान को परम ज्योति कहा गया है और अज्ञान को अंधकार।
६- बृहस्पति स्मृति -१.१५
ज्ञानदीपप्रकाशेन नश्यत्यज्ञानजं तमः।
भावार्थ:
ज्ञान के दीपक के प्रकाश से अज्ञान का अंधकार नष्ट हो जाता है।
७- अत्रि स्मृति -५७
विद्या नाम नरस्य रूपमधिकं प्रच्छन्नगुप्तं धनम्।
विद्या भोगकरी यशः सुखकरी विद्या गुरूणां गुरुः॥
भावार्थ:
विद्या मनुष्य का श्रेष्ठ रूप है; यह छिपा हुआ धन है। विद्या ही यश, सुख और सम्मान देने वाली है।
८-व्यास स्मृति -i १.८
ज्ञानं परममित्याहुस्तमोऽज्ञानं प्रकीर्तितम्।
भावार्थ:
ज्ञान को परम कहा गया है और अज्ञान को अंधकार बताया गया है।
निष्कर्ष:
स्मृतियों में भी यह स्पष्ट किया गया है कि ज्ञान ही ज्योति है और अज्ञान अंधकार। इसलिए जो मनुष्य ज्ञान को प्राप्त करता है वही वास्तविक अर्थ में ज्योति को प्राप्त करने वाला आर्य होता है।
१. चाणक्य नीति -१.३
न चोरहार्यं न च राजहार्यं
न भ्रातृभाज्यं न च भारकारी।
व्यये कृते वर्धते एव नित्यं
विद्याधनं सर्वधनप्रधानम्॥
भावार्थ:
विद्या रूपी धन ऐसा है जिसे न चोर ले सकता है, न राजा छीन सकता है; यह सदैव बढ़ता है — अर्थात् ज्ञान ही श्रेष्ठ प्रकाश है।
२. चाणक्य- २.११
विद्या मित्रं प्रवासे च भार्या मित्रं गृहेषु च।
व्याधितस्यौषधं मित्रं धर्मो मित्रं मृतस्य च॥
भावार्थ:
विद्या (ज्ञान) मनुष्य का सच्चा मित्र है — अर्थात् जीवन में मार्गदर्शक प्रकाश है।
३-विदुर नीति(महाभारत, उद्योग पर्व)- ३३.७२
नास्ति विद्यासमं चक्षुर्नास्ति सत्यसमं तपः।
नास्ति रागसमं दुःखं नास्ति त्यागसमं सुखम्॥
भावार्थ:
विद्या के समान कोई आँख (प्रकाश) नहीं है — अर्थात् ज्ञान ही देखने का वास्तविक साधन है।
४-भृतहरि नीति शतक-७
अज्ञानतिमिरान्धस्य ज्ञानाञ्जनशलाकया।
चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः॥
भावार्थ:
जो गुरु अज्ञान रूपी अंधकार को ज्ञान रूपी अंजन से दूर कर आँखें खोल देता है, उसे प्रणाम — अर्थात् ज्ञान अंधकार को मिटाने वाली ज्योति है।
“आर्य ज्योतिरग्रा:” — श्रेष्ठ मनुष्य ज्ञान-ज्योति को प्राप्त करता है —
हितोपदेश में प्रमाण--
१. मित्रलाभ- १.७
अनेकसंशयोच्छेदि परोक्षार्थस्य दर्शकम्।
सर्वस्य लोचनं शास्त्रं यस्य नास्त्यन्ध एव सः॥
भावार्थ:
शास्त्र (ज्ञान) अनेक संदेहों को दूर करता है और अदृश्य सत्य को दिखाता है; यह सबके लिए आँख (प्रकाश) के समान है — जिसके पास यह नहीं, वह अंधे के समान है।
२. मित्र लाभ-१.२५
विद्या नाम नरस्य रूपमधिकं प्रच्छन्नगुप्तं धनम्।
विद्या भोगकरी यशः सुखकरी विद्या गुरूणां गुरुः॥
भावार्थ:
विद्या मनुष्य का श्रेष्ठ रूप है; यह छिपा हुआ धन है और सुख, यश तथा मार्गदर्शन देने वाली है — अर्थात् ज्ञान ही जीवन का प्रकाश है।
पंचतंत्र में प्रमाण-
१. तन्त्र १ (मित्रभेद) -१.३३
नास्ति विद्यासमं चक्षुर्नास्ति सत्यसमं तपः।
भावार्थ:
विद्या के समान कोई नेत्र (प्रकाश) नहीं है — अर्थात् ज्ञान ही वास्तविक दृष्टि है।
२. तन्त्र २ (मित्रलाभ)- २.१०
विद्या मित्रं प्रवासे च।
भावार्थ:
विद्या मनुष्य की सच्ची मित्र है — अर्थात् जीवन में मार्गदर्शक प्रकाश है।
निष्कर्ष:
हितोपदेश और पंचतंत्र में भी स्पष्ट रूप से बताया गया है कि विद्या (ज्ञान) ही मनुष्य की आँख और प्रकाश है, जो जीवन का मार्ग दिखाती है।
अतः जो व्यक्ति इस ज्ञान-ज्योति को प्राप्त करता है, वही वास्तविक अर्थ में आर्य है।
निष्कर्ष:
नीति ग्रन्थों में भी बार-बार यह बताया गया है कि विद्या (ज्ञान) ही वास्तविक प्रकाश है जो जीवन का मार्ग दिखाता है। अतः जो व्यक्ति इस ज्ञान-ज्योति को प्राप्त करता है वही आर्य है।
वाल्मीकि रामायण में प्रमाण--
१. अयोध्या काण्ड- २.१०९.३४
नास्ति विद्यासमं चक्षुर्नास्ति सत्यसमं तपः।
भावार्थ:
विद्या के समान कोई नेत्र (प्रकाश) नहीं है — अर्थात् ज्ञान ही जीवन का वास्तविक प्रकाश है।
२. अरण्य काण्ड- ३.७२.८
धर्मो हि परमं लोके धर्मे सत्यं प्रतिष्ठितम्।
भावार्थ:
धर्म ही संसार में सर्वोच्च है, और सत्य उसमें स्थित है — अर्थात् धर्म और सत्य ही जीवन का प्रकाश हैं।
गर्ग संहिता में प्रमाण-
१. गोलोक खण्ड- १.२३
ज्ञानदीपप्रकाशेन हृदयग्रन्थयो विदुः।
भावार्थ:
ज्ञान के दीपक के प्रकाश से हृदय के बन्धन (अज्ञान) कट जाते हैं।
