क्या सब ठीक है?
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यह किताब उन अनकहे सवालों और अधूरी बातों का संग्रह है, जिन्हें हम अक्सर अपने अंदर दबाकर जीते रहते हैं।
हर कहानी हमारे रोज़मर्रा के जीवन से जुड़ी एक सच्चाई को सामने लाती है - रिश्तों की खामोशी, दूरियाँ, और वो एहसास जिन्हें हम शब्द नहीं दे पाते।
यहाँ आपको कोई हीरो या परफेक्ट अंत नहीं मिलेगा,
बल्कि ऐसे किरदार मिलेंगे जो बिल्कुल हमारी तरह हैं - थोड़े उलझे हुए, थोड़े थके हुए, पर फिर भी आगे बढ़ते हुए।
यह कहानियाँ आपको सिर्फ़ पढ़ने के लिए नहीं, बल्कि खुद को महसूस करने के लिए लिखी गई हैं।
शायद कहीं न कहीं, हर पन्ने पर आपको अपनी ही ज़िंदगी की झलक मिले।
क्योंकि सच तो यही है - हम सब बाहर से ठीक दिखते हैं,
पर अंदर कहीं न कहीं एक सवाल हमेशा रहता है…
क्या सब ठीक है?
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कहानी 2: Billable
रात के 11:48 बजे थे।
Office almost खाली हो चुका था, लेकिन रोहित अभी भी अपनी कुर्सी पर बैठा था।
स्क्रीन पर Jira का dashboard खुला था -
टिकट्स की लंबी लिस्ट।
हर टिकट के साथ एक छोटा सा नंबर लिखा था - "Story Points"
और हर story point के पीछे एक अदृश्य शब्द -
"Billable"
सुबह 9:30 की daily standup में Manager ने कहा था:
"Guys, we are falling behind. Client is not happy."
रोहित ने mic mute रखा।
वो जानता था - client कभी happy नहीं होता।
उसकी टीम में 8 लोग थे।
एक ने पिछले हफ्ते resign किया था।
दो लोग quietly job search कर रहे थे।
बाकी सब… बस survive कर रहे थे।
रोहित भी।
उसने clock देखी - 10:30 PM।
Slack पर message आया:
"Hey Rohit, can you quickly check one thing?"
Message के end में "quickly" लिखा था।
लेकिन रोहित जानता था -
Corporate में “quickly” का मतलब होता है
"तुम सोने का plan cancel कर दो।"
उसने reply किया -
"Sure."
Laptop की रोशनी में उसका चेहरा थका हुआ लग रहा था।
उसने code खोला।
Bug वही था… जो पिछले 3 दिन से fix करने की कोशिश कर रहा था।
हर बार fix लगता… फिर break हो जाता।
जैसे उसकी खुद की life।
रात 11:30 बजे तक वो bug fix नहीं हुआ।
Manager का call आया।
"Rohit, what’s the status?"
उसने कहा -
"Still working on it."
Manager ने sigh किया -
"Client escalation है, yaar. We need to close this tonight."
"Tonight."
ये शब्द रोहित के लिए नया नहीं था।
उसने system mute किया… और कुछ सेकंड के लिए आँखें बंद कीं।
दिमाग में एक अजीब सा सवाल आया -
“अगर मैं अभी उठकर चला जाऊं… तो क्या होगा?”
उत्तर simple था -
कुछ नहीं।
कल कोई और ये ticket उठा लेगा।
Project चलती रहेगी।
Company को फर्क नहीं पड़ेगा।
लेकिन EMI?
Rent?
Family expectations?
उनको फर्क पड़ेगा।
उसने आँखें खोलीं।
और फिर से code लिखना शुरू किया।
सुबह के 3:10 बजे bug fix हो गया।
उसने Slack पर message किया -
"Fixed. Please verify."
कोई reply नहीं आया।
सब सो रहे थे।
वो chair पर पीछे झुक गया।
Room में silence था।
उसने सोचा -
"मैं ये सब किसके लिए कर रहा हूँ?"
सुबह 9:30 फिर वही standup।
Manager ने कहा -
"Good job, Rohit. Bug is fixed."
बस।
ना appreciation, ना relief।
अगला sentence -
"Now we have another high priority issue."
उस दिन रोहित ने पहली बार महसूस किया -
Corporate में तुम्हारी मेहनत का lifetime… एक दिन भी नहीं होता।
लंच टाइम पर वो cafeteria गया।
चारों तरफ लोग थे -
हँसते हुए, बात करते हुए।
LinkedIn वाली life।
एक table पर बैठकर उसने phone खोला।
Instagram scroll किया।
दोस्त Goa trip पर थे।
किसी की engagement हुई थी।
किसी ने "New Job, Grateful" पोस्ट किया था।
उसने phone बंद कर दिया।
उसके पास कोई story नहीं थी डालने के लिए।
शाम को Manager फिर उसके पास आया।
"Rohit, can you stretch a bit today?"
उसने पूछा -
“Till what time?”
Manager हँसकर बोला -
"Let’s see."
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"Let’s see."
Corporate का सबसे dangerous phrase।
रात फिर 12 बज गए।
फिर वही desk।
फिर वही screen।
इस बार bug नहीं था।
बस एक feature था -
जिसका कोई real impact नहीं था।
Client को अच्छा लगे, बस इसलिए।
रात के 2 बजे उसने code commit किया।
और पहली बार… उसने system बंद कर दिया।
बिना किसी को बताए।
घर पहुँचकर उसने mirror में खुद को देखा।
आँखों के नीचे dark circles थे।
चेहरे पर थकान थी।
उसने खुद से पूछा -
"अगर मैं कल भी यही करता रहा… तो 5 साल बाद मैं कौन होऊँगा?"
Answer डरावना था।
अगले दिन उसने HR portal खोला।
Resignation वाला page open किया।
Cursor "Submit" बटन पर था।
लेकिन उसने click नहीं किया।
उसने page बंद कर दिया।
और फिर से Jira खोल लिया।
क्योंकि सच ये है -
Corporate तुम्हें सिर्फ काम से नहीं बाँधता…
वो तुम्हें डर से बाँधता है।
और रोहित अभी भी…
डर से ज़्यादा strong नहीं था।
उस रात फिर 11:48 बजे थे।
वो फिर उसी desk पर बैठा था।
और screen पर फिर वही शब्द चमक रहा था -
"Billable"