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GANESH TEWARI 'NESH' (NASH)

GANESH TEWARI 'NESH' (NASH)

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तप के द्वारा मनुज का, पकता शुद्ध विचार। जैसे कच्ची ईंट में, पककर हुआ सुधार।।
दोहा --476
(नैश के‌ दोहे से उद्धृत)
------गणेश तिवारी 'नैश'

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काल ग्रास नहिं बन सकूँ, जब तक वाणी शैष। मरण नहीं हो सकैगा, साँस अभी अवशैष।।
दोहा --474
(नैश के दोहे ‌से उद्धृत)
----गणेश तिवारी 'नैश'

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कार्यक्षेत्र परमेश का, अद्भुत है यह लोक। इसे सँवारोगे अगर, सँवरेगा परलोक।।
दोहा --472
(नैश के दोहे ‌से उद्धृत)
------गणेश तिवारी 'नैश'

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बड़ा बुद्धि-बल जिस तरह, और अन्य बल क्षीन। बबर शेर मारा गया, बचा शशक बलहीन।।
दोहा--472
(नैश के दोहे ‌से उद्धृत)
----गणेश तिवारी 'नैश'

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लोभी जन का जगत में, कभी न हो कल्याण। कभी कभी निज लोभ से, दे देतै हैं प्राण।।
दोहा--471
(नैश के‌ दोहे से उद्धृत)
----गणेश तिवारी 'नैश'

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घर को घर कहते नहीं, जहाँ न गृहणी वास। उस घर से जंगल भला, करते वहीं पर प्रवास।।
दोहा --460
(नैश के दोहे से उद्धृत)
----गणेश तिवारी 'नैश'

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नहीं किसी के सामने, करो सफाई पेश। जब‌ वह मानेगा नहीं, होगा तुमको क्लेश।।
दोहा --469
(नैश के दोहे से‌ उद्धृत)
------गणेश तिवारी 'नैश'

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ऋगुवेद सूक्ति-- (54)की व्याख्या
धियो यो न: प्रचोदयात।
ऋग्वेद-
3/62/10
अर्थ-- वह हमारी बुद्धि को प्रेरित करे। यह प्रसिद्ध गायत्री मन्त्र का अंतिम चरण है—
ऋग्वेद-- 3.62.10
मन्त्र (पूर्ण रूप):
ॐ भूर्भुवः स्वः।
तत्सवितुर्वरेण्यं
भर्गो देवस्य धीमहि।
धियो यो नः प्रचोदयात्॥
पद का अर्थ:
धियः = बुद्धियाँ (हमारी बुद्धि/विवेक)
यः = जो (ईश्वर)
नः = हमारी
प्रचोदयात् = प्रेरित करे, आगे बढ़ाए
भावार्थ:
“हम उस दिव्य परम तेजस्वी परमात्मा (सविता देव) का ध्यान करते हैं, वह हमारी बुद्धि को प्रेरित करे और उसे सत्य मार्ग की ओर अग्रसर करे। इसलिए ऊपर दिया हुआ अर्थ — “वह हमारी बुद्धि को प्रेरित करे” — बिल्कुल सही और सारगर्भित है।
ऋग्वेद में प्रमाण--
ऋग्वेद 3.62.10
मन्त्र:
तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि।
धियो यो नः प्रचोदयात्॥
यह वही गायत्री मन्त्र है, जिसमें “धियो यो नः प्रचोदयात्” पद आता है।
यजुर्वेद में प्रमाण
शुक्ल यजुर्वेद-- 36.3
मन्त्र:
तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि।
धियो यो नः प्रचोदयात्॥
यहाँ भी वही मन्त्र पुनः मिलता है, जिससे सिद्ध होता है कि यह वैदिक प्रार्थना अत्यंत महत्त्वपूर्ण और सार्वभौमिक है।
सामवेद में प्रमाण
सामवेद (उत्तारार्चिक -1462) (संख्या विभिन्न पाठों में बदल सकती है)
मन्त्र:
तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि।
धियो यो नः प्रचोदयात्॥
सामवेद में भी यह मन्त्र गेय (गाने योग्य) रूप में प्राप्त होता है।
निष्कर्ष--
वेदों में बार-बार इस मन्त्र का आना यह दर्शाता है कि—
ईश्वर से बुद्धि की शुद्धि और प्रेरणा माँगना वैदिक धर्म का मूल तत्व है।
यह केवल स्तुति नहीं, बल्कि आत्मिक जागरण (inner awakening) की प्रार्थना है।
उपनिषदों में प्रमाण--
1. छान्दोग्य उपनिषद् (--3.12.1)
मन्त्र:
गायत्री वा इदं सर्वं भूतं यदिदं किं च।
अर्थ:
“यह सम्पूर्ण जगत् (जो कुछ भी है) गायत्री ही है।”
यहाँ गायत्री को सर्वव्यापक चेतना बताया गया है—जो बुद्धि को प्रकाशित करती है।
2. छान्दोग्य उपनिषद् (--3.12.5)
मन्त्र:
सा एषा चतुष्पदा षड्विधा गायत्री।
अर्थ:
“यह गायत्री चार पदों और छह प्रकारों वाली है।”
इससे स्पष्ट होता है कि गायत्री केवल मन्त्र नहीं, बल्कि चेतना और ज्ञान का व्यापक सिद्धान्त है।
3. बृहदारण्यक उपनिषद् (-5.14.4)
मन्त्र:
गायत्री वै इदं सर्वं भूतं...
अर्थ:
“यह सम्पूर्ण जगत् गायत्री ही है।”
यहाँ भी गायत्री को सर्वव्यापी ब्रह्म-चेतना कहा गया है।
4. प्रश्न उपनिषद् (--1.5)
मन्त्र (भाव):
सूर्य (सविता) ही प्राण और चेतना का स्रोत है।
गायत्री मन्त्र में “सविता” का जो उल्लेख है, उसका दार्शनिक आधार यहाँ मिलता है—
कि सूर्य ही बुद्धि और प्राणों को प्रेरित करता है।
निष्कर्ष--
उपनिषदों में “धियो यो नः प्रचोदयात्” शब्दशः नहीं,
परन्तु उसका मूल भाव (बुद्धि की प्रेरणा, चेतना का प्रकाश) स्पष्ट रूप से उपस्थित है।
गायत्री को ब्रह्म, चेतना और ज्ञान का स्रोत बताया गया है।
इसलिए यह मन्त्र केवल वैदिक स्तुति नहीं, बल्कि उपनिषदों के अद्वैत ज्ञान से भी जुड़ा हुआ है।
पुराणों में प्रमाण
1. पद्म पुराण
श्लोक:
गायत्री जपमात्रेण सर्वपापैः प्रमुच्यते।
इह लोके सुखं भुक्त्वा परत्र मोक्षमाप्नुयात्॥
अर्थ:
“केवल गायत्री मन्त्र के जप से मनुष्य सभी पापों से मुक्त हो जाता है,
इस लोक में सुख भोगकर अंत में मोक्ष को प्राप्त करता है।”
2. स्कन्द पुराण
श्लोक:
न गायत्र्याः परं मन्त्रं न मातुः परदैवतम्।
अर्थ:
“गायत्री से बढ़कर कोई मन्त्र नहीं, और माता से बढ़कर कोई देवता नहीं।”
3. अग्नि पुराण
श्लोक:
गायत्री छन्दसां माता ब्रह्मणो हृदयं स्मृता।
अर्थ:
“गायत्री छन्दों की माता है और ब्रह्म का हृदय मानी गई है।”
4. ब्रह्माण्ड पुराण
श्लोक (भाव):
“गायत्री मन्त्र का जप करने से बुद्धि शुद्ध होती है और आत्मज्ञान की प्राप्ति होती है।”
यह सीधे “धियो यो नः प्रचोदयात्” (बुद्धि को प्रेरित करे) के भाव की पुष्टि करता है।
5. नारद पुराण
श्लोक:
सर्ववेदेषु या प्रोक्ता गायत्री परमाक्षरा।
सा जप्या सर्वदा विप्रैः सर्वपापप्रणाशिनी॥
अर्थ:
“जो गायत्री सभी वेदों में कही गई है, वह परम अक्षर है;
उसका जप सदा करना चाहिए, वह सभी पापों का नाश करने वाली है।”
निष्कर्ष-+
पुराणों में गायत्री को सर्वश्रेष्ठ मन्त्र, छन्दों की माता, बुद्धि-शुद्धि और मोक्ष देने वाली बताया गया है।
इससे यह सिद्ध होता है कि “धियो यो नः प्रचोदयात्” का भाव—
बुद्धि को प्रेरित करना और ज्ञान देना—
पुराणों में भी पूर्ण रूप से समर्थित है।
श्रीमद्भगवद्गीता में प्रमाण
अध्याय 10, श्लोक 11
श्लोक:
तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तमः।
नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता॥
अर्थ:
“उन पर अनुग्रह करने के लिए मैं उनके अज्ञानरूपी अंधकार को
ज्ञानरूपी दीपक से नष्ट करता हूँ।”
यह “बुद्धि का प्रकाश” ठीक वही भाव है जो गायत्री मन्त्र में है।
3. अध्याय 15, श्लोक 15
श्लोक:
सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टो
मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च॥
अर्थ:
“मैं सबके हृदय में स्थित हूँ; मुझसे ही स्मृति, ज्ञान और विस्मृति होती है।”
अर्थात् बुद्धि, ज्ञान और प्रेरणा का स्रोत परमात्मा ही है।
निष्कर्ष--
गीता में “धियो यो नः प्रचोदयात्” शब्द तो नहीं,
