Towards the Light – Memoirs in Hindi Moral Stories by DrPranava Bharti books and stories PDF | उजाले की ओर –संस्मरण

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उजाले की ओर –संस्मरण

स्नेहिल नमस्कार प्रिय मित्रों

मधुशाला...???

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   वैसे तो हम अब उम्र की जिस कगार पर खड़े हैं ,यह मस्तिष्क में आना स्वाभाविक सी बात है कि हमारे मन में बहुत सी बातें ,बहुत से विचार, अपनी उम्र से जुड़े न जाने कितने किस्से याद  आते रहते हैं बेशक हम स्वयं को कितना भी व्यस्त  क्यों न कर लें,रोजमर्रा की बातों से, घटनाओं से मन में पुरानी बातें, स्मृतियाँ  न जाने मन के किस कोने में से उठकर सामने प्रश्नचिन्ह बनाकर खड़ी हो जाती हैं । कहाँ होते हैं हमारे पास उनके सटीक उत्तर... ---हम तो बस ऐसे ही घूमते रह जाते हैं या फिर हमारी धुरी पर हमारे सहारे न जाने क्या क्या घूमते रहते हैं?? जीवन के अब तक के लंबे  सफ़र में मुझे तो जीवन की यही बात समझ में आई कि भई कुछ सोचने की जरूरत नहीं है सिवाय इसके कि जो कुछ सामने आ रहा है ,उसमें कुछ भी ना-नुकर  किए बिना उसके साथ चलते चलो और चरैवेति चरैवेति का मंत्र अपना लो । इसके अतिरिक्त हमारे पास कुछ करने को है भी नहीं और यदि हम निराश हो जाते हैं तो मृतप्राय: ही हो जाते हैं इसलिए जो भी है उसे आलिंगन करके बढ़ते चलें। ठहरे  हुए  तो पानी में भी दुर्गंध आने लगती है फिर यह तो हमारा जीवन है । इसको तो चलाना ही है ,प्रेम से,मनुहार से,करुणा से! 

 

      पता चलता है क्या ज़िंदगी के लम्हे किधर से आकर किधर निकल जाते हैं,हम तो मुँह बाए देखते रह जाते हैं,ठिठके खड़े रह जाते हैं उसी स्थान पर...और जीवन की गाड़ी ऐसी सर्र से भागती चलती है कि जब तक पलक झपकते हैं ,कोसों दूर हो जाते हैं, इतने कि जानना ,पहचानना तो दूर की बात है,घूमकर उस स्थान पर पहुंचना भी असंभव हो जाता है जहाँ से हम आवाज़ दे रहे थे। हमारी आवाज़ घुटन से भर जाती है,गले में अटककर रह जाती है।मनुष्यता की संवेदना गहरे कूँए में डूबने,उतरने लगती है, फिर गुम हो जाती है।

     अपनी दोस्त इंद्रा वर्मा के पति डॉ.देशपाल वर्मा के बारे में मैं यहाँ पहले लिख चुकी हूँ जो बालपन से आज तक मेरे लिए इंद्रा नहीं चुन्नी है।हम सब हमेशा एक दूसरे को नाम से ही पुकारते रहे हैं,ऐसा कोई रिश्ता नहीं बना हमारे बीच जिससे मस्तिष्क में कभी सम्बोधन का कोई विशेष शब्द  पनपा हो।देश भी जब से मिला मेरे लिए देश था और मैं उसके लिए प्रणव ! मेरे पति को भी चुन्नी और देश नाम से ही पुकारते जबकि वह थोड़े फॉर्मल थे । 

 

