दोहा:१३
अति का भला न बोलना, अति की भली न चूप।
अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप॥
कथा: "संतुलन की डोर"
एक वीणा वादक था जो अपनी वीणा के तारों को कस रहा था। उसने सोचा कि तार जितने ज़्यादा कसे हुए होंगे, संगीत उतना ही ऊँचा और सुरीला निकलेगा। उसने तार इतने ज़्यादा कस दिए कि जैसे ही उसने पहला सुर छेड़ा, तार टूट गया।
फिर उसने नया तार लगाया और उसे बहुत ढीला छोड़ दिया। इस बार जब उसने बजाया, तो वीणा से कोई आवाज़ ही नहीं निकली, सिर्फ एक बेसुरा शोर हुआ।
पास खड़े एक गुरु ने यह देखा और कहा, "बेटा, जीवन का संगीत भी इस वीणा के तार जैसा ही है। अगर तुम बहुत ज़्यादा 'अति' करोगे—चाहे वो बहुत ज़्यादा बोलना हो या बहुत ज़्यादा चुप रहना, बहुत ज़्यादा मोह हो या बहुत ज़्यादा वैराग्य—तो जीवन का सुर टूट जाएगा। संगीत वही निकलता है जहाँ 'संतुलन' होता है।"
सीख :
अहंकार को हमेशा 'अति' पसंद है। या तो वह बहुत ज़्यादा आक्रामक होकर बोलेगा, या फिर अहंकार में आकर 'मौन' का मुखौटा पहन लेगा। कबीर कह रहे हैं कि प्रकृति का नियम संतुलन है।
जैसे बहुत ज़्यादा बारिश बाढ़ ले आती है और बहुत ज़्यादा धूप अकाल डाल देती है, वैसे ही तुम्हारे जीवन में किसी भी चीज़ की 'अति' तुम्हें मानसिक रूप से बीमार कर देती है। हम अक्सर एक छोर से दूसरे छोर पर भागते हैं। कभी हम बहुत विलासी हो जाते हैं, तो कभी एकदम संन्यासी बनने का नाटक करते हैं।
कबीर की सलाह है—मध्य मार्ग (The Middle Path)। न इतने कड़वे बनो कि लोग तुम्हें बर्दाश्त न कर सकें, और न इतने मीठे कि लोग तुम्हें निगल जाएँ। होश में रहने का मतलब ही यही है कि तुम जानो कि कब रुकना है। संतुलन ही वह एकमात्र रास्ता है जहाँ तुम बिना टूटे जीवन की यात्रा पूरी कर सकते हो।
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दोहा: १४
धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय।
माली सींचे सौ घड़ा, ऋतु आए फल होय॥
कथा: "जल्दबाजी का फल"
एक किसान को कहीं से एक दुर्लभ फल का बीज मिला। उसने बीज बोया और अगले ही दिन खाद-पानी लेकर खड़ा हो गया। उसे जल्दी थी कि कब पेड़ उगे और कब वह फल चखे। उसने सोचा कि अगर वह रोज़ एक बाल्टी की जगह दस बाल्टी पानी डालेगा, तो पेड़ दस गुना तेज़ी से बढ़ेगा।
वह रोज़ सौ-सौ घड़े पानी डालने लगा। नतीजा यह हुआ कि बीज अंकुरित होने के बजाय सड़ गया। पास के खेत वाले किसान ने मुस्कुराकर कहा, "भाई, तुम कितनी भी मेहनत और जल्दबाजी कर लो, पेड़ तभी फल देगा जब उसका 'वक़्त' आएगा। तुम ज़मीन को गीला कर सकते हो, लेकिन मौसम को मज़बूर नहीं कर सकते।"
सीख :
हमारा अहंकार हमेशा 'इन्सटेंट रिज़ल्ट' (Instant Result) चाहता है। आज ध्यान किया, तो कल शांति चाहिए। आज मेहनत की, तो परसों सफलता चाहिए। हम जीवन को एक 'मैगी' की तरह बनाना चाहते हैं जो दो मिनट में तैयार हो जाए।
कबीर यहाँ धैर्य (Patience) की बात कर रहे हैं। वे कह रहे हैं कि प्रकृति का अपना एक लय (Rhythm) है। तुम माली बनकर अपनी कोशिश (सौ घड़े पानी) तो कर सकते हो, लेकिन 'फल' तभी आएगा जब उसकी ऋतु (Season) आएगी।
"जल्दबाजी दरअसल गहरे डर और असुरक्षा की निशानी है।" तुम भाग रहे हो क्योंकि तुम्हें भरोसा नहीं है। कबीर सिखा रहे हैं कि सही दिशा में शांत होकर काम करते रहो
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