२. वृन्दावन खण्ड- १२.४५
अज्ञानतिमिरान्धानां ज्ञानं दिव्यं प्रदीपवत्।
भावार्थ:
अज्ञान के अंधकार में पड़े लोगों के लिए ज्ञान दिव्य दीपक के समान है।
योग वशिष्ठ में प्रमाण-
१. निर्वाण प्रकरण- २.१८.१२
अज्ञानतिमिरान्धस्य ज्ञानं सूर्य इवोदितम्।
भावार्थ:
अज्ञान के अंधकार से अंधे हुए मनुष्य के लिए ज्ञान सूर्य के समान उदित होकर प्रकाश देता है।
२. उपशम प्रकरण- ५.१०
ज्ञानं हि परमं ज्योतिः आत्मा प्रकाशकः स्वयम्।
भावार्थ:
ज्ञान ही परम ज्योति है और आत्मा स्वयं प्रकाश करने वाला है।
३. निर्वाण प्रकरण १.२८.३१
यथा दीपप्रभा नाशयति तमः क्षणेन वै।
तथा ज्ञानप्रभा नाशयत्यज्ञानमाशु हि॥
भावार्थ:
जैसे दीपक का प्रकाश क्षणभर में अन्धकार को दूर कर देता है वैसे ही ज्ञान शीघ्र ही अज्ञान को नष्ट कर देता है।
--------++-------++------++---

Read More

मां चाहे सुत की प्रगति, कहती यह मम रक्त। रखा माह नौ पेट में, यह मुझमें है न्यस्त।।
दोहा--४५३
(नैश के दोहे से उद्धृत)
‌‌-----गणेश तिवारी 'नैश'

Read More

ऋगुवेद सूक्ति-- (४०) की व्याख्या
न त्वदन्यो मघवन्नस्य मर्दिता --ऋगुवेद
भावार्थ --हे मघवन(ईश्वर) ! आपके सिवा दूसरा सुख देने वाला कोई नहीं है।
“न त्वदन्यो मघवन्नस्य मर्दिता”
पद–व्याख्या
न — नहीं
त्वत् अन्यः — आपसे अन्य, आपके अतिरिक्त
मघवन् — हे दानी प्रभु (इन्द्र के लिए प्रयुक्त संबोधन)
अस्य — इस (जगत / भक्त) का
मर्दिता — कष्ट दूर करने वाला, दुःख का नाश करने वाला
भावार्थ--
हे प्रभु! आपके अतिरिक्त इस संसार में दुःखों को दूर करने वाला और सच्चा सुख देने वाला दूसरा कोई नहीं है।
संक्षिप्त व्याख्या--
ऋग्वेद के इस वाक्य का तात्पर्य यह है कि परमात्मा ही संसार का वास्तविक सहायक और रक्षक है।
वही मनुष्य के दुःखों का नाश करता है।
वही कल्याण और सुख का दाता है।
इसलिए मनुष्य को ईश्वर पर विश्वास, प्रार्थना और श्रद्धा रखनी चाहिए।
इसका संदेश है कि सच्चा आश्रय और सुख केवल परमात्मा से ही प्राप्त होता है।
वेदों में प्रमाण--
१-ऋग्वेद १०.१२१.२
“यो देवानां नामधा एक एव।”
भावार्थ: वही एक परम सत्ता है जो सब देवताओं का आधार है।
२- यजुर्वेद- ३२.११
“न तस्य प्रतिमा अस्ति।”
भावार्थ: उस परमात्मा के समान या उसके बराबर कोई नहीं है।
३-अथर्ववेद- १०.८.१
“यो भूतं च भव्यं च सर्वं यश्चाधितिष्ठति।”
भावार्थ: वही परमात्मा भूत, भविष्य और सम्पूर्ण जगत का अधिष्ठाता है।
सार:
वेदों का सिद्धान्त है कि—
परमात्मा ही एकमात्र सर्वोच्च सत्ता है।
वही सुख देने वाला और दुःखों का नाश करने वाला है।
उपनिषदों में प्रमाण--
१-श्वेताश्वतरोपनिषद्- ६.१७
“यो देवानाṁ प्रभवश्चोद्भवश्च
विश्वाधिपो रुद्रो महर्षिः।”
भावार्थ: वही परमात्मा देवताओं का भी कारण है और सम्पूर्ण जगत का स्वामी है।
२-श्वेताश्वतरोपनिषद्- ६.१८
“यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्वं
यो वै वेदांश्च प्रहिणोति तस्मै।”
भावार्थ: जो परमात्मा सृष्टि के आरम्भ में ब्रह्मा को उत्पन्न करता है और वेदों का ज्ञान देता है, उसी परमात्मा की शरण लेनी चाहिए।
३-कठोपनिषद्- २.२.१३
“नित्यो नित्यानां चेतनश्चेतनानाम्
एको बहूनां यो विदधाति कामान्।”
भावार्थ: वह एक परमात्मा सब नित्य और चेतन प्राणियों में श्रेष्ठ है और वही सबकी आवश्यकताओं को पूर्ण करता है।
४- मुण्डकोपनिषद्- २.२.११
“ब्रह्मैवेदममृतं पुरस्ताद्
ब्रह्म पश्चाद् ब्रह्म दक्षिणतश्चोत्तरेण।”
भावार्थ: आगे-पीछे, दाएँ-बाएँ सब ओर वही ब्रह्म (परमात्मा) है।
५-ईश उपनिषद-- ८
“स पर्यगाच्छुक्रमकायमव्रणम्
अस्नाविरं शुद्धमपापविद्धम्।”
भावार्थ: वह परमात्मा सर्वव्यापक, शुद्ध और निष्पाप है; वही सबका परम आधार है।
६-मैत्री उपनिषद्- ६.१७
“एको हि रुद्रो न द्वितीयाय तस्थुः।”
भावार्थ: वह एक ही परमात्मा है, उसके समान दूसरा कोई नहीं है।
७--कैवल्योपनिषद्- १०
“स ब्रह्मा स शिवः सेन्द्रः सोऽक्षरः परमः स्वराट्।”
भावार्थ: वही परमात्मा ब्रह्मा, शिव और इन्द्र आदि सबका आधार है; वही परम और स्वतंत्र है।
८- नारायणोपनिषद्- ४
“नारायणः परो ज्योतिरात्मा नारायणः परः।”
भावार्थ: नारायण (परमात्मा) ही परम ज्योति और परम आत्मा है; वही सर्वोच्च सत्ता है।
सार-
