नमस्कार मित्रो
आज उजाले की ओर में डॉ. रश्मि चौबे की कविता की पुस्तक, `उद्गार` के बारे में परिचय....
मन के प्रांगण में प्रस्फुटित ‘उद्गार’ –डॉ. रश्मि चौबे
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वियोगी होगा पहला कवि कभी था किन्तु आज हर पल कविता के साथ बंधा हुआ है । जैसे गज़ल केवल कामिनी नहीं रह गई है ,वह पीड़ा,परेशानी,जीवन की वास्तविकता को ओढ़-बिछाती है । पीड़ा में दुखी होकर कही जाति है तो सुख व प्रेम में आंतरिक आनंद को महसूस करके कही जाती है । ठीक उसी प्रकार कविता भी है ,बेशक उसके लिखने का तरीका अलग है किन्तु उसका मन तभी हल्का हो पाता है जब वह अपने मन की पीड़ा अथवा प्रसन्नता को शब्दों के जरिए बाहर आ जाते हैं और शनै:शनै:वे घुटन को पार करके खुले में साँस लेने लगते हैं।
उद्गार---डॉ.रश्मि चौबे की पद्य रचनाओं का एक संग्रह है जिसमें विभिन्न वातावरण के प्रांगण में खिलते हुए पुष्पों को जोड़कर 66 पुष्पों का एक सुंदर गुलदस्ता महकाया गया है । हम सब वाकिफ़ हैं कि हम सब प्रकृति की संतान हैं । मनुष्य संवेदनशील है किन्तु प्रत्येक के लिए मन की बात को कागज़ पर उतार देना संभव कहाँ हो पाता है ?अधिकांश मनुष्य अपनी बात को ,प्रेम को,लगाव को अथवा परेशानी को भी अपने भीतर समेटे बैठा रहता है जिससे उसकी बात किसी के पास नहीं पहुँच पाती किन्तु जो लोग अपनी भावना को बहिर्मुखी बना लेते हैं वे स्वयं को ही नहीं अन्य संवेदनशील मित्रों को चिंतन के लिए विषय दे देते हैं,यह उनका समाज के प्रति एक महत्वपूर्ण कर्तव्य होता है ।
प्रकृति माँ से प्रारंभ किए गए उद्गार संवेदना के स्तर पर ध्यान आकर्षित करते हैं।मानव जीवन मेँ वृक्षों का बहुत महत्व है । कवयित्री प्रकृति के सकारात्मक रूप के प्रति नतमस्तक हैं । इन रचनाओं से ज्ञात होता है कि हमारी शत् शत् प्रणाम करती हैं।हम सब परिचित हैं कि हमारा शरीर पृथ्वी,जल,अग्नि,वायु ,आकाश पाँच तत्वों से निर्मित है ।ये तत्व ही हमें ज़िंदा रखते हैं,जिलाते हैं।कवयित्री कहती हैं—
परम प्रकृति माँ ! तेरेरूप ने मुझे सदा सकारात्मक बनाया।
जल, थल, पावक ,गगन,समीरा,पाँच तत्व से बना शरीरा।।
इस सृष्टि में जितने भी चेतन अवयव हैं वे सभी इन पाँच तत्वों से बने हैं। प्रकृति प्रेमी कवयित्री ने वृक्षों का बहुत सुंदर उपयोग बताते हुए कितनी सुंदरता से नीम के वृक्ष की महत्ता प्रदर्शित की है । कहती हैं-- बड़ों की डाँट नीम सी कड़वी होती है किँतु इसके लाभ असीमित हैं।
कवयित्री रश्मि चौबे ने प्रकृति के विभिन्न रूपों पर अपने भावों को प्रस्तुत किया है ।चाँदनी रात में चँपा के वृक्ष पर चिड़िया के सुंदर जोड़े का वर्णन प्रकृति में शृंगार रस की व्युत्पत्ति कराता है। प्रकृति के विभिन्न रूपों को वे बारंबार नमन करती हैं। इनमें वसंत ,वर्षा,सावन की सलोनी फुहार तो है किन्तु समय की स्थिति से उत्पन्न संवेदन शील मन की पीड़ा भी दृष्टव्य होती है जब उनकी कलम से स्वत: ही निकलता है देख सखी! आया वसंत के साथ कैसे गाऊँ वसंत !कवियित्री के मन के उल्लास के साथ निरीहता भी समक्ष आ जाती है ।
प्रकृति माँ ने वीणा बजाई
चारों ओर मंत्रोचार की आवाज़ आई
सावन आया रे का आह्लाद भी है, प्यासी धरती को हरितिमा का दृश्य
ज्ञान की रोशनी फैलाए, दीपक की तरह जलना, रोशन, प्रकाश का स्व