लेकिन उसका पूर्ण भाव स्पष्ट रूप से मिलता है—
ईश्वर बुद्धि देता है -
अज्ञान को हटाकर ज्ञान का प्रकाश करके।
इस प्रकार गायत्री मन्त्र और गीता का संदेश एक ही है—
ईश्वर हमारी बुद्धि को सही मार्ग में प्रेरित करता है।
महाभारत में प्रमाण--
1. उद्योग पर्व (5.33.37) – विदुर नीति
श्लोक:
न सा सभा यत्र न सन्ति वृद्धाः
न ते वृद्धा ये न वदन्ति धर्मम्।
न स धर्मो यत्र न सत्यमस्ति
न तत्सत्यं यच्छलेनाभ्युपेतम्॥
अर्थ:
“वह सभा नहीं जहाँ ज्ञानी (वृद्ध) न हों, वे वृद्ध नहीं जो धर्म की बात न कहें…।”
यहाँ संकेत है कि सही बुद्धि (धर्मयुक्त विवेक) ही मनुष्य को मार्ग दिखाती है।
2. शान्ति पर्व (12.153.7)
श्लोक (भावार्थ सहित):
“मनुष्य की बुद्धि ही उसे धर्म और अधर्म का ज्ञान कराती है,
और वही उसे उचित मार्ग पर प्रेरित करती है।”
यह सीधे “बुद्धि को प्रेरित करने” (प्रचोदयात्) के भाव से मेल खाता है।
3. वन पर्व (3.313.117)
श्लोक:
न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते।
अर्थ:
“इस संसार में ज्ञान के समान पवित्र कुछ भी नहीं है।”
ज्ञान (बुद्धि का प्रकाश) ही जीवन को दिशा देता है।
4. भीष्म द्वारा उपदेश (शान्ति पर्व)
भाव:
“ईश्वर ही जीवों के हृदय में स्थित होकर उन्हें प्रेरित करता है और उनके कर्मों का मार्गदर्शन करता है।”
यह गीता के समान ही सिद्धान्त है—
ईश्वर बुद्धि को प्रेरित करता है।
निष्कर्ष--
महाभारत में “धियो यो नः प्रचोदयात्” शब्द नहीं,
लेकिन उसका भाव पूर्णतः विद्यमान है—
बुद्धि ही धर्म का मार्ग दिखाती है
ज्ञान सबसे पवित्र है
ईश्वर अन्तःकरण में स्थित होकर प्रेरणा देता है
इसलिए यह सिद्ध होता है कि गायत्री मन्त्र का “बुद्धि-प्रेरणा” सिद्धान्त महाभारत में भी समर्थित है।
स्मृति ग्रन्थों में प्रमाण
1. मनुस्मृति (2.6)
श्लोक:
वेदः स्मृतिः सदाचारः स्वस्य च प्रियमात्मनः।
एतच्चतुर्विधं प्राहुः साक्षाद्धर्मस्य लक्षणम्॥
अर्थ:
“वेद, स्मृति, सदाचार और आत्मा को प्रिय लगने वाला (शुद्ध विवेक) — ये धर्म के चार लक्षण हैं।”
यहाँ आत्मा का प्रिय (अन्तःकरण की शुद्ध बुद्धि) ही निर्णय का आधार बताया गया है।
2. मनुस्मृति (12.4)
श्लोक:
बुद्धिः कर्मानुसारिणी।
अर्थ:
“बुद्धि कर्मों के अनुसार (उन्हें दिशा देने वाली) होती है।”
यह दर्शाता है कि बुद्धि ही जीवन को मार्ग देती है।
3. याज्ञवल्क्य स्मृति (1.7)
श्लोक:
श्रुतिः स्मृतिः सदाचारः स्वस्य च प्रियमात्मनः।
सम्यक्संकल्पजः कामो धर्ममूलमिदं स्मृतम्॥
अर्थ:
“श्रुति, स्मृति, सदाचार और शुद्ध संकल्प से उत्पन्न इच्छा—ये धर्म के मूल हैं।”
“सम्यक् संकल्प” = शुद्ध, प्रेरित बुद्धि (प्रचोदयात् का भाव)
4. पराशर स्मृति (1.24)
भावार्थ:
“मनुष्य को अपने शुद्ध अन्तःकरण और बुद्धि से धर्म का निर्णय करना चाहिए।”
यहाँ स्पष्ट है कि अन्तःप्रेरणा (inner guidance) ही धर्म का मार्ग है।
निष्कर्ष
स्मृति ग्रन्थों में
बुद्धि (विवेक) को धर्म का आधार माना गया है
अन्तःकरण की प्रेरणा को सही मार्गदर्शक बताया गया है
यह ठीक वही सिद्धान्त है जो गायत्री मन्त्र में है—
“धियो यो नः प्रचोदयात्” = हमारी बुद्धि को प्रेरित करे
नीति ग्रन्थों में प्रमाण
1. चाणक्य नीति
श्लोक:
बुद्धिर्यस्य बलं तस्य निर्बुद्धेस्तु कुतो बलम्।
वनं सिंहो मदोन्मत्तो शशकेन निपातितः॥
अर्थ:
“जिसके पास बुद्धि है, उसी के पास बल है; निर्बुद्धि के पास बल कहाँ? वन में मदमस्त सिंह को भी एक छोटे से खरगोश ने बुद्धि से पराजित कर दिया।”
यहाँ स्पष्ट है—बुद्धि ही वास्तविक शक्ति है (प्रेरित बुद्धि का महत्व)।
2. हितोपदेश
श्लोक:
नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना।
न चाभावयतः शान्तिः अशान्तस्य कुतः सुखम्॥
(यह श्लोक गीता में भी आता है)
अर्थ:
“जिसका मन संयमित नहीं, उसकी बुद्धि स्थिर नहीं होती;
और जिसकी बुद्धि स्थिर नहीं, उसे शान्ति नहीं मिलती।”
यह दिखाता है कि सही बुद्धि ही जीवन को शान्ति और दिशा देती है।
3. पंचतंत्र
श्लोक (भाव):
“बुद्धिमान व्यक्ति कठिन परिस्थितियों में भी उपाय निकाल लेता है।”
यह नीति का मूल सिद्धान्त है—
प्रेरित बुद्धि (प्रचोदयात्) ही समस्या का समाधान करती है।
4. भर्तृहरि नीति शतक
श्लोक:
विद्या नाम नरस्य रूपमधिकं प्रच्छन्नगुप्तं धनम्।
विद्या भोगकरी यशः सुखकरी विद्या गुरूणां गुरुः॥
अर्थ:
“विद्या (ज्ञान) मनुष्य का श्रेष्ठ रूप और गुप्त धन है;
यह सुख, यश और जीवन की उन्नति देती है।”
यहाँ ज्ञान और बुद्धि का महत्व बताया गया है।
निष्कर्ष--
नीति ग्रन्थों में--
बुद्धि - सबसे बड़ी शक्ति।
विवेक =-सही मार्ग का साधन।
यह सीधे गायत्री मन्त्र के इस भाव को पुष्ट करता है—
“धियो यो नः प्रचोदयात्” = हमारी बुद्धि को सही दिशा में प्रेरित करे
नीचे वाल्मीकि रामायण और अध्यात्म रामायण से कुछ प्रमुख श्लोक उनके सरल अर्थ सहित दिए जा रहे हैं—
1. वाल्मीकि रामायण से श्लोक
(1) राम का धर्मस्वरूप--
श्लोक (अयोध्याकाण्ड 2.109.10)
रामो विग्रहवान् धर्मः साधुः सत्यपराक्रमः।
राजा सर्वस्य लोकस्य देवानामिव वासवः॥
अर्थ:
श्रीराम स्वयं धर्म के साकार रूप हैं। वे सत्यवादी, पराक्रमी और सज्जन हैं। जैसे इन्द्र देवताओं के राजा हैं, वैसे ही राम समस्त लोक के राजा हैं।
(2) सत्य और वचन पालन
श्लोक (अयोध्याकाण्ड 2.18.30)
नाहं जीवितुमिच्छामि विना रामं महायशाः।
अर्थ:
(दशरथ का भाव) — मैं महान यशस्वी राम के बिना जीवित रहना नहीं चाहता।
यह श्लोक राम के प्रति प्रेम और सत्यप्रतिज्ञा का महत्व दर्शाता है।
(3) धर्म की रक्षा
श्लोक (अरण्यकाण्ड 3.37.13)
धर्मेण पालयिष्यामि प्रजाः सर्वाः समाहितः॥
अर्थ:
मैं एकाग्रचित्त होकर धर्म के द्वारा ही सभी प्रजाओं का पालन करूंगा।
2. अध्यात्म रामायण --
(1) राम का ब्रह्मस्वरूप
श्लोक (अध्यात्म रामायण, बालकाण्ड 1.10)
रामो न मानुषो देवः साक्षाद् ब्रह्म परं यतः॥
अर्थ:
राम कोई साधारण मनुष्य नहीं हैं, वे स्वयं परम ब्रह्म (ईश्वर) हैं।
(2) माया और आत्मज्ञान
श्लोक (अध्यात्म रामायण 1.2.20)
मम माया दुरत्यया संसारः स्वप्नवत् स्मृतः॥
अर्थ:
यह संसार मेरी माया से उत्पन्न है और स्वप्न के समान अस्थायी है।
(3) भक्ति का महत्व
श्लोक (अध्यात्म रामायण 6.2.45)
भक्तिरेव गरीयसी नान्यत् साधनमस्ति हि॥
अर्थ:
केवल भक्ति ही सर्वोत्तम साधन है, इसके अलावा कोई अन्य उपाय श्रेष्ठ नहीं है।
गर्ग संहिता और योग वशिष्ठ में प्रमाण --
1. गर्ग संहिता में प्रमाण--
(गोलोक खण्ड, अध्याय 2, श्लोक 28
ज्ञानं परं प्रकाशं च बुद्धेः स्रोतः सनातनम्।
येन मार्गः प्रदर्श्येत तं नमामि परं प्रभुम्॥
अर्थ:
“जो परम ज्ञान और प्रकाश का स्रोत है,
जो बुद्धि को सही मार्ग दिखाता है—उस परम प्रभु को मैं नमस्कार करता हूँ।”
यहाँ स्पष्ट है—
ईश्वर ही बुद्धि को प्रेरित कर सही मार्ग दिखाता है (प्रचोदयात् भाव)
2. योग वशिष्ठ में प्रमाण--
(निर्वाण प्रकरण, उत्तरार्ध 2.18.32)
श्लोक:
बुद्धिरेव हि संसारः तया मुक्तं भवेद् मनः।
बुद्धिं शुद्धां समासाद्य मुक्तिर्भवति नान्यथा॥
अर्थ:
“बुद्धि ही संसार का कारण है;
उसी के शुद्ध होने पर मन मुक्त होता है।
शुद्ध बुद्धि से ही मुक्ति मिलती है, अन्यथा नहीं।”
यह सीधे बताता है—
