थकान और कमजोरी से लड़की की आँखें भारी होने लगीं। नींद और बेहोशी के बीच बड़बड़ाई—
“माता रानी… मैंने कभी किसी माँ की झोली खाली करने का इरादा नहीं किया था… सुनीता पर दया करो… उसकी ममता भी पूरी हो जाए… वो भी माँ बन जाये…”
धीरे-धीरे वह गहरी नींद में चली गई।
शाम ढलते ही जब आँख खुली, तो सामने का दृश्य देख कर उसका दिल भर आया—
केशव बच्चे को अपने सीने से लगाकर कुर्सी पर ही सो गया था।
उसके चेहरे पर अजीब-सी शांति थी, और नन्हा-सा शिशु उसकी बाँहों में सुरक्षित महसूस कर रहा था।
लड़की ने चुपके से केशव को देखा। उसके चेहरे पर नींद की थकान थी लेकिन बाँहों में बच्चे को थामे हुए उसकी पकड़ बेहद मज़बूत और स्नेहमयी थी। पहली बार उसे एहसास हुआ कि इस अनजान सफ़र में वह अकेली नहीं है।
धीरे से उसने कहा—
“केशव जी… आप क्यों मेरी मदद कर रहे हैं? आप तो मुझे जानते भी नहीं…”
केशव ने हल्की मुस्कान के साथ आँखें खोलीं और बच्चे की ओर देखते हुए बोला—
“जानता नहीं हूँ, लेकिन तुम्हारी हालत देख कर अनदेखा भी नहीं कर पाया। कभी-कभी खून का रिश्ता नहीं, बल्कि हालात और इंसानियत सबसे बड़ा रिश्ता बना देते हैं।”
लड़की की आँखें भर आईं। इतने दर्द और असुरक्षा के बीच उसे पहली बार किसी पर भरोसा करने की हिम्मत मिली थी…
बच्चे की मासूम सूरत को देखते-देखते केशव का दिल भर आया। उसने बच्चे की नन्हीं उँगली पकड़कर मुस्कुराते हुए लड़की की ओर देखा और धीरे से बोला—
“सुनो… मैं सोच रहा था… इस बच्चे को एक नाम देना चाहिए।
नाम से ही तो पहचान बनती है।
अगर तुम चाहो… तो मैं नाम रख दूँ?”
लड़की कुछ पल चुप रही। उसकी आँखों में आँसू तैर उठे।
वह सोच में डूब गई—जिस बच्चे को दुनिया से छुपाकर उसने अपनी ममता के सहारे संभालना शुरू किया था, आज उसे पहली बार किसी और ने अपनापन देने की बात कही।
उसकी काँपती आवाज़ निकली—
“नाम… हाँ… नाम तो होना ही चाहिए… लेकिन केशव जी, ये हक़ तो माँ-बाप का होता है… और मैं तो…”
केशव ने उसकी बात बीच में ही रोक दी।
उसकी आँखों में गहरी संवेदना थी—
“माँ वही होती है जो बच्चे को जन्म देती है, और पिता वही जो बच्चे को सहारा देता है।
तुम माँ हो… और अगर तुम इजाज़त दो तो… मैं इस बच्चे का पिता जैसा बनकर उसकी पहचान बनाने का पहला कदम उठाना चाहता हूँ।”
लड़की ने आँसुओं से भरी आँखों से सिर झुका लिया।
दिल में एक अजीब-सी राहत और डर दोनों थे…
" क्या मै इसका पिता बन सकता हूँ " केशव ने फिर से पूछा
लड़की ने सिर झुका कर ‘हाँ’ भर दी।
उस पल जैसे उसकी और केशव की किस्मत एक डोर से बंध गई।
केशव उसे अपने घर ले आया… और दोनों ने मिलकर नये जीवन की शुरुआत की।
माँ को थोड़ा वक्त लगा समझाने में केशव को , आखिर मां ने स्वीकार कर ही लिया एक लड़की को अपने बेटे के लिए।
दिन बीतते गए, दुख और डर धीरे-धीरे सुकून में बदलने लगे।
तीन साल गुजर गए।
बच्चा अब बोलना सीख गया था और घर आँगन उसकी किलकारियों से गूंजता रहता था।
एक दिन केशव काम से जल्दी लौट आया।
लड़की हैरान होकर बोली—
“क्या हुआ, आज इतनी जल्दी आ गए?”
केशव ने गंभीर आवाज़ में कहा—
“तुमसे एक बात बतानी थी।”
लड़की का दिल धड़क उठा—“क्या बात?”
केशव ने मुस्कराते हुए कहा—
“राज ठाकुर और सुनीता के घर बेटा हुआ है।”
लड़की की आँखें भर आईं। वह तुरंत हाथ जोड़कर बोली—
“सच…? शुक्र है माता रानी ने मेरी पुकार सुन ली… वरना मैं तो जिंदगी भर खुद को दोषी मानती रहती।”
उसके चेहरे पर गहरी राहत थी। ऐसा लगा मानो तीन साल का बोझ एक पल मे उतर गया हो।
एक माँ की पुकार दूसरी माँ ने सुन ली हो जैसे और उसने दोनो माँ की ममता पूर्ण कर दी।❤️
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कल्पिता 🌻
दिल से दुनिया तक