सम्मान अथवा....
बड़े बेआबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले
संस्मरण
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स्नेहिल सुभोर मित्रो
माँ अपने सभी रूपों में सब पर अनुकंपा बनाए रखें।'माँ`संबोधन ही स्वयं में पूर्ण है। इसके आगे-पीछे कुछ सोचने, देखने की ही ज़रूरत नहीं है।
जीवन जीने के मूल मंत्र को काँख में दबाए हम चक्कर काटते रहते हैं उन वीथिकाओं में, उन बीहड़ों में,उन जंगलों में, उन धूसर मार्गों पर जिनके बारे में हमें लेश मात्र भी आभास नहीं होता। बस हम चलते रहते हैं, दौड़ते रहते हैं और न जाने कब एक अंधी दौड़ में शामिल हो जाते हैं।
आज का दिन सब लोग देवी माँ की प्रार्थना कर रहे हैं, उनके आगमन का प्रकाश चहुँ ओर आलोकित है। मन में यह भी उठता है कि ईश्वर, प्रकृति सब कुछ तो भीतर है जो कभी हमें छोड़कर नहीं जाते, पल भर के लिए भी नहीं इसीलिए तो हमें मस्तिष्क नामक एक कलपुर्जा फ़िट करके अवतरित किया है इस धरती पर!अब इसका तो कुछ हो नहीं सकता कि हम उस कलपुर्ज़े में जंग लगा लेते हैं, उसकी उपयोगिता न के बराबर करते हैं तो भई भुगतान तो हमें ही करना होता है।
यह घटना तो लगभग आठ वर्ष पूर्व की है जो मेरे मनोमस्तिष्क में पालथी जमाकर बैठी है।कई बार सोचा भी लेकिन होता है न अधिकतर कि हम ढूँढते रह जाते हैं, ऐसे ही सोचते रह जाते हैं, बस सोचती ही रह गई, यहाँ तक कि हाल ही की संस्मरण के प्रकाशित संग्रह' इस छोर से उस छोर तक'में भी लिखना रह गया, अभी भी इतने संस्मरण मस्तिष्क के धरातल पर चिपके पड़े हैं, शायद उनके लिए दूसरी पुस्तक तैयार करनी पड़े।
वैसे सोचती तो कई बार हूँ कि आख़िर क्यों हो जाती है इतनी बेचैनी? शांति से नहीं बैठ सकती? कुछ अंतराल ऐसा भी आ जाता है कि मन द्वंद में चक्कर खाता है, कलम और दिमाग़ को थोड़ा विश्राम देने के बहाने कभी नैटफ़्लिक्स पर, कभी किसी और चैनल पर कुछ खोलकर बैठ भी जाती हूँ लेकिन क्या चल रहा है सामने कुछ पता ही नहीं चलता।वैसे यह वैराग्य तो नहीं है, जाने क्या है, कुछ तो होगा ही, क्यों भला पहले से ही लोडेड दिमाग़ को और ठूँस ठूँसकर भरती रहूँ?
कहाँ से कहाँ पहुँच जाती हूँ, वापिसी का मार्ग भी कहाँ याद रहता है? तो ज़िक्र है लगभग आठ वर्ष पूर्व का, आजकल बार बार याद भी संभवत: इसलिए आ रहा है कि उस घटना से जुड़े कुछ पात्र इस एफ़बी के आशीर्वाद से हर दिन ही मिल जाते हैं।
इससे पूर्व कई उपन्यास प्रकाशित हो चुके थे, भोपाल के लिए इसरो के 'डेकू 'से श्री अशोक कामले के साथ 68/70 एपीसोड्स का सीरियल हो चुका था फिर भी मेरी पहचान उन दायरों तक ही सीमित थी जिनमें काम करती रही थी।लेकिन मुझ बुद्धिमति को यह अहसास तक नहीं हुआ था कि जब तक पुस्तक को कहीं भेजा न जाए तब तक उसके बारे में आख़िर जानेगा कौन?