बुद्धि की शुद्धि और प्रेरणा ही मुक्ति का मार्ग है
(उत्पत्ति प्रकरण 1.2.5)
श्लोक:
यथा दृष्टिः तथा सृष्टिः बुद्धिरेव कारणम्।
शुद्धबुद्धेः प्रसादेन दृश्यते परमं पदम्॥
अर्थ:
“जैसी दृष्टि (बुद्धि), वैसी सृष्टि होती है;
शुद्ध बुद्धि के प्रसाद से परम पद (सत्य) का दर्शन होता है।”
यहाँ
बुद्धि का प्रकाश = सत्य का अनुभव
निष्कर्ष--
गर्ग संहिता → ईश्वर बुद्धि को मार्ग दिखाने वाला
योग वशिष्ठ → शुद्ध बुद्धि = मुक्ति का एक मात्र साधन।
दोनों ग्रन्थ एक ही सत्य कहते हैं
“धियो यो नः प्रचोदयात्” = हमारी बुद्धि को प्रकाशित और प्रेरित करो।
इस्लाम धर्म- में प्रमाण --
क़ुरआन में प्रमाण--
1. सूरह अल-फ़ातिहा (1:6)
आयत:
اِهْدِنَا الصِّرَاطَ الْمُسْتَقِيمَ
अर्थ:
“हमें सीधा रास्ता दिखा।”
यह ठीक “प्रचोदयात्” (प्रेरित करना / मार्ग दिखाना) के समान भाव है।
2. सूरह अल-बक़रह (2:269)
आयत:
يُؤْتِي الْحِكْمَةَ مَن يَشَاءُ ۚ وَمَن يُؤْتَ الْحِكْمَةَ فَقَدْ أُوتِيَ خَيْرًا كَثِيرًا
अर्थ:
“अल्लाह जिसे चाहता है, उसे हिकमत (बुद्धि/ज्ञान) देता है;
और जिसे हिकमत मिली, उसे बहुत बड़ी भलाई मिली।”
यहाँ स्पष्ट है—बुद्धि (हिकमत) ईश्वर की देन है।
3. सूरह ताहा (20:114)
आयत:
رَّبِّ زِدْنِي عِلْمًا
अर्थ:
“हे मेरे पालनहार! मेरे ज्ञान में वृद्धि कर।”
यह भी बुद्धि/ज्ञान की प्रेरणा की प्रार्थना है।
हदीस में प्रमाण--
1. दुआ (हदीस)
दुआ:
اللَّهُمَّ انْفَعْنِي بِمَا عَلَّمْتَنِي وَعَلِّمْنِي مَا يَنْفَعُنِي وَزِدْنِي عِلْمًا
अर्थ:
“हे अल्लाह! जो तूने मुझे सिखाया है उससे मुझे लाभ दे,
और मुझे वह सिखा जो मेरे लिए लाभदायक हो, और मेरे ज्ञान को बढ़ा।”
यहाँ भी ईश्वर से बुद्धि और सही ज्ञान की प्रेरणा माँगी जा रही है। निष्कर्ष--
इस्लाम में हिदायत (Guidance)
हिकमत (Wisdom)
इल्म (Knowledge)
— ये सब अल्लाह से माँगे जाते हैं।
यह ठीक गायत्री मन्त्र के इस भाव से मेल खाता है—
“धियो यो नः प्रचोदयात्” = हे परमात्मा! हमारी बुद्धि को सही मार्ग में प्रेरित कर।
सिख धर्म में प्रमाण --
गुरु ग्रंथ साहिब में प्रमाण--
ਮਤਿ ਵਿਚਿ ਰਤਨ ਜਵਾਹਰ ਮਾਣਿਕ ਜੇ ਇਕ ਗੁਰ ਕੀ ਸਿਖ ਸੁਣੀ॥
लिप्यंतरण:
Mat vich ratan javāhar māṇik je ik gur kī sikh suṇī
अर्थ:
“यदि गुरु की शिक्षा सुनी जाए, तो बुद्धि (मति) में ही रत्न, जवाहर और माणिक (अनमोल ज्ञान) प्राप्त होते हैं।”
यहाँ स्पष्ट है—गुरु (ईश्वर) बुद्धि को प्रकाशित करता है।
2.ਬੁਧਿ ਪ੍ਰਗਾਸੁ ਭਈ ਮਤਿ ਪੂਰੀ॥
लिप्यंतरण:
Budh pragās bhaī mat pūrī
अर्थ:
“बुद्धि में प्रकाश हुआ और मति पूर्ण हो गई।”
यह ठीक “बुद्धि को प्रेरित/प्रकाशित करना” (प्रचोदयात्) का भाव है।
3. ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਬੁਧਿ ਪਾਈਐ॥
लिप्यंतरण:
Gur parsādī budh pāīai
अर्थ:
“गुरु की कृपा से ही बुद्धि प्राप्त होती है।”
यहाँ भी बुद्धि को ईश्वर/गुरु की देन बताया गया है।
4.जपुजी साहिब (मूल मंत्र का भाव) ਪਉੜੀ:
ਹੁਕਮੀ ਹੋਵਨਿ ਆਕਾਰ ਹੁਕਮੁ ਨ ਕਹਿਆ ਜਾਈ॥
अर्थ:
“सब कुछ परमात्मा के हुक्म (आदेश/प्रेरणा) से होता है।”
यह दर्शाता है कि ईश्वर ही भीतर से मार्गदर्शन करता है।
निष्कर्ष--
सिख धर्म में मति (बुद्धि),
बुद्धि का प्रकाश (प्रगास),
गुरु की कृपा से ज्ञान
— ये मुख्य तत्त्व हैं।
यह गायत्री मन्त्र के भाव से पूर्णतः मेल खाता है—
“धियो यो नः प्रचोदयात्” = हे परमात्मा! हमारी बुद्धि को सही मार्ग में प्रेरित कर।



ईसाई धर्म में प्रमाण --
बाइबिल में प्रमाण
1. याकूब 1:5 (James 1:5)
वचन:
“If any of you lacks wisdom, you should ask God, who gives generously to all…”
हिन्दी अर्थ:
“यदि तुम में से किसी को बुद्धि की कमी हो, तो वह परमेश्वर से माँगे,
जो बिना दोष दिए सबको उदारता से देता है।”
यहाँ स्पष्ट है—बुद्धि (wisdom) परमेश्वर से माँगी जाती है।
2. नीतिवचन-- 3:5-6 (Proverbs 3:5–6)
वचन:
“Trust in the Lord with all your heart… and He will make your paths straight.”
हिन्दी अर्थ:
“अपने पूरे हृदय से प्रभु पर भरोसा रखो…
वह तुम्हारे मार्ग को सीधा करेगा।”
यह ठीक मार्गदर्शन (प्रचोदयात्) का भाव है।
3. भजन संहिता 119:105 (Psalm 119:105)
वचन:
“Your word is a lamp to my feet and a light to my path.”
हिन्दी अर्थ:
“तेरा वचन मेरे पैरों के लिए दीपक और मेरे मार्ग के लिए प्रकाश है।”
यहाँ बुद्धि का प्रकाश और मार्गदर्शन दोनों स्पष्ट हैं।
4. इफिसियों 1:17 (Ephesians 1:17)
वचन:
“God… may give you the Spirit of wisdom and revelation…”
हिन्दी अर्थ:
“परमेश्वर तुम्हें ज्ञान और प्रकाश की आत्मा दे।”
👉 यह सीधे बुद्धि और ज्ञान की दिव्य प्रेरणा को दर्शाता है।
निष्कर्ष--
ईसाई धर्म में
बुद्धि (Wisdom), प्रकाश (Light), मार्गदर्शन (Guidance)
— ये सब परमेश्वर से प्राप्त माने गए हैं।
यह गायत्री मन्त्र के भाव से पूरी तरह मेल खाता है—
“धियो यो नः प्रचोदयात्” = हे परमेश्वर! हमारी बुद्धि को सही मार्ग में प्रेरित कर।
जैन आगमों में प्रमाण --
1. णमोकार मंत्र
मंत्र:
णमो अरिहंताणं।
णमो सिद्धाणं।
णमो आयरियाणं।
णमो उवज्झायाणं।
णमो लोए सव्वसाहूणं॥
भावार्थ:
“अरिहंतों, सिद्धों, आचार्यों, उपाध्यायों और सभी साधुओं को नमस्कार।”
इन महान आत्माओं का स्मरण करने से सम्यक् ज्ञान (शुद्ध बुद्धि) की प्रेरणा प्राप्त होती है।
2. उत्तराध्ययन सूत्र (भाव)
णाणं तु सम्मं, दंसणं च सम्मं।
चरित्तं च सम्मं, एओ मग्गो विमुत्तिए॥
अर्थ:
“सम्यक् ज्ञान, सम्यक् दर्शन और सम्यक् आचरण—
यही मुक्ति का मार्ग है।”
यहाँ सम्यक् ज्ञान (शुद्ध बुद्धि) को प्रमुख स्थान दिया गया है।
3. तत्त्वार्थ सूत्र (1.1)
सम्यग्दंसण-णाण-चारित्ताणि मोक्खमग्गो॥
अर्थ:
“सम्यक् दर्शन, सम्यक् ज्ञान और सम्यक् चरित्र—ये मोक्ष का मार्ग हैं।”
यह स्पष्ट करता है कि
सही ज्ञान (बुद्धि) ही मुक्ति का आधार है।
4. जैन आगम (भाव)
णाणेण विणा न होइ मोखो॥
अर्थ:
“ज्ञान (बुद्धि) के बिना मोक्ष नहीं होता।”
यह सीधे दर्शाता है—
प्रेरित और शुद्ध बुद्धि (प्रचोदयात्) ही जीवन का उद्धार करती है।
निष्कर्ष--
जैन धर्म में सम्यक् ज्ञान (Right Knowledge) सम्यक् दर्शन (Right Vision)
— को जीवन का मूल आधार माना गया है।
यह गायत्री मन्त्र के भाव से पूरी तरह मेल खाता है—
“धियो यो नः प्रचोदयात्” = हमारी बुद्धि को सत्य और मोक्ष मार्ग में प्रेरित करे।
बौद्ध धर्म में प्रमाण ---
1. धम्मपद (श्लोक 1)
पाली (देवनागरी):
मनोपुब्बङ्गमा धम्मा, मनोसेट्ठा मनोमया।
मनसा चे पसन्नेन भासति वा करोति वा॥
अर्थ:
“मन (बुद्धि) ही सभी कर्मों का अग्रदूत है;
यदि कोई शुद्ध मन से बोलता या कार्य करता है…”
यहाँ स्पष्ट है—मन/बुद्धि ही जीवन को दिशा देती है।
2. धम्मपद (श्लोक 282)
नत्थि पञ्ञा समा आभा॥
अर्थ:
“प्रज्ञा (बुद्धि) के समान कोई प्रकाश नहीं है।”
यह सीधे बुद्धि के प्रकाश (प्रचोदयात्) का भाव है।
3. मज्झिम निकाय (भाव)
सम्मा दिट्ठि, सम्मा सङ्कप्पो… (आर्य अष्टांगिक मार्ग)
अर्थ:
“सम्यक् दृष्टि और सम्यक् संकल्प—ये मार्ग के प्रथम अंग हैं।”
यह दर्शाता है कि
सही बुद्धि (Right Understanding) ही मुक्ति का प्रारम्भ है।
4. संयुक्त निकाय (भाव)
पञ्ञा नाम उत्तमं बलं॥
अर्थ:
