Kya Sab thik he - 3 in Hindi Moral Stories by Narayan Menariya books and stories PDF | क्या सब ठीक है - 3

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क्या सब ठीक है - 3

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क्या सब ठीक है?

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यह किताब उन अनकहे सवालों और अधूरी बातों का संग्रह है, जिन्हें हम अक्सर अपने अंदर दबाकर जीते रहते हैं।
हर कहानी हमारे रोज़मर्रा के जीवन से जुड़ी एक सच्चाई को सामने लाती है - रिश्तों की खामोशी, दूरियाँ, और वो एहसास जिन्हें हम शब्द नहीं दे पाते।

यहाँ आपको कोई हीरो या परफेक्ट अंत नहीं मिलेगा,
बल्कि ऐसे किरदार मिलेंगे जो बिल्कुल हमारी तरह हैं - थोड़े उलझे हुए, थोड़े थके हुए, पर फिर भी आगे बढ़ते हुए।

यह कहानियाँ आपको सिर्फ़ पढ़ने के लिए नहीं, बल्कि खुद को महसूस करने के लिए लिखी गई हैं।
शायद कहीं न कहीं, हर पन्ने पर आपको अपनी ही ज़िंदगी की झलक मिले।

क्योंकि सच तो यही है - हम सब बाहर से ठीक दिखते हैं,
पर अंदर कहीं न कहीं एक सवाल हमेशा रहता है…
क्या सब ठीक है?

 


कहानी: "Unseen"


कॉलेज का lunch break था। कैंटीन हमेशा की तरह भरी हुई थी - हँसी, शोर, दोस्तों के ग्रुप और उनके बीच चलती बेफिक्र बातें। हर टेबल पर लोग थे, हर टेबल पर कोई ना कोई किसी के साथ था। उस पूरे माहौल में एक अजीब सी आसानी थी… जैसे हर किसी को पता हो कि उसे कहाँ बैठना है, किसके साथ बैठना है।

वो कुछ सेकंड तक वहीं खड़ा रहा। नज़रें इधर-उधर घूमीं - जैसे कोई जगह ढूँढ रही हों… या शायद कोई ऐसी जगह जहाँ उसे कोई notice न करे। फिर उसे कैंटीन के कोने में एक खाली टेबल दिखी। वो बिना किसी से नज़र मिलाए वहाँ जाकर बैठ गया।

उसने बैग खोला, छोटा सा plastic का tiffin बाहर निकाला और एक बार हल्के से आसपास देखा। कोई पहचान वाला तो नहीं है। फिर उसने जल्दी से tiffin खोला और जो कुछ भी सुबह बनाकर लाया था, उसे बिना रुके खाने लगा। स्वाद कैसा है, क्या है - इन सब चीज़ों का कोई मतलब नहीं था। बस एक ही urgency थी - खाना जल्दी खत्म करना है, इससे पहले कि कोई आकर पूछे "क्या लाया है?" और उसे जवाब देना पड़े।

 

ऐसा नहीं था कि उसने कभी दोस्तों के साथ बैठने की कोशिश नहीं की। शुरू में की थी। लेकिन हर बार उसे लगता था कि वो उस flow का हिस्सा नहीं बन पा रहा। बातें चलती रहतीं - plans, outings, अचानक बने decisions - "चल आज बाहर चलते हैं", "कल movie देखते हैं"… और वो बस सुनता रहता। क्योंकि उसके लिए ये सब इतना simple नहीं था। वो ना नहीं कहता था… लेकिन हाँ भी नहीं कह पाता था। इसलिए उसने बीच का रास्ता चुन लिया - खुद ही दूर हो जाना।

 

कॉलेज के दिनों में वो घर से दूर एक छोटे से कमरे में रहता था। सुबह उठकर खुद खाना बनाता, फिर उसी को tiffin में डालकर कॉलेज ले आता। कई बार खाना ठीक बनता, कई बार नहीं… लेकिन उसने कभी किसी को बताया नहीं। क्योंकि उसे लगता था - अगर लोग जानेंगे, तो या तो sympathy देंगे… या सवाल पूछेंगे। और उसे दोनों में से कुछ भी नहीं चाहिए था।

