(यह कहानी छत्तीसगढ़ी भाषा में ना लिखकर साधारण भाषा में लिखी गई है)
छत्तीसगढ़ में सबसे घने जंगल को नंदनवन कहते हैं। यहां कुठामुड़ा गांव में हाथी बहुत होते हैं । यहां के लोग रावत होते हैं। यहां वन कम है और गांव में मिट्टी के घर हैं ।पास के जंगलों में कुल्हाड़ी लेकर लोग जाते हैं और लकड़ी काट कर ले आते हैं। पानी का स्रोत यहां पर कुआं ही है। वैसे अब गांव में तो पंचायत भी है और यादव लोग भी हैं लेकिन फिर भी मूलभूत समस्याएं बहुत हैं।
यहां पर साल वन , सागौन वन (टीक) और मिश्रित वन हैं! यह जंगल डरावने हैं हसदेव का जंगल झारखंड से भी लगा हुआ है। यहां पर विभिन्न जातियों के पक्षी पाए जाते हैं। भारतीय वन अनुसंधान और शिक्षा परिषद में इसे सबसे महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है । जंगलों के ठेके बहुत दिए जाते हैं। यदि जंगल कट गए तो प्राकृतिक आपदाएं आ जाएंगी। इसीलिए छत्तीसगढ़ के पेड़ों को पर्यावरण की खातिर काटने से रोका गया है।
इसी जंगल में रहते हैं लखमा और उसकी पत्नी मंदिना. मंदिना ने अपनी घास -फूस की झोपड़ी में धरती पर बिछी बांस की चटाई पर , साथ में लेटे हुए लखमा को हिलाते हुए पूछा। " काहे लखमा, तुमको नींद कैसे आ जाती है?, कोई चिंता है कि नहीं?"
"क्यों रात हो गई है तो सोए का है कि नहीं?"वह बोला।
"अपनी कलनी (बिटिया) पांच बरस की हो गई है तो ब्याह करे का है ना!"
"हां, तो करेंगे ना! जैसा तुम्हारा हुआ रहा।अब सोए दे।"
इतना बोलकर वह तो सो गया और थोड़ी देर में खर्राटे भी भरने लगा । इधर मंदिना अपने बचपन की यादों में गुम हो गई।
छत्तीसगढ़ के `गरियाबंद जिले ` के "रसिल गांव" की ओर ` गूड़ा पहाड़ के आसपास के घने जंगलों में ही `भुनझिया आदिवासियों ` के इसी कबीले में ही तो जन्मी थी वह। उसका बचपन भी यहीं बीता था और अपनी परंपराओं के अनुसार वह यहीं बस गई थी। वर्तमान युग की आधुनिकता से परे देश की धरोहर अनुसूचित जन जातियों और आदिवासी जातियों को इस प्रदेश के बीहड़ जंगलों ने अपने भीतर संभाल कर रखा हुआ है। देश की तकरीबन आधी जनजातियां इन्हीं घने बीहड़ वनों में बसती हैं। ढेरों जनजातियां थोड़े -थोड़े फासले पर हैं । यहां जंगल बहुतायत में हैं तो खाद्यान्न उत्पादन भी खूब हैं। उसे मालूम है कि जंगली लोग मेहनती और ताकतवर होते हैं क्योंकि ये अपने उगाए अनाज पर पलते हैं। मंदिना के घर में भी तो अपने जंगल के कंदमूल और दाल-चावल पकाते हैं। यह लोग सुन रखे हैं, लेकिन अभी तक ये लोग नकली खाद यूरिया आदि का प्रयोग नहीं करते हैं । यहां मजदूर यानी कि श्रमिक बहुत सस्ते मिलते हैं। इनकी अपनी संस्कृति और रीति रिवाज हैं जिन्हें यह बहुत ईमानदारी से मानते हैं। मंदिना का मेल भी तो लखमा से साल वन की कटाई के समय होता था। वहीं इनका प्रेम पनपा था।