उपनिषदों का भी यही मत है कि
परमात्मा एक और अद्वितीय है।
वही सबका पालनकर्ता, रक्षक और सुखदाता है।
उसके समान दूसरा कोई नहीं है।
पुराणों में प्रमाण--
१-भागवतपुराण- १०.१४.५८
“समाश्रिता ये पदपल्लवप्लवं
महत्त्पदं पुण्ययशो मुरारेः।”
भावार्थ: जो लोग भगवान के चरणों का आश्रय लेते हैं, उनके लिए संसार-सागर पार करना सरल हो जाता है; अर्थात् वही वास्तविक आश्रय हैं।
२-विष्णुपुराण- १.२२.५३
“एको विष्णुर्महद्भूतं पृथग्भूतान्यनेकशः।”
भावार्थ: वही एक विष्णु (परमात्मा) सम्पूर्ण जगत में अनेक रूपों में विद्यमान है।
३. शिवपुराण-१.२६
“नास्ति शम्भोः परं किञ्चित्।”
भावार्थ: भगवान शम्भु (परमात्मा) से बढ़कर कोई दूसरी सत्ता नहीं है।
४-पद्मपुराण,उत्तरखण्ड- २३६.१८
“हरिरेव सदा रक्षेत् हरिरेव परायणम्।”
भावार्थ: भगवान ही सदा रक्षा करने वाले और परम आश्रय हैं।
५-गरुड़पुराण- १.२३१.१२
“नारायणपराः सर्वे न कुतश्चन बिभ्यति।”
भावार्थ: जो लोग परमात्मा (नारायण) का आश्रय लेते हैं, वे किसी से भय नहीं करते; वही उनका रक्षक है।
६. स्कन्दपुराण- १.२.६.४५
“त्वमेव शरणं नाथ जगतां त्राणकारणम्।”
भावार्थ: हे प्रभु! आप ही सम्पूर्ण जगत के एकमात्र शरण और रक्षक हैं।
७-ब्रह्मपुराण- २३४.३१
“एको देवः सर्वभूतेषु गूढः।”
भावार्थ: एक ही परम देव सभी प्राणियों में स्थित है और वही सबका आधार है।
८- नारदपुराण- १.४१.५२
“त्वत्तो नान्यो जगन्नाथ रक्षकः सुखदायकः।”
भावार्थ: हे जगन्नाथ! आपसे बढ़कर कोई दूसरा रक्षक और सुख देने वाला नहीं है।
सार:
पुराणों का भी यही निष्कर्ष है कि
परमात्मा ही जगत का वास्तविक रक्षक है।
वही भय और दुःख को दूर करके सुख देने वाला है।

“न त्वदन्यो मघवन्नस्य मर्दिता” (ऋग्वेद) के भाव—कि परमात्मा ही वास्तविक सुखदाता और दुःखों को दूर करने वाला है—का समर्थन Bhagavad Gita में भी अनेक स्थानों पर मिलता है।
गीता में प्रमाण--
१. गीता १८.६६
“सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥”
भावार्थ :
सब प्रकार के आश्रयों को छोड़कर केवल मेरी शरण में आओ। मैं तुम्हें सभी पापों और दुःखों से मुक्त कर दूँगा, शोक मत करो।
अर्थात् परमात्मा ही अंतिम रक्षक और दुःखों को दूर करने वाला है।
२. गीता ९.२२
“अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥”
भावार्थ :
जो लोग निरन्तर मेरा स्मरण और उपासना करते हैं, उनके योग और क्षेम (आवश्यकताओं और सुरक्षा) का भार मैं स्वयं उठाता हूँ।
अर्थात् परमात्मा ही अपने भक्तों की रक्षा और कल्याण करता है।
३. गीता ७.१४
“दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया।
मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते॥”
भावार्थ :
यह मेरी त्रिगुणमयी माया बड़ी कठिन है; परन्तु जो मेरी शरण में आते हैं वे इसे पार कर लेते हैं।
अर्थात् ईश्वर की शरण ही संसार के दुःखों से मुक्ति का मार्ग है।
४. गीता १०.८
“अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते।”
भावार्थ :
मैं ही सम्पूर्ण जगत का कारण हूँ और मुझसे ही सब कुछ संचालित होता है।
अर्थात् परमात्मा ही सभी शक्तियों और सुखों का मूल स्रोत है।
५. गीता १२.६–७
“ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि संन्यस्य मत्पराः…
तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात्।”
भावार्थ :
जो लोग अपने सभी कर्म मुझे समर्पित करके मेरी शरण लेते हैं, उन्हें मैं जन्म-मृत्यु रूपी संसार-सागर से निकाल देता हूँ।
सार--
गीता का भी यही सिद्धान्त है कि
परमात्मा ही वास्तविक आश्रय है।
वही भक्तों का रक्षक और पालनकर्ता है।
उसकी शरण से ही दुःखों का नाश और सच्चा सुख प्राप्त होता है।
महाभारत में प्रमाण--
१. भीष्मपर्व ६.६२.३३
“त्वमेव शरणं कृष्ण त्वमेव जगदीश्वरः।”
भावार्थ :
हे कृष्ण! आप ही हमारी शरण हैं और आप ही सम्पूर्ण जगत के ईश्वर हैं।
अर्थात् परमात्मा ही वास्तविक आश्रय और रक्षक है।
२. शान्तिपर्व १२.३४८.५१
“एको देवः सर्वभूतेषु गूढः
सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा।”
भावार्थ :
एक ही परम देव सब प्राणियों में स्थित है और वही सबका अन्तर्यामी है।
अर्थात् वही परमात्मा सबका आधार और रक्षक है।
३. वनपर्व ३.३१३.११७
“नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम्।”
भावार्थ :
नारायण को नमस्कार करके ही सब कार्यों का आरम्भ करना चाहिए; वही परम सहायक हैं।
४. उद्योगपर्व ५.७१.३
“नारायणपरं ब्रह्म नारायणपरं तपः।”
भावार्थ :
नारायण ही परम ब्रह्म हैं और वही सर्वोच्च तप तथा आश्रय हैं।
५. शान्तिपर्व १२.२३७.२४
“नारायणः परं सत्यं नारायणः परा गतिः।”
भावार्थ :
नारायण ही परम सत्य और मनुष्य की सर्वोच्च गति (अंतिम आश्रय) हैं।
६. शान्तिपर्व १२.३२१.२६
“ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशे तिष्ठति प्रभुः।”
भावार्थ :
परमात्मा सभी प्राणियों के हृदय में स्थित होकर उनका संचालन करता है।
सार-
महाभारत का निष्कर्ष भी यही है कि—परमात्मा ही जगत का वास्तविक स्वामी है।
वही मनुष्य का रक्षक और आश्रय है।
उसी की शरण से दुःखों का नाश और कल्याण होता है।
इस प्रकार महाभारत का सिद्धान्त भी ऋग्वेद की उक्त सूक्ति “न त्वदन्यो मघवन्नस्य मर्दिता” के भाव को पुष्ट करता है कि परमात्मा ही सच्चा रक्षक और सुखदाता है।
स्मृति ग्रन्थों में प्रमाण--
१-मनुस्मृति १२.१२२
“वेदशास्त्रार्थतत्त्वज्ञो यत्र तत्राश्रमे वसन्।
इहैव लोके तिष्ठन्नेव ब्रह्मभूयाय कल्पते॥”
भावार्थ: जो मनुष्य परम सत्य (ब्रह्म) को जान लेता है, वही वास्तविक कल्याण और सुख को प्राप्त करता है।
२-याज्ञवल्क्यस्मृति- १.३४८
“ईश्वरप्रणिधानाद्वा सर्वदुःखक्षयो भवेत्।”
भावार्थ: ईश्वर का आश्रय लेने से मनुष्य के दुःखों का नाश होता है।
३-पराशर स्मृति- १.१९
“हरिरेव जगन्नाथः शरण्यः सुखदायकः।”
भावार्थ: परमात्मा ही सम्पूर्ण जगत का स्वामी, शरण देने वाला और सुख प्रदान करने वाला है।
४-व्यास स्मृति- १.११
“एको देवः सर्वभूतेषु रक्षकः।”
भावार्थ: एक ही परम देव सब प्राणियों का रक्षक है।
५-अत्रि स्मृति- १.७४
“एको देवः सर्वभूतेषु रक्षकः शरणं परम्।”
भावार्थ: एक ही परम देव सब प्राणियों का रक्षक और परम शरण है।
६-दक्ष स्मृति- २.२८
“ईश्वरः सर्वभूतानां नान्यः शरणदायकः।”
भावार्थ: परमात्मा ही सब प्राणियों को शरण देने वाला है, उसके अतिरिक्त दूसरा कोई नहीं।
७-गौतम स्मृति- ८.२४
“तमेव शरणं गच्छेत् सर्वभावेन मानवः।”
भावार्थ: मनुष्य को पूर्ण भाव से उसी परमात्मा की शरण में जाना चाहिए।
८-शंख स्मृति- १.६१
“नान्यो जगति रक्षिता सुखदाता च विद्यते।”
भावार्थ: इस जगत में परमात्मा के अतिरिक्त कोई दूसरा वास्तविक रक्षक और सुख देने वाला नहीं है।
सार:
स्मृतियों का भी यही मत है कि
परमात्मा ही सबका वास्तविक आश्रय और रक्षक है।
वही सुख देने वाला और दुःखों को दूर करने वाला है।
नैति ग्रन्थों में प्रमाण--
१-भृतहरि नीतिशतक-८४
“भोगा न भुक्ता वयमेव भुक्ताः
तपो न तप्तं वयमेव तप्ताः।”
भावार्थ: संसार के भोग मनुष्य को स्थायी सुख नहीं देते; वास्तविक शान्ति और कल्याण परम सत्य (परमात्मा) की शरण से ही मिलता है।
२-चाणक्य नीति- १५.७
“सुखस्य मूलं धर्मः।”
भावार्थ: वास्तविक सुख का मूल धर्म है, और धर्म का आधार परमात्मा है।
३-शुक्रनीति- १.६६
“ईश्वराश्रयणादेव नित्यं सुखमवाप्यते।”
भावार्थ: परमात्मा का आश्रय लेने से ही मनुष्य को स्थायी सुख प्राप्त होता है।
४-विदुरनीति (उद्योग पर्व)- ३३.२७
“धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः।”
भावार्थ: धर्म की रक्षा करने वाला मनुष्य सुरक्षित रहता है; धर्म ही उसका रक्षक बनता है, और धर्म का मूल परमात्मा है।
५-हितोपदेश, मित्रलाभ- १.३१
“यस्य नास्ति स्वयं प्रज्ञा शास्त्रं तस्य करोति किम्।”
भावार्थ: केवल बाहरी साधनों से कल्याण नहीं होता; विवेक और उच्च सत्य का आश्रय ही वास्तविक हित का कारण है।
६-पंचतंत्र- १.२६७
“दैवं पुरुषकारेण यत्नेनापि निवार्यते।”
भावार्थ: दैवी व्यवस्था और परम शक्ति का प्रभाव सर्वोच्च होता है; उसी के अधीन मनुष्य का जीवन चलता है।
७-सुभाषितरत्नभाण्डागार- ९५४
“दैवमेव परं बलं।”
भावार्थ: दैवी शक्ति (परमात्मा) ही सर्वोच्च बल और सहारा है।
८-सदुक्तिकर्णामृत ३.४२
“दैवाधीनं जगत्सर्वम्।”
भावार्थ: यह सम्पूर्ण जगत दैवी शक्ति (परमात्मा) के अधीन है।
सार:
नीति ग्रन्थों का भी यही निष्कर्ष है कि दैवी शक्ति / परमात्मा ही सर्वोच्च आधार है।
मनुष्य का वास्तविक सुख और संरक्षण उसी के आश्रय में है।