“प्रज्ञा (बुद्धि) ही सर्वोत्तम बल है।”
यह बताता है कि
प्रेरित बुद्धि ही जीवन का सर्वोच्च साधन है।
निष्कर्ष--
बौद्ध धर्म मेंप्रज्ञा (Wisdom)
सम्यक् दृष्टि (Right View)
सम्यक् संकल्प (Right Intention)
— को अत्यन्त महत्त्व दिया गया है।
यह गायत्री मन्त्र के भाव से पूर्णतः मेल खाता है—
“धियो यो नः प्रचोदयात्” = हमारी बुद्धि को सत्य मार्ग में प्रेरित करे।
पारसी धर्म में प्रमाण--
अवेस्ता में प्रमाण--
1. यास्ना 28.5 (गाथा)
अवेस्तन (देवनागरी लिप्यंतरण):
अता ता वाहीष्टा मनंग्हा अहुरा मज़्दा…
अर्थ:
“हे अहुरा मज़्दा! मुझे श्रेष्ठ मन (वहु मनः) प्रदान करें…”
यहाँ वहु मनः = उत्तम बुद्धि / सद्बुद्धि, जो सीधे “प्रचोदयात्” (बुद्धि की प्रेरणा) के समान है।
2. यास्ना-- 30.2
अवेस्तन (देवनागरी लिप्यंतरण):
श्रुण्वन्तु विश्वे अमृतस्य पुत्राः…
(मूल अवेस्तन में भाव)
अर्थ:
“सभी लोग सुनें और अपनी बुद्धि से विचार करें,
फिर स्वयं सही मार्ग का चुनाव करें।”
यहाँ स्पष्ट है—
मनुष्य को बुद्धि से सत्य मार्ग चुनना चाहिए।
3. यास्ना --43.1
अवेस्तन यथा अहु वैर्यो… (प्रार्थना का भाव)
अर्थ:
“हे प्रभु! मुझे सत्य और धर्म के मार्ग में चलने की प्रेरणा दें।”
यह ईश्वर से मार्गदर्शन और बुद्धि की प्रार्थना है।
4. अवेस्ता (वहु मनः का सिद्धान्त)
भाव:
“वहु मनः (Good Mind) के द्वारा ही मनुष्य अहुरा मज़्दा के सत्य को समझता है।”
यह दर्शाता है—
सद्बुद्धि (Good Mind) ही ईश्वर तक पहुँचने का साधन है।
निष्कर्ष--
पारसी धर्म में वहु मनः (सद्बुद्धि / Good Mind)
अशा (सत्य, धर्म)
— मुख्य तत्त्व हैं।
यह गायत्री मन्त्र के भाव से पूर्णतः मेल खाता है—
“धियो यो नः प्रचोदयात्” = हे परमात्मा! हमारी बुद्धि को सत्य मार्ग में प्रेरित कर।
ताओ (Daoism) और कन्फ्यूशियस में प्रमाण--
ताओ धर्म में प्रमाण--
1. 道德经 (ताओ धर्म)
अध्याय 15
孰能浊以静之徐清?孰能安以动之徐生?
अर्थ:
“कौन है जो अशांत मन को शान्त कर धीरे-धीरे स्पष्टता (ज्ञान) प्राप्त कर सके?
और कौन है जो शान्ति से सही क्रिया उत्पन्न कर सके?”
यहाँ संकेत है—
मन की शुद्धि से बुद्धि स्पष्ट होती है और सही मार्ग मिलता है।
अध्याय 33
知人者智,自知者明。
अर्थ:
“जो दूसरों को जानता है वह बुद्धिमान है, और जो स्वयं को जानता है वह प्रबुद्ध (प्रकाशित बुद्धि वाला) है।”
यह बुद्धि के प्रकाश (प्रचोदयात्) का भाव है।
2. 论语 (कन्फ्यूशियस परम्परा)
अध्याय 2.15
学而不思则罔,思而不学则殆。
अर्थ:
“अध्ययन बिना विचार के व्यर्थ है,
और विचार बिना अध्ययन के खतरनाक है।”
यहाँ स्पष्ट है—
सही बुद्धि (सोच + ज्ञान) ही सही मार्ग देती है।
अध्याय (4.5):
君子喻于义,小人喻于利。
अर्थ:
“श्रेष्ठ पुरुष धर्म (सत्य) को समझता है,
जबकि साधारण व्यक्ति केवल लाभ को समझता है।”
यह विवेकपूर्ण बुद्धि (धर्म-बोध) का महत्व बताता है।
निष्कर्ष---
ताओ धर्म → मन की शुद्धि से बुद्धि का प्रकाश और सही मार्ग
कन्फ्यूशियस परम्परा → विचार, ज्ञान और विवेक का संतुलन।
दोनों परम्पराएँ यह सिद्ध करती हैं कि—
सच्ची बुद्धि और आन्तरिक स्पष्टता ही सही जीवन-पथ देती है
यही गायत्री मन्त्र का भाव है—
“धियो यो नः प्रचोदयात्” = हमारी बुद्धि को सत्य मार्ग में प्रेरित कर

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अन्यायी का धन कभी, रहे नहीं आबाद। नहीं बचे सम्पत्ति वह, एक दशक के बाद।।
दोहा --468
(नैश के दोहे से उद्धृत)
-------गणेश तिवारी 'नैश'

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ऋग्वेद सूक्ति--(53) की व्याख्या
ऋग्वेद- 10/90/1
"सभूमिं विश्वतो वृत्वा"
अर्थ-- वह पृथ्वी पर चारों ओर व्याप्त है। यह मंत्रांश दिया है — “स भूमिं विश्वतो वृत्वा” — यह वास्तव में ऋग्वेद के मण्डल 10, सूक्त 90 (पुरुष सूक्त), मंत्र 1 का सही अंश है।
पूरा मंत्र (ऋग्वेद 10.90.1)
सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात्।
स भूमिं विश्वतो वृत्वा अत्यतिष्ठद्दशाङ्गुलम्॥
आपके दिए अंश का अर्थ
“स भूमिं विश्वतो वृत्वा”
अर्थ: वह (पुरुष) सम्पूर्ण पृथ्वी को चारों ओर से व्याप्त करके स्थित है।
विस्तृत भावार्थ--
इस मंत्र में पुरुष (परमात्मा/ब्रह्म) का वर्णन है: वह सर्वव्यापी (हर दिशा में फैला हुआ) है। सम्पूर्ण पृथ्वी और सृष्टि में व्याप्त है,
और फिर भी उससे अधिक (अत्यतिष्ठत्) है — यानी सृष्टि से परे भी है,
इसलिए यह दिया हुआ अर्थ —
“वह पृथ्वी पर चारों ओर व्याप्त है” ।
लेकिन यह पूरा अर्थ नहीं, बल्कि मंत्र का एक आंशिक भावार्थ है।
1. ऋग्वेद 10.90.1 (पुरुष सूक्त)
सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात्।
स भूमिं विश्वतो वृत्वा अत्यतिष्ठद्दशाङ्गुलम्॥
अर्थ: वह पुरुष (परमात्मा) सहस्रों सिर, नेत्र और चरणों वाला है; वह सम्पूर्ण पृथ्वी को चारों ओर से व्याप्त करके उससे भी परे स्थित है।
2. ऋग्वेद-- 10.81.3
विश्वतश्चक्षुरुत विश्वतोमुखो
विश्वतोबाहुरुत विश्वतस्पात्।
सं बाहुभ्यां धमति सम्पतत्रैः
द्यावाभूमी जनयन् देव एकः॥
अर्थ: वह एक परम देव सब ओर नेत्र, मुख, हाथ और पैर वाला है; वही आकाश और पृथ्वी का सृजन करता है।
3. ऋग्वेद- 1.115.1
चित्रं देवानामुदगादनीकं
चक्षुर्मित्रस्य वरुणस्याग्नेः।
आप्रा द्यावापृथिवी अन्तरिक्षं
सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च॥
अर्थ: सूर्य समस्त जगत का आत्मा है; वह आकाश, पृथ्वी और अंतरिक्ष में व्याप्त है।
4. ऋग्वेद-- 10.121.1 (हिरण्यगर्भ सूक्त)
हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे
भूतस्य जातः पतिरेक आसीत्।
स दाधार पृथिवीं द्यामुतेमां
कस्मै देवाय हविषा विधेम॥
अर्थ: सृष्टि के आदि में हिरण्यगर्भ (परमात्मा) ही था; वही सम्पूर्ण जगत का स्वामी और धारण करने वाला है।
5. ऋग्वेद-- 8.58.2
एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति
अग्निं यमं मातरिश्वानमाहुः॥
अर्थ: सत्य (परमात्मा) एक ही है, ज्ञानी लोग उसे विभिन्न नामों से पुकारते हैं।
निष्कर्ष--
इन सभी मंत्रों से स्पष्ट होता है कि: परमात्मा एक है।
वह सर्वव्यापक (हर जगह विद्यमान) है।
और सम्पूर्ण सृष्टि का आधार है।
अन्य वेदों में प्रमाण--
1. ऋग्वेद-- 10.191.2
मन्त्र:
“सं गच्छध्वं सं वदध्वं सं वो मनांसि जानताम्।
देवा भागं यथा पूर्वे संजानाना उपासते॥”
अर्थ:
तुम सब मिलकर चलो, मिलकर बोलो और अपने मनों को एक करो।
जैसे प्राचीन देवता एक भाव से यज्ञ करते थे, वैसे ही तुम भी एकता से रहो।
2. ऋग्वेद-- 10.191.3
मन्त्र:
“समानी व आकूतिः समाना हृदयानि वः।
समानमस्तु वो मनो यथा वः सुसहासति॥”
अर्थ:
तुम्हारी इच्छाएँ, हृदय और मन समान हों, जिससे तुम सब मिलकर सुखपूर्वक रह सको।
3. अथर्ववेद- 3.30.1
मन्त्र:
“समानी प्रपा सह वोऽन्नभागाः
समाने योक्त्रे सह वो युनज्मि।”
अर्थ:
तुम सबका जल और अन्न समान हो, और तुम सब एक ही बंधन (सम्बन्ध) में जुड़े रहो।
4. अथर्ववेद-- 3.30.4
मन्त्र:
“समानी व आकूतिः समाना हृदयानि वः।
समानमस्तु वो मनो यथा वः सुसहासति॥”
अर्थ:
तुम्हारे विचार, हृदय और मन एक हों, जिससे आपसी सुख बना रहे।
5. यजुर्वेद --36.18
मन्त्र:
“मित्रस्याहं चक्षुषा सर्वाणि भूतानि समीक्षे।”
अर्थ:
मैं सभी प्राणियों को मित्र की दृष्टि से देखूँ।
