कुछ ज्ञान की बातें 5
आकाश नीला क्यों
नोट - इस आलेख में कुछ ऐसी प्राकृतिक बातों पर प्रकाश डालने ला प्रयत्न किया गया है जिसे हम अक्सर देखते हैं और उसके बारे में और जानने की जिज्ञासा होती है , इस लेख में पढ़ें आकाश नीला क्यों …
अगर आकाश में बादल न हों तो आकाश हमेशा नीला ही क्यों दिखता है ? इसका संक्षिप्त उत्तर है - सूर्य की किरणें जब पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश करती हैं तो वायुमंडल में वर्तमान गैस और अन्य कणों के चलते उनका सभी दिशाओं में बिखराव ( scatter ) होता है . इसलिए साफ़ आसमान सदा ब्लू दिखता है . नीले रंग के प्रकाश की तरंग अपेक्षाकृत छोटे वेवलेंथ ( wavelength ) से गतिमान होता है . जब तरंग का आकार किसी खास दूरी के बाद स्वयं को पुनरावृत ( रिपीट ) करता है तब उस दूरी को वेवलेंथ कहते हैं .
इसके लिए लाइट या प्रकाश के बारे में कुछ जान लेना उचित होगा . सनलाइट वास्तव में सफ़ेद होता है और सफ़ेद रंग इंद्रधनुष ( rainbow ) के सात रंगों या किरणों का मिश्रण होता है . जब प्रकाश की किरणें किसी प्रिज्म ( prism ) से गुजरती हैं तब उसके सातों रंग ( बैंगनी , इंडिगो या जामुनी , ब्लू , हरा , पीला ,नारंगी ,और लाल ) , अलग अलग दिखते हैं जैसा कि हम किसी इंद्रधनुष में देखते हैं . रेनबो के संदर्भ में वायुमंडल में वर्तमान पानी की बूँदें प्रिज्म का काम करती हैं . यहाँ पर जब सूर्य की किरणें पृथ्वी के वायुमंडल ( atmosphere ) में प्रवेश करती हैं तो वे अनेक प्रकार के गैस के अणुओं और अन्य कणों से टकरा कर अलग अलग दिशाओं में मुड़ती हैं और बिखर जाती हैं . वैसे प्रकाश की किरणें सीधी रेखा में चलती हैं अगर मार्ग में उन्हें कोई रुकावट न मिले . अगर वायुमंडल एक ऐनक ( mirror ) होता तो किरणें रिफ्लेक्ट कर लौट जातीं पर ऐसा कोई आईना वहां नहीं होता है . सभी सात रंग की किरणों का वेवलेंथ एक समान नहीं होता है और नीले और बैंगनी रंग का वेवलेंथ छोटा होता है . बैंगनी रंग को ज्यादातर ऊपरी वायुमंडल अब्जॉर्ब कर लेता है . इसलिए नीले रंग की किरणों का बिखराव सबसे ज्यादा होता है और यही रंग हमारी आँखों तक आसानी से पहुँचता है . इसके अतिरिक्त हमारी आँखें ब्लू रंग के प्रति ज्यादा संवेदनशील होती हैं . इसलिए हमें आकाश नीला दिखता है .
‘ स्कैटरिंग ऑफ़ लाइट ‘ विषय पर भारतीय भौतिक वैज्ञानिक सी वी रमन को 1930 में नोबल पुरस्कार से सम्मनित किया गया था . उनकी खोज को ‘ रमन इफेक्ट ‘ कहा जाता है .
आकाश का रंग क्षितिज ( horizon ) पर हल्का नीला या श्वेत क्यों - क्षितिज पर या उसके निकट आसमान लाइट ब्लू या सफ़ेद दिखता है . क्षितिज पर से आने वाली किरणें ओवरहेड आकाश की तुलना में अपेक्षाकृत बहुत कम ऊंचाई से हम तक पहुँचती हैं . इस मार्ग में ऊंचाई से आने वाली किरणों की तुलना में किरणों को बहुत ज्यादा निचले वायुमंडल से गुजरना होता है . ऐसे में वायु में मौजूद गैस के अणुओं से किरणें बार बार टकराती हैं और नीले रंग का स्कैटरिंग बहुत बार होते रहता है और अंततः हमें यह फीका दिखता है . इसके अतिरिक्त पृथ्वी की सतह से टकरा कर प्रकाश की किरणें परावर्तित ( reflected ) होती हैं . ऐसे में अन्य प्रकाश किरणों का अन्य रंगों के साथ मिक्सिंग होता है . इसलिए नीला रंग कम या फीका दिखता है और सफ़ेद रंग ज्यादा दिखता है . जब हम ऊंचाई पर होते हैं तब आसमान ज्यादा नीला दिखता है क्योंकि रास्ते में प्रकाश किरणों को कम गैस और कणों से गुजरना पड़ता है . ऐसे में शार्ट वेवलेंथ वाली ब्लू तरंगों का बिखराव ज्यादा होता है . बहुत ही ज्यादा ऊंचा जाने पर पृथ्वी जैसा वायुमंडल नहीं होता है इसलिए वहां किरणों का बिखराव बहुत कम हो जाता है . ऐसे में आसमान काला दिखता है . इसलिए अंतरिक्ष ( space ) काला होता है .
क्या दूसरे ग्रहों से भी आकाश नीला दिखता है ? - इसका उत्तर है नहीं
जैसा कि ऊपर देख चुके हैं आसमान का ब्लू दिखना दो मुख्य बातों पर निर्भर है - स्कैटरिंग ऑफ़ लाइट जो वायुमंडल में मौजूद गैस और अन्य अणुओं पर निर्भर करता है और किरणों का वेवलेंथ . देखा गया है कि मंगल पर वायुमण्डल बहुत पतला है और वहां मुख्यतः कार्बन डाइऑक्साइड और धूल कण हैं . इनके चलते प्रकाश की किरणों का बिखराव धरती के वायुमंडल से बिल्कुल भिन्न है . वहां आकाश दिन के समय लाल और प्रातः एवं संध्या के समय ब्लू या ग्रे दिखता है . चन्द्रमा पर जहाँ कोई atmosphere नहीं है वहां से आकाश काला दिखता है .