कई वर्ष पूर्व अपनी क़रीबी दोस्त मंजु महिमा के माध्यम से 'ई कविता' के मंच से जुड़ी थी जिसमें अच्छे मित्रों से मुलाक़ात हुई।उसी में कुसुम वीर और प्रताप नारायण सिंह से भी मुलाक़ात हुई और बड़े सुंदर संबंध बनते चले गए। 16 में मेरे दो उपन्यास आए 'गवाक्ष' और 'नैनं छिंदन्ति शस्त्राणि'!प्रताप ने ही उन्हें नहीं पढा बल्कि अपने पिताजी को भी पढवाए और उनसे चर्चा की। बात यह भी हुई कि कहीं भेजती क्यों नहीं दीदी?और यह प्रताप का ही श्रम, पराक्रम था जो गवाक्ष उ. प्रदेश हिन्दी संस्थान में भेजा गया और उस पर 'प्रेमचंद नामित सम्मान' योगी जी के निवास पर हुए एक बड़े कार्यक्रम में उनके द्वारा प्राप्त हुआ। हर वर्ष कार्यक्रम संस्थान में होता था किंतु उस वर्ष योगी जी के निवास पर हुआ।
वहाँ से सम्मान मिला तो लगा सच में कुछ होगा, मेरा परिचय लखनऊ में किसी से नहीं था। हाँ, एक बार पूर्णिमा बर्मन जी जब गुजरात विद्यापीठ आईं थीं तब उनसे परिचय हुआ था और मैं उनसे 'अभिव्यक्ति' के माध्यम से जुड़ गई थी अतः जब लखनऊ जाना हुआ मैं उनके पास भी मिलने गई और दो दिन उनके पास ठहरी जहाँ नवगीत के सशक्त हस्ताक्षर स्थानीय शुक्ल जी और कुछ और साहित्यकारों से मिलना व गोष्ठी में शामिल होने के अवसर से मन बहुत प्रसन्न हुआ।
इसके बाद पता नहीं कैसे उपन्यास को राँची भेजा गया, किसी 'स्पेनिन पुरुस्कार'के लिए उसे चयनित किया गया था।अब वहाँ जब जाने की बात हुई तब मना कर दिया मैंने लेकिन किन्ही संजय जी के फ़ोंस, मेल्स लगातार आते रहे। पैसा तो ज़्यादा खर्च होना ही था लेकिन बेटी से बात हुई, राँची के बारे में इतना सुना था बड़ा सुंदर स्थान है, हरियाली, झरने!बेटी ने कहा चलो थोड़ा घूम आएंगे इस बहाने और हम दोनों माँ बेटी निकल पड़े।ठहरने व घुमाने का इंतज़ाम मेज़बान को ही करना था।
ख़ैर, हम कोलकता की उड़ान में बैठे फिर वहाँ से राँची की लगभग तीसेक मिनट की उड़ान थी।पहुँच गए। एयरपोर्ट पर संजय जी पधारे हुए थे अपने साथ सारिका भूषण को साथ लेकर या यूँ कहूँ कि उनके कंधे पर बंदूक रखकर!सारिका जी व उनकी गाड़ी को लेकर पहुँचे थे।हमें उस गाड़ी से एक साधारण से होटल में उतार दिया गया। मैंने पहले ही बता दिया था कि बेटी साथ में होगी।कमरे में एक डबल बैड था, दो कुर्सियांँ,एक छोटी मेज़ खिड़की के पास! हम प्लेन में खाना खा चुके थे।संजय महाशय ने होटल में चाय पिलवाई और अपने साथ कोई अपना लिखा नाटक दिखाने ले गए।हम बुरी तरह थक चुके और बोर हो चुके थे। संजय के बार बार मेल आना और हमें वहाँ रहने घुमाने के बारे में आश्वस्त करने ने हमसे यह ट्रिप बनवा दिया था।शाम को पता नहीं किसकी गाड़ी से होटल भेज दिया गया यह कहकर कि सुबह इतने बजे गाड़ी आएगी,सम्मान के फंक्शन के लिए, समय से तैयार रहें।
हम आकर थोड़े रिलैक्स होने के मूड में लेटे तो सामने एसी था पर उसका कंट्रोल नहीं था। बेटी ने इधर उधर देखकर वहाँ किसी बंदे से रिमोट के लिए कहा। पता चला, रिमोट नहीं देना है। बेटी चिढ गई, सरदार जी का होटल था, बहुत शरीफ़ थे। बेटी नीचे गई, उसे भी यही बताया गया कि रिमोट नहीं देना है। उसने कहा एसी का बिल हम पे करेंगेऔर रिमोट लेकर गुस्से में भरी ऊपर आई।
रात का खाना हमने ऊपर ही मंगवा लिया। रात में उर्मिला शुक्ल आईं, उनके लिए कोई कमरा न था, उसी कमरे में एडजस्ट करना है, पता चला। बेटी बुरी तरह नाराज़ थी, कहाँ जगह थी,वह भड़की हुई थी। किसी तरह रात निकली, सुबह हम समय से तैयार हो गए, नाश्ता मंगवाया, गाड़ी आ गई थी, तैयार होकर चले, आख़िर सम्मान होना था भई!
