संस्कृति अभी भी सोफे पर बैठी थी। पारो उसके सामने कुर्सी खींचकर बैठ गई। उसके चेहरे पर अब चिंता से ज़्यादा शरारती मुस्कान थी।
पारो (धीरे से) बोली -
भाभी… एक बात पूछूँ?
संस्कृति ने हैरानी से उसे देखा।
संस्कृति बोली -
क्या?
पारो थोड़ा और पास आ गई और फुसफुसाते हुए बोली—
कल रात… आपके और जेठजी के बीच कुछ हुआ था क्या?
इतना सुनते ही संस्कृति का चेहरा टमाटर की तरह लाल हो गया।
वो एक पल के लिए चुप रह गई। उसकी नज़रें झुक गईं। पारो मुस्कुरा रही थी और जवाब का इंतज़ार कर रही थी। कुछ सेकंड बाद…संस्कृति ने धीरे-धीरे हां में सिर हिला दिया। पारो की आँखें चमक उठीं।
पारो (हँसते हुए) बोली -
ओह्हो… इसलिए तो सुबह से ये हाल है!
संस्कृति ने शर्माते हुए उसे हल्का-सा धक्का दिया।
संस्कृति बोली -
पारो… तुम भी ना!
पारो हँसने लगी।
पारो बोली -
अरे भाभी, मैं तो बस कन्फर्म कर रही थी।
क्योंकि अगर ऐसा है… तो मुझे लगता है हमारी वो वाली ‘खुशखबरी’ सच हो सकती है।
संस्कृति के गाल फिर से लाल हो गए।
उसने धीरे से कहा—
मुझे खुद समझ नहीं आ रहा…
पारो तुरंत खड़ी हो गई।
पारो उत्साह से बोली -
बस फिर तय हो गया।
आज ही डॉक्टर के पास चलते हैं।
संस्कृति ने थोड़ा घबराकर उसकी तरफ देखा।
संस्कृति बोली -
अभी?
पारो बोली -
हाँ अभी! अगर सच में खुशखबरी हुई… तो सबसे पहले मुझे पता चलना चाहिए।
दोनों हँस पड़ीं। संस्कृति ने हल्के से अपना हाथ पेट पर रखा।
उसकी आँखों में अब घबराहट और उम्मीद दोनों थीं। शायद सच में…उनकी जिंदगी में एक नई छोटी-सी धड़कन आने वाली थी।
पारो की जिद के आगे संस्कृति ज्यादा देर टिक नहीं पाई। कुछ ही देर बाद दोनों पास के क्लिनिक पहुँच गईं। संस्कृति का दिल तेज़ धड़क रहा था। उसे खुद समझ नहीं आ रहा था कि वो ज़्यादा घबराई हुई है या खुश। डॉक्टर ने मुस्कुराते हुए उन्हें अंदर बुलाया।
कुछ टेस्ट हुए…कुछ देर की जांच के बाद डॉक्टर अपनी कुर्सी पर बैठी और रिपोर्ट देखते हुए मुस्कुराई। संस्कृति और पारो दोनों उसकी तरफ साँस रोके देख रही थीं।
फिर डॉक्टर ने धीरे से कहा —
बधाई हो… आप प्रेग्नेंट हैं।
संस्कृति की आँखें एक पल के लिए फैल गईं। पारो ने तो जैसे सुना ही नहीं।
पारो (हड़बड़ाकर) बोली -
सच…? सच में डॉक्टर?
डॉक्टर हल्के से हँस दी।
डॉक्टर बोली -
हाँ… लेकिन अभी शुरुआत है।
लगभग एक ही दिन हुआ है। इसलिए आपको बहुत ध्यान रखना होगा।
संस्कृति के होंठ काँप गए। उसने धीरे से अपने पेट पर हाथ रख लिया। उसकी आँखों में आँसू आ गए। पारो तो खुद को रोक ही नहीं पाई। वो अचानक रो पड़ी और संस्कृति को गले लगा लिया।
पारो (रोते हुए) बोली -
भाभी… मैं चाची बनने वाली हूँ…
संस्कृति भी हँसते-रोते उसे पकड़कर खड़ी रही। कुछ देर बाद…पारो को अचानक कुछ याद आया।
पारो बोली -
भाभी! जेठजी को फोन करो!
संस्कृति का दिल फिर तेज़ धड़कने लगा। उसने काँपते हाथों से कार्तिक का नंबर डायल किया। उधर ऑफिस में कार्तिक मीटिंग में था। फोन देखते ही उसने तुरंत उठाया।
कार्तिक बोला -
हाँ संस्कृति… सब ठीक है ना?