मंदिना को अपनी सांवली देह की चमड़ी पर बहुत गर्व था। मंदिना और उसकी गुंइयां (सहेली)कविता हर महीने ताल के किनारे की नरम मिट्टी में गले तक डूब कर दोपहरी तक मिट्टी स्नान करती थीं। अपने को धोती से साथ वाले पेड़ से बांध लेती थीं। फिर उसी को पकड़कर मिट्टी से बाहर आकर ताल में स्नान करती थीं। इससे दोनों की चमड़ी खूब चमकती थी। पूर्णमासी वाले दिन, यह दोनों ऐसे माटी स्नान करती थीं।
लखमा कहा करता था," तेरी चमड़ी पर मेरी नजर फिसल जाती है, तू बहुत सुंदर है।"
यह सुनकर, मंदिना मंद मंद मुस्काती थी और गर्व से फूली नहीं समाती थी।
इन लोगों का कबीले से बाहर के जनजीवन से कोई सरोकार नहीं होता है। देसी टोटके और घरेलू इलाज से यह अपने दुख- रोग से छुटकारा पा लेते हैं! तभी इस क्षेत्र के यह लोग आत्मनिर्भर हैं।
उसे आज भी याद है कि पांच वर्ष की होने पर उसका `तीखा लोड़ी` या `काण विवाह` संपन्न हुआ था। वह परेशान थी कि सारा कबीला उसको हल्दी तेल लगाए जा रहा है और उसकी महतारी (मां) उसकी गोद में लिए बैठी रही, किसी को कुछ नहीं कहती थी। जब भी किसी की बेटी का काण विवाह होता तो वह परेशान हो जाती थी। कुछ बड़ी होने पर उसने दायी (मां) से इन रस्मों का कारण पूछा तो उसने बताया था, "छोटी कन्याएं जब तक उनका मासिक धर्म नहीं आता वह पवित्र और पूज्य होती हैं। तभी उनका विवाह आठ वर्ष की आयु से पूर्व कर दिया जाता है। यह बिना दूल्हे के विवाह धनुष बाण के एक बाण से होता है। यह रस्म हो जाने के बाद कन्या का जीवन स्वतंत्र हो जाता है। अपनी यौवन अवस्था में फिर वह किसी को भी अपना दूल्हा चुन सकती है। माता-पिता के कहने पर भी उनकी पसंद के दूल्हे से tvशादी कर सकती है या प्रेम विवाह भी कर सकती है। उसे कोई मना नहीं करता है। जरूरी है कि उसका दूल्हा बस अपनी बिरादरी का होना चाहिए। अब तुम आजाद हो।"
यह सब सुनकर मंदिना के सिर से बहुत बड़ा बोझ उतर गया। उसे इन रस्मों की सार्थकता समझ आ गई थी।
लेटे हुए मंदिना की आंखें चमक उठीं याद कर के कि तभी उसने मां को लखमा के बारे में बताया था।
कबीले की लाल दीवार की झोपड़ी में देवताओं का वास होता है। मां ने उन दोनों की शादी के समय बताया था,
" दुल्हा देव सबले परमुख कुल देवता से। अऊ उखर
संगे-संग सूवा देव, सूरज देव, नारायन देव
येहू देवता मन जाति म परमुख इस्थान रइथे, तमो ले गोड़ जनजाति मन के सबले बड़े अउ परसिद्ध देवी बस्तर के दंतेश्वरी दाई हे।"
देवताओं के विषय में ज्ञान पाकर, मंदिना तो मानो ज्ञान की गंगा में नहा गई। उसने लखमा को सब बताया और वहीं जाकर दोनों ने एक दूसरे को माला पहनाई और कबीले की औरतों ने खूब नृत्य किया।"सुआ गीत" गाया।
"जिया जलेती रीता जानी, जिया जलेती रीता जानी
बलम सुगाजी ,हो बलम सुगाजी , हो ओ बलम सुगाजी"
गीत याद करके उसके चेहरे पर अंधेरे में भी मुस्कुराहट छा गई और वह अपने आप में लजा गई