एक इसाई स्कूल था जिसके हाल में यूनिफ़ार्म पहने बच्चे भरे पड़े थे। अँग्रेज़ों के ज़माने की कोई बिल्डिंग थी जिसकी इतनी ऊँची छतें, उन पर लंबी डंडियों से लटके पँखे चूँ चूँ करते हुए मरमैले से चल क्या हिल रहे थे। हम टिपटौप तैयार, सिल्क साड़ी में सजे हुए। बेटी का भी मैं लंबा सिल्क गाऊन जैसा रखवाकर ले गई थी, भाई!माँ का सम्मान है तो ठीक से तैयार होना बनता है न!
हाल में भरे स्कूली बच्चों के पसीने की गंध से जी घबराने लगा। सामने ऊँचा स्टेज था, आगे कुछ कुर्सियाँ थीं जिन पर वी आईपीज़ को पधारना था।
तालियाँ बजाने के लिए भरपूर हाल चकाचक भरा था। वह क्षण भी आ गया जब तालियों की गड़गड़ाहट के बीच सम्मानित किया गया।उर्मिला शुक्ल जी को व एक और कोई साहित्यकार कहीं उधर से ही पधारे थे, उन्हें भी सम्मानित किया गया, वे सपत्नी व बेटी के साथ पधारे थे।
मंच पर प्रशंसा के पुल बाँधते हुए संजय महोदय ने बताया कि बीस हज़ार देकर सम्मानित किया गया है। हाँ, मुझे बीस हज़ार से सम्मानित किया गया था लेकिन बाद में पता चला कि दो और सम्मानित साहित्यकारों के लिफ़ाफ़ों में काफ़ी हल्का सम्मान था।
ख़ैर जी तालियाँ बजवाकर,लिफ़ाफ़ा समेटकर हम फिर होटल पहुँच गए। अब इतनी दूर गए थे तो कहीं झरने वरने, राँची की सुंदरता को देखने तो जाना ही चाहिए था।
होटल आकर हमने सरदार जी से अपनी इच्छा ज़ाहिर की, उन्होंने बताया कि गाड़ी तो वे दिलवा देंगे,ड्राइवर भी उनका ही है, मुस्लिम है, बहुत शरीफ़ बंदा है।हमें इससे क्या फ़र्क पड़ने वाला था। ड्राइवर ने बताया कि 7बजे से पहले वापिस लौटना होगा, सेफ़ नहीं है।ठीक है भई, हम तो उस इलाके से बिलकुल भी परिचित नहीं थे। उर्मिला जी ने कहा वे भी साथ चलेंगी, अच्छी बात है दो से भले तीन!हमारे मेज़बान जो बार बार मेल कर रहे थे मि. इंडिया बन चुके थे। घूमने और अन्य साहित्यकारों से मिलने के लालच में हमने लौटने की टिकिट भी दो दिन बाद की करवाई थी।
दो/तीन स्थानीय कवयित्रियाँ मिलने भी आईं होटल में,हमने उनका यथाशक्ति स्वागत भी किया, वहीं होटल से कुछ मंगवाकर!
उर्मिला जी तो घूमने के बाद चली गईं थीं, उनकी ट्रेन में बुकिंग थी। कार्यक्रम के दौरान कविता विकास जी से भी मुलाकात हुई थी लेकिन बाद में हम माँ बेटी ही थे।अपने लौटने के दिन की प्रतीक्षा करनी ही थी। कविता जी ने बताया था कि वो काफ़ी दूर से आईं थीं।
भला हो होटल वाले सरदार जी का, जिन्होंने गाड़ी ड्राइवर का अच्छा इंतज़ाम करवा दिया था।हम लोकल मार्केट में भी घूम आए लेकिन कुछ अता पता तो था नहीं, बस यूँ ही बेकार सी छुटपुट चीज़ें लीं जिनकी ज़रूरत भी नहीं थी। हमारे मेज़बान होटल वाले सरदार जी से बात करके कब चले गए हमें पता भी नहीं चला.पता चला जब हम लौटने लगे। हमारे सामने खाने का, एसी का, गाड़ी का बिल था। मेज़बान हमें फ़ोन पर बाय कर चुके थे।
हम उसी गाड़ी से एयरपोर्ट पहुंचे, कोलकाता की, वहाँ से अहमदाबाद की फ़्लाइट बुक थी ही!सो... सस्मान लौटके बुद्धू यह सोचते हुए घर को आए कि यदि वह सम्मान था तो.... अपमान????
सोचें, समझें फिर सम्मान ग्रहण करने जाएं, कैसा आभास हुआ? कृपया अपनी प्रतिक्रिया देने का कष्ट करें।
सस्नेह
आपकी मित्र
डॉ. प्रणव भारती