संस्कृति कुछ बोल ही नहीं पाई। उसकी आवाज़ गले में अटक गई।
तभी पारो ने फोन उसके हाथ से छीन लिया।
पारो (उत्साह से चिल्लाते हुए) बोली -
भाई साहब!!! बधाई हो!
कार्तिक चौंक गया।
कार्तिक बोला -
किस बात की बधाई?
पारो की आवाज़ खुशी से काँप रही थी।
पारो बोली -
आप… पापा बनने वाले हो!
कुछ सेकंड के लिए फोन के उस तरफ बिल्कुल सन्नाटा छा गया।
कार्तिक जैसे सुनकर भी यकीन नहीं कर पा रहा था।
फिर धीमे से उसकी आवाज़ आई —
सच…?
अब संस्कृति ने फोन लिया।
संस्कृति (धीरे से) बोली -
हाँ… कार्तिक जी।
फोन के उस तरफ कार्तिक की साँसें भारी हो गईं। उसकी आँखें नम हो गई थीं ।
कार्तिक बोला -
संस्कृति… तुम ठीक हो ना?
संस्कृति बोली -
हाँ… मैं ठीक हूँ।
कुछ पल दोनों चुप रहे।
फिर कार्तिक ने धीमे से कहा —
मैं अभी घर आ रहा हूँ।
मीटिंग, काम… सब छोड़कर वो तुरंत उठ खड़ा हुआ। उसकी आँखों में चमक थी। आज…इतने संघर्षों के बाद…उनकी जिंदगी में सचमुच एक नई धड़कन आने वाली थी। और शायद पहली बार…कार्तिक को लगा कि उसकी दुनिया पूरी होने वाली है। 💛
क्लिनिक से लौटते समय पारो पूरे रास्ते खुशी से चमक रही थी।
संस्कृति अभी भी थोड़ी चुप थी… जैसे वो इस पल को अंदर ही अंदर महसूस कर रही हो।
घर पहुँचते ही पारो ने दरवाज़ा खोला और बोली —
भाभी, आज तो घर का माहौल ही बदल जाएगा!
संस्कृति हल्की मुस्कान दे ही रही थी कि तभी दरवाज़ा तेज़ी से खुला। कार्तिक अंदर आया। वो शायद भागते हुए आया था।
उसकी साँसें तेज़ थीं… आँखों में बेचैनी भी और खुशी भी।
उसने कमरे में चारों तरफ देखा।
कार्तिक बोला -
संस्कृति…!
संस्कृति सामने खड़ी थी। दोनों की नज़रें मिलीं। एक पल के लिए जैसे समय रुक गया। अगले ही पल कार्तिक तेजी से उसके पास आया और उसे कसकर अपनी बाँहों में भर लिया। संस्कृति चौंक गई… लेकिन अगले ही पल उसने भी उसे पकड़ लिया।
कार्तिक की आवाज़ धीमी और भावुक थी —
कार्तिक बोला -
तुम ठीक हो ना…?
संस्कृति ने उसके सीने में चेहरा छुपाते हुए कहा —
हाँ… अब सब ठीक है।
कार्तिक ने धीरे से उसके माथे को चूमा। उसकी आँखों में नमी थी।
उधर…मोहन ऑफिस से लौटकर जैसे ही अंदर आया, पारो ने उसे पकड़ लिया।
पारो (उत्साह से) बोली -
पतिदेव… आपको पता है क्या हुआ?
मोहन चौंका।
मोहन बोला -
क्या हुआ?
पारो मुस्कुराई और बोली —
आप चाचा बनने वाले हो!
और मैं चाची।
बस इतना सुनना था…मोहन एकदम उछल पड़ा।
मोहन बोला -
क्या… सच में!!!
वो खुशी में पागलों की तरह नाचने लगा। कभी सोफे पर चढ़ता… कभी हाथ हवा में उठाकर घूमने लगता।
मोहन (चिल्लाते हुए) बोला -
मैं चाचा बनने वाला हूँ!!!