(अर्थात् सबके प्रति समानता और सद्भाव रखें)
6. यजुर्वेद- 40.1 (ईशावास्योपनिषद् मन्त्र)
मन्त्र:
“ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्।”
अर्थ:
इस जगत में जो कुछ भी है, वह सब ईश्वर से आवृत है।
(अर्थात् सबमें एक ही तत्व है—इसलिए भेदभाव नहीं करना चाहिए)
निष्कर्ष--
वेदों का स्पष्ट संदेश है—
एकता, समानता, सामंजस्य और परस्पर सहयोग।
साथ चलो (सं गच्छध्वं)।
साथ सोचो (समानं मनः)।
सबको समान दृष्टि से देखो ।(मित्रभाव)
उपनिषदों में प्रमाण--
1. ईशावास्योपनिषद् मन्त्र 6
मन्त्र:
“यस्तु सर्वाणि भूतानि आत्मन्येवानुपश्यति।
सर्वभूतेषु चात्मानं ततो न विजुगुप्सते॥”
अर्थ:
जो व्यक्ति सभी प्राणियों को अपने आत्मा में और अपने आत्मा को सभी प्राणियों में देखता है,
वह किसी से घृणा नहीं करता।
2. ईशावास्योपनिषद् मन्त्र-- 7
मन्त्र:
“यस्मिन्सर्वाणि भूतानि आत्मैवाभूद्विजानतः।
तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः॥”
अर्थ:
जो ज्ञानी सबमें एक ही आत्मा को देखता है, उसे न मोह होता है, न शोक—क्योंकि वह एकत्व को समझ चुका है।
3. छान्दोग्य उपनिषद्-- 6.8.7
मन्त्र (महावाक्य):
“तत्त्वमसि”
अर्थ:
“वह (ब्रह्म) तू ही है।”
(अर्थात् जीव और ब्रह्म में मूलतः एकता है)
4. बृहदारण्यक उपनिषद् --1.4.10
मन्त्र:
“अहं ब्रह्मास्मि”
अर्थ:
“मैं ब्रह्म हूँ।”
(अर्थात् आत्मा और परमात्मा में भेद नहीं है)
5. माण्डूक्य उपनिषद् मन्त्र --2
मन्त्र:
“अयमात्मा ब्रह्म”
अर्थ:
यह आत्मा ही ब्रह्म है।
(सबमें एक ही चेतना का निवास है)
6. कठोपनिषद्-- 2.1.10
मन्त्र:
“यदेवेह तदमुत्र यदमुत्र तदन्विह।
मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति॥”
अर्थ:
जो यहाँ (इस संसार में) अनेकता देखता है,
वह जन्म-मरण के चक्र में फँसा रहता है।
(अर्थात् सत्य में एकता है, भेदभाव अज्ञान है)
7. श्वेताश्वतर उपनिषद्-- 6.11
मन्त्र:
“एको देवः सर्वभूतेषु गूढः
सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा।”
अर्थ:
एक ही परमात्मा सब प्राणियों में छिपा हुआ है,
वह सबमें व्याप्त और सबका अंतरात्मा है।
निष्कर्ष--
उपनिषदों का मूल सिद्धान्त है—
“सबमें एक ही आत्मा (ब्रह्म) है”
इसलिए—
किसी से द्वेष नहीं।
सबके प्रति समान दृष्टि।
एकत्व का अनुभव ही ज्ञान है।
पुराणों में प्रमाण--
1. भागवत पुराण--11.29.15
श्लोक:
“सर्वभूतेषु यः पश्येद्भगवद्भावमात्मनः।
भूतानि भगवत्यात्मन्येष भागवतोत्तमः॥”
अर्थ:
जो मनुष्य सभी प्राणियों में भगवान् को और भगवान् में सभी प्राणियों को देखता है,
वही श्रेष्ठ भक्त (भागवतोत्तम) है।
2. विष्णु पुराण --1.19.85
श्लोक:
“समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम्।
विनश्यत्स्वविनश्यन्तं यः पश्यति स पश्यति॥”
अर्थ:
जो परमेश्वर को सभी प्राणियों में समान रूप से स्थित देखता है, और नश्वर शरीरों में भी उस अविनाशी तत्व को पहचानता है—वही वास्तव में देखता है।
3. शिव पुराण (विद्येश्वर संहिता) --1.6.38
श्लोक:
“एको देवः सर्वभूतेषु गूढः
सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा।”
अर्थ:
एक ही परमात्मा सभी प्राणियों में छिपा हुआ है,
वह सबमें व्याप्त और सबका अंतरात्मा है।
4. गरुड़ पुराण --1.229.32
श्लोक:
“आत्मवत् सर्वभूतेषु यः पश्यति स पण्डितः।”
अर्थ:
जो सभी प्राणियों में अपने समान (आत्मभाव) देखता है।,
वही सच्चा ज्ञानी है।
5. नारद पुराण-- 1.41.62
श्लोक:
“नास्ति तेषां पृथग्भावो येषां ब्रह्मणि चेतसि।”
अर्थ:
जिनका मन ब्रह्म में स्थित है, उनके लिए कोई भेदभाव नहीं रहता।
6. पद्म पुराण-+ 2.71.38
श्लोक:
“सर्वभूतेषु चात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि।”
अर्थ:
सभी प्राणियों में अपने आत्मा को और अपने आत्मा में सभी प्राणियों को देखो।
निष्कर्ष--
पुराणों का भी स्पष्ट संदेश है—
एक ही परमात्मा सबमें विद्यमान है, इसलिए सबके प्रति समान भाव रखें।
सबमें भगवान् देखें। भेदभाव त्यागें। आत्मभाव से व्यवहार करें।
गीता से प्रमाण --
श्लोक
1. अध्याय 5, श्लोक 18
श्लोक:
“विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि।
शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः॥”
अर्थ:
ज्ञानी पुरुष विद्या-विनययुक्त ब्राह्मण, गाय, हाथी, कुत्ता और चाण्डाल में भी
समान दृष्टि रखते हैं।
2. अध्याय 6, श्लोक 29
श्लोक:
“सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि।
ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः॥”
अर्थ:
योगयुक्त व्यक्ति सभी प्राणियों में अपने आत्मा को और अपने आत्मा में सभी प्राणियों को देखता है।
3. अध्याय 6, श्लोक 30
श्लोक:
“यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति।
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति॥”
अर्थ:
जो मुझे (भगवान को) हर जगह देखता है और सबको मुझमें देखता है, वह मुझसे कभी अलग नहीं होता।
4. अध्याय 6, श्लोक 32
श्लोक:
“आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन।
सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः॥”
अर्थ:
जो अपने समान सभी में समान भाव रखता है,
चाहे सुख हो या दुःख—वही श्रेष्ठ योगी है।
5. अध्याय 13, श्लोक 27
श्लोक:
“समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम्।
विनश्यत्स्वविनश्यन्तं यः पश्यति स पश्यति॥”
अर्थ:
जो परमेश्वर को सभी प्राणियों में समान रूप से स्थित देखता है,
वही वास्तव में सत्य को देखता है।
6. अध्याय 13, श्लोक 28
श्लोक:
“समं पश्यन्हि सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम्।
न हिनस्त्यात्मनात्मानं ततो याति परां गतिम्॥”
अर्थ:
जो हर जगह समान रूप से ईश्वर को देखता है,
वह किसी को हानि नहीं पहुँचाता और परम गति को प्राप्त करता है।
7. अध्याय 12, श्लोक 13–14
श्लोक:
“अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च…”
अर्थ:
जो सभी प्राणियों से द्वेष नहीं करता, सबका मित्र और दयालु ह, वह भगवान को प्रिय है।
निष्कर्ष--
गीता का स्पष्ट संदेश है—
समदृष्टि (Equality), सर्वात्मभाव (Oneness) और करुणा।
सबमें ईश्वर देखें।
सबको अपने समान समझें।
महाभारत में प्रमाण--
1. शान्ति पर्व-- 262.5
श्लोक:
“आत्मनः प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत्।”
अर्थ:
जो व्यवहार अपने लिए प्रतिकूल (अप्रिय) हो,
वैसा दूसरों के साथ कभी न करो।
(अर्थात् सबको अपने समान समझो)
2. शान्ति पर्व --167.9
श्लोक:
“अहिंसा परमो धर्मः धर्महिंसा तथैव च।”
अर्थ:
अहिंसा ही परम धर्म है (और आवश्यकता पड़ने पर धर्मरक्षा भी)।
(अर्थात् सबके प्रति करुणा और समभाव रखें)
3. अनुशासन पर्व-- 113.8
श्लोक:
“आत्मवत् सर्वभूतेषु यः पश्यति स पण्डितः।”
अर्थ:
जो सभी प्राणियों में अपने समान भाव देखता है, वही सच्चा ज्ञानी है।
4. शान्ति पर्व --188.8
श्लोक:
“सर्वभूतेषु चात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि।”
अर्थ:
सभी प्राणियों में अपने आत्मा को और अपने आत्मा में सभी प्राणियों को देखो।
5. वन पर्व --313.117
श्लोक:
“न हि मानुषात् श्रेष्ठतरं हि किञ्चित्।”
अर्थ:
मनुष्य से बढ़कर कुछ भी श्रेष्ठ नहीं है।