     देश पहले मेरठ विश्वविद्यालय से बॉटनी में एम.एस,सी कर रहा था ।  उसने यूनिवर्सिटी टॉप की। तभी  उसकी सगाई मेरी बैस्टी से हुई। शोध करने के लिए पी.एचडी में यहीं प्रवेश लेने का का कार्यकर्म चल ही रहा था कि  अमरीका के नामी-गिरामी विश्वविद्यालय से बॉटनी में उसे  छात्र वृत्ति प्राप्त हुई ।उसे छात्रवृत्ति मिली थी ,उसे जल्दी जाना था लेकिन मेरे विवाह का समय था। चुन्नी यानि इंद्रा की सगाई के बाद देश मेरठ से मुजफ्फरनगर आता रहता और हम सब कुछेक बार मिलने से ही दोस्त बन चुके थे।एक दूसरे को नाम से पुकारते।यूँ तो बड़े होते होते बहुत से परिवर्तन हो चुके थे लेकिन मैं और चुन्नी बैस्टी ठहरे ,हो गया शामिल देश भी हमारी टीम में! पता नहीं उसने कैसे मैनेज किया लेकिन मेरी शादी के बाद तुरंत ही चल गया ,अपनी पत्नी यानि मेरी बैस्टी को कुछ माह के लिए छोड़कर अमेरिका चल गया जहाँ वह शोध  करके डी.लिट् करने के बाद विभिन्न देशों में,विशेषकर अमेरिका के कई विश्वविद्यालयों में उच्च स्तर पर कार्यरत रहा । भारत के कई विश्वविद्यालयों में व्याख्यान देने वह लगातार आता रहा।अब तक चुन्नी व देश दो बेटों के माता-पिता बन चुके थे।बच्चों को लेकर वे मेरे पास सपरिवार अहमदाबाद भी आए। कभी देश व्याख्यान देने किसी भारतीय यूनिवर्सिटी में आता तो कभी हमसे भी कुछ घंटों के लिए मिलने की कोशिश करता।

 

    मज़े की बात यह है कि मेरा और मेरी बालपन की दोस्त के जन्म में केवल एक माह का फ़र्क है। प्रसन्नता इस बात की है कि एक दूसरे की जान खाने वाले,नोच खसोट करने वाले ,ठुकाई-पिटाई करने वाले बचपन में तो साथ रहे ही, सात समुद्र पार जाकर भी हमारे संबंध बने रहे । कम मिलते थे लेकिन हम थे एक-दूसरे के लिए । समय को बीतना होता है,वह बीतता रहा ,बच्चे बड़े और हम प्रौढ़ होते रहे। मेरे व उसके बच्चों के शादी-ब्याह हो गए । वह अमेरिका में बस गई मैं अहमदाबाद में !

 

   हमारी एक और दोस्त है आभा गोयल ,वह कुछ बड़े होने के बाद हमारी टीम में जुड़ी लेकिन करीबी दोस्त रही । रहते हम सब पास-पास ही थे मुज़फ्फरनगर में! साथ में नृत्य-संगीत सीखने और सबसे अधिक कॉलेज जाना होता ।पढ़ाई के बाद वह भी अमेरिका पहुँच गई ,मैं केवल यहाँ थी अहमदाबाद में ! किन्तु हमारा मिलना जुलना रहा,आपस में परिवारों में भी काफ़ी समीपता रही।

 

    वह वो समय था जब सब अपने कैरियर की चिंता में थे ,सबको अपने अपने अनुसार जीवन-युद्ध करना था।  चलता रहा यह युद्ध! कई बार सोचा तो गया कि कुछ दिनों के लिए चुन्नी के पास रह आऊँ तो कैसा हो, जीवन के बैस्ट दिन बैस्टी के साथ कुछ दिनों रहने का सपना ,सपना ही बनकर रह गया । कभी कुछ और कभी कुछ ! व्यस्तताएं पल्ले में बंधी साथ ही लटकती रहतीं । 

 

  कई दशकों तक जीवन-युद्ध चलता रहा । अब सब दोस्त अपनी गृहस्थियों में रम चुके थे ।बीच में एक समय ऐसा भी आया कि कुछ कारणों से हमारा संपर्क छूट गया। उन दिनों ये मोबाइल्स तो होते नहीं थे या तो ट्रंक कॉल बुक करवानी पड़ती या बाहर जाकर साइबर कैफे में बात करनी पड़ती तभी कुछ लंबी बात हो पाती।भारत से वहाँ बात करना बहुत महंगा पड़ता, अधिकतर वे लोग ही फ़ोन करते रहते।  कुछ वर्ष पहले आभा की सूचना आई कि वह भारत आ रही है लेकिन उसके पास कम समय है,मुंबई में वह केवल एक दिन फ्री थी फिर उसे अपनी ससुराल साउथ जाना था फिर उसकी वापसी थी। 

