(सुबह का समय। ऑफिस में सिमरन फाइलों में उलझी बैठी है। उसकी मासूमियत वैसी ही है, जैसे हमेशा। उसे नहीं पता उसके चारों ओर मौत का साया मंडरा रहा है।)
"सिमरन… जिसके लिए ये दुनिया मासूमियत और डर से भरी थी…
अब अनजाने में उस खेल का हिस्सा बन चुकी थी
जहाँ इंसानियत और खून की प्यास टकरा रहे थे।"
(करण केबिन के शीशे से बाहर सिमरन को देख रहा है। उसकी आँखों में बेचैनी है। उसके मन में बिरादरी की धमकी गूंज रही है।)
Karan (मन ही मन) बोला -
"अगर मैंने इसे नहीं मारा… तो ये लोग इसे नोच डालेंगे।
मुझे इसे इस शहर से, इन आँखों से छुपाना होगा।"
(शाम का समय। ऑफिस में सभी चले गए हैं। सिमरन अब भी फाइलों में डूबी है। करण अंदर आता है। उसका चेहरा गंभीर और खामोश है।)
Simran (डरी हुई नज़र से) बोली -
"स-स-स… सर? मैंने कुछ ग़लत किया क्या?"
Karan (धीरे, पर सख़्त स्वर में) बोला -
"तुमने कुछ नहीं किया।
लेकिन अब तुम यहाँ नहीं रहोगी।"
(सिमरन चौंक जाती है।)
Simran बोली -
"मतलब? मुझे निकाल रहे हैं?"
Karan (गहरी आवाज़ में) बोला -
"निकाल नहीं रहा… छुपा रहा हूँ।
क्योंकि इस शहर में अब तुम्हारा रहना ख़तरनाक है।"
(सिमरन का चेहरा और भी डर से भर जाता है।)
Simran (काँपते हुए) बोली -
"ख़तरनाक…? कि किससे?"
(करण कुछ नहीं कहता। बस उसका हाथ पकड़कर तेज़ी से बाहर निकलता है। उसकी पकड़ इतनी मज़बूत कि सिमरन छुड़ाना चाहे तो भी छुड़ा नहीं सकती।)
(रात। दिल्ली शहर की चहल-पहल पीछे छूट चुकी है। कार सुनसान जंगलों की ओर जा रही है। सिमरन घबराई हुई है, उसकी आँखों में डर और सवाल हैं।)
Simran बोली -
" स सर… आप मुझे कहाँ ले जा रहे हैं?"
(करण खामोश है। सिर्फ़ उसकी आँखें रियर मिरर में चमक रही हैं— लाल, बेचैन और खतरनाक।)
"सिमरन को ये नहीं पता था कि वो किस खाई की तरफ जा रही है।
पर करण जानता था— या तो वो उसे अपनी बिरादरी से बचाएगा…
या फिर खुद अपनी प्यास से हार जाएगा।"
रात। कार सुनसान जंगल में रुकती है। चारों ओर सन्नाटा। सिर्फ़ झींगुरों की आवाज़ें और हवा की सरसराहट। चाँद की हल्की रोशनी पेड़ों के बीच से छनकर गिर रही है।)
Simran (घबराकर) बोली -
" स सर… यहाँ क्यों लाए हैं मुझे? ये… ये कैसी जगह है?"
(करण धीरे-धीरे कार से उतरता है। उसकी आँखें लाल चमक रही हैं। उसके चेहरे पर अब वो रहस्य नहीं—बल्कि एक शिकारी की भूख है।)
"सच्चाई ये थी… कि करण किसी और को अपना शिकार देना नहीं चाहता था।
वो जानता था—सिमरन सिर्फ़ उसकी है।"
(करण धीरे-धीरे कार का दरवाज़ा खोलता है। सिमरन काँपते हुए बाहर आती है। उसके कदम लड़खड़ा रहे हैं।)
Simran (डरी आवाज़ में) बोली -
" स सर… मुझे घर जाना है। प्लीज़…"
(करण उसकी ओर बढ़ता है। उसकी साँसें भारी हैं, जैसे हर लम्हे उसकी प्यास बढ़ रही हो।)
Karan (खामोशी तोड़ते हुए, ठंडी आवाज़ में) बोला -
"तुम नहीं समझोगी सिमरन…
मैं तुम्हें यहाँ क्यों लाया।"
(सिमरन पीछे हटती है, उसकी आँखों में आँसू भर आते हैं।)
Simran बोली -
"आप… आप मुझे डराते क्यों हैं? मैंने क्या बिगाड़ा है आपका?"
