Jhakhmo ki Shaadi in Hindi Women Focused by Sonam Brijwasi books and stories PDF | ज़ख्मों की शादी - 19

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ज़ख्मों की शादी - 19

सृष्टि शॉवर के नीचे फर्श पर बैठी थी। पानी लगातार उसके सिर, कंधों और शरीर पर गिर रहा था। पर उसे कोई फर्क नहीं पड़ रहा था। वो बिल्कुल खामोश थी। इतनी खामोश कि जैसे उसके भीतर की सारी आवाज़ें थककर बैठ गई हों। उसकी आँखें खुली थीं…पर उनमें कोई चमक नहीं थी।

वो बोली - 
क्यों हुआ ये सब? 
मेरी क्या गलती थी?

हर गिरती हुई बूंद के साथ उसे फिर वही रातें याद आने लगीं—
कबीर का गुस्सा…उसकी सख्त पकड़…सृष्टि का डर…उसकी बेबसी। उसका शरीर अनजाने में ही सिकुड़ने लगा। उसने अपने हाथों से खुद को ढक लिया, जैसे कोई खुद को बचाने की कोशिश करता है जब उसे लगता है कि फिर वही सब दोहराया जाएगा।
उसकी सांसें तेज हो गईं। दिल बेतरतीब धड़कने लगा। डर सिर्फ यादों में नहीं था, वो उसके शरीर में बस चुका था।

वो बोली - 
कहीं फिर से…
नहीं नहीं, ये ...ये सब फिर से नहीं...।

ये ख्याल आते ही उसने खुद को और कसकर पकड़ लिया।
उसे समझ नहीं आ रहा था, वो अपने ही घर में सुरक्षित क्यों महसूस नहीं कर पा रही? वो अपने ही पति से क्यों डर रही है?

बाहर कमरे में कबीर अभी भी खड़ा था। उसकी उँगलियाँ मुट्ठी में बंधी थीं। सृष्टि के शब्द—“हैवानियत…”
उसके कानों में गूंज रहे थे।
पहली बार उसे एहसास होने लगा कि गुस्से में कही गई बात
सिर्फ आरोप नहीं थी, वो सृष्टि का जख्म था। बाथरूम के भीतर
सृष्टि पानी के नीचे बैठी रही। ना रो रही थी,ना चिल्ला रही थी।
बस…टूटी हुई थी।

शॉवर के नीचे बैठी सृष्टि की सिसकियाँ अचानक तेज़ हो गईं।
अब वो सिर्फ़ खामोश नहीं थी, वो बुरी तरह डर चुकी थी। उसकी सांसें टूट रही थीं। हाथ काँप रहे थे। पानी उसके आँसुओं में मिल रहा था…पर दर्द कम नहीं हो रहा था।
उसने काँपते हुए अपनी बाँहों को देखा। कंधे पर उंगलियों के गहरे निशान। कलाई पर नाखूनों के हल्के-लाल दाग।

वो यादें फिर से ताज़ा हो गईं—
जब गुस्से में पकड़ ज़रूरत से ज़्यादा कस जाती थी।
जब उसकी “ना” दीवारों में दबकर रह जाती थी।
सृष्टि ने खुद को और समेट लिया। घुटनों को सीने से लगा लिया।
उसके शरीर पर जो निशान थे, वो दिखाई दे रहे थे। पर दिल पर जो थे…वो उससे कहीं गहरे थे।

वो सोच रही थी—
क्या सच में मैं उसकी पत्नी हूँ…या बस उसकी जिद?
क्या मेरा डर कभी खत्म होगा?

हर सिसकी के साथ उसका सीना उठता-गिरता रहा। बाहर कमरे में
कबीर ने बाथरूम से आती आवाज़ सुनी। उसके कदम दरवाज़े की ओर बढ़े…फिर रुक गए।
पहली बार उसे एहसास हुआ, शायद वह गुस्से में इतना अंधा हो गया था कि उसे सृष्टि का डर दिखाई ही नहीं दिया।

दरवाज़े के उस पार एक औरत बैठी थी जो सिर्फ़ नाराज़ नहीं थी—
वो अंदर से टूट चुकी थी। और दरवाज़े के इस पार एक आदमी खड़ा था जिसे पहली बार समझ आ रहा था कि अधिकार और प्यार में फर्क होता है। बारिश अब भी हो रही थी। लेकिन इस घर के भीतर तूफ़ान कहीं ज़्यादा तेज़ था।

बाथरूम के अंदर सृष्टि की सिसकियाँ अब साफ़ सुनाई दे रही थीं।
दरवाज़े के बाहर कबीर खड़ा था। उसका हाथ दरवाज़े तक गया…
पर उसने खटखटाया नहीं।

उसके कानों में वही शब्द गूंज रहे थे—
“हैवानियत…”

