ट्रेन से उतरते ही मेहरीश को वही शोर, वही भीड़, वही ज़िंदगी का प्रेशर महसूस हुआ। तीन दिन की ख़ामोशी के बाद यह शहर की आवाज़ें उसके कानों में चिल्लाने लगी थीं। हॉर्न, लोगों के झगड़े, मोबाइल की घंटियाँ, सब कुछ बहुत ज़्यादा लग रहा था।
उसका फोन ऑन करते ही 12 मिस्ड कॉल्स और 25 मैसेजेस आए। चाची, ऑफिस, बैंक, डॉक्टर। रियल वर्ल्ड ने उसे याद दिला दिया कि उसकी ज़िंदगी साइलेंस के लिए नहीं बनी है।
घर पहुँची तो चाची बैठी थीं। "कहाँ थी तू? किसी को बताया नहीं! हम सब परेशान थे!"
मेहरीश ने सिर्फ सिर झुकाया। उसकी ज़ुबान फिर से बंद हो गई थी। तीन दिन बोलने के बाद, अब शब्दों में लौटना मुश्किल लग रहा था।
" माँ की याद में एक रिट्रीट में गई थी," उसने बस इतना कहा।
चाची ने उसके चेहरे को देखा। "तुम... अलग लग रही हो।"
अलग। हाँ। मेहरीश अलग थी। पर वह कैसे समझाती कि तीन दिन की ख़ामोशी ने उसे कैसे बदल दिया था? कैसे एक अजनबी ने उसे बिना बोले वह दिया जो रिश्तेदार सालों में नहीं दे पाए, समझ।
उसने अपना बैग कमरे में रखा। सफेद पत्थर निकाला। रयान का कार्ड निकाला। "मल्होत्रा एंटरप्राइजेज़"। उसने कंप्यूटर ऑन किया। गूगल किया।
और फिर उसकी साँस रुक गई।
विजय मल्होत्रा। सिटी का सबसे बड़ा रियल एस्टेट किंग। बिलेनियर। उसकी फोटो, एक सख्त, गंभीर चेहरा। और फिर रयान मल्होत्रा। उसका बेटा। हीरो। मीडिया में "प्लेबॉय हीरो" कहा जाता था। पार्टीज़, कार्स, गर्लफ्रेंड्स।
मेहरीश ने खुद को शीशे में देखा। एक साधारण लड़की। मिडिल क्लास। ऑफिस जॉब। कर्ज़। और फिर रयान। एक अलग दुनिया।
उसने कार्ड फेंक दिया। "यह मेरी दुनिया नहीं है," उसने खुद से कहा।
पर फिर उसने सफेद पत्थर उठाया। "यू आर नॉट अलोन।" उन शब्दों ने उसके दिल को छू लिया था।
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अगले दिन मेहरीश ऑफिस पहुँची। उसकी नौकरी एक मीडियम लेवल मार्केटिंग कंपनी में थी। डेस्क जॉब। सैलरी ठीक-ठाक। पर आज सब कुछ अलग लग रहा था।
उसकी बेस्ट फ्रेंड नीता ने देखा कि कुछ गड़बड़ है। "तू कहाँ गई थी? तेरे चेहरे पर एक अजीब सी शांति है।"
"बस... कुछ दिन आराम किया," मेहरीश ने कहा।
"अरे! सुन! तेरे लिए न्यूज़ है! हमारी कंपनी को एक बड़ा प्रोजेक्ट मिला है! मल्होत्रा एंटरप्राइजेज़ के साथ!"
मेहरीश का गला सूख गया। "क... क्या?"
"हाँ! विजय मल्होत्रा की नई प्रॉपर्टी का मार्केटिंग कॉन्ट्रैक्ट! और गेस क्या? उनका बेटा रयान मल्होत्रा प्रोजेक्ट हेड है! वो खुद मीटिंग्स के लिए आएगा!"
मेहरीश का दिल ज़ोर से धड़का। कोई संयोग नहीं हो सकता। यह... यह कुछ और था।
"वो कब आ रहा है?" उसकी आवाज़ काँप रही थी।
"कल! और तेरा नाम लिस्ट में है! तुझे प्रेजेंटेशन देना होगा!"
मेहरीश ने महसूस किया कि दुनिया तेजी से घूम रही है। रयान। यहाँ। उसके ऑफिस में। कल।
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उधर रयान अपने पेंटहाउस में खड़ा था। शहर उसके नीचे फैला हुआ था। पर आज वह खालीपन नहीं था। आज उसके दिमाग में एक चेहरा था। मेहरीश।
उसने अपने असिस्टेंट कबीर को बुलाया। "कल की मीटिंग के बारे में..."
"सब तैयार है सर। क्रिएटिव हाउस मार्केटिंग के साथ 10 बजे मीटिंग है।"
"उनकी टीम लिस्ट भेजो।"
कबीर ने लिस्ट भेजी। रयान ने नाम देखे। और फिर उसका दिल एक धड़कन के लिए रुक गया।
मेहरीश सक्सेना। सीनियर कॉपीराइटर।
वह मुस्कुराया। एक असली मुस्कान। जो कबीर ने महीनों में नहीं देखी थी।
"सर? सब ठीक है?"
"हाँ... बिल्कुल ठीक है। इससे बेहतर नहीं हो सकता।"
पर फिर उसके फोन की घंटी बजी। पिता का कॉल।
"कल की मीटिंग याद है ना?"
"हाँ पापा।"
"यह प्रोजेक्ट इम्पोर्टेन्ट है। कोई गलती नहीं। और... सुन। मैंने सुना तुम किसी रिट्रीट में गए थे। यह सब नॉनसेंस बंद करो। हम मल्होत्रा लोग इस तरह का ड्रामा नहीं करते।"
"यह ड्रामा नहीं था पापा।"
"जो भी था। बंद करो। फोकस करो बिजनेस पर।"
कॉल कट गई। रयान ने फोन फेंक दिया। उसका गुस्सा वापस आ गया। पर फिर उसने मेहरीश के बारे में सोचा। उसकी शांत आँखें। उसके "यू आर नॉट योर एंगर" वाले नोट के बारे में।
उसने गहरी साँस ली। गुस्से को कंट्रोल किया। पहली बार।
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मेहरीश पूरी रात जागकर प्रेजेंटेशन तैयार करती रही। उसका दिल हिलोरे ले रहा था। कल वह रयान को फिर से देखेगी। पर अब वह रयान मल्होत्रा था। बिलेनियर हीरो। न कि वह आदमी जो उसे सफेद पत्थर देता है।
सुबह उसने खास तैयारी की। एक सिंपल सलवार सूट। न्यूट्रल मेकअप। पर उसने एक चीज़ पहनी, एक सफेद पत्थर की पेंडेंट। उसने खुद बनाया था। रयान के दिए हुए पत्थर से।
ऑफिस पहुँची तो बॉस मिस्टर शर्मा ने बुलाया। "मेहरीश, आज की मीटिंग बहुत इम्पोर्टेन्ट है। रयान मल्होत्रा खुद आ रहे हैं। वो बहुत... डिमांडिंग हैं। स्ट्रिक्ट। तुम्हें परफेक्ट परफॉर्म करना है।"
"जी सर।"
"और... सुनो। वो बहुत हैंडसम हैं। रिच हैं। पर प्लीज... प्रोफेशनल रहना। कोई पर्सनल... यू समझ रही हो?"
मेहरीश ने सिर हिलाया। उसके पेट में तितलियाँ उड़ रही थीं।
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10 बजे। कॉन्फ्रेंस रूम। मल्होत्रा एंटरप्राइजेज़ की टीम आ गई। और फिर रयान अंदर आया।
ब्लैक सूट। पर्फेक्ट फिट। उसके चेहरे पर वही बिजनेस एक्सप्रेशन था। सख्त। गंभीर। पर जब उसकी नज़र मेहरीश पर पड़ी, तो एक सेकंड के लिए उसकी आँखों में कुछ फड़का। एक रिकग्निशन। एक गर्माहट।
मेहरीश ने भी देखा। उसने अपना सिर नीचे झुका लिया।
प्रेजेंटेशन शुरू हुआ। मेहरीश की बारी आई। वह उठी। स्क्रीन के सामने गई। उसने देखा, रयान उसे देख रहा था। इंटेंसली।
उसकी आवाज़ काँपी। पहले दो मिनट तो। फिर उसने खुद को संभाला। और वह शानदार थी। उसके आइडियाज क्लियर थे। क्रिएटिव थे।
जब वह खत्म हुई, तो रयान ने ताली बजाई। अकेले। "एक्सलेंट प्रेजेंटेशन, मिस सक्सेना।"
उसकी आवाज़... वही आवाज़। पर अलग टोन में। प्रोफेशनल।
"थैंक यू, मिस्टर मल्होत्रा।"
मीटिंग खत्म हुई। सब उठे। रयान ने मिस्टर शर्मा से कहा, "क्या मैं मिस सक्सेना से अकेले बात कर सकता हूँ? उनके आइडियाज के बारे में कुछ क्वेश्चन्स हैं।"
"बिल्कुल! बिल्कुल!"
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कॉन्फ्रेंस रूम खाली हो गया। सिर्फ रयान और मेहरीश रह गए।
दरवाज़ा बंद हुआ। एक मिनट की साइलेंस।
फिर रयान की आवाज़ बदल गई। नर्म हो गई। "तुम ठीक हो?"
मेहरीश ने देखा। उसकी आँखें... वही आँखें। साइलेंट रिट्रीट वाली। "हाँ... हाँ।"
"तुमने कॉल नहीं किया।"
"मैं... मैं नहीं जानती थी..."
"क्या नहीं जानती थी?"
"कि तुम... तुम कौन हो।"
रयान ने एक कदम आगे बढ़ाया। "मैं वही हूँ जो तुमने साइलेंट रिट्रीट में देखा था। बस।"
"पर तुम रयान मल्होत्रा हो।"
"और तुम मेहरीश सक्सेना हो। क्या इससे कुछ फर्क पड़ता है?"
मेहरीश ने सिर हिलाया। "फर्क पड़ता है। तुम्हारी दुनिया और मेरी दुनिया..."
रयान ने उसकी बात काटी। "एक ही दुनिया है। जहाँ लोग टूटे हुए हैं। और ढूँढ रहे हैं किसी को जो उन्हें बिना शर्त समझे।"
उसने फिर कदम बढ़ाया। अब वे बहुत करीब थे। मेहरीश ने अपनी पेंडेंट को छुआ। सफेद पत्थर।
रयान ने देखा। उसकी आँखों में चमक आ गई। "तुमने इसे पहना है।"
"हाँ।"
"मैंने सोचा था तुम कॉल नहीं करोगी।"
"मैं करने वाली थी। पर..."
"पर?"
"मुझे डर था।"
रयान ने धीरे से कहा, "मुझे भी डर था। डर था कि तुम मुझे भूल जाओगी। डर था कि यह सब सपना था।"
उसने अपनी जेब से एक छोटा सा बॉक्स निकाला। मेहरीश को दिया।
मेहरीश ने खोला। अंदर था, सूखा हुआ गुलाब। उसी का। पर अब उसे एक छोटे से ग्लास डोम में प्रिज़र्व किया गया था। और नीचे लिखा था: "आर यू रियल?"
उसकी आँखें भर आईं। "हाँ। मैं रियल हूँ।"
"तो फिर... क्या मैं तुम्हें डिनर पर ले जा सकता हूँ? आज रात?"
मेहरीश ने सोचा। डर। उम्मीद। फिर उसने सिर हिलाया। "हाँ।"
"पर एक कंडीशन है।"
"क्या?"
"हम बात नहीं करेंगे। साइलेंट डिनर। बस... बिना शब्दों के।"
मेहरीश मुस्कुराई। "डील।"
°°°°°
रात 8 बजे। एक छोटा, प्राइवेट रेस्तराँ। रयान ने पूरा रेस्तराँ बुक कर लिया था। सिर्फ उन दोनों के लिए।
टेबल पर मोमबत्तियाँ। कोई वेटर नहीं। खाना पहले से सर्व था।
दोनों बैठे। मुस्कुराए। फिर चुप हो गए।
पहले 10 मिनट: सिर्फ खाना। एक-दूसरे को देखना। आँखों में बात करना।
फिर रयान ने अपना फोन निकाला। एक प्लेलिस्ट चलाई। इंस्ट्रुमेंटल म्यूजिक। कोई गाने नहीं। सिर्फ संगीत।
उसने मेहरीश की तरफ देखा। एक सवाल: "तुम्हारा पसंदीदा गाना क्या है?"
मेहरीश ने उसके फोन पर टाइप किया: "ऐसे नहीं। कोई गाना नहीं। साइलेंस।"
रयान ने म्यूजिक बंद कर दिया। और फिर सचमुच की साइलेंस थी।
पर यह साइलेंस अजनबीपन वाली नहीं थी। यह कम्फर्टेबल साइलेंस थी। वह साइलेंस जो केवल तभी होती है जब दो लोग एक-दूसरे को बिना शब्दों के समझते हैं।
खाना खत्म हुआ। रयान ने एक नोटबुक निकाली। लिखा: "मैं तुम्हारे बारे में जानना चाहता हूँ। सब कुछ।"
मेहरीश ने लिखा: "यह डरावना है।"
"क्यों?"
