ठकुराइन नयना देवी
हरियाणा के एक छोटे से गांव में नयना देवी रहती थी। गांव वाले उसे नयना कहकर बुलाते थे। नयना बहुत सुंदर थी, लेकिन स्वभाव से अक्खड़ और साफ दिल की थी। उसकी शादी पास के ही गांव में सुरेश नाम के लड़के से तय हुई। सुरेश का स्वभाव बिल्कुल उल्टा था - मीठा बोलने वाला, सबको मान देने वाला।
नयना का जन्म महीने की सात तारीख को हुआ था। बुजुर्ग कहते थे कि सात का अंक केतु का होता है। केतु वाले लोग जिद्दी, स्वाभिमानी और बहुत धार्मिक होते हैं। उनकी कही बात अक्सर सच हो जाती है। नयना भी वैसी ही थी। वो किसी का दबाव बर्दाश्त नहीं करती थी। जो सही लगता वो करती, चाहे दुनिया कुछ भी कहे।
शादी के अगले ही दिन ससुराल में बवाल हो गया। नयना सुबह जल्दी उठी, नहाई, अपने कपड़े धोए और फिर कमरे में जाकर सो गई। उसकी जेठानी सरिता ये देखकर भड़क गई। सरिता बहुत आदर्शवादी और नियम-कायदे वाली लड़की थी। उसे लगा नई बहू कामचोर है। उसने सास से शिकायत कर दी - "मम्मी देखो तो, ये तो बस अपने कपड़े धोकर सो गई। सास-ससुर के कपड़े कौन धोएगा? पूजा कौन करेगा?"
सास ने कुछ नहीं कहा, लेकिन नयना ने सब सुन लिया। नयना का खून खौल गया। शाम कोसरिता के स्कूल से घर आते ही वो के सामने खड़ी हो गई। सरिता एक स्कूल में प्राध्यापक थी।गुस्से में उसकी आवाज कांप रही थी।
"तुम्हें मेरी फिक्र करने की जरूरत नहीं। मैं आलसी नहीं हूं। जब मन करेगा तब काम करूंगी, जब मन करेगा आराम करूंगी।"
सरिता रोने लगी। नयना का गुस्सा अभी ठंडा नहीं हुआ था। उसने आवेश में कह दिया - "जा, तेरी शादी गांव में होगी। तेरी सास तुझसे सारा घर का काम करवाएगी और मेहमानों के कपड़े भी तुझसे ही धुलवाएगी। तब पता चलेगा कितने ताने देती है तू।"
ये सुनकर घर में सन्नाटा छा गया। सबको लगा नयना ने श्राप दे दिया है। उस दिन के बाद घर के सब लोग नयना से कन्नी काटने लगे। कोई उससे बात नहीं करता।
लेकिन नयना दिल की बुरी नहीं थी। वो बस बोलने में कड़वी थी। घर का सारा काम वो हंसते-हंसते कर देती। खाना बनाना, आंगन बुहारना, खेत का हिसाब रखना - सब उसको आता था। बस किसी की रोक-टोक उसे पसंद नहीं थी।
धीरे-धीरे गांव में नयना की एक अलग पहचान बन गई। उसके पास पूरे गांव के लोग अपने झगड़े लेकर आते। नयना सबकी बात सुनती और बीच-बचाव कर देती। उसकी कही बात पत्थर की लकीर मानी जाती। लोग उसे प्यार से "ठकुराइन नयना कहने लगे। ठकुराइन इसलिए क्योंकि वो रौबदार थी, किसी की न सुनती थी लेकिन उसकी बातें अक्सर सच हो जाती। उसकी बातें कड़वी जरूर होती लेकिन समस्या हल भी कर देती। गांव की सब खबर रखती कहां क्या हो रहा है।
सरिता शुरू में उससे चिढ़ती थी, लेकिन बाद में समझ गई कि नयना बुरी नहीं है। एक दिन सरिता बीमार पड़ गई। पूरे घर का काम अटक गया। तब नयना ने ही दिन-रात एक करके सब संभाला। सरिता के कपड़े धोए, दवाई दी, और सिर पर हाथ फेरकर कहा - "अब से तू आराम कर, काम मैं देख लूंगी।"
उस दिन सरिता की आंखों में आंसू थे। उसे समझ आया कि नयना का दिल सोने का है, बस जुबान थोड़ी तेज है।
इस तरह नयना ससुराल में "ठकुराइन नयना " बनकर रह गई। गांव वाले आज भी कहते हैं - "केतु वाली है, पर दिल साफ है।"
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नयना देवी की कहानी पढ़े अगले अंक में क्या हुआ
डॉ वंदना शर्मा पांडव नगर नई दिल्ली