जंगल के एक कोने के गूड़ा पहाड़ के पीछे की ओर से जहां ढेरों जनजातियां थोड़ी-थोड़ी दूर पर अपने टोले बना कर रहती हैं और सप्ताही बाज़ार जिसे रंगीला बाजार कहते हैं- में एक दूसरे से मिल पातीं हैं ।हालांकि उन्हें बीहड़, घने जंगलों को पैदल पार करके रंगीला बाज़ार पहुंचना होता है। असल में गृहस्थी की खरीदारी के लिए उनको हाट लगने के दिन की प्रतीक्षा रहती है। सारी खरीदारी कपड़ा लत्ता, मोती और पत्थर के गहने, नून मसाला ,अनाज , बच्चों के खिलौने आदि सब यहीं से यह लोग खरीदते हैं। अपने- अपने प्रेम और संबंधों के आधार पर फिर यह लोग एक दूसरे के ग़म और खुशी में सम्मिलित होने के लिए वहीं एक दूसरे को वह लोग निमंत्रण दे देते हैं। इसी रंगीला बाज़ार से शादी के बाद दोनों अपनी ज़रुरत का सामन खरीद लाते थे।
शादी होने के कुछ महीने बाद लखमा ने उससे पूछा था ,``तू शादी से बहुत ख़ुश है ?``
``हाँ रे ,मेरे बप्पा कहते हैं हम आदिवासी की अलग जातियों में बहुत तरह के विवाह होते हैं।`परिगंधन विवाह` में लड़का जिसको प्रेम करता है उस वधू का मूल्य देता है अपनी हैसियत के अनुसार भूमि, जानवर या पैसा। तुझे पता होगा इसे क्रय विवाह भी कहते हैं और तुझे तो मेरे से ब्याह करने के लिए कुछ भी नहीं देना पड़ा। ``
``खुसी की बात तो ई है कि कहते हैं महाभारत में राजा पांडु का कुंती के बाद, दूसरा विवाह मादुरी के साथ बहुत धन देकर हुआ था। मेरे बप्पा के पास पैसा कहाँ था?यदि हमके यहाँ पैसे देकर क्रय विवाह करना होता तो तू मुझे कैसे मिलती ? तुझे पता है हमारी तरफ़ माझी जनजाति, मोरिया जनजाति की बस्तरिया शादी में दो लड़कियों का इकट्ठे बियाह रचाते हैं। ``
मंदिना ने इठलाकर कहा था ,``मुझे तो अलग अलग शादी का नाम भी पता है जैसे सेवा विवाह , हठ विवाह, पठोनी विवाह, विधवा विवाह ,पठौनी विवाह, पाटो विवाह और सबसे अधिक प्रचलित बरोखी बिहाऊ होता है।``जो आम लोग करते हैं। सीधी तरह से दूल्हा-दुल्हन का बियाह।
मंदिना कलनी [ बिटिया] के पैदा होते ही कितनी ख़ुश थी कि उसकी जाति में ` काण विवाह` होता है। वह तब सोचती रहती थी उनको वर ढूंढने नहीं जाना पड़ेगा । कलनी बड़ी हो जाएगी, तो अपने आप उसे कोई ना कोई मिल जाएगा जैसे मंदिना को लखमा मिल गया था। देवी मां की कृपा है कि लखमा भुंजा जाति का रहा, तो वर खोजने का चक्कर नहीं करना पड़ा था । अब तो कलनी के खेलने के दिन थे। बाकी लड़कियों की तरह वह भी खेल कूद कर बड़ी हो जाएगी तो कोई ना कोई मिल ही जाएगा उसे भी।
कलनी के पांच बरस की होते ही फटाफट उसके काण विवाह की तैयारी होने लगी थी। लखमा मंदिना व कलनी को लेकर रंगीला बाज़ार गया और झोले भरकर सामान ले आया।
उसके अगले दिन वह दोनों को लेकर `भरोदा` गांव के घने जंगल में एक काले पत्थर के भरकम चट्टान जैसे एक प्राकृतिक शिवलिंग के दर्शन को चल पड़ा। उस शिवलिंग की मान्यता है कि वह हर वर्ष 5-6 इंच बढ़ जाता है ऊंचाई में। इसे `भूतेश्वर नाथ ` के नाम से जाना जाता है! वह बीस फुट गोलाकार है और अभी तकरीबन अठारह फीट का है। वह इसी गरियाबंद जिले में है। वहां बिटिया को माथा टिकाकर, आशीर्वाद लेकर यह लोग वापस आकर गांव में घंटी बजा कर बोल दिए कि इसी इतवार को कलनी का `काण विवाह` यानी `तीखा लोड़ी` है!
