(ऑफिस का रात का माहौल। सभी लोग जा चुके हैं। सिर्फ़ करण अपनी केबिन में बैठा है। सिमरन फ़ाइल लेकर धीरे-धीरे दरवाज़ा खटखटाती है।)
Simran (धीमे स्वर में, घबराई हुई) बोली -
"स…सर, ये साइन चाहिए थे…"
(करण धीरे से सिर उठाता है। उसकी लाल आँखों में हल्की चमक है। सिमरन की नाक से अभी भी हल्की चोट का निशान है। करण की प्यास और बढ़ जाती है।)
Karan (आँखें गहरी करते हुए) बोला -
"इतनी देर रात… तुम अकेली क्यों रुकी हो?"
(सिमरन घबराकर झुक जाती है। उसके हाथ काँप रहे हैं।)
Simran (धीरे से) बोली -
"वो… आपका ऑर्डर था सर… मैं डरी हुई थी, इसलिए…"
(करण अचानक खड़ा होता है और उसके बेहद क़रीब आ जाता है। सिमरन एकदम से पीछे हटती है, लेकिन दीवार से टकरा जाती है। करण उसका रास्ता रोक लेता है।)
"सिमरन के दिल की धड़कन तेज़ थी।
उसके सामने वही आदमी खड़ा था—
जो डर भी देता था और अजीब तरह से आकर्षित भी करता था।"
(करण उसके बेहद करीब आता है। वो उसकी कलाई को पकड़ कर उसकी नब्ज़ सुनता है। उसकी सांसें तेज़ हो जाती हैं। करण की आँखें गहरी लाल चमकती हैं।)
Karan (मन ही मन, होंठ दबाते हुए) बोला -
"ये मासूम खून… ये खुशबू…
कितनी बार खुद को रोका है…
लेकिन अब मेरी प्यास… मुझे चैन नहीं लेने दे रही।"
(सिमरन घबराकर बोल पड़ती है।)
Simran (काँपते स्वर में) बोली -
"सर… प…प्लीज़… मुझे जाने दीजिए…"
(करण उसकी आँखों में देखता है। उसकी आवाज़ धीमी लेकिन डरावनी है।)
Karan बोला -
"भागने की कोशिश मत करना, सिमरन…
तुम जितना डरती हो… उतना ही मेरे और क़रीब आती जाती हो।"
(सिमरन की आँखों में आँसू भर आते हैं। लेकिन उसकी सांसों में एक अनजाना आकर्षण है। वह खुद समझ नहीं पा रही कि उसके दिल में डर है… या खिंचाव।)
"करण की प्यास अब हद पार करने लगी थी…
सिमरन का मासूम डर उसे और भड़काता जा रहा था।
लेकिन क्या वो अब भी खुद पर काबू रख पाएगा?"
रात गहरी है। कमरे में हल्की रोशनी जल रही है। करण सिमरन के बिलकुल करीब खड़ा है। उसकी आँखें खून की तरह लाल हो चुकी हैं। सिमरन दीवार से सटी हुई काँप रही है।)
Karan (धीमी, भारी आवाज़ में) बोला -
"तुम्हें पता भी है… तुम्हारी धड़कन कितनी तेज़ है अभी?
और इसी के साथ तुम्हारा खून भी.....
तुम्हारा डर… तुम्हारी खुशबू…
मेरे लिए सबसे बड़ा नशा है।"
(करण झुककर उसके गले के करीब आता है। सिमरन की साँसें अटक जाती हैं। वह आँखें बंद कर लेती है। वो चाह कर भी हिल नहीं पा रही थी। ऐसा लगता था जैसे किसी अदृश्य शक्ति ने उसे बांध दिया है।)
"करण की प्यास अब अपने चरम पर थी।
सिमरन की नब्ज़ उसकी हर नस में गूँज रही थी।
उसके लिए अब उसे रोक पाना आसान नहीं था।"
(करण अपने दाँत उसके गले के बेहद करीब ले आता है। सिमरन काँपती है, आँसू टपकते हैं।)
Simran (फुसफुसाते हुए, डर और मासूमियत में) बोली -
"प…प्लीज़ सर… मुझे छोड़ दीजिए…"
(करण अचानक एक पल के लिए रुक जाता है। उसके भीतर एक जंग चल रही है। लाल आँखें धीरे-धीरे हल्की होने लगती हैं। वह अचानक पीछे हटता है और जोर से अपनी मुट्ठी दीवार पर मारता है।)
Karan (गुस्से और दर्द से) बोला -
"क्यों… क्यों नहीं कर पा रहा मैं…?
