भाग 1: हवेली की पुकार
राहुल ने कार का इंजन बंद किया।
कुछ सेकंड तक सिर्फ सन्नाटा था। फिर… दूर कहीं कुत्तों के भौंकने की आवाज गूँजी, जो अचानक ही थम गई, जैसे किसी ने उनका गला दबा दिया हो।
उसने धीरे-धीरे हवेली की ओर देखा।
पुरानी हवेली—टूटी-फूटी, जर्जर, और समय की मार से झुकी हुई। चाँदनी रात में भी उसका रंग काला ही लग रहा था। खिड़कियों पर जंग लगे लोहे के शटर हल्की हवा में चरमराते हुए हिल रहे थे।
हवा में एक अजीब सी गंध थी।
सड़ी हुई मिट्टी… और कुछ और।
कुछ… खून जैसा।
राहुल ने गहरी साँस ली।
“ये बस एक पुरानी इमारत है,” उसने खुद से कहा।
लेकिन उसकी आवाज में अब पहले जैसी आत्मविश्वास नहीं था।
गांव के बुजुर्ग की आवाज उसके दिमाग में गूंज उठी—
> “बाबू… उस हवेली में मत जाना। खासकर उस कुएँ के पास मत जाना। वो रात में जागती है…”
राहुल ने सिर झटका।
“ये सब अंधविश्वास है,” उसने खुद को भरोसा दिलाया।
“मैं एक डॉक्टर हूँ। भूतों में विश्वास नहीं करता।”
उसने कार से अपना बैग निकाला और हवेली की तरफ बढ़ गया।
जैसे ही उसने मुख्य दरवाजे तक कदम रखा, एक ठंडी हवा का झोंका आया।
दरवाजे की लकड़ी हल्की सी कराह उठी।
ताला लगा हुआ था।
राहुल ने अपनी जेब से चाबी निकाली—जो उसके दादा की थी।
जैसे ही चाबी लॉक में डाली…
“क्लिक…”
दरवाजा खुद-ब-खुद खुल गया।
राहुल कुछ पल के लिए रुक गया।
“ये… अपने आप खुला?”
उसने हल्का सा धक्का दिया।
दरवाजा धीरे-धीरे चरमराते हुए पूरा खुल गया—अंदर घुप्प अंधेरा था।
एक अजीब सी खामोशी।
जैसे घर नहीं… कब्र हो।
राहुल ने टॉर्च निकाली और अंदर कदम रखा।
जैसे ही उसने लाइट ऑन की, पीली रोशनी दीवारों पर फैली।
धूल के कण हवा में तैर रहे थे।
फर्श पर पैरों के निशान—पुराने, धुंधले।
दीवारों पर पेंटिंग्स टंगी थीं।
औरत के चेहरे… एक ही चेहरा बार-बार।
उसकी आँखें लाल थीं।
इतनी लाल कि जैसे उनमें खून भरा हो।
नीचे एक धूल से ढका नाम लिखा था—
“काली माँ – 1923”
राहुल की आँखें थोड़ी सिकुड़ीं।
“काली माँ…?”
“ये कौन थी?”
उसने पेंटिंग को छुआ।
ठंडी… बहुत ठंडी।
जैसे किसी ने बर्फ से ढक रखा हो।
तभी…
कहीं दूर… अंदर से…
“टक… टक…”
जैसे किसी ने फर्श पर नाखून मारा हो।
राहुल तुरंत मुड़ा।
“कौन है वहाँ?”
कोई जवाब नहीं।
सिर्फ सन्नाटा।
उसने अपनी टॉर्च आगे बढ़ाई।
अंधेरा गहरा था—जैसे रोशनी भी वहां जाने से डर रही हो।
रात धीरे-धीरे बीत रही थी।
राहुल ने घर का एक कमरा ढूंढ लिया और वहीं सो गया।
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3:00 AM
अचानक उसकी आँख खुली।
किसी ने… उसके कान के पास फुसफुसाया—
> “प्यास…”
राहुल झटके से उठा।
उसका दिल तेज़ी से धड़क रहा था।
“कौन…?”
उसने कमरे में चारों तरफ देखा।
अंधेरा।
कुछ भी नहीं।
लेकिन आवाज… फिर से आई—
> “बहुत… प्यास…”
इस बार आवाज कहीं और से नहीं…
उसके अंदर से आई थी।
राहुल को पसीना आने लगा।
“ये… सिर्फ मेरा दिमाग है,” उसने खुद को समझाया।
वो उठकर बाथरूम की तरफ गया।
जैसे ही उसने दरवाजा खोला…
सड़ांध की गंध
उसकी नाक में भर गई।
राहुल का चेहरा सिकुड़ गया।
उसने लाइट ऑन की।
और फिर…
वो जम गया।
फर्श पर—
खून।
पूरा बाथरूम खून से भरा था।
लाल… गाढ़ा… और ताज़ा।
दीवार पर किसी ने उंगली से लिखा था—
“मेरा खून दो…”
राहुल का हाथ कांप गया।
“ये… असली नहीं हो सकता…”
वो धीरे-धीरे पीछे हटने लगा।
उसने आँखें बंद कीं।
एक लंबी साँस ली।
और फिर…
जब उसने दोबारा आँखें खोलीं—
सब गायब था।
बाथरूम साफ था।
सिर्फ फर्श पर—
एक काला… लंबा बाल पड़ा था।
गीला।
और खून से सना।
राहुल की साँस तेज़ हो गई।
“हैलुसिनेशन…”
“ये बस… थकान है…”
लेकिन उसके मन में डर बैठ चुका था।
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अगला दिन
सूरज की रोशनी भी उस हवेली को पूरी तरह उजाला नहीं दे पा रही थी।
राहुल बाहर आया।
उसने खुद को पानी से धोया और खुद को शांत किया।
तभी…
एक जीप आकर रुकी।
उसका दोस्त—विक्रम—बाहर निकला।
“अरे राहुल! तू यहाँ सच में रहने आ गया?”
विक्रम हँस रहा था।
“हॉरर फिल्म में हीरो बनने आया है क्या?”
राहुल हल्का सा मुस्कुराया।
“बस कुछ दिनों के लिए आया हूँ।”
दोनों ने बातें कीं।
शाम तक उन्होंने शराब पी।
हंसी-मजाक हुआ।
थोड़ी देर के लिए… सब सामान्य लग रहा था।
लेकिन जैसे ही रात हुई—
हवेली फिर से बदलने लगी।
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3:00 AM (फिर से)
इस बार राहुल अकेला नहीं था।
विक्रम भी सो रहा था।
अचानक…
एक चीख गूँजी—
“राहुल!”
राहुल तुरंत उठा।
“क्या हुआ?”
विक्रम कांप रहा था।
“वो… वो औरत…”
“क्या औरत?”
विक्रम ने अपने गले पर हाथ रखा।
“वो… मेरी गर्दन चाट रही थी…”
राहुल ने टॉर्च उठाई और बिस्तर की तरफ देखा।
विक्रम के गले पर—
दो छोटे निशान।
खून रिस रहा था।
राहुल के चेहरे से रंग उड़ गया।
“कोई नहीं है यहाँ।”
लेकिन…
विक्रम हँसा।
अजीब… डरावनी हँसी।
“अब मेरी बारी है…”
उसने धीरे से कहा।
“प्यास बुझाने की…”
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To be Continued.....
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क्योंकि असली खौफ अभी बाकी है 😈