।। …टूटने का स्थान… ।।
चलो फिर टूटते हैं-
वहीं,
जहाँ कोई नहीं होता
यह बताने के लिए
कि तुम कमज़ोर हो।
जहाँ शोर नहीं,
सिर्फ़ भीतर का सच होता है,
और हर दरार
अपनी कहानी खुद कहती है।
डर-
जो धीरे-धीरे
नसों में पनपता है,
वही एक दिन
हिम्मत में बदल जाता है।
और नफ़रत-
जो हर बीज में बोई जाती है,
वह भी
कभी न कभी
थक कर गिर जाती है।
फिर बचता है-
सिर्फ़ एक इंसान,
जो टूटा जरूर है,
पर खत्म नहीं हुआ।