भाग 2: कुएँ का रहस्य
सुबह की रोशनी हवेली के अंदर घुस तो रही थी…
लेकिन अंधेरा पूरी तरह हट नहीं रहा था।
जैसे हवेली के किसी कोने में अभी भी रात छिपी हो।
राहुल की नींद टूट चुकी थी।
विक्रम का चेहरा पीला पड़ गया था।
“राहुल…” उसकी आवाज कांप रही थी,
“ये जगह ठीक नहीं है… हमें यहाँ से निकलना चाहिए।”
राहुल ने उसकी तरफ देखा।
“तू ठीक है?”
विक्रम ने अपना गला छुआ।
“मुझे लगा… कोई मुझे छू रहा था… बहुत ठंडी उंगलियाँ…”
राहुल ने गले के निशान देखे।
“ये सिर्फ… एक सपना था।”
लेकिन अंदर ही अंदर, उसे भी शक होने लगा था।
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हवेली के भीतर खोज
राहुल ने फैसला किया—
वो इस हवेली की असलियत जानेगा।
वो अकेले अंदर गया।
हवेली के गलियारे लंबे और संकरे थे।
हर कदम पर फर्श चरमराता था।
एक कमरे के दरवाजे पर उसे अजीब सा एहसास हुआ।
दरवाजा… बाकी दरवाजों से अलग था।
उस पर काले रंग का निशान बना था—
जैसे किसी ने खून से छुआ हो।
राहुल ने दरवाजा खोला।
अंदर…
पुराना फर्नीचर… धूल… और कोने में एक पुरानी लकड़ी की मेज।
मेज के नीचे एक दराज था।
लॉक नहीं था।
उसने धीरे से दराज खोला।
अंदर—
एक पुरानी डायरी।
राहुल का दिल तेज धड़कने लगा।
उसने पन्ने पलटे।
और जैसे-जैसे वो पढ़ता गया…
उसका चेहरा सख्त होता गया।
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डायरी का सच
डायरी में लिखा था—
> “1923… मुझे यहाँ जिंदा फेंक दिया गया।
मेरा बच्चा… मुझसे छीन लिया गया…”
राहुल ने पन्ना पलटा।
> “उन्होंने कहा मैं बदनाम हूँ…
लेकिन असल में मैं सिर्फ प्यार चाहती थी…”
अगले पन्ने पर—
> “मुझे कुएँ में फेंका गया…
पानी ठंडा था… बहुत ठंडा…
और तब… मैंने अपनी आँखें बंद नहीं कीं…”
राहुल के हाथ कांपने लगे।
उसने अगला पन्ना पढ़ा—
> “मैं मरी नहीं…
मैंने उस कुएँ में अपनी प्यास जगा दी…
अब मैं लौटूंगी… हर पूर्णिमा…”
अचानक—
हवेली के अंदर से—
“छप… छप…”
पानी की आवाज आई।
राहुल चौंक गया।
उसने डायरी बंद की और बाहर भागा।
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कुएँ की ओर खिंचाव
हवेली के पीछे—
एक पुराना कुआँ था।
पत्थरों से घिरा हुआ।
उसके ऊपर लोहे का ढक्कन लगा था…
लेकिन वो थोड़ा खुला हुआ था।
और…
उसके अंदर से—
लाल रोशनी निकल रही थी।
राहुल धीरे-धीरे उसकी तरफ बढ़ा।
“विक्रम…?”
उसने आवाज लगाई।
कोई जवाब नहीं।
जैसे ही वो कुएँ के पास पहुँचा…
एक ठंडी हवा का झोंका आया।
और अचानक—
उसका सिर घूमने लगा।
आँखों के सामने धुंध छा गई।
और फिर…
उसे दिखा—
एक औरत।
लंबे बाल…
सफेद चेहरा…
और खून से भरी आँखें।
वो कुएँ के अंदर खड़ी थी।
धीरे-धीरे ऊपर देख रही थी।
उसके होंठ हिल रहे थे—
> “प्यास…”
राहुल ने पीछे हटने की कोशिश की।
लेकिन उसके पैर जकड़ गए।
जैसे जमीन ने उसे पकड़ लिया हो।
और फिर—
एक चीख…
हवेली के अंदर से आई।
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राहुल भागा।
वो अंदर पहुँचा—
और जो उसने देखा…
उसका दिमाग हिल गया।
विक्रम जमीन पर पड़ा था।
उसकी आँखें खुली थीं।
और… खाली।
जैसे उसमें जान ही नहीं बची।
उसकी गर्दन पर—
दो गहरे निशान थे।
लेकिन इस बार…
खून नहीं था।
जैसे किसी ने उसका खून… पूरी तरह चूस लिया हो।
राहुल कांप उठा।
“विक्रम…?”
कोई जवाब नहीं।
तभी—
कमरे का दरवाजा धड़ाम से बंद हो गया।
राहुल ने पीछे मुड़कर देखा।
वह वहाँ थी।
वही औरत।
काली माँ।
उसकी आँखें अब पूरी तरह लाल थीं।
और उसके होंठ… खून से सने थे।
वो धीरे-धीरे राहुल की ओर बढ़ी।
“तुम…”
उसकी आवाज में एक अजीब गूंज थी।
> “तुम्हारे खून में… उसकी गंध है…”
राहुल पीछे हटने लगा।
“तुम कौन हो?!”
औरत मुस्कुराई।
एक डरावनी, टूटी हुई मुस्कान।
“मैं वही हूँ…
जिसे तुम्हारे ही लोगों ने मार डाला…”
उसने हाथ बढ़ाया—
और अचानक—
कमरे की लाइट्स फड़कने लगीं।
राहुल की साँस रुकने लगी।
और फिर—
अंधेरा…
पूरी तरह छा गया।
To be Continued....
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