उसके बिना स्थायी कल्याण संभव नहीं है।
रामायण और गर्ग संहिता में प्रमाण--
१-वाल्मीकि रामायण, युद्धकाण्ड -१८.३३
“सकृदेव प्रपन्नाय तवास्मीति च याचते।
अभयं सर्वभूतेभ्यो ददाम्येतद् व्रतं मम॥”
भावार्थ: जो एक बार भी मेरी शरण में आकर कहता है कि “मैं आपका हूँ”, उसे मैं सब प्राणियों से अभय देता हूँ—यह मेरा व्रत है।
अर्थात् भगवान ही सच्चे रक्षक और आश्रय हैं।
२-अध्यात्म रामायण, अरण्यकाण्ड- २.४०
“राम एव परं ब्रह्म राम एव परं तपः।”
भावार्थ: भगवान राम ही परम ब्रह्म और परम आश्रय हैं; वही वास्तविक सुख और कल्याण देने वाले हैं।
३-गर्ग संहिता, गोलोक खण्ड -१.२३
“त्वमेव शरणं कृष्ण त्वमेव जगदीश्वरः।”
भावार्थ: हे कृष्ण! आप ही हमारी शरण और सम्पूर्ण जगत के ईश्वर हैं।
४-गर्ग संहिता, गोलोक खण्ड -९.३८
“त्वत्तो नान्यो जगन्नाथ रक्षकः सुखदायकः।”
भावार्थ: हे जगन्नाथ! आपसे बढ़कर दूसरा कोई रक्षक और सुख देने वाला नहीं है।
सार:
रामायण और गर्ग संहिता दोनों का निष्कर्ष है कि—
भगवान ही मनुष्य का परम आश्रय हैं।
वही रक्षक, दुःखों का नाश करने वाले और सच्चा सुख देने वाले हैं।
१- योग वशिष्ठ, निर्वाण प्रकरण- २.१३
“ब्रह्मैवेदं जगत्सर्वं नान्यत्किञ्चन विद्यते।”
भावार्थ: यह सम्पूर्ण जगत ब्रह्म ही है, उसके अतिरिक्त दूसरा कुछ भी नहीं है।
२-योग वशिष्ठ, उपशम प्रकरण- ६.२७
“तमेव शरणं यान्ति ये विवेकिनो नराः।”
भावार्थ: विवेकशील मनुष्य उसी परम सत्य (ब्रह्म) की शरण ग्रहण करते हैं।
३- योग वशिष्ठ, निर्वाण प्रकरण- १.५६
“ब्रह्माश्रयात् परं सुखं नान्यत् विद्यते क्वचित्।”
भावार्थ: ब्रह्म (परमात्मा) के आश्रय से बढ़कर कहीं भी कोई अन्य सुख नहीं है।
सार:
योग वशिष्ठ का सिद्धान्त है कि—
परम ब्रह्म ही सर्वोच्च सत्य और आश्रय है।
उसी के ज्ञान और आश्रय से वास्तविक शान्ति और सुख प्राप्त होता है।
उसके अतिरिक्त कोई दूसरा स्थायी आश्रय नहीं है।
-------+--------+--------+---------

Read More

कार्य करो तुम इस तरह, बचें नहीं लवलेश। ज्यों कांटा निकले बिना, देता रहता क्लेश।।
दोहा --४५२
(नैश के दोहे से उद्धृत)
------गणेश तिवारी 'नैश'

Read More

ऋगुवेद सूक्ति-- (३९) की व्याख्या
"निन्दितारो निन्द्यासो भवन्तु"
ऋगुवेद--५/२/६
भावार्थ--निन्दक सबसे निन्दित होते हैं।
“निन्दितारो निन्द्यासो भवन्तु”
पद–व्याख्या
निन्दितारः — निन्दा करने वाले, दोष खोजने वाले लोग
निन्द्यासः — स्वयं निन्दा के योग्य, तिरस्कार के पात्र
भवन्तु — हो जाते हैं / बन जाते हैं।
भावार्थ--
जो लोग दूसरों की निन्दा करते रहते हैं, वे अंततः स्वयं ही निन्दा के पात्र बन जाते हैं। अर्थात् निन्दा करने वाला व्यक्ति समाज में सम्मान नहीं पाता; उसका स्वभाव ही उसे अपमानित कर देता है।
विस्तृत व्याख्या--
इस वैदिक वाक्य का तात्पर्य यह है कि मनुष्य को दूसरों के दोष ढूँढ़ने और उनकी निन्दा करने की आदत से बचना चाहिए।
निन्दा करने से व्यक्ति का स्वभाव, चरित्र और विवेक कमजोर हो जाता है।
जो व्यक्ति सदैव दूसरों की बुराई करता है, लोग धीरे-धीरे उसी से दूर होने लगते हैं।
परिणामतः वही व्यक्ति समाज में निन्दित और तिरस्कृत हो जाता है।
इसलिए वेद का संदेश है कि मनुष्य को सद्गुण, प्रशंसा और हितकारी वचन बोलने चाहिए, न कि निन्दा।
निष्कर्ष--
निन्दा करने वाला व्यक्ति अंत में स्वयं निन्दा का पात्र बनता है; इसलिए श्रेष्ठ जीवन के लिए निन्दा से बचकर सद्वचन और सद्भाव अपनाना चाहिए।
वेदों में प्रमाण--
१-(क) ऋग्वेद १०.७१.२
“सक्तुमिव तितउना पुनन्तो यत्र धीरा मनसा वाचमक्रत।”
भावार्थ: विद्वान लोग वाणी को छानकर शुद्ध करते हैं, अर्थात् सोच-समझकर उत्तम वचन बोलते हैं।
१(ख) ऋग्वेद १.८९.८
“भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवाः।”
भावार्थ: हम अपने कानों से शुभ और कल्याणकारी वचन ही सुनें।
२-(क) यजुर्वेद २१.६१
“मित्रस्य चक्षुषा सर्वाणि भूतानि समीक्षामहे।”
भावार्थ: हम सभी प्राणियों को मित्रभाव से देखें (अर्थात् निन्दा-द्वेष से दूर रहें)।
(ख) यजुर्वेद ३६.१८
“मित्रस्याहं चक्षुषा सर्वाणि भूतानि समीक्षे।”
भावार्थ: मैं सभी प्राणियों को मित्रभाव से देखता हूँ।

३-(क)-अथर्ववेद १९.९.१४
“शं नो देवीरभिष्टय आपो भवन्तु पीतये।”