मंदिना बहुत प्रसन्न है कि वह गोण `भनझिया आदिवासी `है, जहां बिना दूल्हे के बेटी काण [तीर ]से ब्याही जाती है। वर्ना अलग- अलग मानस के अलग- अलग रिवाज़ हैं। `माझी जनजाति `में दो मंडप की सिरगुजिया शादी होती है। इसी तरह `मुरिया जनजाति ` की बस्तरिया शादी भी होती है। `बैगा जाति `की लड़की की शादी से पहले माथे पर गोदना गुदवाया जाता है। मंदिना की जाति में ये रिवाज़ नहीं है ,अच्छा है उसकी कलनी का माथा बच गया।
काण ब्याह का सुनकर कबीले के मर्द लोग खुशी- खुशी बांस काट कर ले आए और एक जगह बैठकर बांस को छीलकर तरह-तरह के फूल पत्ते बनाकर बाण का सेहरा और दुल्हन के माथे का सेहरा या मुकुट , दुल्हन का श्रृंगार बनाने लग गए । चारों ओर चहल-पहल मच गई। बीच का आंगन जो धूल से भरा था उसे वहां की औरतें साफ- सुथरा कर के लीपने- पोतने लग गईं। वे शादी के सगन वाले गीत संग- संग गाए जा रही थीं।
जब रात तक सब काम हो गया तो सुबह उठते ही पांच साल की कलनी को छोटी सी बॉर्डर वाली सफ़ेद धोती पहना दी गई जो रंगीला बाजार से लाई गई थी। अपने समय को याद करती, उसकी महतारी यानी मंदिना उसको गोद में उठाकर बाहर ले आई। संग में दूसरी तरफ मंदिना की बहिन ने कलनी को पकड़ा।
आंगन के बीच में सफेद चाक पाऊडर से `मड़ुआ` यानी मंडप पूरा गया। कलनी को लगा मंडप जैसा उसने कहीं देखा है --कहाँ ?फिर याद आया ! कोई- कोई लोग अपने घरों की दीवारों पर ऐसे ही मंडप बनाकर उन्हें रंग से सजाते हैं। एक पीतल का लोटा लेकर उसके ऊपर भी गोबर से और फूल पत्तों से सजाकर मंडप के बीचों- बीच रखा गया। उसी के किनारे अपनी गोद में बिटिया को लेकर महतारी और मौसी बैठ गईं। गांव में चप्पल पहनने का कोई रिवाज नहीं है सारी उम्र नंगे पांव ही सब लोग रहते हैं। काण [ बाण] सामने की ओर एक बार धरती में गाड़ दिया गया । दो औरतें एक थाल में ढेर सारा तेल हल्दी और पिसा चावल मिलाकर ले आईं। इसके बाद बारी-बारी से एक-एक औरत आती रही और कलनी के पैरों को हल्दी छुआ कर गोड़(घुटने) फिर माथे तक लगाती रहीं। सभी के मुंह में अपनी भाषा में शगुन वाले शादी के गीत चलते रहे ।
कलनी को उठाकर अब लाल कोठी में ले गए और वहां पर कबीले की सबसे बुड्ढी औरत के पैर छुआए। उसने कलनी के ऊपर चावल का छिड़काव किया और वह भी संग में आ गई। उसने भी आकर दुल्हन को तेल हल्दी लगाई। इसी दाई मां के कहे अनुसार अब आगे का रीति रिवाज होने लगा। तब तक बाकी महिलाएं भी आपस में हल्दी एक दूसरे को लगाकर होली जैसा माहौल बना रही हैं। खूब गाने और हंसी खेल चल रहा है। स्त्रियों के मुखारविंद से मीठे-मीठे संगीत में गीत माहौल में घुल रहे हैं। पहाड़ के ऊपर की बस्ती से ताओ जनजाति के लोग भी आए हैं शादी में सम्मिलित होने।
अब मड़ुवा गूंजाने लगे, लड़की सात फेरे लेगी वहीं जमीन पर गड़े हुए काण [बाण] के साथ। इसे `खपर `बोलते हैं! सूखा लंबा- लंबा घास भवंरा को झाड़ू की तरह एक बांस के ऊपर बांधकर उस पर आम के पत्ते लगाए गए। कहते हैं यह सूखा घास कीमती होता है।
अब लड़की को नहलाने के लिए घने जंगल के तालाब की तरफ़ ले जाना है, जो काफी दूर है । इसलिए शादी में आये सब लोग एक स्थान पर इकठ्ठे होकर ढोल - नगाड़े बजाते भीतर की ओर ले जाते हैं! इससे जंगल के भीतर बसे जंगली जानवरों का भय नहीं रहता है। वहां भीतर स्वच्छ नदियों का प्रवाह मिलता है।