        मेरी बेटी मुझे मुंबई ले गई और हमने सुबह से शाम तक किसी माल के फूड कोर्ट में पुराना जीवन जीया । जैसे जैसे पन्ने पलटते गए वैसे वैसे पुरानी स्मृतियों के नए गवाक्ष खुलते गए । उसमें झाँकतीं वो शैतानी वाली स्मृतियाँ हमें इतना हँसाती रहीं कि हम पेट पकड़कर हँसते ही तो रहे । बीच में आँखें भी आँसू से भरीं,गालों पर भी आँसू टपकते रहे लेकिन कुल मिलाकर जैसे एक नया जीवन सा मिल गया । 

 

     आभा के लौटने के दो/तीन साल बाद मुझे पता चल कि देश काफ़ी बीमार चल रहा था और स्वाभाविक रूप से मैं काफ़ी असहज हो गई।बीच के वर्षों में मैंने पति को भी खोया था और अब मोबाइल्स के ऑडियो,वीडियो कॉल्स से कभी कभी हम फिर से कॉन्टेक्ट में आए ।     देश की बीमारी का पता चलता रहा । कभी कभी चुन्नी से भी बातें हो जातीं । एक दिन अचानक ही चुन्नी का वीडियो कॉल आया ,वैसे आश्चर्य की कोई बात नहीं थी लेकिन देश ने अस्पताल से आकर मुझे फ़ोन मिलवाया था । 

 

   "ले देश तुझसे बात करेगा,कब से मेरा दिमाग खा रखा है"। मैं खुशी के मारे फूली न समाई। इतने दिनों बाद देश ने मुझे बात करने के लिए पत्नी से फ़ोन लगवाया है ! मैं बहुत खुश थी,उन दोनों के चेहरों पर भी एक तृप्ति भरी मुस्कान थी । 

 

"आहा! आज कैसे याद किया देश ने मुझे?"मैंने हँसते हुए उसकी खिंचाई  करने की कोशिश की ।

"मुझे तेरे से कब से बात करनी थी लेकिन तेरी दोस्त ने फ़ोन लगाकर ही नहीं दिया ।"उसने हँसते हुए कहा ,मैं जानती थी वह बीमार था लेकिन इतना कि इस बीच कई बार उसे अस्पताल जाना पड़ा ,यह मैं नहीं जानती थी । 

उस दिन वीडियो काल के समय वह एक कुर्सी पर बैठा था ,घुटनों तक उसके पैरों पर चादर थी । उसने एक पुस्तक मुझे दिखाई ।"देख ,कई साल पहले मुझे किसी ने यह बच्चन साहब की मधुशाला गिफ़्ट की थी । कुछ पेज पलटकर मैंने रख दिया था, इस बार मुझे तेरी याद आई ,मैंने वैसे ही पन्ने पलटकर स्टडी में रख दी थी । इस बार जब अस्पताल से आया , मुझे तेरी याद आई और मेरा मन हुआ कि मैं तेरे साथ इस पुस्तक पर चर्चा करूँ,यह तो बड़ी डीप है । मैं कुछ पद पढताहूँ,तू मुझे एक्सप्लेन कर ।" वह जिस शिद्दत के साथ मधुशाला के पन्ने पलट रहा था ,मैं खुद उसके साथ इनवॉल्व हो गई कि हमें समय की सुध भी नहीं रही। वह पढता गया ,मैं अपनी बुद्धि के अनुसार उसे अर्थ समझाती रही । उसके चेहरे पर मुझे एक प्रकार की संतुष्टि दिखाई दी और मुझे बड़ा अच्छा लगा ।लगभग पौने दो घंटे हो गए और हमारी चर्चा ख्त्म ही  होने में नहीं आ रही थी । मैं जानती थी ,वह थक चुका था । 

 

