लोह पर मक्की की मोटी-मोटी रोटियां थापती वीरों के दिमाग में विचारों के अंधड़ चल रहे थे। नीचे से लोह को तपाता हुआ आग के बवंडर का सेंक उसके गालों को लाल करने की अपेक्षा कत्थई कर रहा था जो उसकी आबनूसी रंगत से भिड़ गया था। महंतों के डेरे पर जितने कामे( काम करने वाले) घर और खेतों में काम करते हैं, उसके पति समेत- उन सब की दोपहर की रोटी का काम उसके हाथों में चूड़े के साथ ही बंध गया था। वीरो की सास भी उनके घर में यही काम करती थी। नई ब्याही को डेरे के महंत की आशीष दिलाने जब उसकी सास उसे लंबे से घूंघट में लपेट लाई थी ,तो महंत जी ने उसके मजबूत चूड़े वाले हाथों को देखते ही कहा था,
"इसे भी इसी काम पर लगा दे अमरो।, यह सब संभाल लेगी।"
तब से आज तक क्या कुछ नहीं गुजर गया उसके साथ! उसने आज तक तीन चलीहे
(बच्चा होने पर चालिस दिनों की छुट्टी) और छोटी-मोटी बच्चों की बीमारी के अलावा कभी काम में नागा नहीं डाला था। सारी जिम्मेवारी अपने ऊपर ले ली थी।
उसकी हर सुबह महंतों के चूल्हे से शुरू होकर दिन भर वहीं खटती थी और सांझ ढले जब सूरज पश्चिम में गेरुआ रंग बिखेरता धीरे-धीरे अपने को धरती के पीछे खिसकाता तब वह अपने घर के मोड़ तक पहुंचती ,जहां उसका इंतजार करते उसके बच्चे उससे लिपट जाते थे। चांद भी अपनी चांदनी उसके दरवाजे पर पहुंचते ही उस पर बिखेर देता था, जिससे उसके सारे दिन के काम की तपिश कुछ ठंडी पड़ जाए। वह घर-भर का खाना साथ डब्बे में ले आती थी । तब तक उसका घर वाला भी पहुंच जाता था। सबको खिलाने के बाद उसकी सारी थकावट सबकी संतुष्टि से उतर जाती थी।
दिन चढ़े आज जब उसने चूल्हे पर सरसों का साग बड़ी सी हांडी में हर दिन की भांति रखा तो मौसम सुहाना था। नसीमे सहर (सुबह की ताजी हवा) उसके बालों की लटों से खेल उसके मुख पर लटें इधर-उधर बिखेर कुछ छेड़खानी सी कर रही थीं; तो वह ख्यालों में अपने घरवाले की रात की ठिठोली की याद करके स्वयं ही लाज से उन्हें बार-बार हटा रही थी और बड़बड़ा रही थी,
"जाओ,परे हटो, तंग ना किया करो मुझ बेचारी को, जब देखो छेड़ती रहती हो तुम भी उनकी तरह!"
