लड़की ने बोलना जारी रखा...
राज ठाकुर की पत्नी सुनीता ने अचानक मेरा हाथ कसकर पकड़ लिया और मुझे भीतर ले गई।
उसकी मुस्कान में एक अजीब-सी दृढ़ता थी, जैसे सब कुछ पहले से तय हो।
मेरे पेट पर हाथ फेरते हुए उसने कहा—
“यह सिर्फ़ बच्चा नहीं... यह इस घर का भविष्य है।
मेरे राज का अंश... वह वारिस, जिसके लिए मैंने वर्षों तक पूजा-पाठ किए, व्रत रखे...
अब मेरी ममता अधूरी नहीं रहेगी।”
मेरे भीतर घबराहट की लहर दौड़ गई।
ये कैसी ममता? ये कैसी ख़ुशी?
राज ठाकुर की आँखों में भी अजीब चमक थी।
वह सुनीता के साथ खड़े होकर बोला—
“आज से तुम इसी घर में रहोगी।
तुम्हारा कोई अतीत नहीं रहा... अब तुम्हारी पहचान बस मेरे बच्चे की माँ के रूप में होगी।”
कमरे की हवा अचानक भारी हो गई।
मुझे लगा जैसे मैं किसी सुनहरे पिंजरे में क़ैद की जा रही हूँ...
जहाँ अपनापन भी था और डर भी।
केशव ने सांस ले कर पूछा " तुम्हारे माँ बाप ? उनसे बात नहीं की तुमने?"
मैने राज ठाकुर से कहा की मेरी माँ को पता चलेगा तो वो तुम्हे छोड़ेगी नहीं।
तो राज ने हसते हुए कहा की तेरी माँ ने अपनी ममता , अपनी बेटी की कीमत 20 लाख लगाई है।
मेरे कानों में जैसे बम फट गया।
सारा विश्वास, सारा अपनापन—एक ही पल में चकनाचूर।
तो यह खेल पहले से तय था... और मैं बस मोहरा थी।
मेरे अंदर चीख उठने की इच्छा हुई, मगर गला सूख गया।
अब मेरे पास कोई और रास्ता नहीं बचा था।
मैं समझ चुकी थी—
चुप रहकर उनका कहना मानना होगा, बच्चा जन्म देना होगा...
और उसके बाद शायद... बस शायद... मैं आज़ाद हो सकूँ।
पर माँ की ममता तो ऐसी अनुभूति है, जिसके बिना कोई भी स्त्री अधूरी रहती है।
सुनीता भी अधूरी थी… इसलिए वह मुझे अपने सबसे क़रीबी रिश्ते की तरह अपनाने लगी।
वह हर पल मेरा और मेरे गर्भ में पल रहे बच्चे का ध्यान रखती—
कभी पौष्टिक भोजन बना कर देती,
कभी रात को मेरे तकिए के पास बैठी रहती,
कभी मेरी थकी आँखों में तेल मल देती।
मै ना चाह कर भी सुनीता से हमदर्दी रखने लगी।
उसकी ममता सच्ची थी… और शायद उसी ममता के आगे मैं धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगी।
राज ठाकुर वैसे तो एक बड़े बिज़नेसमैन थे—
सख़्त दिल, ऊँचे क़द-क़द्र और आदेशों से जीने वाले। ऑफिस मे बहुत रोबदार इंसान थे पर् घर पर एक अलग ही इंसान थे पर अपनी पत्नी सुनीता से बेइंतेहा मोहब्बत करते थे।
इसी मोहब्बत ने ही उन्हें दूसरी शादी से रोका,
पर उसी मोहब्बत ने उन्हें एक सौदा करने पर मजबूर किया—
अपनी बीवी के लिए उन्होंने मेरी कोख खरीद ली।
जितना ध्यान सुनीता मेरा रखती थी उससे कई गुणा अधिक वह सुनीता का रखते थे।
"क्या राज ठाकुर दुबारा आये तुम्हारे पास ? मेरा मतलब कोई संबंध बनाने...?" केशव ने डरते डरते पूछा
" नहीं...अब मैं सिर्फ इस घर को वारिस देने वाली इंसान थी...उनकी जिम्मेदारी खत्म हो गयी थी
मुझसे झूठी मोहब्बत , मुझे माँ बनाना बस"
"पर....???"
" मेरा नाम केशव है" केशव ने कहा
"पर, केशव जी...राज मेरा पहला प्यार थे और यह बच्चा उनके और मेरे प्यार की निशानी" लड़की जोर से रोने लगी।
“पता नहीं मेरी किस्मत मुझे किस ओर ले जाएगी…”
केशव ने नन्हें से बच्चे को सीने से लगाया और धीरे से पूछा –
“तो फिर तुमने यह बच्चा उन्हें क्यों नहीं दिया?”
मैंने गहरी साँस ली और काँपती आवाज़ में कहा –
“आख़िरी पल तक मैंने खुद को समझाया था कि बस बच्चा जन्म देना है और उन्हें सौंप देना है। लेकिन… मैं हार गई। मेरी ममता… मेरी ममता मेरी उन दोनों के लिए की गई हमदर्दी पर भारी पड़ गई।”
बच्चे की पहली किलकारी सुनते ही जैसे मेरे भीतर सोई हुई माँ जाग उठी।
हॉस्पिटल के उस कमरे में मैं खुद को रोक न सकी… और जैसे ही बच्चा मेरी गोद में आया, मैंने बिना सोचे-समझे वहाँ से भागने का फ़ैसला कर लिया।
उस वक़्त राज दिल्ली से बाहर थे। हॉस्पिटल में सिर्फ़ सुनीता थी…
वहाँ से भागकर मैं सीधे बिहार जाने वाली ट्रेन में बैठ गई…
उसके आगे की कहानी तो आपको पता ही है, केशव जी।
यह कैसी ममता थी जिसने 20 लाख मे बेच दी?
यह कैसी ममता थी जो किसी और की कोख के लिए थी?
यह कैसी ममता थी जो हर भावना पर भारी थी?
.......to be continued