भावार्थ: हमारे लिए कल्याण और मंगल की भावना बनी रहे।
(ख)-अथर्ववेद ३.३०.५
“समानी व आकूति: समाना हृदयानि वः।”
भावार्थ: आप सबकी भावना और हृदय एक समान हों (अर्थात् परस्पर विरोध और निन्दा न हो)।
सार:
वेदों का मूल संदेश है कि मनुष्य को दूसरों की निन्दा नहीं करनी चाहिए, बल्कि मित्रभाव, सद्वचन और शुभ विचार अपनाने चाहिए। निन्दक अंततः स्वयं निन्दित हो जाता है।।
उपनिषदों में प्रमाण--
१. तैत्तिरीयोपनिषद् १.११.१
“सत्यं वद। धर्मं चर।”
भावार्थ: सत्य बोलो और धर्म का आचरण करो।
अर्थात् मनुष्य को असत्य, निन्दा और दोषारोपण से बचना चाहिए।
२.ईशोपनिषद् --६
“यस्तु सर्वाणि भूतान्यात्मन्येवानुपश्यति।
सर्वभूतेषु चात्मानं ततो न विजुगुप्सते॥”
भावार्थ: जो सभी प्राणियों में अपने ही आत्मभाव को देखता है, वह किसी से घृणा या निन्दा नहीं करता।
३-छान्दोग्योपनिषद् ३.१४.१
“सर्वं खल्विदं ब्रह्म।”
भावार्थ: यह सम्पूर्ण जगत ब्रह्मस्वरूप है; इसलिए किसी प्राणी का तिरस्कार या निन्दा करना उचित नहीं है।
(४)बृहदारण्यकोपनिषद् १.४.१४
“आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः।”
भावार्थ: आत्मा को जानना, सुनना, मनन करना और ध्यान करना चाहिए; जब आत्मज्ञान होता है तब मनुष्य दूसरों की निन्दा और द्वेष से दूर रहता है।
(५). कठोपनिषद् १.२.२४
“नाविरतो दुश्चरितान्नाशान्तो नासमाहितः।
नाशान्तमानसो वापि प्रज्ञानेनैनमाप्नुयात्॥”
भावार्थ: जो व्यक्ति दुश्चरित्र (दोषपूर्ण आचरण) से नहीं रुकता, जिसका मन शान्त नहीं है, वह आत्मज्ञान को प्राप्त नहीं कर सकता।
अर्थात् दोष-दर्शन, निन्दा और अशुभ आचरण से दूर रहना आवश्यक है।
६-मुण्डकोपनिषद् ३.१.५
“सत्येन लभ्यस्तपसा ह्येष आत्मा।”
भावार्थ: यह आत्मा सत्य और तप से प्राप्त होती है।
अर्थात् सत्य वचन और शुद्ध आचरण आवश्यक हैं, न कि निन्दा और असत्य।
७. प्रश्नोपनिषद् --१.१५
“तेषामेवैष ब्रह्मलोकः।”
भावार्थ: जो लोग सत्य, संयम और ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं, वही उच्च अवस्था को प्राप्त होते हैं; दोष-दर्शन और निन्दा करने वाले नहीं।
८. श्वेताश्वतरोपनिषद्- ६.२३
“यस्य देवे परा भक्तिः यथा देवे तथा गुरौ।”
भावार्थ: जिस व्यक्ति को ईश्वर और गुरु में परम श्रद्धा होती है, उसी को ज्ञान प्राप्त होता है।
अर्थात् श्रद्धा और सम्मान आवश्यक हैं, न कि निन्दा।
सार--
उपनिषदों का भी यही सिद्धान्त है कि—मनुष्य को दोष-दर्शन और निन्दा से बचना चाहिए, सत्य, संयम और शुभ वाणी का पालन करना चाहिए, तभी आध्यात्मिक उन्नति संभव है।
पुराणों में भी निन्दा करने वाले व्यक्ति की निन्दनीयता तथा परनिन्दा से बचने का उपदेश अनेक स्थानों पर मिलता है। कुछ प्रमुख प्रमाण इस प्रकार हैं—
पुराणों में प्रमाण--
१. भागवतपुराण १०.७४.४०
“परस्वभावकर्माणि न प्रशंसेन्न गर्हयेत्।
विश्वमेकात्मकं पश्यन् प्रकृत्या पुरुषेण च॥”
भावार्थ: जो व्यक्ति समस्त जगत में एक ही आत्मा को देखता है, वह किसी के स्वभाव और कर्म की न तो निन्दा करता है और न ही व्यर्थ प्रशंसा करता है।
२-पद्मपुराण, उत्तरखण्ड ७१.३७
“परनिन्दां न कुर्वीत परदोषान्न दर्शयेत्।”
भावार्थ: मनुष्य को न तो दूसरों की निन्दा करनी चाहिए और न ही उनके दोषों को फैलाना चाहिए।
३-गरुड़पुराण १.११४.९
“परनिन्दारतः पापी सर्वधर्मबहिष्कृतः।”
भावार्थ: जो व्यक्ति परनिन्दा में लगा रहता है, वह पापी और धर्म से दूर माना जाता है।
४. स्कन्दपुराण २.४.५.२३
“परनिन्दा परद्रोहः परपीडाच वर्जयेत्।”
भावार्थ: परनिन्दा, परद्रोह और दूसरों को पीड़ा देने वाले आचरणों को त्याग देना चाहिए।
५. विष्णुपुराण- ३.१२.४५
“परनिन्दां परद्रोहं परपीडां च वर्जयेत्।”
भावार्थ: मनुष्य को परनिन्दा, परद्रोह और दूसरों को कष्ट देने वाले आचरणों का त्याग करना चाहिए।
६.अग्निपुराण -३७१.१२
“परनिन्दा न कर्तव्या न च दोषान् प्रकाशयेत्।”
भावार्थ: किसी की निन्दा नहीं करनी चाहिए और दूसरों के दोषों को फैलाना भी उचित नहीं है।
७-ब्रह्मपुराण २३५.२१
“परनिन्दारतः नित्यं नरः पापफलं लभेत्।”
भावार्थ: जो व्यक्ति सदैव दूसरों की निन्दा करता रहता है, वह पाप का फल प्राप्त करता है।
८. नारदपुराण १.१५.६०
“परनिन्दां न कुर्वीत सर्वभूतेषु मानदः।”