और सिर झटक कर हाथ से उन लटों को पीछे की ओर मुस्कुराते हुए बार-बार धकेल रही थी। वीरों की सास को दम्मे की बीमारी थी। सारा दिन खांसती रहती थी । बेटे के साथ रिक्शे में अस्पताल जाते हुए ; रिक्शे की टेंपो से टक्कर होने से वह बुरी तरह जख्मी हो गई थी और थोड़े ही दिनों में स्वर्ग सिधार गई थी। इधर गगनपाल की टांग टूट गई थी वह अपाहिज बना घर में बैठ गया था। अब वही बच्चों को देखता था, पर वीरो को बहुत चाहता था। इस चाहत के कारण ही तो वीरो को घर जाने की जल्दी लगी रहती थी । वह उसकी चूड़ियों से सजी कलाई पर रीझता रहता था। जो हर वक्त रंग- बिरंगी चूड़ियों से सजी रहती थी। वह स्वयं भी चूड़ी वाली रेहड़ी को हर महीने रोकता था और उसे नए रंग की चूड़ियां चढ़वाता था। फिर मुग्ध होकर उसकी कलाइयों को निहारता रहता था। उसकी चूड़ियों की खनक में उसे जीवन का मधुर संगीत सुनाई देता था। वीरो को उसकी इन्हीं अदाओं पर प्यार आता था। ख्यालों के साथ-साथ उधर साथ के चूल्हे में उसके हाथ चूल्हे की लकड़ियों पर भी सधे हुए थे।
ढेरों डंगर,जानवर बंधे थे महंतों के बाड़े में। खेती के बैल अलग ज़मीन पर, दुधारू डंगर यानी गाय ,भैंस आदि दूसरे हिस्से में थे। इसी तरह रखवाली करने वाले खूंखार कुत्ते जो न जाने कौन-कौन से देशों से मंगवाए हुए थे, उनको बढ़िया लोहे की सलाखों से बने कमरों में कैद करके रखा गया था और रात के समय पहरेदारी के लिए उनको खुला छोड़ा जाता था। इसी कारण महंतों की कोठी पर कभी कोई चोर- उचक्का भूले- भटके भी नहीं आता था। कुत्तों की देखभाल और नहलाने- धुलाने वाले करिंदे अलहदा थे।
कुछ कामे बाल्टियों में दूध भर कर लाते थे जो बड़ी रसोई में उबालने के लिए रखना होता था। वीरो तो बाहर वेहड़े( आंगन) में बैठती थी। दूध की मलाई की बाटी (कटोरा नुमा बर्तन)भर कर वीरो मालिकों के नाश्ते के लिए अलग से रख देती थी। उसका सारा ध्यान दूध- दही और मक्खन की तरफ होता लेकिन एक टंकार खेतों में रहती कि कलुआ जल्दी सरसों का साग ,बाथू ,पालक लेकर आए तो उसने दातरी से साग काट कर बड़ी बटोही में चढ़ाना होता था। बीच में ढेर सारा अदरक और हरी मिर्च भी खूब डालती थी। करारी ठंड के दिनों में ठिप्पर(शलगम) डालकर उसका ज़ायका बदल देती थी। इसके अलावा एक बड़ी बटोही में एक गुछी मेथी भी कहां पता चलती थी! हां, साग में करारापन आ जाता था, तो वह भी डाल देती थी। तभी वीरो के हाथ के साग का स्वाद लोगों के मुंह से उतरता ही नहीं था। उसे भी अपनी रेसिपी पर बहुत गुमान था।
अपनी असिस्टेंट "रत्ती" को आवाज़ें मार- मार के वीरो को बुलाना पड़ता था। रत्ती को अपने आप कभी ख्याल नहीं आता था कि उसने रात का जमाया दूध आधा वहीं रहने देना है और बाकी आधे दही का मक्खन और छाछ निकाल कर जल्दी ऊपर लेकर जाना है। जहां, मालिकों ने नाश्ता करना है। वीरो की पुकार सुनते ही रत्ती में बिजली का करंट चालू हो जाता था। फिर वह दौड़ती इधर गई कि उधर गई । साथ ही सारा समय अपने दुपट्टे से सर का पल्लू भी संभालती जाती थी। वीरो के कान में रत्ती की आवाज पड़ी तो वह चूल्हे के सामने बैठी मंद-मंद मुस्कुरा उठी।
