flowing tears in Hindi Human Science by Vijay Erry books and stories PDF | बहते आँसू

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बहते आँसू

बहते आँसूएक भावपूर्ण हिंदी कहानीलेखक: विजय शर्मा ऐरीगौरव खिड़की के पास बैठा बाहर गिरती बारिश को देख रहा था। उसकी आँखों से भी आँसू उसी बारिश की तरह लगातार बह रहे थे। कभी-कभी इंसान के जीवन में ऐसे तूफान आते हैं जो बाहर नहीं, भीतर सब कुछ उजाड़ देते हैं।गौरव एक साधारण परिवार का लड़का था। पिता स्कूल में अध्यापक थे और माँ गृहिणी। परिवार अमीर नहीं था, लेकिन प्यार और संस्कारों से भरपूर था। माँ अक्सर कहा करती थीं—"बेटा, जिंदगी में चाहे कितना भी बड़ा आदमी बन जाना, लेकिन इंसानियत कभी मत छोड़ना।"गौरव मुस्कुराकर कहता—"माँ, आपका बेटा कभी आपको शर्मिंदा नहीं करेगा।"समय बीतता गया। गौरव पढ़ाई में बहुत अच्छा था। उसने मेहनत करके इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की और एक बड़ी कंपनी में नौकरी पा ली। पूरे परिवार में खुशी का माहौल था।उस दिन माँ ने मंदिर में प्रसाद चढ़ाया और खुशी से बोलीं—"आज मेरा सपना पूरा हो गया।"गौरव ने माँ के चरण छू लिए।"माँ, यह सब आपकी दुआओं का फल है।"लेकिन किस्मत को शायद कुछ और ही मंजूर था।एक दिन अचानक गौरव के पिता को दिल का दौरा पड़ा। अस्पताल ले जाने से पहले ही उनका निधन हो गया।घर में मातम छा गया।पिता की अर्थी के सामने खड़ा गौरव फूट-फूटकर रो रहा था।"पापा... मुझे अकेला छोड़कर मत जाइए..."लेकिन जो जा चुका था, वह वापस नहीं आने वाला था।उस दिन पहली बार गौरव ने महसूस किया कि जीवन कितना कठोर हो सकता है।पिता के जाने के बाद सारी जिम्मेदारी उसके कंधों पर आ गई। माँ को संभालना, छोटी बहन नेहा की पढ़ाई पूरी करवाना, घर का खर्च चलाना—सब कुछ उसी को करना था।गौरव दिन-रात मेहनत करने लगा।कई बार देर रात घर लौटता तो माँ उसका माथा सहलाते हुए कहतीं—"बेटा, थोड़ा आराम भी कर लिया कर।""माँ, अभी नहीं। पहले नेहा की पढ़ाई पूरी हो जाए।"माँ की आँखें गर्व से भर जातीं।समय के साथ नेहा की पढ़ाई पूरी हुई। फिर उसकी शादी भी अच्छे परिवार में हो गई।शादी के दिन नेहा अपने भाई के गले लगकर रोने लगी।"भैया, आपने मेरे लिए पिता का भी फर्ज निभाया है।"गौरव की आँखें नम हो गईं।"खुश रहना बहन, बस यही मेरी दौलत है।"शादी के बाद घर में केवल गौरव और उसकी माँ रह गए।अब माँ अक्सर कहतीं—"बेटा, तू भी शादी कर ले।"लेकिन गौरव हर बार मुस्कुरा देता।"अभी समय नहीं है माँ।"एक दिन कंपनी में उसकी मुलाकात राधिका नाम की लड़की से हुई।राधिका समझदार, सरल और संवेदनशील थी।धीरे-धीरे दोनों अच्छे मित्र बन गए।एक दिन राधिका ने पूछा—"गौरव, तुम हमेशा दूसरों के लिए जीते हो। अपने लिए कब जीओगे?"गौरव कुछ देर चुप रहा।"शायद कभी नहीं।""क्यों?""क्योंकि मेरी खुशियाँ मेरे परिवार की खुशियों में हैं।"राधिका उसकी बात सुनकर भावुक हो गई।समय के साथ दोनों के बीच प्यार पनपने लगा।जब गौरव ने यह बात माँ को बताई तो वे बहुत खुश हुईं।"मैं तो कब से इसी दिन का इंतजार कर रही थी।"कुछ महीनों बाद दोनों की शादी हो गई।गौरव को लग रहा था कि अब उसकी जिंदगी में खुशियों का नया अध्याय शुरू हो गया है।लेकिन जिंदगी की किताब में दुख का एक और पन्ना लिखा जा चुका था।शादी के केवल एक साल बाद माँ को कैंसर होने का पता चला।यह खबर सुनकर गौरव के पैरों तले जमीन खिसक गई।"डॉक्टर साहब, मेरी माँ ठीक तो हो जाएँगी न?"डॉक्टर ने गंभीर स्वर में कहा—"हम पूरी कोशिश करेंगे।"इसके बाद अस्पताल, दवाइयाँ, इलाज और चिंताओं का लंबा दौर शुरू हो गया।गौरव दिन-रात माँ की सेवा करता।राधिका भी हर पल उसके साथ खड़ी रही।एक रात अस्पताल में माँ ने गौरव का हाथ पकड़ा।"बेटा, अगर मैं चली जाऊँ तो रोना मत।""