उसने पहली बार अपने गुस्से को याद किया। अपनी ज़िद को।
अपनी वो रातें…जब उसने सृष्टि के डर को नहीं समझा।
अंदर—
सृष्टि अब भी फर्श पर बैठी थी। सिसकियाँ और तेज़ हो गई थीं।
वो अपने कंधों को ढक रही थी, जैसे खुद को किसी अनदेखे खतरे से बचा रही हो।
अचानक…दरवाज़े पर हल्की सी दस्तक हुई। बहुत हल्की।
जैसे कोई ज़ोर लगाने की हिम्मत न कर पा रहा हो।

कबीर बोला - 
सृष्टि…

कबीर की आवाज़ पहली बार नरम थी। गुस्से से खाली।

वो बोला - 
दरवाज़ा खोलो…मैं… मैं बस बात करना चाहता हूँ।

अंदर कुछ पल सन्नाटा रहा।

फिर सृष्टि की टूटी हुई आवाज़ आई—
Please… अभी नहीं…मुझे...मुझे अकेला छोड़ दीजिए।

उसकी आवाज़ में डर था। और थकान। कबीर की आँखें बंद हो गईं। उसने दरवाज़े से सिर टिका दिया। 

पहली बार उसने खुद से पूछा—
क्या मैंने सच में उसे इतना डरा दिया?

कुछ देर बाद पानी बंद हो गया। दरवाज़ा धीरे से खुला।
सृष्टि बाहर आई, चेहरा सूजा हुआ, आँखें लाल।
शरीर पर तोलिया लिपटी थी। और बदन पर हल्के नीले-लाल निशान। कबीर की नज़र उन निशानों पर पड़ी। उसकी साँस अटक गई। वो कुछ बोल नहीं पाया। सृष्टि बिना उसकी तरफ देखे , अलमारी की तरफ गई। साड़ी पहन ली।  फिर चुपचाप बिस्तर की तरफ चली गई। धीरे से लेट गई। कबीर वहीं खड़ा रहा।
उसने महसूस किया—
आज पहली बार वो सृष्टि को खोने से डर रहा था। सिर्फ़ उसके जाने से नहीं… बल्कि उसके दिल से गिर जाने से।

कमरे में गहरा सन्नाटा था। दोनों एक ही घर में थे, पर दोनों के बीच
अब सिर्फ़ दूरी नहीं थी…एक सच्चाई खड़ी थी।
सृष्टि बिस्तर पर लेटी थी। वो रोना चाहती थी…जी भरकर रोना चाहती थी। पर आँसू जैसे अब थक चुके थे।

उसके मन में बस एक ही बात घूम रही थी—
ये शादी… क्या सच में सिर्फ़ ज़ख्मों की कहानी बन गई है?
क्या ये सच में जख्मों की शादी है?

पीठ पर पड़े हल्के नीले निशान अब भी ताज़ा थे। गर्दन के पास उंगलियों की पकड़ के निशान साफ़ दिख रहे थे। कबीर कुछ कदम दूर खड़ा था। उसकी नज़र अनजाने में उन निशानों पर टिक गई।

और अचानक—
उसके अंदर कुछ टूट गया। उसे अपनी ही हरकतें याद आने लगीं।
वो रातें…जब उसका गुस्सा हावी हो जाता था। जब उसने सृष्टि की आँखों में डर देखा था,  पर खुद को रोक नहीं पाया था।
उसे याद आया—
सृष्टि की आँसू से भरी आँखें। उसका बार-बार पीछे धकेलना।
उसका हाथ-पैर मारना। उसका “रुक जाइए…” कहना।
और वो…सुनता नहीं था। कबीर की साँस भारी हो गई।
पहली बार उसे अपनी ताक़त पर शर्म आई।

उसने खुद से पूछा—
क्या मैं सच में उससे प्यार करता था?
या सिर्फ़ उसे अपना समझकर उसकी मर्यादा भूल गया?

उसके सीने में दर्द उठा। वो गुस्सा नहीं था, वो पछतावा था।
सृष्टि करवट लेकर लेटी थी। पीठ उसकी तरफ। वो खुद को समेटे हुए थी, जैसे अब भी किसी हमले से बच रही हो।
कबीर की आँखों में नमी आ गई। उसे खुद से नफरत हो रही थी।
वो धीरे से बिस्तर के किनारे बैठ गया। पर इस बार उसने उसे छुआ नहीं।

सिर्फ़ धीमे से बोला—
सृष्टि…मैं… गलत था।

उसकी आवाज़ में पहली बार अहंकार नहीं था। सिर्फ़ टूटन थी।
कमरे में सन्नाटा था। पर उस सन्नाटे में एक आदमी अपने किए का सामना कर रहा था…और एक औरत अपने जख्मों के साथ जीना सीख रही थी।

क्या कबीर सृष्टि से माफी मांगेगा?
क्या सृष्टि उसकी माफ़ी सुनेगी?
या ये देर से आया पछतावा बहुत छोटा साबित होगा…?

To be continued.....

Aapko kya lagta hai -
Shristi is trauma se nikalegi ya nahin?
Kya uski halat ka jimmedar kabir Hai?

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