Quotes by Deepak Bundela Arymoulik in Bitesapp read free

Deepak Bundela Arymoulik

Deepak Bundela Arymoulik Matrubharti Verified

@deepakbundela7179
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बंट गए सब

कभी एक थे, आज बँट गए सब,
हँसी की चौपाल से चुप्पी में सिमट गए सब।
आँगन जहाँ गूँजती थी किलकारियों की धुन,
वहीं खामोशी ओढ़े, अपने ही बन गए सब।

घर की दीवारों पे टँगी यादों की तस्वीरें,
आज धूल पूछती हैं—किधर चले गए सब?
जो साथ बैठ कर बाँटते थे सुख-दुख की रोटियाँ,
वक़्त की आँधी में रिश्तों से कट गए सब।

एक दीया था जो सबके हिस्से उजाला देता,
अब हर कोना अँधेरा, अपने-अपने जल गए सब।
नाम तो वही हैं, खून भी एक ही बहता है,
पर दिलों के पते बदल कर बिछुड़ गए सब।

कभी जो “अपना” कहने में देर न लगती थी,
आज वही शब्द होंठों से उतर गए सब।
बस एक सवाल दीवारों से टकरा कर लौटता है—
हम बदले या हालात, कि यूँ बिखर गए सब…

आर्यमौलिक

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हर आदमी ज़मी बनता है जीने के लिए

हर आदमी ज़मी बनता है जीने के लिए,
ख़ुद को रौंदता है, औरों को सीने के लिए।
उसके सपनों पर चलते हैं रिश्तों के क़दम,
फिर भी चुप रहता है, घर को रखने के लिए।

वो धूप में जलता है, छाँव किसी और की,
रातें काटता है सुकून किसी और की।
उसकी पीठ पर रखे जाते हैं सब बोझ,
क्योंकि वही मज़बूत है — यही मान ली जाती है सोच।

हर आदमी ज़मी बनता है जीने के लिए,
अपनी आवाज़ दबाता है, शांति पीने के लिए।
उसके आँसू भी नियमों में बँध जाते हैं,
“मर्द हो” कहकर दर्द समझाए जाते हैं।

वो पिता बनकर त्याग का नाम पा जाता है,
पति बनकर ज़िम्मेदारी में खो जाता है।
बेटा बनकर उम्मीदों का बोझ ढोता है,
और आदमी बनकर… अक्सर अकेला होता है।

पर ज़मी भी एक दिन थक जाती है,
दरारें चुपचाप सच कह जाती हैं।
अगर पानी, प्यार, सम्मान न मिले,
तो सबसे उपजाऊ ज़मी भी बंजर हो जाती है।

इसलिए याद रखना ऐ दुनिया,
हर आदमी पत्थर नहीं होता।
वो ज़मी ज़रूर बनता है जीने के लिए,
पर उसे भी हर दिन कुचले जाने का हक़ नहीं होता।

आर्यमौलिक

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प्रिय लेखक और पाठक,

जैसे ही मैं पिछले साल को याद करता हूँ,
मैं आपके भरोसे और समर्थन के लिए आपका दिल ❤️ से धन्यवाद करता हूं

आपका लगातार साथ मेरे लिए बहुत मायने रखता है और हर दिन आपको बेहतर लेखन प्रस्तुत करने के लिए मुझे प्रेरित करता है।

मैं भी आपकी यात्रा का हिस्सा बनकर सच में बहुत खुश हूं और आने वाले साल में भी आपके साथ और सहयोग की उम्मीद करता हूं।

धन्यवाद सहित,
दीपक बुंदेला "आर्यमौलिक"
🎉🎉🎉🎉🎉🎉🎉

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स्टेटस में आग,
प्रोफाइल में क्रांति,
और ज़िंदगी सामने आए
तो आवाज़ गले में मर जाती है।

मोहब्बत अगर मिल जाए
तो वही ज़िंदगी बना देते हैं—
उसी के लिए सपने, शब्द, वादे,
पूरी कायनात लिख डालते हैं।

और जब मोहब्बत टूटती है
तो दर्द बहाने के लिए
पूरी टाइमलाइन छोटी पड़ जाती है,
हर पोस्ट एक आँसू बन जाती है।

पर जब समाज का दिल टूटता है,
जब हक़ कुचले जाते हैं,
तब ये लोग नेटवर्क खोजते हैं,
तब रीच ज़्यादा ज़रूरी हो जाती है।

दिल टूटा तो शायर,
हक़ टूटा तो दर्शक—
ये वही कलमें हैं
जो अपने दर्द पर चीखती हैं
और दूसरों के दर्द पर
म्यूट हो जाती हैं।