"ओ राजया , तूं जाकर गुड़ की भेलियां (टुकड़े ) तो छब्बी( टोकरी) में भरकर नीचे गन्ने के खेत से ले आ। कल सारा दिन गन्नों का रस कड़ाह में डालकर गुड़ ही तो बना रहे थे वह सारे। वही ताजी-ताजी नरम पेसियां ही लेकर जल्दी आईं।"
सारी पलटन एक दूसरे के काम को सिरे चढ़ाने के लिए ऐसे जुट जाती थी मानो लाम की तैयारी हो रही हो बॉर्डर पर। मालिक और मालकिन तो अभी निपट के कमरे से बाहर भी आते नहीं दिख रहे थे और वीरो के राज में सब काम सिरे चढ़ा होता था। तीसरी मंजिल के बन्ने (बाउंड्री) पर अचार के मर्तबान और अचार के चीनी मिट्टी के मटके आम के अचार से भरे होते थे जो सारा दिन वहां धूप में सिंकते रहते थे। जिनमें से बाटी भर के अचार भी रोज निकलता था। वीरो के राज में लोह पर पकी चार मक्की की रोटियां उस पर अचार की फांक और सरसों का गर्म-गर्म साग उसके ऊपर मक्खन का गोल पेड़ा पिघलता हुआ हर कामे को मिलता था।
लोह के पास पड़े चूल्हे पर चाय की हांडी चढ़ी रहती थी। कोई चाय तो कोई छाछ पीता था। वीरो में गजब की फुर्ती थी। कामे जब खाने बैठते तो ज्यादातर छै या आठ रोटियां तक स्वाद- स्वाद में खा जाते थे। मजाल है वीरों के माथे पर कोई शिकन पड़े। वह तो अन्नपूर्णा बनी रोटियां बना- बनाकर ढेर लगाती जाती थी। यह भी कमाल था कि वह अपने मुंह में कभी एक कौर भी नहीं डालती थी। मालिकों को भी अपनी तसल्ली से खिलाकर फिर अपने विषय में सोचती थी। सूरज सर पर चढ़ आता था तो इसके अंदर की भूख भी तब फटती थी। फिर यह एक रोटी हाथ में पकड़ अचार की डली उस पर रखकर मुंह जूठा करती थी। तब तक एक के बाद एक कामे खाकर गुड़ की पेसी हाजमे के लिए लेकर चले जाते और उसके बाद यदि साग बच जाता तो वह बचा हुआ साग यह चूल्हे के पीछे बाटी में डालकर बच्चों के लिए छुपा देती पर स्वयं यूं ही खा लेती थी और जो उससे भी अधिक होता तो बच्चों के बापू के लिए भी डब्बी में डालकर रख लेती थी। वैसे रात का खाना उसने बनाकर और लेकर ही जाना होता था। शाम को काले माह की दाल, राजमा या छोले ही ज्यादातर बनते थे। वह तो उसने घर लेकर जाना ही होता था, जिसके लिए वह टिफिन कैरियर लेकर आती थी। ढेर सारी रोटियां भी बनी होती थीं। यहां सुबह से शाम ढले तक मर- खपने के बाद कोई उसमें हिम्मत थोड़े ना बची होती थी कि घर पहुंच कर फिर चूल्हे में खपे।
आज उसके विचारों के अंधड़ उसे शादी के बाद महंत जी की आशीष लेने आने पर चल रहे थे। असल में महंतों के डेरे पर सब श्रद्धालु अपनी नई ब्याही बीवी या बहू को लाकर पहले उनकी सेवा में दिन भर रखते फिर रात गए घर वापस लेकर जाते थे तभी दुल्हन के नेग करते थे। नवी नवेली दुल्हन वीरो को भी माथा टिकाने के लिए पहले यहीं महंत जी के पास लाया गया था और घर के बाकी लोग दिन भर बाहर बैठे रहे थे। महंत जी के सेवक बाहर उनकी चाय-नाश्ता ,पानी आदि से आव भगत करते रहे थे। भीतर आशीष रूप में महंत जी ने शरबत पिलाकर उसे प्रसाद दिया। और उसके पश्चात कहने लगे,
"तुम्हें ठोक बजा कर देखना है कि तुम गगन पाल के लायक हो भी कि नहीं?"
