उम्र के तीसरे पड़ाव पर आकर नयनादेवी बिल्कुल शांत हो गई थीं। तीनों बच्चों की शादी के बाद घर खाली-खाली सा हो गया था। दोनों लड़के विदेश जाकर बस गए थे, और बेटी अपनी ससुराल चली गई थी। बड़े शहर का बंगला अब उन्हें काटने को दौड़ता था।
एक दिन नयनादेवी महाकाल दर्शन करने उज्जैन गईं। वहां से लौटकर उनकी जिंदगी पूरी तरह बदल गई। उन्होंने अपना शहर का बड़ा सा बंगला बेच दिया और गांव के छोटे से घर में रहने लगीं। बंगला बेचकर जो पैसे मिले, उनसे उन्होंने गांव में एक छोटा अस्पताल बनवा दिया। उस अस्पताल में सिर्फ 10 रुपए में इलाज होता था। गरीब से गरीब आदमी भी बिना डरे इलाज करवा सकता था।
इसके बाद उन्होंने गांव की लड़कियों के लिए एक विद्यालय खोला। स्कूल की पढ़ाई के बाद शाम को गांव की औरतों को क्राफ्ट और सिलाई करना सिखातीं। उनका मानना था कि "अगर महिला के हाथ में हुनर होगा तो वह कभी किसी की मोहताज नहीं होगी।"
हर महीने के अंतिम रविवार को गांव में मेला लगता। उस मेले में गांव की सभी महिलाओं द्वारा बनाए गए शिल्प बिकते। सारे स्टॉल महिलाएं खुद सजातीं और खुद बेचतीं। धीरे-धीरे पूरे इलाके में नयनादेवी का नाम "ठकुराइन नयनादेवी" के नाम से प्रसिद्ध हो गया। गांव के हर झगड़े, हर समस्या को वही सुलझातीं। नयनादेवी के द्वार से कोई भी खाली हाथ नहीं लौटता था।
शाम होते ही वो अपने विद्यालय में बच्चों की निशुल्क कक्षा चलातीं। उस कक्षा में बच्चों को किताबी ज्ञान के साथ-साथ नैतिक मूल्य और देशभक्ति भी सिखाई जाती। नयनादेवी बहुत सादगी से महाकाल की भक्ति में अपना जीवन बिताने लगी थीं। गांव में अब उनका नाम सम्मान से लिया जाता था।
एक दिन गांव की एक बुढ़िया घबराई हुई नयना देवी के पास आई। उसकी आंखों में आंसू थे। "नयना देवी मेरा बेटा जख्मी हालत में पड़ा है। उसे तुरंत इलाज की जरूरत है। मेरे बेटे की जान बचा लो नयना देवी।"
नयनादेवी से उस मां का दुख देखा नहीं गया। वो तुरंत उस घायल युवा को लेकर शहर के सबसे बड़े अस्पताल पहुंचीं।
वह युवा कोई और नहीं, देश की सेना का एक वीर जवान था। एक रात पहरा देते समय वो गलती से दुश्मन की सीमा में चला गया था। वहां दुश्मनों ने उसे पकड़कर बहुत यातनाएं दीं। किसी तरह जान बचाकर वो भागा और गांव वालों को जख्मी हालत में मिला।
डॉक्टरों ने कहा "इसे बहुत खून चाहिए, और अंगों को भी नुकसान हुआ है। बचने की उम्मीद कम है।"
यह सुनते ही नयनादेवी डॉक्टर के सामने हाथ जोड़कर खड़ी हो गईं। उनकी आंखों में दृढ़ता थी। उन्होंने कहा, "डॉक्टर साहब, इस वीर जवान को कुछ नहीं होना चाहिए। हमारे देश को ऐसे युवाओं की बहुत जरूरत है। मेरी रगों का एक-एक कतरा खून ले लीजिए। जो भी अंग चाहिए, मेरे शरीर से ले लीजिए। पर इस बेटे की जान बचा लीजिए।"
नयनादेवी ने अपने शरीर के सभी अंग दान कर दिए। उस जवान को अपना खून दिया। खून देते-देते नयनादेवी के प्राण निकल गए। लेकिन उनके त्याग से उस वीर जवान की जिंदगी बच गई।
गांव में शोक की लहर दौड़ गई। पूरा गांव रोया। लेकिन साथ ही गर्व भी किया। गांव वालों ने चंदा इकट्ठा करके गांव के बीच चौराहे पर "ठकुराइन नयनादेवी" की संगमरमर की मूर्ति स्थापित की।
आज भी हर साल सावन के महीने में वहां बड़ा मेला लगता है। भंडारा होता है। और गांव के बुजुर्ग बच्चों को ठकुराइन नयनादेवी की कथा सुनाते हैं। कथा सुनकर बच्चे सीखते हैं कि सेवा क्या होती है, त्याग क्या होता है और देशभक्ति क्या होती है।
नयनादेवी चली गईं, पर अपने कर्मों से अमर हो गईं। आज भी गांव का हर व्यक्ति कहता है - "नयनादेवी हमारे बीच ही हैं। अस्पताल में, स्कूल में और हर उस बेटी में जो अपने पैरों पर खड़ी है।"
डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली