Ep1 साइलेंट रिट्रीट
हवाई अड्डे की भीड़ में मेहरीश एक पतली सी रेखा की तरह खड़ी थी। उसके कंधे पर एक छोटा सा बैग था, हाथ में एक किताब, और आँखों में एक ऐसी थकान जो सालों की नहीं, जन्मों की लगती थी। उसकी माँ की मौत को एक साल हो गया था। एक साल जिसमें हर दिन एक सवाल था: "क्या मैं और कर सकती थी?"
उसका फोन वाइब्रेट हुआ। चाची का मैसेज: "तू ठीक तो है ना?
मेहरीश ने जवाब नहीं दिया। वह जानती थी इस साइलेंट रिट्रीट के नियम। "साइलेंस सर्कल" जहाँ लोग 3 दिन के लिए खुद से, अपने दर्द से, अपने सवालों से रूबरू होने आते थे। बोलना मना था। फोन मना था। लैपटॉप मना था। सिर्फ एक डायरी और अपने विचारों की आवाज़ें।
उसे बस मिली। दो घंटे का सफर। पहाड़ों की तरफ। जंगल के बीच एक आश्रम। वह खिड़की से बाहर देखती रही। बारिश की हल्की फुहार ने शीशे पर धुंधली सी लकीरें खींच दी थीं। उसने खुद को शीशे में देखा। पच्चीस साल की उम्र, पर चेहरे पर ज़िम्मेदारियों के पचास साल।
"तुम क्यों आई हो यहाँ?" उसने खुद से पूछा, आवाज़ नहीं, विचारों में।
"शायद इसलिए क्योंकि मैं थक गई हूँ बोलने से। हर बात का जवाब देने से। हर सवाल का बहाना बनाने से।"
बस रुकी। आश्रम का गेट था। एक साधारण सा बोर्ड: "साइलेंस सर्कल - व्हेयर साउल्स स्पीक विदाउट वर्ड्स।"
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उसी दिन सुबह, रयान मल्होत्रा ने अपने पिता के साथ लड़ाई की थी। बोर्डरूम में। बीस लोगों के सामने।
"आप हमेशा मेरी बात काटते हो!" रयान की आवाज़ में वही गुस्सा था जो उसकी पहचान बन चुका था।
"क्योंकि तुम्हारी बातें बचकानी होती हैं!" विजय मल्होत्रा ने जवाब दिया, अपनी कुर्सी से उठे बिना।
"मैं 27 साल का हूँ पापा! मैं बच्चा नहीं हूँ!"
"जब तक इस कंपनी का सीईओ मैं हूँ, तब तक मेरे नियम चलेंगे।"
रयान ने फाइलें मेज पर पटक दीं। "तो ठीक है! मैं जा रहा हूँ।"
"कहाँ?"
"जहाँ मुझे आपकी ज़रूरत नहीं होगी।"
उसने दरवाज़ा ज़ोर से बंद किया। उसकी सहायक नेहा ने डरते हुए पूछा, "सर, कल की मीटिंग..."
"कैंसल कर दो। मैं 3 दिन के लिए बाहर जा रहा हूँ।"
"पर सर..."
"बस! कैंसल कर दो!"
रयान ने गाड़ी स्टार्ट की। उसके हाथ काँप रहे थे। वह जानता था यह गुस्सा सिर्फ गुस्सा नहीं था। यह डर था। असफल होने का डर। पिता को निराश करने का डर। खुद को निराश करने का डर।
उसकी थेरेपिस्ट डॉ. मेहता ने सुझाव दिया था: "साइलेंस रिट्रीट। तुम्हें अपने गुस्से की जड़ तक जाना है। और वह जड़ शब्दों के पीछे छुपी है।"
रयान ने GPS में लोकेशन डाली। "साइलेंस सर्कल"। 3 दिन। बोलना मना। वह सोच रहा था, "मैं कैसे रहूँगा बिना बोले? मेरा गुस्सा तो मेरी आवाज़ है।"
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शाम के 5 बजे थे। आश्रम के मुख्य हॉल में 20 लोग इकट्ठे थे। सब चुप। एक दूसरे की आँखों में देख रहे थे। बिना बोले।
मेहरीश एक कोने में बैठी थी। उसने लाल रंग की साधारण सी कुर्ती पहनी थी, और सफेद पजामा। बाल एक साधारण सी चोटी में बँधे थे। वह अपनी डायरी लिख रही थी: "दिन 1: मैं यहाँ हूँ क्योंकि मैं थक गई हूँ अपनी आवाज़ से। शायद चुप्पी में मुझे वो जवाब मिल जाए जो शब्द नहीं दे पाए।"
तभी दरवाज़ा खुला। रयान अंदर आया। काले जींस, काले टी-शर्ट, और आँखों में वह तूफान जो अभी-अभी शांत हुआ था। उसने कमरे को देखा। लोगों को देखा। फिर उसकी नज़र मेहरीश पर पड़ी।
वह एक सेकंड के लिए रुक गया।
मेहरीश ने भी देखा। उस युवक की आँखों में वही खालीपन था जो उसकी अपनी आँखों में था। एक ऐसा खालीपन जो भरने की कोशिश में और भर जाता है।
रयान उसके सामने वाली सीट पर बैठ गया। कोई नहीं बोला। नियम थे - पहले दिन की शाम सिर्फ देखना है। एक दूसरे को। अपने आप को।
मेहरीश ने रयान की ओर देखा। उसके हाथों पर नसें उभरी हुई थीं। जैसे वह किसी चीज़ को बहुत जोर से पकड़े हुए हो। उसकी आँखों के नीचे काले घेरे थे। पर उसकी आँखें... उनमें एक तीखी चमक थी। एक जिद्द।
रयान ने मेहरीश को देखा। उसकी आँखें बड़ी थीं। शांत। पर उस शांति के पीछे एक तूफान था। एक ऐसा तूफान जो कभी बाहर नहीं आया। उसके होंठों पर एक हल्की सी रेखा थी। जैसे वह हमेशा कुछ कहना चाहती हो, पर रोक लेती हो।
आश्रम की इंचार्ज, दीदी, ने एक चार्ट उठाया। उस पर लिखा था: "आज का नियम: सिर्फ देखो। सुनो। महसूस करो। शब्द नहीं।"
सबने सिर हिलाया।
रयान ने मेहरीश की ओर देखा। मेहरीश ने रयान की ओर देखा।
दो जोड़ी आँखें। दो अलग दुनियाएँ। एक ही खालीपन।
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रात के खाने का समय था। डाइनिंग हॉल में सब चुपचाप बैठे थे। खाना परोसा गया। साधारण खाना। दाल, चावल, सब्जी।
मेहरीश एक टेबल पर बैठी। रयान भी उसी टेबल पर आकर बैठ गया। संयोग? शायद। या शायद वह जानबूझकर।
दोनों ने एक दूसरे को देखा। फिर अपनी प्लेटों की ओर देखा।
रयान ने खाना शुरू किया। तेजी से। जैसे यह कोई टास्क हो। मेहरीश ने धीरे-धीरे खाया। हर कौर चबाते हुए। जैसे हर कौर में कोई जवाब छुपा हो।
तभी रयान का हाथ खिसका। पानी का गिलास गिरने ही वाला था। मेहरीश ने तेजी से हाथ बढ़ाया और गिलास संभाल लिया। उसने गिलास वापस रखा। रयान की ओर देखा। एक सेकंड के लिए उनकी उंगलियाँ छुईं।
रयान ने आँखों से "थैंक्यू" कहा।
मेहरीश ने सिर्फ सिर हिलाया।
खाना खत्म हुआ। सब अपनी-अपनी प्लेटें लेकर उठे। मेहरीश उठी। रयान भी उठा।
दरवाज़े पर दोनों एक साथ पहुँचे। रयान ने कदम पीछे खींचे। मेहरीश को पहले जाने दिया।
मेहरीश ने मुड़कर देखा। एक सेकंड के लिए। फिर आगे बढ़ गई।
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रात को 9 बजे। सब अपने-अपने कमरों में। मेहरीश अपनी बालकनी में खड़ी थी। चाँद निकला था। पूर्णिमा का चाँद। उज्ज्वल। पर उसकी रोशनी में एक ठंडक थी।
वह सोच रही थी: "वो लड़का... उसकी आँखों में क्या है? वह गुस्सा? वह दर्द? वह डर?"