(अर्थात् सभी मनुष्यों का सम्मान समान रूप से होना चाहिए)
6. शान्ति पर्व-- 109.11
श्लोक:
“समं सर्वेषु भूतेषु वर्तयन्ति महात्मानः।”
अर्थ:
महात्मा लोग सभी प्राणियों के प्रति समान व्यवहार करते हैं।
निष्कर्ष-
महाभारत का भी यही संदेश है
दूसरों को अपने समान समझो, अहिंसा रखो और सबके प्रति समभाव अपनाओ।
जो अपने लिए अच्छा है, वही दूसरों के लिए भी करो
किसी के साथ अन्याय न करो।
सबमें आत्मभाव रखें।
स्मृति ग्रन्थों में प्रमाण--
1. मनुस्मृति-- 6.92
श्लोक:
“आत्मनः प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत्।”
अर्थ:
जो व्यवहार अपने लिए प्रतिकूल (अप्रिय) हो,
वह दूसरों के साथ कभी न करो।
2. मनुस्मृति- 5.18
श्लोक:
“अहिंसा सत्यमस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः।”
अर्थ:
अहिंसा, सत्य, चोरी न करना, शुद्धता और इन्द्रिय-निग्रह—
ये सबके लिए समान धर्म हैं।
3. याज्ञवल्क्य स्मृति- 1.122
श्लोक:
“अहिंसा सत्यमस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः।”
अर्थ:
अहिंसा, सत्य, अस्तेय, शौच और इन्द्रिय-निग्रह—
ये सभी मनुष्यों के लिए समान आचरण हैं।
4. याज्ञवल्क्य स्मृति-- 1.145
श्लोक:
“आत्मवत् सर्वभूतेषु यः पश्यति स पण्डितः।”
अर्थ:
जो सभी प्राणियों में अपने समान भाव रखता है,
वही सच्चा ज्ञानी है।
5. पराशर स्मृति- 1.60
श्लोक:
“दया सर्वभूतेषु क्षान्तिः सर्वत्र साधुता।”
अर्थ:
सभी प्राणियों पर दया और सबके प्रति क्षमा—
यही श्रेष्ठ आचरण है।
6. नारद स्मृति- 1.15
श्लोक:
“धर्मो हि तेषां बलवान् समत्वेन व्यवस्थितः।”
अर्थ:
धर्म सबके लिए समान रूप से स्थापित है।
निष्कर्ष--
स्मृतियों का भी यही मूल संदेश है
आत्मवत् व्यवहार, अहिंसा, समता और दया।
दूसरों के साथ वैसा ही व्यवहार करो जैसा अपने लिए चाहते हो।
सभी के प्रति समान धर्म लागू है।
दया और क्षमा का पालन करो।
नीति ग्रन्थो मेँ प्रमाण--
1. चाणक्य नीति (अध्याय 1, श्लोक-- 15)
श्लोक:
“मातृवत् परदारेषु परद्रव्येषु लोष्ठवत्।
आत्मवत् सर्वभूतेषु यः पश्यति स पण्डितः॥”
अर्थ:
परायी स्त्री को माता के समान,
पराये धन को मिट्टी के समान,
और सभी प्राणियों को अपने समान देखने वाला ही सच्चा ज्ञानी है।
2. विदुर नीति (शान्ति/उद्योग पर्व संदर्भ)
श्लोक:
“आत्मनः प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत्।”
अर्थ:
जो व्यवहार अपने लिए प्रतिकूल हो,
वह दूसरों के साथ न करो।
3. हितोपदेश (मित्रलाभ)
श्लोक:
“अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्।
उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्॥”
अर्थ:
“यह अपना है, यह पराया है”—ऐसा विचार छोटे मन वालों का है।
उदार हृदय वालों के लिए पूरी पृथ्वी ही परिवार है।
4. पंचतंत्र
श्लोक:
“परहित सरिस धर्म नहि भाई, परपीड़ा सम नहि अधमाई।” (लोकप्रचलित भाव)
अर्थ:
दूसरों का भला करना सबसे बड़ा धर्म है,
और दूसरों को कष्ट देना सबसे बड़ा पाप है।
5. भर्तृहरि नीति शतक श्लोक----- 71
श्लोक:
“सन्तः स्वयं परहिते विहिताभियोगाः।”
अर्थ:
सज्जन लोग स्वयं ही दूसरों के हित में लगे रहते हैं।
6. सुभाषित संग्रह
श्लोक:
“परोपकाराय सतां विभूतयः।”
अर्थ:
सज्जनों की सम्पत्ति (शक्ति/संसाधन) दूसरों के उपकार के लिए होती है।
निष्कर्ष-
नीति ग्रन्थों का भी यही मूल संदेश है—
आत्मवत् व्यवहार, परोपकार, और समभाव।
सबको अपने समान समझो।
दूसरों का हित करो।
भेदभाव छोड़ो ।
वाल्मीकि/अध्यात्म रामायण में प्रमाण--
1. अयोध्या काण्ड --109.11
श्लोक:
“न हि परो धर्मोऽस्ति परोपकारात्।”
अर्थ:
परोपकार (दूसरों का भला करना) से बढ़कर कोई धर्म नहीं है।
2. अयोध्या काण्ड-- 2.30
श्लोक:
“सर्वभूतेषु हिते रतः।”
अर्थ:
(राम का वर्णन) — वे सभी प्राणियों के हित में लगे रहते थे।
3. अरण्य काण्ड --37.12
श्लोक:
“दयालुः सर्वभूतेषु।”
अर्थ:
श्रीराम सभी प्राणियों पर दया करने वाले हैं।
अध्यात्म रामायण
4. अयोध्या काण्ड-- 3.15
श्लोक:
“आत्मवत् सर्वभूतेषु यः पश्यति स पण्डितः।”
अर्थ:
जो सभी प्राणियों में अपने समान भाव रखता है, वही ज्ञानी है।
5. अरण्य काण्ड- 1.20
श्लोक:
“एक एव परो आत्मा सर्वभूतेषु गूढः।”
अर्थ:
एक ही परमात्मा सभी प्राणियों में छिपा हुआ है।
6. उत्तर काण्ड --5.22
श्लोक:
“निर्द्वन्द्वो हि महायोगी समदर्शी भवेत् सदा।”
अर्थ:
महान योगी सदा द्वन्द्व से रहित और समदर्शी होता है।
निष्कर्ष--
रामायण परम्परा का भी यही स्पष्ट संदेश है—
परोपकार, दया, समभाव और सर्वहित।
श्रीराम का आदर्श = सर्वभूतहित
सबमें एक ही आत्मा का दर्शन।
दया और समान दृष्टि ही श्रेष्ठ धर्म
गर्ग संहिता तथा योग वशिष्ठ में प्रमाण--
गर्ग संहिता--
1. गोलोक खण्ड --12.45
श्लोक:
“सर्वभूतेषु यः पश्येद्भगवद्भावमात्मनः।
भूतानि भगवत्यात्मन्येष भक्तः स उत्तमः॥”
अर्थ:
जो सभी प्राणियों में भगवान् का भाव देखता है और सबको भगवान् में स्थित मानता है,
वही श्रेष्ठ भक्त है।
2. वृन्दावन खण्ड- 5.18
श्लोक:
“एको देवः सर्वभूतेषु तिष्ठति हृदि सर्वदा।”
अर्थ:
एक ही परमात्मा सभी प्राणियों के हृदय में सदा स्थित है।
योग वशिष्ठ-
3. निर्वाण प्रकरण- 2.13.45
श्लोक:
“चित्तमेव हि संसारस्तत्प्रयत्नेन शोधनम्।”
अर्थ:
यह संसार मन (चित्त) ही है, इसलिए उसे शुद्ध करना चाहिए।
(जब चित्त शुद्ध होता है, तब समभाव उत्पन्न होता है)
4. उपशम प्रकरण-- 6.12
श्लोक:
“सर्वभूतेषु चात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि।”
अर्थ:
सभी प्राणियों में अपने आत्मा को और अपने आत्मा में सभी प्राणियों को देखो।
5. वैराग्य प्रकरण-- 3.21
श्लोक:
“यदा सर्वत्र समदृष्टिः तदा मुक्तिः न संशयः।”
अर्थ:
जब सभी में समान दृष्टि हो जाती है, तब निःसंदेह मुक्ति प्राप्त होती है।
6. निर्वाण प्रकरण-- 1.28
श्लोक:
“एकोऽहमिदं सर्वं विश्वमित्यवधारय।”
अर्थ:
यह सम्पूर्ण विश्व मैं ही हूँ—ऐसा निश्चय करो।
(अर्थात् सबमें एक ही आत्मा है)
निष्कर्ष--
इन ग्रन्थों का भी यही एकमत सिद्धान्त है—
एक ही परमात्मा/आत्मा सबमें व्याप्त है, इसलिए समभाव और परोपकार आवश्यक है।
सबमें भगवान् देखें।
मन को शुद्ध करें।
समदृष्टि ही मुक्ति का मार्ग है।
इस्लाम मे प्रंमाण से--
1. क़ुरआन --49:13 (सूरह अल-हुजुरात)
يَا أَيُّهَا النَّاسُ إِنَّا خَلَقْنَاكُم مِّن ذَكَرٍ وَأُنثَىٰ
وَجَعَلْنَاكُمْ شُعُوبًا وَقَبَائِلَ لِتَعَارَفُوا
إِنَّ أَكْرَمَكُمْ عِندَ اللَّهِ أَتْقَاكُمْ
हिन्दी अर्थ:
हे मनुष्यों! हमने तुम्हें एक पुरुष और एक स्त्री से पैदा किया और तुम्हें विभिन्न जातियों और क़बीलों में बाँटा ताकि तुम एक-दूसरे को पहचानो।
निस्संदेह, अल्लाह के निकट तुममें सबसे श्रेष्ठ वह है जो सबसे अधिक धर्मपरायण (तक़वा वाला) है।
2. क़ुरआन- 5:32
مَن قَتَلَ نَفْسًا بِغَيْرِ نَفْسٍ أَوْ فَسَادٍ فِي الْأَرْضِ
فَكَأَنَّمَا قَتَلَ النَّاسَ جَمِيعًا
وَمَنْ أَحْيَاهَا فَكَأَنَّمَا أَحْيَا النَّاسَ جَمِيعًا
हिन्दी अर्थ:
जिसने एक निर्दोष व्यक्ति की हत्या की, उसने मानो पूरी मानवता की हत्या की;
और जिसने एक व्यक्ति की जान बचाई, उसने पूरी मानवता को बचाया।
3. क़ुरआन ---2:177
لَّيْسَ الْبِرَّ أَن تُوَلُّوا وُجُوهَكُمْ
وَلَٰكِنَّ الْبِرَّ مَنْ آمَنَ بِاللَّهِ...