वीरो के काटो तो खून नहीं। उसका मुंह बंद कर दिया गया। उसे ठोक बजा कर देख लिया गया। उसके बाद सांझ ढले उसे दोबारा से दुल्हन के कपड़े पहना कर घूंघट में उसका मुंह छुपा कर ,बाहर उसके परिजनों को सौंप दिया गया।
रात को गगन पाल की बाहों में सिमट वह रो पड़ी। मगर उसने अपने होंठ सीए रखे। अंतर्वेदना के स्वर उसके कर्ण कोटरों में गूंज रहे थे, लेकिन उसने अपने आप को सहज रखने का मुखौटा पहन लिया था। धीरे-धीरे गगन पाल ने अपने प्यार के फाहे से उसका वह जख्म भर दिया, जिसका उसे अंदेशा भी नहीं था। पूरे नौ महीने होने पर उसके घर लक्ष्मी रूपा कन्या "राधा" ने जन्म लिया! वह बहुत सुंदर थी। गगन पाल पर तो बिल्कुल भी नहीं थी। उधर वीरों को संशय हो गया कि हो ना हो यह महंत का परसाद है! लेकिन वह चुप्पी साध गई थी। कुछ ऐसी स्मृतियां होती हैं जो धुंधली तो पड़ती हैं पर मिटती नहीं हैं। कुछ तो टीस की तरह -जो जान तो नहीं ले सकती हैं लेकिन जीने के एहसास को हर पल चुनौती देती सी लगती हैं।
छै साल की राधा बड़े रोआब वाली थी। मालकिन जिसे वीरो "शाहणी" बुलाती थी, अपनी बेटियों के कपड़े लत्ते ,सामान अब राधा के लिए दे देती थी। वीरो को इसका बहुत सहारा था। लेकिन वीरों ने अपने बच्चों को हवेली की तरफ आने के लिए बिल्कुल मना किया हुआ था। राधा छोटे दोनों भाइयों को अपनी किसी चीज को हाथ भी नहीं लगाने देती थी। और अपने को कोई चीज पसंद आ जाए तो वह लेकर ही रहती थी। वह स्कूल जाने लग गई थी। उसकी सहेली नीलू के पास सुंदर सी पेंसिल थी, जो उसका बापू विलैत ( विदेश) से लाया था। यह उससे वह पेंसिल छीन कर ले आई थी। इस पर नीलू अपनी मां के साथ रात को रोती हुई अपनी पेंसिल लेने आई थी। राधा किसी कीमत पर वह पेंसिल लौटाने को राजी नहीं हो रही थी। यह देखकर वीरो को महंत की आदत का असर उसमें दिखा; जिससे वह सारी रात सो नहीं पाई और अब विचारों के अंधड़ उसका दिमाग खा रहे थे कि ऐसे कैसे चलेगा----?
दोपहर को शाहणी के पास जाकर वीरो ने अपनी बेटी की कथा सुना दी । इस पर उन्होंने कहा,
" घबरा नहीं! ठहर मैं एक मिनट में आई।"
भीतर जाकर शाहणी ने दराज में से एक विलायती (इंपोर्टेड) पेंसिल लाकर उसके हाथ में थमा दी। और कहा,
"चल कोई बात नहीं । एक पेंसिल की ही तो ज़िद की है ना उसने। यह ले और उसे दे देना। तूं ख्वामखाह ही परेशान हो रही है। यह बाहर से लाते ही रहते हैं ऐसी चीजें बच्चों के लिए।"
लेकिन मालकिन क्या जाने कि वीरो का दिमाग कहां पहुंचा हुआ है ? वीरो के भीतर तो प्रश्न था कैसे बुझाएगी नीलाकाश की प्यासी, तीव्र अंतहीन उदीषा को? खरामा- खरामा अभी तो शुरुआत है! तभी उसने देखा कि कोई गबरू जवान ऊंचा, लंबा मालकिन से मिलने आया है। उसमें कोई खास ही बात थी लेकिन वीरो ने मुंह छुपाते हुए पल्ला मुंह में ले लिया और वापस चूल्हे के पास आ बैठी थी। पेंसिल को संभाल कर उसने पल्लू में बांध लिया था। अब तो उसे घर जाने की बहुत जल्दी थी। सब काम निपट गए तो उसे ध्यान आया कि वह सुंदर- सलोना नौजवान अभी भी भीतर ही था। सो वह मालकिन को गुहार लगाए बगैर ही घर को चली गई। घर जाकर उसने विलायती पेंसिल राधा को पकड़ाई तभी वह नीलू की पेंसिल वापस करने उसके घर गई और वीरो को चैन मिला।
इंसानी वजूद में न जाने कितने रंग के रंग-बिरंगे अनगिनत धागे हैं जो भीतर ही भीतर आपस में उलझ- सुलझ कर इंसान के बाहरी किरदार पर असर डालते रहते हैं। कहां मिल पाता है कोई जानकार जुलाहा जो उन धागों को बुनकर कोई विशेष रूप में ढाल दे!
