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पता है ना तुम्हें… इस जगत में बहुत कुछ मायावी हो सकता है— अधरों पर ठहरी मुस्कानें, शब्दों में घुली आत्मीयता, यहाँ तक कि प्रेम के नाम पर किए गए अनगिनत आश्वासन भी… किन्तु रात्रि के उस नीरव एकांत में नयनों से अविरल बहते अश्रु कभी असत्य नहीं होते। वे हृदय के उस मौन आर्तनाद का स्वर होते हैं, जिसे केवल पीड़ा ही सुन पाती है। अब मैं स्वयं को विरक्त करना सीख रही हूँ… मन की अनियंत्रित व्याकुलताओं पर संयम का आवरण ओढ़ना सीख रही हूँ। तुम्हें स्मरण करके भी तुम्हारा नाम अधरों तक न आने देना, तुमसे कहने को असंख्य भाव होते हुए भी उन्हें भीतर ही भीतर विसर्जित कर देना— यह सब अब मेरी नियति-सा हो चला है। क्योंकि अब यह सत्य अत्यंत स्पष्ट दिखाई देने लगा है कि— तुम्हारा अहंकार मेरी समस्त पीड़ाओं से कहीं अधिक विराट हो चुका है, और मेरा धैर्य… मेरे प्रेम से भी अधिक अथाह। यह जो शनैः-शनैः थम रही है तुमसे संवाद करने की आदत, इसे मेरी निष्ठुरता का नाम मत देना। विश्वास करना… इसके पीछे अनगिनत सिसकियों का वह अथाह सागर है, जिसकी प्रत्येक लहर प्रतिरात्रि मेरी आत्मा के निर्जन तटों को भिगो जाती है। मैंने तो चाहा था— तुम मेरे अंतर्मन का विश्राम बनो, मेरे अस्तित्व की शांति बनो… किन्तु तुम तो वह मौन वेदना बन गए, जिसे छुपाते-छुपाते मैं स्वयं से ही अपरिचित होने लगी। कभी-कभी प्रेम समाप्त नहीं होता… वह बस शब्दहीन हो जाता है। क्योंकि निरंतर उपेक्षित होता हृदय एक समय के पश्चात चीखना नहीं, मौन हो जाना चुन लेता है। और तब— अश्रु बहते रहते हैं, स्पंदन जीवित रहते हैं, प्रेम भी कहीं भीतर शेष रहता है… किन्तु संवाद मर जाता है। सत्य तो यह है— कुछ रिश्ते टूटते नहीं, वे धीरे-धीरे आत्मा की निस्तब्ध गहराइयों में विलीन हो जाते हैं…।
2021 के बाद आज लिख रही हूँ। बहुत समय के बाद इस app पर आयी हूँ, बहुत कुछ बदल गया है इसमें। *कौन करेगा मुझसे प्रेम, मेरे सम्पूर्ण सत्य के साथ?* मैं कोई किंवदंती नहीं, न इतिहास के स्वर्णिम पृष्ठों पर अंकित कोई आदर्श नारी। मैं तो बस एक साधारण-सी स्त्री हूँ— जिसकी आँखों में कुछ अधूरे स्वप्न हैं, और हृदय में अनगिनत अनकहे संवाद। मैं हँसती हूँ तो खुलकर हँसती हूँ, रोती हूँ तो चुपचाप भीग जाती हूँ। छोटी-सी स्नेहिल बात पर खिल उठती हूँ, और एक उपेक्षा पर भीतर तक टूट भी जाती हूँ। स्वाभिमान मेरा स्वभाव है, और संवेदनशीलता मेरी नियति। मैं प्रेम करती हूँ तो सम्पूर्ण समर्पण से, और विरोध करती हूँ तो सम्पूर्ण साहस से। जब मेरे अस्तित्व पर प्रश्न उठते हैं, तो मेरे भीतर की अग्नि जाग उठती है; पर वही अग्नि किसी अपने के दुःख पर दीपक बनकर भी जलती है। मैं पूर्ण नहीं हूँ— मेरे भीतर असंख्य कमियाँ, भय, उलझनें और आकांक्षाएँ हैं। किन्तु इन्हीं सबके बीच एक निर्मल हृदय भी है, जो प्रेम को पूजा की तरह सँजोकर रखता है। इसलिए कभी-कभी मन पूछ बैठता है— क्या कोई होगा, जो मेरे सौन्दर्य से नहीं, मेरे स्वभाव से प्रेम करेगा? जो मेरे मौन को भी सुनेगा, मेरी जिद को भी समझेगा, मेरे आँसुओं को भी स्वीकार करेगा, और मेरे स्वाभिमान का सम्मान करेगा। क्या कोई होगा, जो मुझे बदलने के लिए नहीं, मुझे समझने के लिए प्रेम करेगा? क्योंकि हर साधारण स्त्री के भीतर, एक असाधारण संसार बसता है।
लोग तो दीवाने हैं बनावट के, भला हम अपनी सादगी लेकर कहाँ जाये।
मैं शून्य में हूँ और मेरी नज़रें उस झूलते नीम के तने पर और मेरा सारा ध्यान उसकी छोटी छोटी पत्तियों पर। मैं देखती हूँ उसे लालसा भरी आँखों से शायद इस उम्मीद में कि मैं भी पत्ती बन जाऊँ निश्चित ही सीता ने भी धरती को इसी लालसा से पुकारा होगा....
शब्दों के सन्नाटे में, अर्थ भटक रहे। रिश्तों के सम्बोधन में, भाव खटक रहे। लेकर वन्दन अभिनंदन मन चटक रहे। स्वप्न की साँझ भरी, अश्रु लटक रहे।
जो तुम्हें प्राप्त है, वही पर्याप्त है। 🙏🏻
मन में दौड़ रहे भावों के चक्रव्यूह को, कुछ पल थाम लेती हूँ । लिखना चाहती हूँ बहुत कुछ, वक्त वक्त पर विराम लेती हूँ। 😊🙏🏻
भोली सूरत अपने अन्दर सोच निराली रखती है। जैसे साधारण सी सीपी अपने अन्दर सुन्दर मोती रखती है।
सोच हूँ और सोच का ही एक सतत अभ्यास हूँ मैं। आस्था की बात हो तो निर्जला उपवास हूँ मैं ।
मौन हूँ, नि:शब्द नहीं। आवाज़ है पर बोलती नहीं। खबर सब है पर मुँह खोलती नहीं। आईने की तरह हूँ पर बिखरती नहीं। कुछ इस तरह जीना छोड़ती नहीं। 😊🧘🏻♀️
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