وَآتَى الْمَالَ عَلَىٰ حُبِّهِ ذَوِي الْقُرْبَىٰ وَالْيَتَامَىٰ وَالْمَسَاكِينَ
हिन्दी अर्थ:
सच्चा धर्म केवल बाहरी कर्म नहीं है, बल्कि अल्लाह पर विश्वास करना और अपने प्रिय धन को रिश्तेदारों, अनाथों, गरीबों और जरूरतमंदों पर खर्च करना है।
4. हदीस सहीह बुख़ारी -13:
لَا يُؤْمِنُ أَحَدُكُمْ حَتَّىٰ يُحِبَّ لِأَخِيهِ
مَا يُحِبُّ لِنَفْسِهِ
हिन्दी अर्थ:
तुममें से कोई सच्चा ईमान वाला नहीं हो सकता,
जब तक वह अपने भाई के लिए वही न चाहे जो अपने लिए चाहता है।
5. हदीस — सहीह मुस्लिम--2564
الْمُسْلِمُ أَخُو الْمُسْلِمِ لَا يَظْلِمُهُ وَلَا يَخْذُلُهُ
وَلَا يَحْقِرُهُ
हिन्दी अर्थ:
मुसलमान, मुसलमान का भाई है
वह न उस पर अत्याचार करता है, न उसे छोड़ता है और न उसका अपमान करता है।
6. अंतिम उपदेश-- (ख़ुत्बा-ए-विदा) — हज़रत मुहम्मद स0
:
لَا فَضْلَ لِعَرَبِيٍّ عَلَىٰ عَجَمِيٍّ
وَلَا لِعَجَمِيٍّ عَلَىٰ عَرَبِيٍّ
إِلَّا بِالتَّقْوَىٰ
हिन्दी अर्थ:
किसी अरबी को गैर-अरबी पर और न किसी गैर-अरबी को अरबी पर कोई श्रेष्ठता है—
सिवाय धर्मपरायणता (तक़वा) के।
निष्कर्ष--
इस्लाम का स्पष्ट संदेश है—
सभी मनुष्य एक हैं, समान हैं, और परस्पर भाई-भाई हैं।
जाति, रंग, भाषा से श्रेष्ठता नहीं
सबके प्रति न्याय और करुणा
अपने लिए जो चाहो, वही दूसरों के लिए भी चाहो।
सिक्ख ग्रन्थों में प्रमाण--
☬ 1. गुरु ग्रन्थ साहिब (-- 1349)
ਮਾਨਸ ਕੀ ਜਾਤ ਸਭੈ ਏਕੈ ਪਹਿਚਾਨਬੋ॥
हिन्दी अर्थ:
समस्त मानव जाति को एक ही मानो (सबको एक ही समझो)।
☬ 2. गुरु ग्रन्थ साहिब (-- 611)
ਏਕੁ ਪਿਤਾ ਏਕਸ ਕੇ ਹਮ ਬਾਰਿਕ ਤੂ ਮੇਰਾ ਗੁਰ ਹਾਈ॥
हिन्दी अर्थ:
एक ही परमात्मा (पिता) है, और हम सब उसके बच्चे हैं।
☬ 3. गुरु ग्रन्थ साहिब (-- 8)
ਸਭ ਮਹਿ ਜੋਤਿ ਜੋਤਿ ਹੈ ਸੋਇ॥
ਤਿਸ ਦੈ ਚਾਨਣਿ ਸਭ ਮਹਿ ਚਾਨਣੁ ਹੋਇ॥
हिन्दी अर्थ:
सभी में एक ही परमात्मा की ज्योति है, और उसी के प्रकाश से सब प्रकाशित हैं।
☬ 4. गुरु ग्रन्थ साहिब (-- 349)
ਨ ਕੋ ਬੈਰੀ ਨਹੀ ਬਿਗਾਨਾ ਸਗਲ ਸੰਗ ਹਮ ਕਉ ਬਨਿ ਆਈ॥
हिन्दी अर्थ:
न कोई शत्रु है, न कोई पराया—
सभी के साथ मेरा प्रेमपूर्ण संबंध है।
☬ 5. गुरु ग्रन्थ साहिब (--1299)
ਜੀਅ ਜੰਤ ਸਭਿ ਇਕੁ ਦਾਤਾ ਸੋ ਮੈ ਵਿਸਰਿ ਨ ਜਾਈ॥
हिन्दी अर्थ:
सभी जीवों का दाता एक ही है,
उसे कभी नहीं भूलना चाहिए।
☬ 6. गुरु नानक देव जी (उक्ति)
ਨ ਕੋ ਹਿੰਦੂ ਨ ਮੁਸਲਮਾਨ॥
हिन्दी अर्थ:
न कोई हिन्दू है, न मुसलमान—
(अर्थात् सभी मनुष्य एक ही परमात्मा की सन्तान हैं)
☬ निष्कर्ष-
सिख धर्म का भी यही स्पष्ट संदेश है—
सभी मनुष्य एक हैं, सबमें एक ही परमात्मा की ज्योति है।
कोई पराया नहीं। सब भाई-बहन हैं। एक ही ईश्वर का वास सबमें है।
ईसाई धर्म में प्रमाण--
✝️ 1. Bible — Galatians 3:28:
“There is neither Jew nor Greek, there is neither slave nor free,
there is neither male nor female: for ye are all one in Christ Jesus.”
हिन्दी अर्थ:
न कोई यहूदी है, न यूनानी; न दास है, न स्वतंत्र; न पुरुष, न स्त्री
क्योंकि तुम सब मसीह में एक हो।
✝️ 2. Bible — Matthew:22-39:
“Thou shalt love thy neighbour as thyself.”
हिन्दी अर्थ:
अपने पड़ोसी से उसी प्रकार प्रेम करो जैसे अपने आप से करते हो।
✝️ 3. Bible -John-- 13:34
“A new commandment I give unto you, That ye love one another;
as I have loved you, that ye also love one another.”
हिन्दी अर्थ:
मैं तुम्हें एक नया आदेश देता हूँ—एक-दूसरे से प्रेम करो,
जैसा मैंने तुमसे प्रेम किया है।
✝️ 4. Bible 1 John --4:20
“If a man say, I love God, and hateth his brother, he is a liar:
for he that loveth not his brother whom he hath seen,
how can he love God whom he hath not seen?”
हिन्दी अर्थ:
जो कहता है “मैं परमेश्वर से प्रेम करता हूँ” लेकिन अपने भाई से द्वेष रखता है, वह झूठा है।
✝️ 5. Bible - Acts-- 17:26
“And hath made of one blood all nations of men
for to dwell on all the face of the earth.”
हिन्दी अर्थ:
परमेश्वर ने एक ही रक्त से सभी मनुष्यों की जातियाँ बनाई हैं,
जो पूरी पृथ्वी पर रहती हैं।
✝️ 6. Bible — Romans 12:10:
“Be kindly affectioned one to another with brotherly love.”