तभी उसने देखा, दूसरी बालकनी में रयान खड़ा था। वह भी चाँदनी में खड़ा था। उसके कंधे झुके हुए थे। जैसे वह कोई भार उठाए हुए हो।
रयान ने मेहरीश की ओर देखा। दोनों की नज़रें मिलीं।
कोई नहीं बोला। कोई हिला नहीं। बस देखते रहे।
पाँच मिनट। दस मिनट।
फिर रयान ने धीरे से सिर हिलाया। एक अजीब सा सलाम। मेहरीश ने भी सिर हिलाया।
रयान अंदर चला गया। मेहरीश भी अंदर आई।
उसने अपनी डायरी खोली। लिखा: "आज मैंने एक आदमी देखा जिसकी आँखें मेरी तरह बोलती हैं। और चुप हैं।"
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आधी रात को मेहरीश की आँख खुल गई। उसका दिल तेजी से धड़क रहा था। पसीना आ रहा था। नाइटमेयर। फिर से वही सपना। माँ का हॉस्पिटल का कमरा। बीप की आवाज़। डॉक्टर का चेहरा।
वह उठ बैठी। साँस लेने में तकलीफ हो रही थी। पैनिक अटैक। यह नया नहीं था। माँ की मौत के बाद से यह होता था।
वह बाथरूम गई। पानी से मुँह धोया। शीशे में खुद को देखा। आँखों में डर। होंठों पर काँपन।
तभी उसने आवाज़ सुनी। दरवाज़े की। कोई खटखटा रहा था।
वह दरवाज़ा खोलने ही वाली थी कि याद आया - बोलना मना है।
उसने दरवाज़ा खोला।
बाहर रयान खड़ा था। उसकी आँखों में चिंता थी। उसने मेहरीश के चेहरे को देखा। आँखों में आँसू। होंठों पर काँपन।
रयान ने कुछ नहीं कहा। बस खड़ा रहा।
मेहरीश ने भी कुछ नहीं कहा।
एक मिनट। दो मिनट।
फिर रयान ने धीरे से अपना हाथ बढ़ाया। उसकी हथेली खुली हुई थी। उसमें एक छोटा सा पत्थर था। चिकना। सफेद।
मेहरीश ने पत्थर को देखा। फिर रयान को देखा।
रयान ने पत्थर उसकी ओर बढ़ाया।
मेहरीश ने पत्थर ले लिया। उसकी ठंडक उसकी हथेली में फैल गई।
रयान ने सिर हिलाया। फिर चला गया।
मेहरीश दरवाज़ा बंद करके वापस बिस्तर पर आई। उसने पत्थर को हाथ में लिया। उसकी धड़कनें धीरे-धीरे सामान्य होने लगीं।
उसने डायरी लिखी: "आज एक अजनबी ने मुझे चुप्पी में ठीक किया। बिना एक शब्द बोले।"
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क्लिफहेंगर:
अगली सुबह, नाश्ते के समय। सब डाइनिंग हॉल में इकट्ठे हुए। दीदी ने चार्ट उठाया। उस पर लिखा था: "आज का एक्सरसाइज: आई कॉन्टैक्ट। एक साथी चुनो। उसकी आँखों में देखो। 5 मिनट तक। बिना बोले।"
सबने एक दूसरे को देखा। मेहरीश ने देखा कि रयान सीधे उसकी ओर देख रहा था। और वह चलकर उसकी तरफ आ रहा था...