   "देश !मैं तुझे दो/चार दिन में फ़ोन करूंगी,निशान लगाकर रखना ।" और यह सोचते हुए कि मैं जल्दी ही उसे कुछ दिनों में फ़ोन करूंगी। चुन्नी उसको दवाई देकर सुलाने के लिए उसे दूसरे कमरे में ले गई । उस दिन इतना समय हो गया था लेकिन देश बहुत खुश था , बोला ,"यह तो बहुत डीप है यार,मैं तो अब समझा ,ये तो पूरी फ़िलॉसफ़ी भरी पड़ी है ।" उस दिन हमने बात समाप्त कर दी और मैंने पक्का सोच लिया कि दो/चार दिनों में मैं उससे उस पुस्तक पर चर्चा करूंगी। मैं जानती थी कि वह निशान लगाकर रखेगा। 

 

     और वे दो/चार दिन ही नहीं आए ,देश चल गया । मुझे मालूम था कि वह कई बीमारियों से जूझता रहा है लेकिन मैं उससे बीमारी के बारे में अधिक बात नहीं करती थी। बातों बातों में उसके मुँह से कई बार निकला था कि अब क्या? पूरी ज़िंदगी जूझते रहे और पाया क्या?बस देखो कब समय आता है?मैंने उसे समझाने की नाकाम सी कोशिश की,मैं जानती थी कि उसके अंदर क्या चल रहा होगा।बस,वही हमारी अंतिम बात व चर्चा थी। मेरा मन इसलिए ज़्यादा दुखी हुआ कि मैं वायदा करके अपना फ़ोन करने का छोटा सा वायदा  पूरा  नहीं कर सकी थी, समय हाथों से फिसल चुका था । बहुत मन परेशान रहा । कई दिनों मैं अपनी दोस्त से बात तक नहीं कर पाई। फिर एक बार आभा के समझाने पर मैंने उससे बात की । 

 

      पिछले माह मेरी दोस्त इंद्रा  यानि चुन्नी ने भारत आने का कार्यक्रम बनाया , मेरा स्वास्थ्य ढीला होने के कारण मैं उनके साथ पटेल  स्टैच्यू, द्वारिका आदि न जा सकी ,केवल गांधी आश्रम तक जा पाई । वह नौ साल से पति की अस्वस्थता के कारण अमेरिका से बाहर नहीं निकली थी । छोटा भाई देहरादून में रहता है,भाई,भाभी के साथ वह मेरे पास अहमदाबाद आई ,साथ में पुरानी स्मृतियों में खोए,इस थोड़े समय में ही इतना जीवन जीया --विश्वास नहीं था कि मिल पाएंगे लेकिन यह मिलना अपने में कितना कुछ दे गया कि शब्द भी कम पड़ गए हैं । एक और बात की बड़ी प्रसन्नता हुई कि चुन्नी की भतीजी जो बैंगलोर से बूआ को मिलने देहरादून जाने वाली थी ,यहाँ अहमदाबाद आ गई । इस उमर में जब इस प्रकार मिलना हो जाता है यह किसी आशीर्वाद के तहत ही होता है । मेरे पास धन्यवाद के लिए शब्द नहीं हैं किन्तु देश से मेरी वीडियो पर हुई अंतिम मुलाकात मेरे दिलोदिमाग पर छप गई है । मन में बार-बार उमड़ता है कि बीमार होते हुए भी देश ने मुझसे इतनी अच्छी बातें कीं और मैं उसको वायदा करके भी पूरा नहीं कर पाई ।

बचपन की यह लँगोटिया हमेशा सुखी रहे , जब तक हम दोस्त हैं,मिलते रहें इससे अधिक खुशी क्या हो सकती है?कुछ नहीं रखा इस जीवन में बस,एक-दूसरे से मिलना  और प्यार बाँटना ! दोस्तों की जीवन में जो जगह है ,वह और किसी की हो ही नहीं सकती। मेरे लिए बचपन का पर्याय चुन्नी ही तो है।मुझे हर पल महसूस हुआ कि दोस्तों के साथ आनंदमय जीवन जीने में ही जीवन की सार्थकता है । आमीन !

स्नेह सहित

आपकी अपनी मित्र

प्रणव भारती