Extra Material Affair.. - 2 in Hindi Motivational Stories by kalpita books and stories PDF | Extra Material Affair.. - 2

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Extra Material Affair.. - 2

रात का खाना खत्म हुआ तो शालिनी ने अपने 12 साल के बेटे को प्यार से सुला दिया। कमरे की लाइट बंद करते हुए उसने एक गहरी सांस ली—क्योंकि जानती थी कि आज की रात उसकी ज़िंदगी बदलने वाली है।

ड्रॉइंग रूम में मनोज अख़बार पढ़ रहा था।
शालिनी उसके सामने आकर बैठ गई। चेहरा उतरा हुआ था, आवाज़ काँप रही थी।

"मनोज... मुझे तुमसे एक सच कहना है,"
उसने धीरे से कहा।

मनोज ने चश्मा उतारा और शांति से उसकी तरफ़ देखा।
"कहो शालिनी, क्या बात है?"

शालिनी की आँखें झुक गईं।
"मेरा... मेरा विकास के साथ अफेयर है।"

मनोज ने जैसे पहले से ही ये बात अपने दिल में दबाकर रखी थी।
वो कुछ पल चुप रहा, फिर गहरी सांस लेकर बोला—
"मुझे शक तो था... कई बार।
ऑफिस वालों की बातें भी कानों में पड़ीं।
लेकिन मैं हर बार अनसुना कर देता था। सोचता था, ये सब गॉसिप है।
मैंने तुम्हें कभी किसी बंधन में नहीं बाँधा, हमेशा आज़ादी दी... लेकिन आज तुमने सारी हदें पार कर दीं, शालिनी।"

कमरे में गहरी खामोशी छा गई।
सिर्फ़ घड़ी की टिक-टिक सुनाई दे रही थी।

शालिनी की आँखों से आँसू बह निकले।
"मनोज... मैं गलत हूँ। लेकिन दिल के हाथों मजबूर हो गई।"

मनोज की आँखों में दर्द था, लेकिन गुस्सा नहीं।
वो धीरे से बोला—
"शालिनी, प्यार अगर मजबूरी बन जाए... तो वो सिर्फ़ धोखा होता है। और सबसे बड़ा धोखा उस इंसान को नहीं, बल्कि अपने परिवार और अपने बच्चे को दिया जाता है।"

उसकी आवाज़ में टूटन थी, मगर संयम भी।
शालिनी का दिल डूब गया।
उसे एहसास हुआ कि एक झूठी मोहब्बत के पीछे उसने उस इंसान का विश्वास तोड़ा जिसने हमेशा उसे इज़्ज़त और आज़ादी दी थी।
मनोज ने बहुत देर तक चुप्पी साधे रखी। उसकी आँखें टेबल पर रखे गिलास पर टिकी थीं, पर मन कहीं और भटक रहा था।
फिर उसने गहरी सांस लेते हुए कहा—

"शालिनी, शायद अब हमारे रिश्ते को ज़बरदस्ती ढोने का कोई मतलब नहीं। अगर तुम्हें सचमुच विकास के साथ रहना है... तो हम तलाक ले लेते हैं।"

ये सुनकर शालिनी का दिल कांप उठा।
तलाक का शब्द इतना भारी था कि उसके होंठ तक सूख गए।
उसने हिचकिचाते हुए कहा—
"पर... हमारा बेटा, मनोज?"

मनोज की आँखें भर आईं।
"हाँ, यही तो सोच रहा हूँ... उसने अभी बारह साल की ही उम्र देखी है।
तुमने कभी नोटिस किया? वो बहुत चुपचाप रहने लगा है... शायद उसे पहले से एहसास था कि हमारे बीच कुछ ठीक नहीं। बच्चे कभी गलत नहीं सोचते, शालिनी। उन्हें सब दिख जाता है।"

इतना कहते ही कमरे का दरवाज़ा हल्के से चरमराया।
शालिनी और मनोज दोनों ने मुड़कर देखा—
उनका बेटा दरवाज़े पर खड़ा था। आँखों में नींद कम और बेचैनी ज़्यादा थी।

"माँ... पापा... आप लोग झगड़ क्यों रहे हो?"
उसकी मासूम आवाज़ ने दोनों का दिल चीर दिया।

शालिनी तुरंत आगे बढ़ी और बेटे को सीने से लगा लिया।
"कुछ नहीं बेटा... तुम सो जाओ।"

पर मनोज ने आँसू रोकते हुए बेटे के सिर पर हाथ रखा और कहा—
"तुम्हारी माँ और पापा... शायद अब एक साथ नहीं रह पाएंगे।"

ये सुनते ही बेटे की आँखों से आँसू छलक पड़े।
"नहीं पापा... मैं आप दोनों को अलग नहीं होने दूँगा।"

कमरे की हवा भारी हो गई थी।
शालिनी का दिल चीख रहा था —
उसने चाहत के नाम पर अपने बेटे का बचपन, उसके सपनों का घर तोड़ दिया था।