भावार्थ: मनुष्य को सब प्राणियों का सम्मान करते हुए किसी की निन्दा नहीं करनी चाहिए।
सार--
अन्य पुराणों का भी यही सिद्धान्त है कि—
परनिन्दा अधर्म और पाप का कारण है।
मनुष्य को दूसरों के दोषों का प्रचार नहीं करना चाहिए।
श्रेष्ठ आचरण है कि सबके प्रति सम्मान।
गीता में भी निन्दा, द्वेष और दोष-दर्शन से बचने तथा समभाव रखने की शिक्षा दी गई है। कुछ प्रमुख प्रमाण इस प्रकार हैं—
गीता में प्रमाण--
१. गीता १२.१३
“अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च।”
भावार्थ: जो मनुष्य सब प्राणियों से द्वेष नहीं करता, सबका मित्र और दयालु होता है, वही श्रेष्ठ भक्त है।
अर्थात् वह किसी की निन्दा नहीं करता।
२. गीता १६.२
“अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्यागः शान्तिरपैशुनम्।”
भावार्थ: अहिंसा, सत्य, क्रोध का अभाव, शान्ति और अपैशुनम् (परनिन्दा न करना) दैवी गुण हैं।
३. गीता १३.७–८
“अमानित्वमदम्भित्वमहिंसा क्षान्तिरार्जवम्।”
भावार्थ: नम्रता, अहंकार का अभाव, अहिंसा, क्षमा और सरलता — ये ज्ञान के लक्षण हैं; इन गुणों वाले व्यक्ति में निन्दा का स्वभाव नहीं होता।
४. गीता १७.१५
“अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्।”
भावार्थ: ऐसा वचन बोलना चाहिए जो किसी को उद्वेग न दे, जो सत्य, प्रिय और हितकारी हो।
अर्थात् कटु वचन और निन्दा से बचना चाहिए।
सार-:
गीता का सिद्धान्त है कि श्रेष्ठ मनुष्य वह है जो —
किसी से द्वेष या निन्दा नहीं करता, मधुर और हितकारी वचन बोलता है,
और सबके प्रति मित्रभाव रखता है।
महाभारत में प्रमाण--
१. शान्ति पर्व- १६७.९
“परस्वभावकर्माणि न प्रशंसेन्न गर्हयेत्।”
भावार्थ: मनुष्य को दूसरों के स्वभाव और कर्मों की न तो निन्दा करनी चाहिए और न ही व्यर्थ प्रशंसा करनी चाहिए।
२. अनुशासन पर्व- १०४.१२
“परनिन्दां परद्रोहं परपीडां विवर्जयेत्।”
भावार्थ: मनुष्य को परनिन्दा, परद्रोह और दूसरों को कष्ट देने वाले आचरणों का त्याग करना चाहिए।
३. उद्योग पर्व- ३४.७५
“न परदोषान् वदेत् प्राज्ञो न च निन्दां समाचरेत्।”
भावार्थ: बुद्धिमान व्यक्ति न तो दूसरों के दोषों की चर्चा करता है और न ही उनकी निन्दा करता है।
४. शान्ति पर्व २६२.५
“वाचा सत्यं प्रियं ब्रूयान्न ब्रूयात् सत्यमप्रियम्।”
भावार्थ: मनुष्य को सत्य और प्रिय वचन बोलना चाहिए; ऐसा सत्य नहीं बोलना चाहिए जो अनावश्यक रूप से किसी को दुख दे।
सार:
महाभारत का स्पष्ट उपदेश है कि
परनिन्दा और दोष-दर्शन से बचना चाहिए।
सत्य, प्रिय और हितकारी वचन बोलना ही धर्म है।
जो व्यक्ति दूसरों की निन्दा करता है, वह स्वयं भी सम्मान खो देता है।
स्मृति ग्रन्थों में भी परनिन्दा (दूसरों की निन्दा) को दोष बताया गया है और उससे बचने की शिक्षा दी गई है। कुछ प्रमुख प्रमाण श्लोक-संख्या सहित इस प्रकार हैं
१-मनुस्मृति ४.१३८
“न परदोषान् वदेद् विद्वान् न परेषां च कर्मसु।”
भावार्थ: विद्वान व्यक्ति को दूसरों के दोषों की चर्चा नहीं करनी चाहिए।
२- मनुस्मृति ४.१६८
“सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयान्न ब्रूयात् सत्यमप्रियम्।
प्रियं च नानृतं ब्रूयादेष धर्मः सनातनः॥”
भावार्थ: मनुष्य को सत्य और प्रिय वचन बोलना चाहिए; ऐसा सत्य भी नहीं बोलना चाहिए जो अनावश्यक रूप से अप्रिय हो।
३-याज्ञवल्क्यस्मृति- १.१३२
“परनिन्दां न कुर्वीत सर्वभूतेषु मानदः।”
भावार्थ: सब प्राणियों का सम्मान करते हुए किसी की निन्दा नहीं करनी चाहिए।
४-पराशर स्मृति १.३९
“परनिन्दा परद्रोहः परपीडा च वर्जयेत्।”
भावार्थ: परनिन्दा, परद्रोह और दूसरों को पीड़ा देने वाले आचरणों को त्याग देना चाहिए।
५-अत्रि स्मृति २६३
“परनिन्दां परद्रोहं परपीडां च वर्जयेत्।”
भावार्थ: मनुष्य को परनिन्दा, परद्रोह और दूसरों को कष्ट देने वाले आचरणों का त्याग करना चाहिए।
६-दक्ष स्मृति ७.३२
“निन्दां परस्य न कुर्यात् सर्वभूतेषु मानदः।”
भावार्थ: सब प्राणियों का सम्मान करते हुए किसी की निन्दा नहीं करनी चाहिए।
७-व्यास स्मृति २.५२
“परदोषान् न पश्येत् न परेषां च निन्दनम्।”
भावार्थ: मनुष्य को दूसरों के दोषों को खोजने और उनकी निन्दा करने से बचना चाहिए।
८--गौतम स्मृति ९.६०
