भाग 5: अनंत प्यास
ठीक है…
अब कहानी अपने अंतिम और सबसे खतरनाक मोड़ पर पहुँच चुकी थी।
यहाँ से या तो सब खत्म होने वाला था…
या फिर…
कुछ ऐसा शुरू होने वाला था जो कभी खत्म नहीं होगा।
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हवेली के अंदर अब सिर्फ सन्नाटा नहीं था…
बल्कि एक जिंदा डर था।
हवा भारी हो चुकी थी—
हर सांस लेना मुश्किल लग रहा था।
दीवारें…
धीरे-धीरे सिकुड़ती हुई महसूस हो रही थीं।
जैसे वो सब कुछ अपने अंदर कैद करना चाहती हों।
फर्श—
ठंडा…
लेकिन अजीब तरह से धड़कता हुआ।
जैसे उसके अंदर अनगिनत चीखें दबाई गई हों।
पूरा माहौल…
अब इंसानों के लिए नहीं बचा था।
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राहुल धीरे-धीरे खड़ा हुआ।
उसकी चाल पहले जैसी नहीं थी।
उसकी आँखें—
अब लाल थीं।
गहरी… खाली… और प्यास से भरी हुई।
उसने अपने हाथों को देखा।
वे कांप नहीं रहे थे।
बल्कि…
अजीब तरह से स्थिर थे।
जैसे अब वो किसी और के नियंत्रण में हों।
> “ये… क्या हो रहा है…”
उसने धीमे से कहा।
लेकिन—
उसकी आवाज अब उसकी अपनी नहीं थी।
वो भारी थी… और ठंडी।
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पीछे खड़ी औरत मुस्कुराई।
वही…
जिसे लोग कभी “काली माँ” कहते थे…
लेकिन वो देवी नहीं थी।
वो एक शापित आत्मा थी।
एक भूत…
जिसे अब गांव वाले एक नए नाम से जानते थे—
> “कुएँ वाली औरत…”
उसकी मुस्कान और गहरी हो गई।
> “तुम्हारा खून… अब जाग गया है…”
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राहुल ने धीरे-धीरे सिर उठाया।
उसकी आँखों में यादों की परछाइयाँ उभरने लगीं।
और फिर—
अचानक—
उसने अपने सिर को पकड़ लिया।
“नहीं… मैं ऐसा नहीं हूँ…”
उसकी आवाज टूट रही थी।
लेकिन…
उसके अंदर से एक और आवाज आई।
गहरी… अंधेरी…
> “तुम हमेशा से ऐसे ही थे…”
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राहुल की आँखों के सामने सब साफ होने लगा।
1923…
वही हवेली…
वही कुआँ…
और…
वही आदमी।
जमींदार।
उसका चेहरा—
निर्दयता से भरा हुआ।
आँखों में लालच…
और दिल में कोई दया नहीं।
वही आदमी जिसने—
एक निर्दोष औरत को कुएँ में मरने के लिए फेंक दिया था।
लेकिन…
उस रात कहानी खत्म नहीं हुई थी।
वो औरत मरी नहीं।
वो बन गई—
“कुएँ वाली औरत…”
एक ऐसी आत्मा…
जिसकी प्यास कभी खत्म नहीं हुई।
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और राहुल…
वो उसी जमींदार का वंशज था।
उसके खून में वही अंधेरा बह रहा था।
वही प्यास…
जो कभी नहीं बुझती।
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कुएँ वाली औरत उसके पास आई।
उसने राहुल के चेहरे को गौर से देखा।
जैसे वो अपने ही अतीत को देख रही हो।
> “तुम वही हो…
लेकिन अब… तुम भी मेरे जैसे हो…”
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राहुल चुप खड़ा था।
उसके अंदर—
दो दुनियाएँ टकरा रही थीं।
एक…
जो इंसान थी।
और दूसरी…
जो अंधेरे में जन्मी थी।
एक आवाज कह रही थी—
“भाग जाओ… अभी भी समय है…”
लेकिन दूसरी आवाज—
ज्यादा ताकतवर थी।
> “खत्म कर दो…
सब खत्म कर दो…”
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राहुल ने धीरे-धीरे कुएँ की तरफ देखा।
लाल रोशनी अब पूरी हवेली में फैल चुकी थी।
कुएँ के अंदर—
अनगिनत परछाइयाँ हिल रही थीं।
जैसे वो सब उसका इंतजार कर रही हों।
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कुएँ वाली औरत ने कहा—
> “हर प्यास…
यहीं खत्म होती है…”
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राहुल ने एक लंबी सांस ली।
उसकी आँखों में एक अजीब सी शांति आ गई।
और फिर—
वो धीरे-धीरे कुएँ की तरफ बढ़ा।
हर कदम के साथ—
जैसे वो इंसानियत से दूर होता जा रहा था।
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उसने औरत की तरफ देखा।
और…
हल्की सी मुस्कान दी।
> “नहीं…”
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औरत की आँखें सिकुड़ गईं।
“क्या?”
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राहुल की आवाज अब पूरी तरह बदल चुकी थी—
गहरी… ठंडी…
> “ये प्यास…
अब मेरी है…”
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और उसी पल—
वो कुएँ में कूद गया।
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एक जोरदार चीख गूंजी।
कुएँ से लाल रोशनी आसमान तक फैल गई।
हवेली हिलने लगी।
दीवारें टूटने लगीं।
और फिर—
सब कुछ शांत।
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कुछ सेकंड बाद…
कुएँ के अंदर हलचल हुई।
और धीरे-धीरे—
एक परछाई बाहर आई।
राहुल।
लेकिन अब…
वो राहुल नहीं था।
उसकी आँखें—
खून जैसी लाल थीं।
उसके होंठ—
ताजे खून से सने हुए थे।
और उसके चेहरे पर—
एक डरावनी शांति थी।
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कुएँ वाली औरत ने उसे देखा।
और पहली बार—
वो चुप हो गई।
जैसे…
उसने कुछ ऐसा बना दिया था…
जिसे वो खुद भी नहीं समझ पा रही थी।
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राहुल ने आसमान की तरफ देखा।
पूर्णिमा का चाँद—
अब उसे बुला रहा था।
वो हल्का सा मुस्कुराया।
और धीरे से बोला—
> “अब… हर पूर्णिमा…”
उसकी आवाज हवेली में गूंज उठी—
> “मेरी बारी होगी…”
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कुछ समय बाद…
शहर।
एक अस्पताल।
राहुल अब वहाँ काम करता दिखता है।
साफ कपड़े…
शांत चेहरा…
एक सामान्य इंसान।
वो एक मरीज के पास बैठा है।
मुस्कुरा रहा है।
मरीज भी मुस्कुरा रहा है।
सब कुछ सामान्य लगता है।
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फिर…
रात होती है।
अस्पताल की लाइट्स धीमी हो जाती हैं।
राहुल धीरे-धीरे उठता है।
कमरे से बाहर निकलता है।
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अंधेरे में—
उसकी आँखें चमकती हैं।
लाल।
भूखी।
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और दूर कहीं…
एक चीख गूंजती है।
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🩸 समाप्त