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Deepak Bundela Arymoulik

Deepak Bundela Arymoulik Matrubharti Verified

@deepakbundela7179
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ईश्वर ने परिंदों को ही
आसमान और ज़मीन के बीच
संतुलन की आज़ादी दी है,
पंख भी दिए,
और लौट आने की समझ भी।
इंसान को ज़मीन दी गई थी
चलने के लिए,
और आसमान
देखने के लिए—
पर उसने
देखने की जगह
हड़पने की चाह रख ली।
वो उड़ना चाहता है
बिना पंखों के,
ऊँचाई चाहता है
बिना विनम्रता के,
और ईश्वर बनना चाहता है
बिना इंसान बने।
परिंदे जानते हैं
कब उड़ना है,
कब बैठ जाना है,
इंसान यही भूल जाता है—
इसी भूल में
वो अक्सर
ओंधे मुँह ज़मीन से टकराता है।
क्योंकि
आसमान छूने के लिए
पंख नहीं,
मर्यादा चाहिए।

आर्यमौलिक

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आज़ादी या अंधापन?
कल तक मर्द की शान कहलाती थी
कई देहों की गिनती,
रिश्तों पर रखी गई धूल,
और वासना का खुला जुलूस।
आज वही भूख
दूसरे चेहरे पहनकर चल रही है,
घर के खाने से ऊबी ज़बानें
अब रिश्तों को बेस्वाद बताने लगी हैं।
फर्क बस इतना है—
पुरुष डरता था,
संतुलन साधता था,
दो नावों पर पैर रख
डूबने से बचने की जुगत करता था।
और आज—
कुछ स्त्रियाँ प्रेम नहीं,
सत्ता खोज रही हैं,
झूठे मुक़दमे को ढाल,
और क़ानून को हथियार बना रही हैं।
प्यार के नाम पर
ख़ून की साज़िश,
साथ के नाम पर
मौत की योजना—
यह कैसी मुक्ति है बहन?
क़ानून ने रास्ता दिया था
सम्मान से जीने का,
न कि किसी के घर का
दीपक बुझाने का।
अगर जाना ही था
तो खुली हवा थी,
क़ानून की छाया थी—
फिर ये जेल की सलाखें
क्यों चुनीं?
माता-पिता की लाज,
सीधे-सादे पति की साँसें,
और समाज की नींव—
सब कुछ गिरवी रख
बस एक रात की कीमत पर?
यह कविता आरोप नहीं,
आइना है—
उन सबके लिए
जो सुरक्षा को
स्वेच्छाचार समझ बैठे हैं।
सोचो,
क़ानून अगर कमज़ोर हुआ
तो सबसे पहले
औरत ही असुरक्षित होगी।
आज़ादी जिम्मेदारी माँगती है,
और न्याय विवेक।
जय हिंद 🇮🇳

☀️आर्यमौलिक

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सर्दियों में दो फांक हो जाती हैं…
एक ओर
कश्मीर फिरन की नरमी है,
पश्मीना ओढ़े
कॉफी के प्याले में
भाप उठती है,
हीटर की गर्म साँसों के बीच
हम शहर की हवा पर
बहस करते हैं।
दूसरी ओर
फुटपाथ है—
जहाँ शहर अपनी नज़रें
जानबूझकर गिरा देता है।
वहाँ ठंड मौसम नहीं,
सज़ा बनकर उतरती है।
वे महंगे कपड़े
शौक से नहीं पहनते,
कभी मिल जाएँ तो—
सिर्फ इसलिए
कि बदन में
थोड़ी-सी जान बची रहे।
उनके लिए सर्दी में
सूप कोई स्वाद नहीं,
एक सपना है।
भरपेट खाना—
किसी त्योहार से कम नहीं।
सर्दियों में
सब काँपते हैं…
पर फर्क बस इतना है—
कुछ ठंड से,
और कुछ
भूख से।

आर्यमौलिक

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हर रास्ता मंज़िल तक नहीं जाता,
कुछ रास्ते
सिर्फ़ यह सिखाने आते हैं
कि लौटना भी एक कला है।
हर सवाल जवाब नहीं माँगता,
कुछ सवाल
अंदर बैठकर
हमें चुप रहना सिखाते हैं।
जो बहुत साफ़ दिखता है
वही सबसे पहले
धोखा देता है,
और जो धुंधला है
वही अक्सर
सच की तरफ़ इशारा करता है।
हर जीत
ताली की आवाज़ नहीं होती,
कुछ जीतें
अकेले कमरे में
आँखें बंद कर
महसूस की जाती हैं।
समय
जब जवाब नहीं देता
तो समझ लो—
वह हमें
ख़ुद से मिलाने में
लगा हुआ है।

आर्यमौलिक

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*मोहब्बत से बेहतर क्यों हो जाती है शराब*

मोहब्बत ने वादे दिए थे उम्र भर के,
शराब ने बस एक रात का सहारा दिया।
वो हर सवाल पर ख़ामोश रही,
इसने हर दर्द को बोलने का हौसला दिया।
मोहब्बत ने हमें खुद से दूर किया,
कभी शक में, कभी उम्मीद में उलझाया।
शराब ने आईना थमाया हाथों में,
कहा— टूटे हो, तो हो… कम से कम झूठ नहीं बनाया।
मोहब्बत में हर आंसू का हिसाब था,
किस दिन रोए, किस बात पर।
शराब ने बस इतना कहा—
रो लो आज, कल की फ़िक्र छोड़ कर।
मोहब्बत ने सिखाया इंतज़ार करना,
बिन आवाज़ के तड़पना।
शराब ने सिखाया भूल जाना,
कम से कम रात भर चैन से सो जाना।
वो बदलती रही हालात के साथ,
इसका मिज़ाज कभी बदला नहीं।
मोहब्बत ने हर बार छोड़ा बीच रास्ते,
शराब ने कभी साथ छोड़ा नहीं।
इसलिए लोग कहते हैं—
मोहब्बत से बेहतर हो जाती है शराब,
क्योंकि मोहब्बत ज़ख़्म देती है उम्र भर का,
और शराब… बस थोड़ी देर का जवाब।