इतना पास होते हुए भी… क्यों खुद को रोक लेता हूँ?"
(सिमरन हाँफते हुए उसकी तरफ देखती है। वो समझ नहीं पाती कि ये सब क्या हो रहा है। उसके लिए करण अब और भी रहस्यमयी और डरावना हो गया था।)
(करण खिड़की के पास जाकर खड़ा हो जाता है। उसकी साँसें भारी हैं। सिमरन धीरे-धीरे फाइल्स समेटकर कमरे से निकलने की कोशिश करती है।)
Karan (पीछे से ठंडी आवाज़ में) बोला -
"याद रखना, सिमरन…
तुम मुझसे कभी दूर नहीं जा सकती।
तुम मेरी हो… चाहे तुम्हें ये मंज़ूर हो या न हो।"
(सिमरन काँपते हुए दरवाज़ा खोलकर बाहर भाग जाती है। उसके आँसू रुक नहीं रहे। लेकिन दिल के किसी कोने में एक सवाल था—
‘वो मुझे क्यों बार-बार छोड़ देते हैं? अगर सच में मुझे नुकसान पहुँचाना चाहते… तो अब तक क्यों नहीं पहुंचाया?’)
"करण की प्यास अब खतरनाक हो चुकी थी।
लेकिन सिमरन की मासूमियत ने उसे रोके रखा।
अब सवाल ये था…
ये जंग कब तक चलेगी?"
(रात का समय। अंधेरा है। करण अपने कमरे में अकेला बैठा है। तभी अचानक खिड़की से काली हवा के झोंके आते हैं और उसकी बिरादरी के तीन लोग कमरे में प्रकट होते हैं। उनकी आँखें भी लाल और चेहरे डरावने हैं।)
Biradari Member 1 (भारी आवाज़ में) बोला -
"करण… बहुत हो गया।
कई हफ़्तों से तेरा मिशन अधूरा पड़ा है।"
Biradari Member 2 (तेज़ स्वर में) बोली -
"याद रख, वो लड़की सिर्फ़ तेरे लिए चुनी गई है।
उसका खून तुझे ताक़त देगा।
वरना तू कमज़ोर होता जाएगा।"
(करण गहरी साँस लेकर मुट्ठी भींच लेता है।)
Karan ( आवाज दबाकर) बोला -
"मुझे समय चाहिए। वो लड़की… अलग है।"
Biradari Leader (गर्जना जैसी आवाज़ में) बोला -
"समय?
या तुझे उसके मासूम चेहरे से लगाव हो गया है?
याद रख, करण… हमारे क़बीले में लगाव की सज़ा मौत है।"
(करण की आँखें और भी लाल हो जाती हैं। गुस्से में उसकी नज़रों में बिजली सी चमकती है।)
Karan (कड़क आवाज़ में) बोला -
"कोई भी सज़ा मंज़ूर है… लेकिन अभी उसका खून मैं नहीं पीऊँगा।"
(बिरादरी के लोग हँसते हैं। उनमें से एक करण के बेहद करीब आकर उसके कान में फुसफुसाता है।)
Biradari Member बोला -
"अगर तूने नहीं किया… तो हम खुद करेंगे।
तेरी आँखों के सामने उस लड़की की हर एक साँस खत्म कर देंगे।
सोच ले, करण।
तू तो एक बार में खत्म करेगा, और हम उसे तड़पा तड़पा के मरेंगे।"
(करण का चेहरा खामोश हो जाता है, लेकिन उसकी नज़रों में खून उबाल खा रहा है। बिरादरी अंधेरे में गायब हो जाती है।)
"करण के लिए अब ये सिर्फ़ एक मिशन नहीं रहा था।
ये जंग थी— अपने क़बीले और अपने दिल के बीच।
उसका डर सबसे बड़ा ये था…
कि कहीं सिमरन उसकी ही दुनिया के हाथों कुर्बान न हो जाए।"