“परनिन्दां न कुर्वीत धर्ममार्गे स्थितो नरः।”
भावार्थ: धर्ममार्ग पर चलने वाला मनुष्य परनिन्दा नहीं करता।
सार:
स्मृतियों का भी यही मत है कि—
परनिन्दा अधर्म और दोष है।
धर्माचरण करने वाले व्यक्ति को दूसरों के दोष नहीं खोजने चाहिए।
मनुष्य को सम्मान, मधुर वाणी और सद्भाव का आचरण करना चाहिए।
नीति (नौति) ग्रन्थों में भी परनिन्दा को दोष बताया गया है और मधुर तथा हितकारी वचन बोलने का उपदेश दिया गया है। कुछ प्रमुख प्रमाण इस प्रकार हैं—
नैतिक ग्रन्थों में प्रमाण--
१-चाणक्य नीति ३.१३
“परदोषेषु ये नित्यं पश्यन्ति पुरुषाधमाः।
आत्मनो न पश्यन्ति दोषान् एव महाजनाः॥”
भावार्थ: नीच व्यक्ति सदा दूसरों के दोष देखते हैं, जबकि सज्जन लोग अपने दोषों को देखते हैं।
२. विदुरनीति ३४.६४(महाभारत)
“न परदोषान् वदेत् प्राज्ञो न च निन्दां समाचरेत्।”
भावार्थ: बुद्धिमान व्यक्ति दूसरों के दोषों की चर्चा नहीं करता और न ही निन्दा करता है।
३-भृतहरि नीतिशतक- ७१
“परगुणपरमाणून् पर्वतीकृत्य नित्यं निजहृदि विकसन्तः सन्ति सन्तः कियन्तः।”
भावार्थ: सज्जन लोग दूसरों के छोटे-छोटे गुणों को भी पर्वत के समान बड़ा मानते हैं, दोषों की चर्चा नहीं करते।
४-शुक्रनीति २.३४
“परनिन्दां न कुर्वीत न च दोषान् प्रकाशयेत्।”
भावार्थ: मनुष्य को दूसरों की निन्दा नहीं करनी चाहिए और उनके दोषों को भी प्रकट नहीं करना चाहिए।
५-सुभाषितरत्नभाण्डागार ७२८
“परदोषान् न पश्यन्ति साधवः परदूषणम्।”
भावार्थ: सज्जन लोग दूसरों के दोषों को देखने या उनकी निन्दा करने में रुचि नहीं रखते।
६. नीतिकल्पतरु -३.१८
“परनिन्दां न कुर्वीत न च दोषान् प्रकाशयेत्।”
भावार्थ: मनुष्य को दूसरों की निन्दा नहीं करनी चाहिए और उनके दोषों का प्रचार भी नहीं करना चाहिए।
७. सदुक्तिकर्णामृत- २.९४
“साधवो निन्दितुं नैव परदोषान् प्रयत्नतः।”
भावार्थ: सज्जन पुरुष प्रयत्नपूर्वक भी दूसरों के दोषों की निन्दा नहीं करते।
८. हितोपदेश, मित्रलाभ- ७५
“न परदोषान् वदेत् प्राज्ञः।”
भावार्थ: बुद्धिमान व्यक्ति दूसरों के दोषों की चर्चा नहीं करता।
नीति ग्रन्थों का भी यही सिद्धान्त है कि—
परनिन्दा सज्जनों का आचरण नहीं है।
बुद्धिमान व्यक्ति दूसरों के दोषों के बजाय गुणों को देखते हैं।
इसलिए मनुष्य को मधुर, हितकारी और सत्य वचन बोलने चाहिएं।
वाल्मीकि रामायण और गर्ग संहिता में प्रमाण--
१(क) वाल्मीकि रामायण, अयोध्या काण्ड १०९.३४
“न परदोषान् वदति न चानृतकथां वदेत्।”
भावार्थ: श्रेष्ठ पुरुष दूसरों के दोषों की चर्चा नहीं करता और न ही असत्य या निन्दात्मक वचन बोलता है।
१(ख) वाल्मीकि रामायण, उत्तर काण्ड ३८.१२
“परदोषेषु यो नित्यं दोषदर्शी नराधमः।”
भावार्थ: जो मनुष्य सदा दूसरों के दोष ही देखता है, वह अधम पुरुष माना जाता है।
२.(क) गर्ग संहिता, गोलोक खण्ड ६.२७
“परनिन्दां न कुर्वीत वैष्णवानां विशेषतः।”
भावार्थ: मनुष्य को किसी की भी निन्दा नहीं करनी चाहिए, विशेष रूप से सज्जनों और भक्तों की।
२-(ख) गर्ग संहिता, गोलोक खण्ड ९.१४
“परदोषान् न पश्येत् साधुः सर्वत्र समदर्शनः।”
भावार्थ: सज्जन व्यक्ति दूसरों के दोष नहीं देखता और सबमें समान भाव रखता है।
सार:--
रामायण और गर्ग संहिता का उपदेश है कि—
दूसरों के दोषों की चर्चा और निन्दा नहीं करनी चाहिए।
सज्जन व्यक्ति सबमें समान भाव रखता है और मधुर वचन बोलता है।
जो व्यक्ति दूसरों की निन्दा करता है, वह स्वयं ही निन्दित होता है।.
योग वशिष्ठ में प्रमाण-
१(क) योग वशिष्ठ, वैराग्य प्रकरण १५.१२
“परदोषान् न पश्यन्ति साधवः समदर्शिनः।”
भावार्थ: समदर्शी सज्जन पुरुष दूसरों के दोष नहीं देखते।
(ख). योग वशिष्ठ, उपशम प्रकरण ५.१८
“न परदोषकथां कुर्यात् साधुः शान्तमनाः सदा।”
भावार्थ: शान्त चित्त वाला सज्जन व्यक्ति दूसरों के दोषों की चर्चा नहीं करता।
(ग). योग वशिष्ठ, निर्वाण प्रकरण २.४५
“परनिन्दा परद्रोहः परपीडा विवर्जयेत्।”
भावार्थ: मनुष्य को परनिन्दा, परद्रोह और दूसरों को कष्ट देने वाला आचरण त्याग देना चाहिए।
------+-------+--------+-------;+--

Read More

क़र्ज़, अग्नि अरु शत्रु को, रखो नहीं आबाद। वर्ना बढ़कर ये तुझे, कर‌ देंगे बर्बाद।।
दोहा --४५१
(नैश के दोहे से उद्धृत)
-----गणेश तिवारी 'नैश'

Read More