"क्योंकि कोई कभी मेरे बारे में सब कुछ नहीं जानना चाहता।"
"मैं जानना चाहता हूँ।"
मेहरीश ने एक लंबी साँस ली। फिर लिखना शुरू किया। उसकी माँ की बीमारी। उसकी मौत। कर्ज़। अकेलापन। डिप्रेशन। वह निशान।
जब उसने खत्म किया, तो उसकी आँखों में आँसू थे।
रयान ने पढ़ा। फिर उसने अपनी कहानी लिखी। अपने पिता का प्रेशर। गुस्सा। अकेलापन। टैटू का मतलब ("शांतिर्भूत:", "शांत बनो")।
दोनों ने एक-दूसरे की कहानियाँ पढ़ीं। और फिर रयान ने लिखा: "हम दोनों टूटे हुए हैं। पर शायद... हमारे टुकड़े एक-दूसरे को कंपलीट कर सकते हैं।"
मेहरीश ने देखा। फिर लिखा: "यह बहुत फास्ट है।"
"प्यार कभी समय नहीं देखता।”
"यह प्यार नहीं है।"
"तो क्या है?"
"कनेक्शन।"
"कनेक्शन प्यार से बेहतर है।"
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रात 11 बजे। रयान ने मेहरीश को उसके घर छोड़ा। कार में, उसने फिर से नोटबुक निकाली। लिखा: "क्या मैं तुम्हें फिर से देख सकता हूँ?"
मेहरीश ने लिखा: "हम एक-दूसरे को रोज़ देखेंगे। प्रोजेक्ट के लिए।"
"यह नहीं। पर्सनली।"
"यह मुश्किल है।"
"क्यों?"
"क्योंकि तुम रयान मल्होत्रा हो। और मैं... मैं हूँ।"
रयान ने उसका हाथ पकड़ा। पहली बार जानबूझकर। मेहरीश ने झटका नहीं दिया।
उसने लिखा: "मेहरीश। प्लीज। गिव अस अ चांस।"
मेहरीश ने देखा। फिर उसने अपना हाथ हटा लिया। और लिखा: "मुझे टाइम चाहिए।"
वह कार से उतरी। पर मुड़कर बोली, पहली बार आवाज़ में: "थैंक यू। आज रात के लिए।"
रयान ने देखा कि वह चली गई। उसके दिल में एक अजीब सा दर्द था। पर साथ ही एक उम्मीद भी।
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अगले दिन ऑफिस में, मेहरीश ने देखा कि उसकी डेस्क पर एक एन्वलप रखा हुआ है। कोई नाम नहीं। खोला तो अंदर था, एक चाबी और एक नोट: "मेरे पर्सनल ऑफिस की चाबी। 50th फ्लोर। कभी भी आओ। जब भी तुम्हें ज़रूरत हो। साइलेंट के लिए।"
और नीचे: "पी.एस.: “मैं तुमसे मिलना चाहता हूँ। इसलिए नहीं कि मुझे तुम्हारी ज़रूरत है, बल्कि इसलिए कि मैं खुद तुमसे मिलना चाहता हूँ।”
मेहरीश ने चाबी को मुट्ठी में भींच लिया। उसका दिल ज़ोर से धड़क रहा था। क्या वह जाएगी? क्या वह इस रिश्ते की शुरुआत करेगी?
पर तभी उसके बॉस मिस्टर शर्मा ने उसे बुलाया। "मेहरीश, मल्होत्रा साहब ने तुम्हें उनकी नई टीम में शामिल होने का ऑफर दिया है। प्रोजेक्ट के दौरान उनके ऑफिस में काम करोगी।"
मेहरीश की साँस रुक गई। यह संयोग नहीं था। रयान ने यह प्लान किया था।
"पर सर..."
"यह बड़ा ऑपरच्युनिटी है! तुम्हारी करियर के लिए बहुत अच्छा है! से हाँ कह दो!"
मेहरीश ने सोचा। चाबी। ऑफर। रयान का चेहरा। उसकी आँखें।
उसने कहा, "मुझे... सोचने दीजिए।"
"सोचना? यह ऑफर सोचने के लिए नहीं है! यह एक्सेप्ट करने के लिए है!"
पर मेहरीश ने फिर कहा, "मुझे एक दिन चाहिए।"
वह वापस अपनी डेस्क पर आई। चाबी को देखा। और फिर उसने रयान को मैसेज किया। पहली बार।
“तुम्हें मुझसे पूछना चाहिए था।”
दो मिनट बाद रिप्लाई आया: “मुझे पता है… लेकिन मुझे डर था कि तुम ‘ना’ कह दोगे।”
“और शायद मैं मना ही कर देती।”
“तो… क्या तुम करोगी?”
मेहरीश ने जवाब नहीं दिया। वह चाबी को देखती रही। 50th फ्लोर। रयान का पर्सनल ऑफिस। एक अलग दुनिया।
और फिर उसने फैसला किया...