वीरो को पता चला कि वह नौजवान महंत जी की कार के ड्राइवर का भतीजा है जो बाहर से आया है कुछ दिनों के लिए। मालकिन उससे अंग्रेजी सीख रही है। महंत की दो बेटियां सात और नौ साल कीअंग्रेजी कान्वेंट के बोर्डिंग में रहती हैं। छुट्टियों में घर आने पर वह उनका होमवर्क कराना चाहती थी, इसी के लिए बढ़ियाअंग्रेजी सीख रही थी। रत्ती बता रही थी उसका नाम "जोगिंदर" है। जोगिंदर का भीतर मालकिन के पास आना और फिर शाम तक बाहर न निकलना ----वीरों को अब यह चिंता खाए जा रही थी कि ना जाने कैसे दोनों में इतना प्रगाढ़ आया ? उसकी पीठ की दीवार के पिछली तरफ दोनों में कुछ तो चल रहा था। पर कितना कुछ यह उसे मालूम नहीं था। एक दो बार आते देखा उसे तो वह संयत और संश्लिष्ट ही दिखा था। वीरो के दिमाग का अंधड़ फिर छिड़ गया था। महंत जैसा चोर-डाकू और कौन होगा? अच्छा है (चोरां दे कहर मोर पै गए ने) ”चोर के घर मोर लूटने आ गए हैं- पंजाबी में यह कहावत भी है! उसे लगा , कुदरत खुद बदला लेती है!
मालिक विलायत (लंदन) गए हुए थे इन दिनों तो जवान मर्द का अंदर क्या काम? लेकिन बड़े लोगों के तन पर ढेरों छेद होते हैं जिनसे बहुत कुछ निकल कर नालियों में बह जाता है, किसी की नजर ही नहीं पड़ती। महंत की दोनों बेटियां क्रमशः सात-नौ वर्ष की शिमला बोर्डिंग में पढ़ती हैं। उनके बाद तीन बार मालकिन का गर्भपात कराया जा चुका है क्योंकि वह बीवी की कोख में बेटी ही दे पाता है। इतना तो वीरो को पता चल गया है।
लंदन में अच्छी तरह स्थापित होने के कारण किसी तगड़े खाते- पीते जमींदार भक्त ने गांव की अपनी सारी जमीन मरने से पहले महंत को दान करनी थी, इसी कारण इस बार महंत वहां एक महीना ठहरने का प्रोग्राम बना कर गए थे। तभी उनकी किरणों रानी उस ड्राइवर के भतीजे के साथ मौज मना रही थी। सरदारनी किरणों के दिन पलाश के रंग से थे अब, तो दिन के साए में रातें चांद की शीतल चांदनी सी थीं।
एक दिन अचानक दोनों कमरे के दरवाजे पर टकरा गईं तो वह वीरो की सवालों भरी नज़र को देखकर बोली,
"जिंदगी के बही खाते में अब कुछ लम्हे सहेज रही हूं वीरो! चांदनी रातों में मैंने कुछ सपने बुने थे आंखों में! अब मैं उन्हीं सपनों की बुनाई करती रहती हूं और अपनी झोली में मुस्कुराहटें भरती रहती हूं।"
कहां वीरो सोचती थी कि अच्छा है चोरों के घर मोर पड़ गए हैं क्योंकि वह हर दुल्हन की इज्जत लूटते थे और यहां उनके घर की इज्जत लुट रही थी। लेकिन एक नारी की संवेदना ने दूसरी नारी की अंतर्तम गहराइयों को छू लिया था और अब वह उनकी खैर के लिए पीर मना रही थी, हाथ जोड़ रही थी।
"हे बाबयों, इस नौजवान की रक्षा करना। यदि मालिक को इसके जनानखाने में आने की भनक भी लगी तो वह इन्हें अपने विलायती कुत्तों से नुचवा डालेगा। आप इन पर अपनी मेहर करना।"
अपना काम करते हुए वह पीर से मन ही मन प्रार्थना करती रहती थी। यूं ही एक दिन काम जल्दी खत्म हो गया तो वह नीचे गन्ने के खेत में चली गई तो देखा कि ड्राइवर अपने भतीजे को कह रहा था," सबसे सत श्री अकाल कह दे पुत्तर!"