माँ, ऐसी बातें मत करो।""हर किसी को एक दिन जाना होता है।"गौरव की आँखों से आँसू बहने लगे।"मुझे आपकी जरूरत है माँ।"माँ ने उसके आँसू पोंछ दिए।"और मुझे तुझ पर गर्व है।"कुछ दिनों बाद माँ भी इस दुनिया को छोड़कर चली गईं।गौरव टूट गया।उसकी दुनिया जैसे उजड़ गई थी।घर की हर दीवार उसे माँ की याद दिलाती।रसोई में रखा उनका चश्मा, पूजा की माला, अलमारी में तह किए कपड़े—सब कुछ।एक रात वह माँ की तस्वीर के सामने बैठा रो रहा था।"माँ, आप मुझे छोड़कर क्यों चली गईं?"कमरे में सन्नाटा था।सिर्फ उसके बहते आँसू थे।समय धीरे-धीरे आगे बढ़ा।राधिका ने उसे संभालने की बहुत कोशिश की।लेकिन माँ की कमी कभी पूरी नहीं हो सकती थी।फिर एक दिन राधिका ने खुशखबरी दी।"गौरव, तुम पापा बनने वाले हो।"कई महीनों बाद पहली बार गौरव के चेहरे पर मुस्कान आई।उसने आसमान की ओर देखकर कहा—"माँ, आपकी दुआ फिर मेरे साथ है।"नौ महीने बाद एक प्यारी सी बेटी ने जन्म लिया।गौरव ने उसे गोद में उठाया तो उसकी आँखें भर आईं।उसे अपनी माँ की याद आ गई।उसने बेटी का नाम रखा—"आशा"।क्योंकि वही उसकी नई आशा थी।आशा के आने से घर में खुशियाँ लौट आईं।गौरव अपनी बेटी से बहुत प्यार करता था।हर शाम ऑफिस से लौटकर उसके साथ खेलता।जीवन फिर से पटरी पर आ रहा था।लेकिन नियति का खेल अभी खत्म नहीं हुआ था।एक दिन राधिका अपनी बेटी को स्कूल से लेकर लौट रही थी।रास्ते में उनकी कार का भयंकर एक्सीडेंट हो गया।खबर सुनते ही गौरव अस्पताल पहुँचा।उसकी साँसें जैसे रुक गई थीं।डॉक्टर बाहर आए।"हमें अफसोस है... हम राधिका को नहीं बचा सके।"यह सुनते ही गौरव जमीन पर बैठ गया।उसकी चीख पूरे अस्पताल में गूँज उठी।"नहीं....!"उसकी आँखों से आँसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे।लेकिन तभी डॉक्टर ने कहा—"आपकी बेटी सुरक्षित है।"गौरव दौड़कर आशा के पास गया।छोटी सी बच्ची बेहोश थी।उसने उसका हाथ पकड़ लिया।"बेटा, अब तू ही मेरी दुनिया है।"उस रात गौरव बहुत रोया।शायद उतना, जितना पहले कभी नहीं रोया था।उसने जीवन में पिता को खोया था, माँ को खोया था, और अब अपनी पत्नी को भी।लेकिन फिर उसने अपनी बेटी की ओर देखा।उसे एहसास हुआ कि अगर वह टूट गया, तो आशा का क्या होगा?उस दिन उसने खुद से एक वादा किया।"मैं अपने दर्द को अपनी बेटी की मुस्कान के पीछे छिपा दूँगा।"वर्ष बीतते गए।आशा बड़ी होती गई।वह पढ़ाई में बहुत तेज थी।एक दिन स्कूल के कार्यक्रम में उसे सम्मानित किया गया।स्टेज से उतरकर वह अपने पिता के पास आई।"पापा, यह पुरस्कार आपके लिए।"गौरव की आँखें भर आईं।"क्यों?""क्योंकि आपने मेरे लिए माँ और पापा दोनों का प्यार दिया है।"गौरव कुछ बोल नहीं पाया।उसकी आँखों से फिर आँसू बह निकले।लेकिन इस बार ये दुख के आँसू नहीं थे।ये गर्व और खुशी के आँसू थे।कुछ वर्षों बाद आशा डॉक्टर बन गई।उसने अपने पिता को गले लगाया।"पापा, मेरा सपना पूरा हो गया।"गौरव मुस्कुराया।"नहीं बेटा, मेरा सपना पूरा हुआ है।"उस रात वह छत पर बैठा आसमान को देख रहा था।उसे अपने पिता, माँ और राधिका की याद आई।उसकी आँखों से फिर आँसू बह निकले।लेकिन अब उन आँसुओं में शिकायत नहीं थी।वे आँसू प्रेम, स्मृतियों और कृतज्ञता के थे।वह धीरे से बोला—"आप सब जहाँ भी हैं, देखिए... आपकी आशा आज डॉक्टर बन गई है।"हवा का एक हल्का झोंका उसके चेहरे को छूकर गुजरा।जैसे कहीं दूर से कोई आशीर्वाद दे रहा हो।गौरव मुस्कुराया।उसने अपने आँसू पोंछे और आसमान की ओर देखा।क्योंकि उसे समझ आ चुका था कि जीवन में आँसू बहना कमजोरी नहीं होते।कई बार यही बहते आँसू इंसान को मजबूत बनाते हैं, उसे दर्द से निकालकर उम्मीद की रोशनी तक पहुँचाते हैं।और उस रात, वर्षों बाद, गौरव के बहते आँसू उसके चेहरे पर एक शांत मुस्कान छोड़ गए।समाप्तलेखक: विजय शर्मा ऐरी