 

Lunch break उसके लिए कभी break नहीं रहा। वो बस एक routine था - corner की उस टेबल पर बैठना, जल्दी-जल्दी खाना और बिना किसी से नज़र मिलाए वापस निकल जाना। जैसे वो वहाँ मौजूद होकर भी… वहाँ का हिस्सा नहीं था।

शाम को जब वो अपने कमरे में लौटता, तब थोड़ी देर के लिए phone उठाता। Facebook या Instagram खोलता। कुछ ही सेकंड में timeline भर जाती - दोस्तों की photos, कहीं घूमने गए हुए, हँसते हुए, group pictures… हर photo में एक चीज़ common थी - साथ होना।

वो उन photos को कुछ देर तक देखता रहता। और हर बार अंदर कुछ हल्का सा खिंचता था। वो ये मानने से बचता था… लेकिन सच ये था कि उसे बुरा लगता था। थोड़ा jealousy भी होती थी। ऐसा नहीं कि वो उनके लिए खुश नहीं था - लेकिन अपने लिए क्या feel करे, ये उसे समझ नहीं आता था।

वो भी घूमना चाहता था। वो भी उन photos का हिस्सा बनना चाहता था। लेकिन वो जानता था कि वो नहीं जा सकता। और शायद उससे भी ज़्यादा - वो ये जानता था कि उसे invite भी नहीं किया जाएगा। धीरे-धीरे उसने scroll करना कम कर दिया। फिर almost बंद कर दिया।

 

लोगों को लगा वो busy हो गया है। लेकिन सच ये था - वो खुद को बचा रहा था।

क्योंकि हर बार screen पर photos दिखती थीं…
लेकिन उसे सिर्फ photos नहीं दिखती थीं।

उसे दिखता था - वो क्या miss कर रहा है।

 


उसके बाद उसका routine और simple हो गया - college, room, पढ़ाई। उसने distractions से दूरी बना ली। ये कोई inspirational decision नहीं था, बस एक practical choice थी। अगर वो बार-बार compare करता रहता, तो शायद आगे बढ़ ही नहीं पाता।

साल धीरे-धीरे निकल गए। कुछ भी dramatic नहीं बदला - same room, same silence, same struggle। लेकिन एक चीज़ कभी नहीं रुकी - उसकी कोशिश। बिना किसी को बताए, बिना किसी validation के, वो बस रोज़ अपना काम करता रहा।

Final year आया तो placement का time शुरू हुआ। बाकी लोग tension में थे, वो भी था… लेकिन उसके अंदर एक अलग तरह की clarity थी। उसने पहले ही बहुत कुछ ignore करना सीख लिया था।

Interview के दिन उसने कोई extra confidence show नहीं किया। बस जितना आता था, उतना honestly बोला। कोई polish नहीं, कोई दिखावा नहीं।

 

कुछ दिनों बाद result आया - उसका selection हो गया था।

उस दिन भी कुछ खास नहीं हुआ। ना celebration, ना कोई बड़ी खुशी का display। वो बस अपने कमरे में बैठा रहा कुछ देर तक। ये जीत loud नहीं थी… लेकिन सच्ची थी।

 

काफी समय बाद उसने phone उठाया। Social media खोला। वही लोग, वही posts, वही smiles… सब कुछ वैसा ही था।

वो कुछ सेकंड तक देखता रहा।

फिर उसने quietly app बंद कर दिया।

 


क्योंकि अब उसे समझ आ गया था - हर चीज़ देखना ज़रूरी नहीं होता।

कुछ चीज़ें न देखना ही बेहतर होता है…
क्योंकि हर बार देखने के बाद
उसे सिर्फ photos नहीं दिखती थीं -

उसे अपनी कमी दिखती थी।


और शायद…
खुद को बचाने का उसका यही तरीका था।