आर्यमौलिक

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जिन्दा

जिस्म से जिन्दा, रूह से मरे हुए हैं,
साँसें चलती हैं, मगर ज़मीर ठहरे हुए हैं।
आईनों में रोज देखते हैं चेहरा अपना,
पर सच के सामने की नजरों में झुके हुए हैं।

कब्र में लेटे मुर्दा भी इंसान से डरे हुए हैं,
क्योंकि यहाँ जीते लोग ही कातिल ठहरे हुए हैं।
हाथों में ताज, होंठों पर झूठ की हँसी,
दिलों में बस खंजर, इरादे ज़हरीले भरे हुए हैं।

बोलते बहुत हैं, पर सच की जुबाँ गूँगी है,
हर आवाज बिकाऊ, हर ख़ामोशी सस्ती है।
इंसानियत को हमने बोझ समझकर उतार दिया,
अब हैरानी है कि फ़िजा इतनी बदहवास क्यों सी है।

जो जिन्दा हैं, वही ज़्यादा ख़ौफ फैलाते हैं,
मुर्दे तो चुप हैं, वो किसी का क्या बिगाड़ते हैं।
यह दौर गवाही माँगता है, चरित्र की नहीं,
यहाँ तो साए भी अब हथियार उठाते हैं।

अगर रूह को जिन्दा करने की चाह बची हो कहीं,
तो पहले इंसान बनना सीखना होगा यहीं।
वरना इतिहास लिखेगा तंज के हर पन्ने पर—
कब्रें महफूज थीं, ख़तरा जिन्दा लोगों से ही था यहीं।

आर्यमौलिक

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मोहब्बत

मोहब्बत सच में होती है, इसमें कोई झूठ नहीं,
झूठ तब पैदा होता है, जब उम्मीदों का कद सच से ऊँचा हो जाए।

न मिली तो उसे धोखा कह देना आसान है,
पर हर अधूरी कहानी में बेईमानी ज़रूरी नहीं होती।

कुछ लोग दिल से मोहब्बत करते हैं,
और जब मुक़द्दर साथ न दे,
तो अपने नसीब की हार को
दूसरे की नीयत का गुनाह बना देते हैं।

मोहब्बत का न मिलना विफलता हो सकता है,
पर हर विफलता धोखा नहीं होती,
कभी-कभी दो सच्चे रास्ते
बस एक ही मोड़ पर खत्म हो जाते हैं।

आज के वक़्त में मोहब्बत से पहले
दिल नहीं, दिमाग़ का पका होना ज़रूरी है,
इतना ज्ञानी कि
चंद मुलाक़ातों में इंसान को पढ़ सको।

बातों के मिठास में छुपे ज़हर को पहचान सको,
नज़रों की सच्चाई और आदतों की चालाकी को
अलग-अलग देख सको।

क्योंकि आज मोहब्बत अंधी नहीं,
लोग नक़ाब पहन कर प्यार करते हैं,
और गिरने के बाद होश आने से बेहतर है
चलने से पहले रास्ता पहचान लेना।

इसलिए मोहब्बत करो,
पर आँखें खोल कर,
दिल दो, पर पहले इंसान को समझ कर,
ताकि न मोहब्बत बदनाम हो
और न हर अधूरी कहानी को
धोखे का नाम देना पड़े।

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प्यार तब महसूस हुआ, जब शब्द मौन हो गए,
और कोई चुपचाप मेरे पास आकर बैठ गया।

ना सवाल थे, ना सलाहों की भीड़,
बस मेरी ख़ामोशी को किसी ने समझ लिया।

वो साथ, जो बिना माँगे मिल गया,
वो हाथ, जो मुश्किल में थाम लिया।

तभी जाना मैंने—प्यार दिखावा नहीं,
किसी के दर्द को अपना मान लेना ही प्यार है।

#आर्यमौलिक

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गवाही

अगर आँखों की गवाही सच की राह दिखाती है,
तो खामोशी भी कई बार इक सच्ची ज़बानी होती है।
लफ़्ज़ मुकर जाएँ तो क्या, एहसास कहाँ मुकरते हैं,
दिल की हर एक धड़कन अपनी ही कहानी होती है।
मोहब्बत में तबाही को तुम सच कह गए हो लेकिन,
कभी-कभी इसी राख से ही नई ज़िंदगानी होती है।
किताबों से जो न समझ आए, वो तजुर्बे सिखा देते हैं,
ज़िंदगी की पाठशाला बड़ी पुरानी होती है।
हया की ओट में लिपटी गुनाही सच सही मगर,
कभी उसी पर्देदारी में इज़्ज़त की निशानी होती है।
सुकूँ लफ़्ज़ों में उतरे ये भी तो मुमकिन नहीं,
जो साथ गुज़र जाए बस वही असल रवानी होती है।

आर्यमौलिक

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पैसा आया तो धैर्य ने चुपचाप
अपने जूते दरवाज़े पर छोड़ दिए,
संवेदनाएँ बोलीं— अब यहाँ जगह कम
है,


और सहनशीलता ने सिर झुका कर विदा ले ली।
अहंकार सिंहासन पर बैठा मुस्कराया,
बोला— अब मैं ही घर का मालिक हूँ,
जहाँ पहले इंसान बसता था,
अब सिर्फ़ दामों में तौला हुआ घमंड रहता है।

आर्यमौलिक

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