शालिनी के सोचने-समझने की शक्ति जैसे खत्म हो चुकी थी।
उसके सामने दो रास्ते थे—एक उसका बच्चा और पति, जिनके साथ उसका घर था; दूसरा विकास, जिसके साथ उसे एक आज़ाद और बंधनमुक्त ज़िंदगी नज़र आ रही थी।

उसने बिना हिचकिचाए विकास को चुना।
क्योंकि अब उसके दिल में एक ही ख्वाहिश रह गई थी—"आज़ादी।"

मनोज ने आखिरी बार उसे समझाने की कोशिश की।
"शालिनी... अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा है। कदम वापस ले लो। हम फिर से सब ठीक कर सकते हैं। बेटा हमें देखकर बड़ा होगा, तुम्हें खोना नहीं चाहता।"

पर शालिनी की ज़िद अडिग थी।
"नहीं मनोज... मैं लौटकर नहीं आऊँगी। मैं अब वही ज़िंदगी चाहती हूँ जिसमें मैं अपने हिसाब से जी सकूँ।"

मनोज ने आँखे मूँद लीं।
उसके लिए जैसे आसमान टूट पड़ा हो।
जिस औरत को उसने हमेशा सम्मान और विश्वास दिया था, उसी ने उसके पूरे परिवार की नींव हिला दी थी।

आख़िरकार, टूटे हुए दिल और भारी मन से उसने कहा—
"ठीक है शालिनी... अगर यही तुम्हारा फैसला है तो मैं तुम्हें तलाक देता हूँ।
लेकिन याद रखना—अब कभी इस घर में लौटने की कोशिश मत करना।
और मेरी एक आखिरी शर्त है... अब से तुम मुझे और अपने बेटे को अपनी शक्ल मत दिखाना।"

ये कहते वक्त मनोज की आँखों में आँसू थे, मगर आवाज़ में पत्थर जैसी कठोरता।

शालिनी जड़ हो गई।
उसने बेटे की ओर देखा—जो खामोश खड़ा था, बस उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे।
उस पल शालिनी के दिल में कसक जरूर उठी, लेकिन फिर भी उसने अपना सामान समेट लिया।

दरवाज़ा बंद होते ही घर में सन्नाटा गूंजने लगा।
मनोज और उसका बेटा... अब अकेले रह गए थे।
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मधु गाँव की सीधी-सादी लड़की थी।
शहर की चमक-दमक और ऑफिस की राजनीति से हमेशा दूर रही।
उसकी दुनिया बस घर की चौखट तक सिमटी हुई थी।
बच्चे नहीं थे, इसलिए उसके दिल की खालीपन को विकास ही भरता था।

लेकिन जब विकास ने उसे शालिनी के बारे में बताया तो उसका दिल चकनाचूर हो गया।
पहली बार उसने अपने पति पर जोर से आवाज़ उठाई, चीख-चिल्लाई, रोई…
पर विकास के चेहरे पर कोई पछतावा नहीं था।

"मधु, मैं मानता हूँ मैंने तुम्हें तकलीफ़ दी। पर अब मैं शालिनी के बिना नहीं जी सकता।"
उसकी आवाज़ ठंडी और कठोर थी।

मधु की आँखों में आंसू थे।
"तो मैं? मैं तुम्हारे लिए क्या थी, विकास?"

विकास ने कुछ देर खामोश रहकर कहा—
"तुम मेरी ज़िम्मेदारी थीं, मधु। और उस ज़िम्मेदारी से मैं भागूंगा नहीं।
तुम्हें घर छोड़ने की ज़रूरत नहीं। यहीं रहो।
मैंने अपने सारे पैसे तुम्हारे नाम कर दिए हैं।
उन पैसों के ब्याज से तुम्हारा गुज़ारा आराम से हो जाएगा।"

मधु जैसे पत्थर हो गई।
ये वही आदमी था जिसे उसने अपना सब कुछ माना, और आज वही उसे "ज़िम्मेदारी" कहकर किनारे कर रहा था।
वो चाहकर भी कुछ नहीं बोल पाई।

विकास अपने फैसले पर अडिग था।
उसके दिल-दिमाग पर अब सिर्फ शालिनी का नाम लिखा था।

शालिनी और विकास ने सब कुछ पीछे छोड़ दिया था—घर, रिश्ते, परिवार।
दोनों ने सोचा था कि अब नए सिरे से ज़िंदगी शुरू करेंगे।
कुछ दिन होटल में रहे, फिर कोई छोटा सा फ्लैट देखने का प्लान बनाया।
उनके लिए ये वक्त किसी सपने जैसा था—क्योंकि उन्हें लगा अब वे आज़ाद हैं।
इन दोनो की ज़िंदगी किस और ले जाएगी दोनो को?
.......to be continued