पारो हँसते-हँसते दोहरी हो गई।
तभी उसने शरारती अंदाज़ में कहा —
अब इस घर में सबसे बड़ा बॉस आने वाला है।
मोहन तुरंत बोला —
हाँ! और हम सब उसके नौकर बनेंगे।
चारों हँस पड़े। उधर कार्तिक अभी भी संस्कृति का हाथ थामे खड़ा था। उसने धीरे से संस्कृति के पेट पर हाथ रखा। उसकी आवाज़ बहुत नरम थी —
कार्तिक बोला -
इतने सालों की लड़ाई के बाद…भगवान ने हमें सबसे बड़ी खुशी दी है।
संस्कृति की आँखों में आँसू आ गए।
संस्कृति बोली -
शायद… ये हमारी नई शुरुआत है।
खिड़की के बाहर बर्फ गिर रही थी। और घर के अंदर…चार लोगों की हँसी के बीच एक नई ज़िंदगी की कहानी शुरू हो चुकी थी। ❤️
घर में अब एक नई हलचल शुरू हो गई थी। खुशखबरी के बाद जैसे चारों की जिंदगी का केंद्र सिर्फ संस्कृति बन गई थी।
सुबह का समय था। संस्कृति किचन में खड़ी चाय बनाने की कोशिश कर रही थी।
तभी पीछे से कार्तिक की आवाज़ आई —
कार्तिक (हल्के गुस्से में) बोला -
संस्कृति… ये तुम क्या कर रही हो?
संस्कृति चौंक गई।
संस्कृति बोली -
चाय बना रही हूँ… और क्या?
कार्तिक तुरंत उसके पास आया और उसके हाथ से केतली ले ली।
कार्तिक बोला -
तुम्हें आराम करना चाहिए। डॉक्टर ने कहा था ना?
संस्कृति ने आँखें घुमाईं।
संस्कृति बोली -
कार्तिक जी… मैं बीमार नहीं हूँ, प्रेग्नेंट हूँ।
तभी पीछे से मोहन की आवाज़ गूँजी —
बिलकुल सही कहा भाभी…आप बीमार नहीं हो… इसलिए आपको और ज्यादा आराम चाहिए!
संस्कृति ने पीछे मुड़कर देखा। मोहन दोनों हाथ कमर पर रखे खड़ा था… जैसे कोई बड़ा डॉक्टर हो।
संस्कृति (हँसते हुए) बोली -
आप कब से डॉक्टर बन गए देवर जी?
मोहन तुरंत बोला —
जब से मुझे पता चला कि मैं चाचा बनने वाला हूँ।
तभी पारो भी किचन में आ गई। उसने हाथ में सब्जियों की टोकरी पकड़ रखी थी।
पारो बोली -
भाभी, आप बाहर बैठो।
आज से किचन की ड्यूटी मेरी।
संस्कृति ने सिर पकड़ लिया।
संस्कृति बोली -
अरे भगवान… ये लोग मुझे इंसान समझेंगे भी या नहीं?
मोहन तुरंत बोला —
नहीं! अब आप हमारे घर की VIP हो।
कार्तिक ने भी सिर हिलाया।
कार्तिक बोला -
और VIP लोग किचन में काम नहीं करते।
संस्कृति हँस पड़ी। वो जाकर सोफे पर बैठ गई। लेकिन मुश्किल यहीं खत्म नहीं हुई। थोड़ी देर बाद वो उठकर पानी लेने लगी।
मोहन तुरंत दौड़ता हुआ आया।
मोहन बोला -
रुको भाभी! आपको उठने की जरूरत नहीं।
उसने तुरंत गिलास में पानी भरकर उसके हाथ में दे दिया। संस्कृति ने भौंहें चढ़ाईं।
संस्कृति बोली -
इतनी भी नाजुक नहीं हूँ मैं।
तभी पारो हँसते हुए बोली -
भाभी, मुझे तो लग रहा है इस बच्चे के आने से पहले ही घर में चार पागल हो गए हैं।
मोहन तुरंत बोला —
चार नहीं… पाँच!
सब चौंककर उसे देखने लगे।
कार्तिक बोला -
पाँच?
मोहन मुस्कुराया।
मोहन बोला -
हाँ… पाँच। एक आने वाला है ना।
कुछ पल के लिए कमरे में सन्नाटा रहा…फिर चारों जोर से हँस पड़े।
कार्तिक ने प्यार से संस्कृति की ओर देखा।
कार्तिक (धीरे से) बोला -
सच में…हमारी जिंदगी कितनी बदल गई है ना?
संस्कृति ने मुस्कुराकर उसका हाथ पकड़ लिया।
संस्कृति बोली -
हाँ…अब हमारी कहानी में एक नया किरदार आने वाला है।
खिड़की के बाहर बर्फ गिर रही थी…और अंदर एक छोटे से मेहमान का इंतजार शुरू हो चुका था। ❤️