अंधेरी रात
(हिंदी कहानी – लगभग 2000 शब्द)
लेखक: विजय शर्मा ऐरी
रात के लगभग ग्यारह बज रहे थे। आसमान में काले बादल छाए हुए थे। कभी-कभी बिजली चमकती और फिर चारों ओर ऐसा अंधेरा छा जाता मानो किसी ने पूरी दुनिया पर काला पर्दा डाल दिया हो।
पंजाब के एक छोटे से गांव में रहने वाला अर्जुन अपनी मोटरसाइकिल पर शहर से घर लौट रहा था। वह एक निजी कंपनी में काम करता था और उस दिन ऑफिस में काम अधिक होने के कारण देर हो गई थी।
उसकी मां ने कई बार फोन किया था।
"बेटा, जल्दी घर आ जाओ। मौसम ठीक नहीं लग रहा।"
अर्जुन हंसते हुए बोला था, "मां, आप चिंता मत करो। बस आधे घंटे में पहुंच जाऊंगा।"
लेकिन किसे पता था कि यह रात उसकी जिंदगी की सबसे रहस्यमयी रात बनने वाली है।
बारिश शुरू हो चुकी थी। हवा इतनी तेज चल रही थी कि पेड़ों की शाखाएं झुक-झुक कर जमीन को छूने लगी थीं।
अचानक उसकी मोटरसाइकिल एक सुनसान सड़क पर बंद हो गई।
"अरे यार! अभी ही खराब होना था?" उसने गुस्से में कहा।
उसने कई बार किक मारी लेकिन मोटरसाइकिल स्टार्ट नहीं हुई।
सड़क के दोनों ओर घना जंगल था। दूर-दूर तक कोई इंसान दिखाई नहीं दे रहा था।
मोबाइल निकाला तो नेटवर्क भी गायब था।
अब अर्जुन को हल्का-हल्का डर महसूस होने लगा।
वह मोटरसाइकिल को धक्का देकर आगे बढ़ने लगा।
तभी बिजली चमकी।
उसकी नजर सड़क किनारे खड़ी एक पुरानी हवेली पर पड़ी।
हवेली काफी बड़ी थी लेकिन बहुत पुरानी और डरावनी लग रही थी।
उसने सोचा, "बारिश रुकने तक वहीं रुक जाता हूं।"
वह धीरे-धीरे हवेली की ओर बढ़ा।
मुख्य दरवाजा आधा खुला हुआ था।
अंदर से पीली रोशनी दिखाई दे रही थी।
अर्जुन ने हिम्मत करके आवाज लगाई—
"कोई है?"
कुछ क्षण सन्नाटा रहा।
फिर अंदर से एक बूढ़े व्यक्ति की आवाज आई—
"आ जाओ बेटा... बारिश में बाहर मत खड़े रहो।"
अर्जुन को थोड़ा आश्चर्य हुआ।
वह अंदर चला गया।
अंदर एक बुजुर्ग व्यक्ति कुर्सी पर बैठा था।
सफेद दाढ़ी, सफेद कपड़े और आंखों में अजीब सी चमक।
"बैठो बेटा," बूढ़े ने कहा।
"धन्यवाद बाबा जी," अर्जुन बोला।
बूढ़े ने उसे चाय दी।
अर्जुन ने चाय पीते हुए पूछा—
"आप यहां अकेले रहते हैं?"
बूढ़ा हल्का सा मुस्कुराया।
"हाँ... पिछले पचास सालों से।"
"पचास साल?"
"हाँ।"
अर्जुन को कुछ अजीब लगा।
लेकिन उसने ज्यादा ध्यान नहीं दिया।
बाहर बारिश और तेज हो चुकी थी।
तभी उसे हवेली के ऊपर वाले हिस्से से किसी लड़की के रोने की आवाज सुनाई दी।
उसने चौंककर पूछा—
"यह आवाज कैसी है?"
बूढ़े का चेहरा अचानक गंभीर हो गया।
"कुछ नहीं बेटा। हवा की आवाज है।"
लेकिन अर्जुन को यकीन नहीं हुआ।
वह साफ-साफ किसी लड़की के रोने की आवाज थी।
कुछ देर बाद वह फिर सुनाई दी।
इस बार पहले से ज्यादा दर्दभरी।
अर्जुन से रहा नहीं गया।
"बाबा जी, कोई परेशानी में है क्या?"
बूढ़े ने उसकी तरफ देखा।
"कुछ सवाल ऐसे होते हैं जिनके जवाब नहीं खोजने चाहिए।"
अर्जुन की उत्सुकता और बढ़ गई।
थोड़ी देर बाद जब बूढ़ा रसोई में गया तो अर्जुन धीरे से सीढ़ियां चढ़कर ऊपर पहुंच गया।
ऊपर पहुंचते ही उसे एक लंबा गलियारा दिखाई दिया।
गलियारे के अंत में एक कमरा था।
वहीं से रोने की आवाज आ रही थी।
उसने धीरे से दरवाजा खोला।
कमरा खाली था।
लेकिन कमरे के बीचों-बीच एक पुरानी तस्वीर रखी थी।
तस्वीर में एक खूबसूरत लड़की मुस्कुरा रही थी।
अचानक पीछे से किसी ने कहा—
"तुम यहां क्यों आए हो?"