मोहब्बत ने इन्हें जिंदा रखा,
डर ने इन्हें मरा हुआ।
सोशल मीडिया पर साँसें,
असल ज़िंदगी में ज़िंदा लाश।

जो अपने लिए नहीं बोले,
जो सच के लिए नहीं जले—
वो दिशा नहीं देते,
वो बस ट्रेंड के पीछे
खुद को घसीटते हैं।

आर्यमौलिक

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आज सोशल मीडिया पर लेखकों के लिए उपलब्ध अधिकांश ऐप्स, लेखन के हर रूप से केवल अपनी कमाई निकालने में लगे हुए हैं। विडंबना यह है कि वर्षों से मौजूद लेखकों की रचनाएँ भी अब प्रीमियम के बिना सीमित कर दी जाती हैं।

मुझे स्पष्ट रूप से याद है कि 7–8 वर्ष पहले, जब मैंने Kuku FM, Quotes और Matrubharti जैसे प्लेटफॉर्म जॉइन किए थे, तब इनका रवैया बिल्कुल अलग था। उस समय बिना किसी प्रीमियम के कहानियाँ, कविताएँ और कोट्स प्रकाशित किए जा सकते थे। ऐप संचालक विज्ञापनों से आय अर्जित करते थे और लेखकों को कम से कम स्वतंत्र अभिव्यक्ति का अवसर मिलता था।

आज स्थिति यह है कि नए और पुराने लेखकों में कोई अंतर नहीं किया जाता। वर्षों की साधना और अनुभव रखने वाले लेखक और आज आए नए लेखक—दोनों को एक ही पंक्ति में खड़ा कर दिया गया है। यह व्यवहार न तो न्यायसंगत है और न ही स्वीकार्य।

सच यह है कि लेखकों के बिना ये ऐप्स अस्तित्व में ही नहीं रह सकते, फिर भी लेखक सबसे उपेक्षित वर्ग बना हुआ है। यदि ऐप संचालक चाहें तो कम से कम लेखक की पोस्ट पर मिलने वाले लाइक, कमेंट और रीड्स के आधार पर प्रोत्साहन या पारदर्शी लाभ-साझेदारी तो दे ही सकते हैं—पर ऐसा कहीं देखने को नहीं मिलता।

यहाँ शब्दों और साहित्य से अधिक प्राथमिकता ऐप संचालकों की कमाई को दी जाती है। लेखक खुश हो जाता है यह देखकर कि आज उसकी पोस्ट पर इतने लाइक और कमेंट आ गए, लेकिन सच्चाई यह है कि न लाइक से लोकप्रियता मिलती है, न उससे कोई वास्तविक आमदनी होती है।

कई प्लेटफॉर्म पर दिखाया जाने वाला कुल लाइक और व्यूज़ का आँकड़ा भी अक्सर कंप्यूटर-जनित और पूर्व-नियोजित खेल मात्र होता है, जिसके सहारे लेखकों को यह भ्रम दिया जाता है कि वे आगे बढ़ रहे हैं—जबकि वास्तविक लाभ कोई और ही उठा रहा होता है।

अंततः यह सब लेखकों की स्वयं की चेतना और सोच पर निर्भर करता है।
क्योंकि यदि आपकी मेहनत की कमाई कोई दूसरा खा रहा है और आप केवल लाइक-ग्राफ में उलझे हुए हैं, तो आप अपनी सबसे कीमती पूँजी—समय और प्रतिभा—दोनों व्यर्थ कर रहे हैं।

अब निर्णय आपको करना है—
सिर्फ दिखावे की सराहना चाहिए या अपने लेखन का वास्तविक सम्मान।
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भगवत गीता जीवन अमृत

https://arymoulikdb1976.blogspot.com/2025/12/8.html

-आदमी आदमी के बगैर

आदमी आदमी के बगैर
अधूरा सा रह जाता है,
जैसे बिना दीप बाती
अंधेरा मुस्काता है।

कदम बढ़ते हैं तो साथ चाहिए,
सपनों को भी हाथ चाहिए,
एक हाथ से जीवन चलता नहीं,
हर मंज़िल को साथ चाहिए।

किसान की मेहनत, मज़दूर का पसीना,
शिक्षक का ज्ञान, माँ की करुणा,
हर रिश्ता, हर श्रम, हर भावना
आदमी से आदमी की साधना।

कोई राजा हो या हो फकीर,
सबकी राहें जुड़ी हुई हैं,
बगैर आदमी के आदमी की
तक़दीरें टूटी हुई हैं।

इसलिए न घमंड, न दूरी रख,
इंसान से इंसान जुड़ा रह,
क्योंकि इस दुनिया की सबसे बड़ी
पूँजी — आदमी का आदमी है।

आर्यमौलिक

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