आज भी सब ढोल - नगाड़े बजाते मंदिना की कलनी को वहां ले चले हैं. अर्थात आधी शादी हो गई है। तालाब में उसे निहलाकर वापिस ले जाकर एक बार फिर फेरे होंगे। तालाब में पानी खेला जब हो गया तो बांस की एक गोल थाली में दीप जलाना जरूरी है, तो वह जलाया गया। हल्दी -तेल पानी में नहाने से उतर गया। अब उसकी पुरानी धोती उतार कर दूसरी पीली धोती पहनाई गई है।
इससे अगली रस्म है कि दो पुरुष एक चादर तान कर रखते हैं दोनों किनारों से पकड़ कर। उसकी एक ओरर दुल्हन व दोनों स्त्रियां उसकी मां और मौसी और दूसरी ओर कबीले की स्त्रियां होती हैं। चादर लेकर मड़ुवा(मंडप) भुंझाते हैं। जो कि सफ़ाई करके दोबारा मंडप पोता गया है।अब दुल्हन के माथे पर डोरी बांधकर उसके आगे बांस के फूलों का सेहरा यानी मुकुट सजाया गया है। इसी तरह का एक और सेहरा पास में जमीन में गड़े हुए बाण(काण) को भी बांधा गया है। दुल्हन के एक और सात फेरे जिसे ‘खपर’ बोलते हैं , वह भी हुए। यह सारा कार्य इस बुड्ढी दाई मां के कथनानुसार हो रहा है। यह लोग अब फिर तालाब की ओर जा रहे हैं गोद में दुल्हन को उठा लिया गया है और उसके पीछे बाकी लोग भी ढोल - नगाड़े बजाते और सारा दिन वहां दरीचों से झांकती आती सूर्य की किरणों से दिशा ज्ञान लेकर अपने देवी- देवता का नाम जपते हुए जलप्रपात के स्वच्छ पानी में स्नान करके तालाब में जाकर दुल्हन का, बाण का मुकुट वगैरा बहा देतें हैं। माथे की डोरी उतार कर वहीं जमीन में गाड़ दिए हैं। इस का तात्पर्य है कि अब विवाह संपन्न हो गया है, बिना दूल्हे के। सांझ से पहले टोले में उसे वापस घर ले आते हैं। लखमा के हाथ में बाण है। वह बहुत प्रसन्न है कि उसकी बेटी का `काण विवाह ` हो गया है।
मर्द के सिर पर यह बहुत बड़ी जिम्मेवारी होती है क्योंकि अगर देर हो जाए और लड़की को मासिक धर्म आ जाए तो उसकी शादी फिर कभी नहीं हो सकती है। हालांकि उनके कबीले में ऐसा कभी नहीं हुआ था।
घर आंगन में वापस आकर सारी बिरादरी को बिठाकर उनके सामने सिरई के पत्तों से बने पत्तल रक्खे गए फिर उनके हाथ पत्तल के ऊपर ही पानी से धुलवाये गए . बाद में उन पत्तलों पर गरम-गरम भात और दाल परोसी गई।
जब सारा ब्याह संपन्न हो गया और लोग खा पीकर अपने अपने घर चले गए तो मंदिना ने अपनी लाड़ो बिटिया कलनी के बलैया उतार कर उसको छाती से चिपका लिया और बोली,"तुम थोड़ी और बड़ी हो जाओ फिर मैं तुमको सारी बातें समझा दूंगी! इस अचरज भरे रस्मों रिवाज का बहुत मर्म है जिनगी में खुश रहने का। उसी के कारण तो मैंने लखमा को पाया था। तुम्हारा भी कोई दूल्हा कहीं इंतज़ार कर रहा होगा। वह हमें अचानक रंगीला बाज़ार में मिलेगा। "
उसकी थकी हुई पस्त कलनी अपना मुंह फाड़े ,अपनी काजल लगी आँखें फैलाये थोड़ा समझती ,कुछ नहीं समझती उसकी बात सुनती रह गई।
अब आखरी बार समूचा कबीला ढोल नगाड़े बजाता जंगल के भीतर जलप्रपात के नीचे स्नान करने जाता है। वहां भीतर स्वच्छ नदियों का प्रवाह मिलता है जो जलप्रपात के रूप में आगे की ओर बहता चला जाता है। किसी भी शुभ कार्य के संपन्न होने के पश्चात् या किसी की मृत्यु होने पर दाह- संस्कार से फारिग हो जाने के बाद लोग एकत्रित होकर वहां जलप्रपात के नीचे स्नान करने जाते हैं। मानो उस दिन कार्य की समाप्ति हो गई। सो यह लोग भी अब बियाह की समाप्ति कर आए थे।
[ नोट: विश्व प्रसिद्ध ब्यूटीशियन शहनाज हुसैन ने इन्हीं आदिवासियों की त्वचा का अन्वेषण करके मड थेरेपी से अपना काम बढ़ाया है । एक स्नान के वह $500 लेती है। इसी से उसने बहुत प्रसिद्धि पाई है। ]
डा.वीणा विज 'उदित'