राधा श्याम की मुरली में रम जाना,राधा-श्याम के झूला झूलने के भाव से एक सुकोमल दृश्य समक्ष आकर गुनगुनाने लगता है,साथ ही वे तुलसी के राम को भी नहीं भूली हैं।
यूँ कागज़ की नाव है तो माँ, पिता, बहन, बेटी, माँ की याद,ममता, बहना आई जैसी स्वाभाविक संबंधों में रेशमी डोर से बंधे चित्र भी मोहित करते हैं ।इन संबंधों के अतिरिक्त संबंधों को संभालते हुए वे कहती हैं-- यूँ न जाइए जाना ही है तो मुस्करा कर जाइए। यह एक सकारात्मक नज़रिया है जिसको कवयित्री समझती व स्वीकार करती है ।
बुढापा में बचपने की तस्वीर,ज़िंदगी,,, हाथों में हाथ, साथी का साथ..समय और पैसा,,बाप बड़ा न भैया, सबसे बड़ा रुपैया जैसे जीवन के महत्वपूर्ण मुद्दों पर भी उनकी कलम चली है । इस काव्य-संग्रह में जहाँ हँसी की बात है ,वहीं मौन भी कुछ कहता है जैसा गंभीर दार्शनिक चित्र संलग्न है।
हिंदी को जीवन आधार व स्वाभिमान समझने वाली कवयित्री नूतन वर्ष का स्वागत सकारात्मक चिंतन से करती हैं साथ ही ईश्वर को याद करते हुए कभी अवसर, कभी अवसाद( कोरोना) स्वछंदता और विनाश के साथ भारत की नारी पर भी अपने विचार प्रस्तुत करने से स्वयं को नहीं रोक पातीं । वे संस्कार की बात भी करती हैं तो स्वछंदता की पीड़ा भी उन्हें गंभीर चिंतन के लिए मज़बूर करती है ।वे सबमें राम को देखते हुए ए-आई जैसे अत्याधुनिक विषय पर भी कुछ चिंतन किए बिना नहीं रह पातीं। उनके मन की सकारात्मकता जीवन के प्रति सार्थक संदेश प्रस्तुत करती दिखाई देती है कि दुनिया में जन्म लेकर जितना कर जाएं उतना ही कम है। उन्हें अपनी भारतीयता पर, अपने देश पर अभिमान है,गर्व है। वे भगतसिंह सुभाष जैसे भारत के गौरव को नमन किए बिना नहीं रह पातीं।
आज समय परिवर्तित हो चुका है ,व्यस्तताओं व दूरियों के चलते संगोष्ठियाँ चर्चाएं दूर बैठे ही एक-दूसरे से जुड़कर होने लगी हैं उनके परिदृश्य में झाँकते हुए उनका मन कैसे बिम्ब ला खड़ा करता है ---खिड़कियों सै झाँकते चेहरे कभी स्वतंत्र कभी परतंत्र !
‘यक्ष प्रश्न’के अंतर में प्रवेश करने से महसूस किया जा सकता है कि यह प्रश्न कितना स्वाभाविक व शाश्वत है---‘दोषी कौन??’इस यक्ष प्रश्न से फूटते हैं अनेक प्रश्न और स्वर! फूटता है जैसे पीड़ा का एक अनवरत झरना जो समाज को झँझोड़ता है, माँग करता है कुछ गंभीर चिंतन के लिए !
बच्चों को जन्म दे
कमाकर भी दे
फिर दोषी कौन???
उसे न मिलती है माया
और न राम,,
अनवरत करती रहती है
सबके लिए काम,,,
अगर वह दोषी नहीं तो
फि र दोषी कौन ???
अगर वह दोषी नहीं तो
फि र दोषी कौन???
परायों को
अपना समझ
देती है अपना तन मन धन,,,
फिर भी वह है निर्धन!!!,,,
बड़ी अफसर बनी तो,
पद लोगों को ना पचा,,,
हे समाज!
तूने कैसा षड़यंत्र रचा,,,?
अगर वह दोषी नहीं तो
फिर दोषी कौन ?
डॉ.रश्मि चौबे ने ‘उद्गार’ के रूप में संवेदनाओं का एक ऐसा पिटारा प्रस्तुत किया है जिसको खोलने से ही पाठक उन सहज,गंभीर प्रश्नों को आत्मसात करके उनके सकारात्मक समाधान का स्वयं प्रयास करे ,तब ही सार्थक सिद्ध हो सकेगा।
डॉ.रश्मि चौबे ने अपने इस काव्य-संग्रह को चिंतनशील पाठक वर्ग के समक्ष प्रस्तुत कर दिया है । आशा व विश्वास है कि उनकी इस भाव-संपुटिका को साहित्य-वर्ग पूरे स्नेह व सम्मान के साथ स्वीकार करेगा। डॉ. रश्मि चौबे को मेरी ओर से अशेष बधाई व मंगलकामनाएं।
अनेकानेक स्नेहिल शुभेच्छाओं सहित
डॉ. प्रणव भारती
अहमदाबाद
25/3/26