(करण उसके और करीब आता है। उसकी आँखों की लाल चमक और तेज़ हो जाती है। दाँत बाहर झलकने लगते हैं।)
Karan (धीरे-धीरे) बोला -
"तुम्हारा कोई कसूर नहीं है…
कसूर सिर्फ़ मेरा है… कि मैं एक इंसान नहीं।
मैं एक प्यासा शैतान हूँ।
और आज… मेरी प्यास का जवाब सिर्फ़ तुम्हारा खून है।
मुझे माफ कर देना सिमरन। पर मैं मजबूर हूं।"
(सिमरन की साँसें रुक सी जाती हैं। वो ज़मीन पर बैठती है, हाथ जोड़ लेती है। उसके पैरों में गिरती है।)
Simran (रोते हुए) बोली -
"नहीं! सर प्लीज़! मैं मरना नहीं चाहती… मुझे मत मारिए…"
(करण उसके करीब आता है। उसके चेहरे पर शिकारी की भूख है, मगर आँखों में एक अजीब सा दर्द भी। वो सिमरन का चेहरा पकड़ता है और उसके गले के पास झुकता है।)
"इस पल में… करण की दो सच्चाइयाँ टकरा रही थीं।
एक—उसकी रगों में जलती खून की प्यास।
दूसरी—उस मासूम लड़की की आँखों में भरा डर।"
(करण की साँसें सिमरन की गर्दन से टकराती हैं। सिमरन काँप रही है, आँखें बंद कर लेती है। वो हिल नहीं पा रही थी। पहले की तरह ही किसी शक्ति ने उसे जकड़ रखा था। )
(जंगल का अंधेरा। करण की लाल आँखें और ज्यादा चमक उठती हैं। वो झुककर सिमरन की गर्दन पर अपने दाँत गड़ा देता है। सिमरन चीख भी नहीं पाती, बस दर्द से कराह उठती है।)
"उस पल में… सैकड़ों सालों की प्यास पूरी होने लगी।
पहली बूंद… जिसने शैतान को सुकून दिया,
मगर इंसान को जला डाला।"
(सिमरन की साँसें भारी हो जाती हैं। उसकी आँखें आँसुओं से भर जाती हैं। वो अपने कांपते हाथ मासूमियत से करण के सीने पे रख देती है।)
Simran (कमज़ोर आवाज़ में) बोली -
"प… प्लीज़… मत कीजिए… द दर्द हो रहा है।"
(करण का शरीर सिहर उठता है। जैसे किसी ने उसके भीतर की आग को रोक दिया हो। उसके हाथ काँपने लगते हैं। वो तुरंत पीछे हट जाता है। उसकी आँखों की लाल चमक थोड़ी मंद पड़ जाती है।)
Karan (गुस्से में, पर काँपती आवाज़ में) बोला -
"क्यों किया तुमने ऐसा। तुमने मुझे फिर कमजोर कर दिया।
कभी… भी ऐसा मत करना मेरे साथ!
तुम्हें अंदाज़ा भी नहीं है… मैं क्या हूँ!"
(सिमरन डरी-सहमी ज़मीन पर बैठ जाती है, अपनी गर्दन पकड़कर रोने लगती है। करण उससे नज़रें चुराता है, जैसे खुद से शर्मिंदा हो। वो अपने हाथों से अपने मुंह पे लगे खून को पोंछता है। )
(करण पास के एक पेड़ को ज़ोर से मुक्का मारता है। पेड़ की छाल चटक जाती है। उसकी आवाज़ गूंजती है।)
Karan (गरजते हुए) बोला -
"मैंने कहा था ना… मेरे करीब मत आया करो!
तुम्हें समझ नहीं आता? मैं इंसान नहीं हूँ!"
(सिमरन काँपते हुए उसके गुस्से को देखती है। उसकी मासूम आँखों में सवाल है, पर आवाज़ नहीं निकलती।)
"सिमरन ने पहली बार अपने राक्षसी बॉस की असली प्यास देखी थी।
मगर उसे ये नहीं पता था कि उस प्यास के पीछे एक अजीब सा डर छिपा है—
डर… खुद को खो देने का।"
(जंगल का अंधेरा और घना हो चुका है। सिमरन काँपते हुए ज़मीन पर बैठी है। उसकी गर्दन से खून की पतली लकीर बह रही है। तभी पेड़ों के बीच से कई लाल आँखें चमक उठती हैं। करण की बिरादरी वहाँ पहुँच चुकी है।)
"शैतानों की बिरादरी…
जिनके लिए इंसानी खून सिर्फ़ प्यास नहीं, बल्कि ताक़त थी।
और अब उनकी नज़रें टिक गई थीं—सिर्फ़ सिमरन पर।"
(एक शैतान आगे आता है, चेहरा भयानक, दाँत बाहर निकले हुए।)
Shaitan (गरजते हुए) बोला -
"करण! तू इतना कमज़ोर हो गया है कि एक इंसानी बच्ची को मार भी नहीं पा रहा?
हट जा… ये शिकार अब हमारा है।
अब हम इसे तड़पा तड़पा के मरेंगे।"
(सिमरन डर के मारे चीख पड़ती है और पीछे हट जाती है। करण उसके आगे खड़ा हो जाता है। उसके पंख फैल जाते हैं, आँखें लाल आग की तरह जलने लगती हैं।)
Karan (गुस्से से) बोला -
"ये शिकार… सिर्फ़ मेरा है।
इसकी एक बूँद भी कोई नहीं छुएगा!"
(दो शैतान सिमरन पर झपटते हैं। करण दहाड़ता है और उन्हें ज़ोर से धक्का मारकर दूर फेंक देता है। वो सिमरन का हाथ पकड़कर भागने लगता है। सिमरन काँपते हुए उसके साथ भाग रही है।)
Simran (रोते हुए) बोली -
"सर! ये… ये क्या हैं? आप मुझे कहाँ ले जा रहे हैं?"
Karan (भागते हुए, भारी आवाज़ में) बोला -
"मत पूछो, सिमरन! बस भागो!"
(जंगल के अंदर तेज़ दौड़। पत्तों की सरसराहट, टूटती डालियाँ, और पीछे से आती हुई शैतानों की दहाड़ें।)
(करण और सिमरन एक गहरी घाटी की ओर भागते हैं। पीछे से शैतानों की परछाइयाँ और नज़दीक आती जा रही हैं। करण सिमरन को अपने पंखों से ढक लेता है और हवा में ऊँचा उछलता है।)
"उस रात… शैतान अपने ही शिकार के लिए लड़ रहा था।
मगर ये लड़ाई सिर्फ़ खून की नहीं थी…
ये उसकी रूह की लड़ाई थी।"