अर्जुन डरकर पलटा।
एक युवती उसके सामने खड़ी थी।
सफेद कपड़े, लंबे बाल और उदास आंखें।
"तुम... कौन हो?" अर्जुन हकलाते हुए बोला।
लड़की की आंखों में आंसू आ गए।
"मेरा नाम निशा है।"
"तुम यहां रहती हो?"
"रहती थी..."
अर्जुन कुछ समझ नहीं पाया।
निशा ने कहा—
"आज से पचास साल पहले मेरी हत्या इसी हवेली में हुई थी।"
अर्जुन के हाथ-पांव कांपने लगे।
"क्या?"
"मेरे पिता ने मेरी शादी जबरदस्ती तय कर दी थी। मैं किसी और से प्यार करती थी। एक रात मैंने घर छोड़ने की कोशिश की। लेकिन मुझे मार दिया गया।"
अर्जुन के माथे पर पसीना आ गया।
"तो... तुम..."
"हाँ। मैं इस दुनिया में नहीं हूं।"
अर्जुन पीछे हट गया।
लेकिन निशा की आंखों में डर नहीं, दर्द था।
"मैं तुम्हें नुकसान नहीं पहुंचाऊंगी।"
"फिर तुम मुझसे क्या चाहती हो?"
"सच को दुनिया तक पहुंचाना।"
उसने एक पुराना संदूक दिखाया।
"उसमें मेरी डायरी है। मेरी कहानी लिखी हुई है।"
अर्जुन ने कांपते हाथों से संदूक खोला।
अंदर एक पुरानी डायरी थी।
डायरी के पन्ने पीले पड़ चुके थे।
उसने पढ़ना शुरू किया।
हर पन्ने पर दर्द लिखा था।
निशा अपने प्रेमी रवि से शादी करना चाहती थी।
लेकिन परिवार ने विरोध किया।
फिर एक रात उसकी हत्या कर दी गई और सबने इसे आत्महत्या बता दिया।
अर्जुन की आंखें नम हो गईं।
"यह बहुत अन्याय हुआ।"
निशा बोली—
"इसीलिए मेरी आत्मा भटक रही है।"
अचानक नीचे से बूढ़े की आवाज आई—
"अर्जुन!"
अर्जुन घबरा गया।
निशा बोली—
"जाओ... लेकिन सच मत भूलना।"
अर्जुन जल्दी से नीचे आ गया।
बूढ़ा उसे घूर रहा था।
"तुम ऊपर गए थे?"
"हाँ।"
"तुमने उसे देखा?"
अर्जुन चुप रहा।
बूढ़े की आंखों में आंसू आ गए।
"वह मेरी बेटी थी।"
अर्जुन हैरान रह गया।
"क्या?"
"मैं ही उसका पिता हूं।"
बूढ़ा रोने लगा।
"मैंने समाज के डर से अपनी बेटी की जिंदगी बर्बाद कर दी।"
उसकी आवाज कांप रही थी।
"पचास साल से मैं इसी अपराधबोध में जी रहा हूं।"
अर्जुन ने कहा—
"अभी भी देर नहीं हुई। सच सामने लाना होगा।"
बूढ़े ने सिर झुका लिया।
"मैं तैयार हूं।"
सुबह होते ही बारिश रुक गई।
अर्जुन गांव पहुंचा।
उसने पुलिस और प्रशासन को पूरी कहानी बताई।
डायरी सबूत के रूप में पेश की गई।
पुराना मामला दोबारा खोला गया।
जांच में पता चला कि निशा की मौत वास्तव में हत्या थी।
गांव में यह खबर आग की तरह फैल गई।
लोग हैरान थे कि पचास साल पुराना सच सामने आ गया था।
कुछ दिनों बाद अर्जुन फिर उस हवेली में गया।
इस बार वहां सन्नाटा था।
वह ऊपर वाले कमरे में पहुंचा।
उसे वही तस्वीर दिखाई दी।
लेकिन इस बार तस्वीर में निशा का चेहरा पहले से अधिक शांत लग रहा था।
अचानक कमरे में हल्की सी रोशनी फैली।
निशा उसके सामने प्रकट हुई।
लेकिन अब उसके चेहरे पर मुस्कान थी।
"धन्यवाद अर्जुन।"
"तुम अब खुश हो?"
"हाँ। सच सामने आ गया। अब मुझे मुक्ति मिल जाएगी।"
अर्जुन की आंखें नम हो गईं।
"तुम्हारी कहानी कभी नहीं भूली जाएगी।"
निशा मुस्कुराई।
"हर अंधेरी रात के बाद एक नई सुबह आती है।"
इतना कहकर वह धीरे-धीरे रोशनी में विलीन हो गई।
अर्जुन कुछ देर वहीं खड़ा रहा।
फिर उसने आसमान की ओर देखा।
आज बादल नहीं थे।
सूरज की सुनहरी किरणें हवेली पर पड़ रही थीं।
उसे महसूस हुआ कि सच और न्याय की रोशनी सबसे घने अंधेरे को भी मिटा सकती है।
उस दिन अर्जुन ने सीखा कि डर से भागना नहीं चाहिए। कभी-कभी एक अंधेरी रात हमें ऐसी सच्चाई से मिलाती है जो कई जिंदगियों को रोशन कर देती है।
समाप्त।
लेखक: विजय शर्मा ऐरी