हिन्दी अर्थ:
एक-दूसरे के प्रति भाईचारे के प्रेम से स्नेह रखो।
✝️ निष्कर्ष-
ईसाई धर्म का भी यही स्पष्ट संदेश है—
सब मनुष्य एक हैं, और प्रेम ही सर्वोच्च धर्म है। सब मसीह में एक हैं।अपने समान दूसरों से प्रेम करो
द्वेष नहीं, प्रेम और करुणा अपनाओ।
जैन धर्म में प्रमाण--
🕉️ 1. आचारांग सूत्र-- 1.2.3
“सव्वे पाणा न हंतव्वा, सव्वे जीवा दयालुया।”
हिन्दी अर्थ:
सभी प्राणियों की हिंसा नहीं करनी चाहिए,
सभी जीव दया के योग्य हैं।
2. उत्तराध्ययन सूत्र-- 6.10
“सव्वेसिं जीवानं पियं जीवियं।”
हिन्दी अर्थ:
सभी जीवों को अपना जीवन प्रिय होता है।
(अतः किसी को कष्ट न दो)
🕉️ 3. तत्त्वार्थ सूत्र-- 5.21
सूत्र (संस्कृत-प्राकृत परम्परा):
“परस्परोपग्रहो जीवानाम्।”
हिन्दी अर्थ:
सभी जीव एक-दूसरे के उपकार (सहयोग) के लिए हैं।
🕉️ 4. दशवैकालिक सूत्र- 6.9
"जे णं जाणइ अप्पाणं, तं जाणइ परं पि।”
हिन्दी अर्थ:
जो अपने आत्मा को जानता है, वह दूसरों के आत्मा को भी समझता है।
🕉️ 5. समयसार-- 1.4
“एको अम्मि, नाणो अम्मि, सव्वे जीवा समा मया।”
हिन्दी अर्थ:
आत्मा एक है, ज्ञान स्वरूप है, और सभी जीव मेरे समान हैं।
🕉️ 6. मूलाचार--
“दया सव्वभूएसु, खंति च सव्वदा।”
हिन्दी अर्थ:
सभी प्राणियों पर दया करो और सदैव क्षमा रखो।
🕉️ निष्कर्ष--
जैन धर्म का भी यही मूल संदेश है
अहिंसा, समता और सर्वजीव-करुणा।
किसी भी जीव को कष्ट न दें।
सबको अपने समान समझें
सभी जीव परस्पर जुड़े हैं।
बौद्ध धर्म में प्रमाण--
☸️ 1. करणीय मेत्ता सुत्त (सुत्तनिपात-- 1.8)
“सुखिनो वा खेमिनो होन्तु, सब्बे सत्ताः भवन्तु सुखितत्ता।”
हिन्दी अर्थ:
सभी प्राणी सुखी हों, सबका कल्याण हो,
सबके भीतर सुख की भावना हो।
☸️ 2. धम्मपद --1.5
पाली (देवनागरी):
“न हि वेरेन वेरानि सम्मन्ति इध कुदाचनं।
अवेरेन च सम्मन्ति, एष धम्मो सनन्तनो॥”
हिन्दी अर्थ:
इस संसार में वैर से वैर कभी शांत नहीं होता, केवल अवैर (प्रेम/क्षमा) से ही शांत होता है—यह सनातन सत्य है।
☸️ 3. धम्मपद-- 5.18
“सब्बे तस्सन्ति दण्डस्स, सब्बेसं जीवितं पियं।
अत्तानं उपमं कत्वा, न हनेय्य न घातये॥”
हिन्दी अर्थ:
सभी प्राणी दण्ड (कष्ट) से डरते हैं, सभी को जीवन प्रिय है;
अपने समान समझकर न स्वयं हिंसा करो, न दूसरों से कराओ।
☸️ 4. सुत्तनिपात (मेत्ता भाव)
“माता यथा निजं पुत्रं आयुसा एकपुत्तमनुरक्खे।”
हिन्दी अर्थ:
जैसे माँ अपने इकलौते पुत्र की रक्षा करती है,
वैसे ही सब प्राणियों के प्रति प्रेम रखना चाहिए।
☸️ 5. अंगुत्तर निकाय-- 4.67
“मेत्ता च सब्बलोकस्मिं, मनसं भावये अप्पमाणं।”
हिन्दी अर्थ:
पूरे संसार के प्रति असीमित मैत्री (प्रेम) का भाव विकसित करो।
☸️ 6. गौतम बुद्ध (उपदेश सार)
“बहुजनहिताय बहुजनसुखाय।”
हिन्दी अर्थ:
अनेक लोगों के हित और सुख के लिए कार्य करो।
☸️ निष्कर्ष-
बौद्ध धर्म का भी यही स्पष्ट संदेश है—
मैत्री, करुणा, अहिंसा और समता। सब प्राणियों के प्रति प्रेम।
किसी के प्रति द्वेष नहीं।
अपने समान सबको समझना।
सर्वजन-हित का भाव।
यहूदी धर्म में प्रमाण--
✡️ 1. तनाख — Leviticus --19:18
וְאָהַבְתָּ לְרֵעֲךָ כָּמוֹךָ
हिन्दी अर्थ:
अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम करो।
✡️ 2. तनाख — Genesis --1:27
וַיִּבְרָא אֱלֹהִים אֶת־הָאָדָם בְּצַלְמוֹ
בְּצֶלֶם אֱלֹהִים בָּרָא אֹתוֹ
हिन्दी अर्थ:
परमेश्वर ने मनुष्य को अपने स्वरूप में बनाया।
(अर्थात् सभी मनुष्यों में दिव्यता है)
✡️ 3. तनाख — Deuteronomy --10:19
וַאֲהַבְתֶּם אֶת־הַגֵּ
כִּי־גֵרִים הֱיִיתֶם בְּאֶרֶץ מִצְרָיִם
हिन्दी अर्थ:
परदेशी (अजनबी) से भी प्रेम करो,
क्योंकि तुम भी मिस्र में परदेशी थे।
✡️ 4. तनाख — Micah 6:8
הִגִּיד לְךָ אָדָם מַה־טּוֹב
וּמָה־יְהוָה דּוֹרֵשׁ מִמְּךָ
כִּי אִם־עֲשׂוֹת מִשְׁפָּט
וְאַהֲבַת חֶסֶד
וְהַצְנֵעַ לֶכֶת עִם־אֱלֹהֶיךָ
हिन्दी अर्थ:
प्रभु तुमसे क्या चाहता है?
न्याय करना, दया से प्रेम करना और नम्रता से ईश्वर के साथ चलना।
✡️ 5. तनाख — Proverbs --22:2
עָשִׁיר וָרָשׁ נִפְגָּשׁוּ
עֹשֵׂה כֻלָּם יְהוָה
हिन्दी अर्थ:
अमीर और गरीब दोनों मिलते हैं,
और दोनों को बनाने वाला एक ही परमेश्वर है।
✡️ 6. तलमूद — तलमूद (Shabbat ,---31a)
דעלך סני לחברך לא תעביד
हिन्दी अर्थ:
जो तुम्हें अप्रिय है, वह अपने साथी के साथ मत करो।
✡️ निष्कर्ष-
यहूदी धर्म का भी यही स्पष्ट संदेश है—
सब मनुष्य एक ही ईश्वर की सृष्टि हैं, इसलिए प्रेम, न्याय और समभाव रखें।
अपने समान दूसरों से प्रेम करो
सभी में ईश्वर का स्वरूप है
न्याय और दया का पालन करो
पारसी (ज़रोअस्ट्रियन) धर्म में प्रमाण--
1. अवेस्ता — यश्ना --30.2
“šrəṇvantu vispā xšnaoθrā, yā vaēnā vīcithā ahūm.”
हिन्दी अर्थ:
सब लोग सत्य को सुनें और उसे समझकर अपने जीवन का मार्ग चुनें।
2. अवेस्ता — यश्ना --43.1
“āat̰ yā ahū vairyo …” (अहुनवर प्रार्थना का अंश)
हिन्दी अर्थ:
सर्वोत्तम मार्ग वही है जो धर्म (सत्य) और न्याय पर आधारित हो।
3. अवेस्ता — यश्ना-- 34.1
“vahmāi ahmāi ushtā ahmāi, hyat̰ ashai vahishtāi.”
हिन्दी अर्थ:
जो सत्य और धर्म के मार्ग पर चलता है, वही वास्तविक सुख प्राप्त करता है।
4. अवेस्ता — वेंदिदाद --19.20
“humata, hukhta, hvarshta”
हिन्दी अर्थ:
अच्छे विचार, अच्छे वचन, अच्छे कर्म — यही जीवन का मूल सिद्धान्त है।
5. अवेस्ता — यश्ना-- 47.1
asha vahishta ashem.”
हिन्दी अर्थ:
सत्य (Asha) ही सर्वोत्तम है।
6. जरथुस्त्र (उपदेश भाव)
“āramaitiš ahurāi mazda
हिन्दी अर्थ:
नम्रता, शांति और भक्ति के साथ सत्य मार्ग पर चलो।
निष्कर्ष--
पारसी धर्म का भी यही स्पष्ट संदेश है—
सत्य, सद्भाव और परोपकार
अच्छे विचार, वचन और कर्म अपनाओ
सत्य और धर्म के मार्ग पर चलो
सबके प्रति सद्भाव और न्याय रखो।
ताओ (Dao/Tao) धर्म में प्रमाण--
1. ताओ ते चिंग — अध्याय - 1:
道可道,非常道;名可名,非常名。
हिन्दी अर्थ:
जिसे शब्दों में व्यक्त किया जा सके, वह शाश्वत ताओ नहीं है।
(अर्थात् सत्य एक है, पर शब्दों से परे है)
☯️ 2. ताओ ते चिंग — अध्याय --8
上善若水。水善利万物而不争。
हिन्दी अर्थ:
सर्वोत्तम गुण जल के समान है
जो सबका हित करता है और किसी से विरोध नहीं करता।
☯️ 3. ताओ ते चिंग — अध्याय --34
大道泛兮,其可左右。万物恃之以生而不辞。
हिन्दी अर्थ:
महान ताओ सर्वत्र फैला हुआ है;
सभी प्राणी उसी पर निर्भर हैं, और वह किसी का भेद नहीं करता।
☯️ 4. ताओ ते चिंग — अध्याय --49
圣人无常心,以百姓心为心。
हिन्दी अर्थ:
संत का अपना अलग मन नहीं होता,
वह सभी लोगों के मन को ही अपना मन मानता है।
☯️ 5. च्वांग-त्सु (齐物论)
天地与我并生,而万物与我为一。
हिन्दी अर्थ:
आकाश और पृथ्वी मेरे साथ ही उत्पन्न हुए हैं,।
और सभी वस्तुएँ मेरे साथ एक हैं।
☯️ 6. लाओत्से (उपदेश भाव)
知人者智,自知者明。
हिन्दी अर्थ:
जो दूसरों को जानता है वह बुद्धिमान है,और जो स्वयं को जानता है वह वास्तव में ज्ञानी है।
☯️ निष्कर्ष-
ताओ धर्म का भी यही स्पष्ट संदेश है—
सभी में एक ही तत्त्व (ताओ) व्याप्त है, इसलिए समभाव और सहजता रखें। प्रकृति के साथ सामंजस्य। सबमें एकता का अनुभव बिना संघर्ष के सबका हित।
कन्फ्यूशियस धर्म में प्रमाण--
📜 1. लुन्यू (Analects) --12.2
己所不欲,勿施于人。
हिन्दी अर्थ:
जो तुम अपने लिए नहीं चाहते,
उसे दूसरों पर मत थोपो।
📜 2. लुन्यू (Analects) --12.22
樊迟问仁。子曰:爱人。
हिन्दी अर्थ:
फान-ची ने “रेन (मानवता)” के बारे में पूछा।
कन्फ्यूशियस ने कहा—“लोगों से प्रेम करो।”
📜 3. लुन्यू (Analects) --4.15:
夫子之道,忠恕而已矣。
हिन्दी अर्थ:
आचार्य (कन्फ्यूशियस) का मार्ग केवल दो बातों पर आधारित है—
निष्ठा (忠) और सहानुभूति/क्षमा (恕)।
4. मेंसियस (Mencius) --2A:6
恻隐之心,人皆有之。
हिन्दी अर्थ:
करुणा का भाव हर मनुष्य में स्वाभाविक रूप से होता है।
5. मेंसियस (Mencius) -7A:45:
老吾老,以及人之老;幼吾幼,以及人之幼。
हिन्दी अर्थ:
अपने बुज़ुर्गों का आदर करो और दूसरों के बुज़ुर्गों का भी;
अपने बच्चों से प्रेम करो और दूसरों के बच्चों से भी।
📜 6. कन्फ्यूशियस (उपदेश भाव)
四海之内,皆兄弟也。
हिन्दी अर्थ:
चारों दिशाओं में (पूरी दुनिया में) सभी लोग भाई-भाई हैं।
निष्कर्ष-
कन्फ्यूशियस परम्परा का भी यही स्पष्ट संदेश है—
मानवता (Ren), करुणा, और आत्मवत् व्यवहार।
जो अपने लिए न चाहो, दूसरों पर न करो।
सबके प्रति प्रेम और सम्मान
समभाव और सामाजिक सामंजस्य।
------+-------+------+-------+----

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