वीरो ने पूछा,"क्यों क्या हो गया है ड्राइवर पाई?(भाई)
"यह वापस अपने घर जा रहा है इसकी छुट्टियां मुक गई (समाप्त हो गई), हैं।"
इस पर वीरो चहक कर बोली,"जा पुत्त ठीक से जाइयो। पढ़ो- लिखो! यहां आकर क्या करना है?"
(हालांकि वह समझती थी कि इस उम्र में औरत का चस्का लग जाए, तो जवान मर्द की नींदें हराम हो जाती हैं। पर शुक्र था कि वह महंत के आने से पहले जा रहा था)
उसे लगा जैसे बाबा जी ने उसकी बात मान ली और उसके सर से मनो बोझ उतर गया । आज की बिल्लोरी सांझ में वह चहकती हुई घर गई। अभी दो-चार दिन ही बीते थे कि महंत जी वापस आ गए। मालकिन का रूप कुछ ज्यादा ही निखरा हुआ था। वे बार-बार उसे निहार रहे थे। पास खड़ी वीरो से पूछ बैठे,
"तेरी सरदारनी खुशी से मस्त मलंग हो रही है। इसका तो रूप ठाठें मार रहा है। ऐसी क्या बात हो गई है?
"आपको आया देखकर खुशी से मस्त हो रही है शाह जी" वीरो मुस्कुरा कर बोली।
यह सुनकर महंत बेहद रंगीले हो गए थे और सारा दिन भीतर घुसे रहे। सांझ ढले जब वीरो घर जा रही थी वह बाहर निकले। सूरज की किरणें टेढ़ी हो गई थीं । पलाश के फूलों सा रंग डूबते सूरज के आसपास छाया हुआ था। इधर महंत का रुतबा और बढ़ गया था। दूर-दूर तक अब सिर्फ महंत की जमीन ही दिखाई देती थी। वे जमीन की ओर घंटों ताकते रहते थे; जैसे उनका मन ही ना भरता हो। क्या मालूम सोचते हों कि उनका वंश चलाने वाला बेटा तो कोई है नहीं। और फिर मन बुझ जाता हो।
इसी तरह दिन बीते जा रहे थे कि मालकिन ने उन्हें बताया कि उनके पांव भारी हैं। क्योंकि महंत को पता था कि वह केवल लड़की का बीज ही अपनी सरदारनी को दे सकता है इसलिए उसका मूड खराब हो गया कि अब एक और नन्ही जान को वह मरवा डालेगा। लेकिन फिर भी सरदारनी को उसी प्राइवेट डॉक्टरनी के पास ले जाकर लिंग टेस्ट करवाया गया हमेशा की तरह। जब रिपोर्ट आई तो महंत नाचने लगे और सरदारनी को गोद में उठा लिया। इस बार लिंग बदल गया था। वे हर्षोल्लास से नाचने लगे थे।
वापस डेरे पहुंच कर, शोर गुल मच गया।
आसमान में बंदूक से धड़ाधड़ फायर किए गए। लोग दौड़ते चले आए कि ना मालूम डेरे पर क्या हो गया है! ढोलिया आ गया और उसकी ताल पर लोग नाचने लग गए थे। वीरो तो बिना बोले ही समझ गई थी। उसे भी बेटा होने पर नया सूट ,शॉल और मिठाई मिली थी। उसने डब्बे से मिठाई का एक टुकड़ा निकाल कर सरदारनी के मुंह में डाला और उसके समक्ष लाल कनेर बनी मौन आ खड़ी हुई थी--जैसी एक बार उसके कमरे से जोगिंदर के बाहर आने के बाद उसका सामना होने पर खड़ी हो गई थी ! वह राज़दार बन गई थी। दोनों मौन खड़ी आंखों से बतिया रही थीं। (चोरां नूं मोर पै गए सी) चोर के घर मोर पड़ गए थे.......!
डॉ वीणा विज 'उदित'
29/4/25