Extra Material Affair.. - 1 in Hindi Motivational Stories by kalpita books and stories PDF | Extra Material Affair.. - 1

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Extra Material Affair.. - 1

शालिनी, तुमने अपने घर पर हमारे अफेयर के बारे में बात की?"
विकास ने धीमी लेकिन बेचैन आवाज़ में पूछा।

शालिनी ने गहरी सांस ली और सिर झुका कर बोली—
"नहीं..."

विकास की आँखों में बेचैनी और अधीरता साफ झलक रही थी।
"कब करोगी? अब और नहीं रह पा रहा यार, तुम्हारे बिना..."

शालिनी ने उसकी तरफ़ देखते हुए हल्की मुस्कान दी, पर आँखों में दुविधा साफ थी।
"ठीक है... आज ही हिम्मत करके बात कर लूंगी। लेकिन तुमने?"

विकास ने दृढ़ आवाज़ में कहा—
"हाँ, मैंने मधु को सब बता दिया है।"

शालिनी चौक पड़ी—
"उसने... कुछ कहा नहीं?"

विकास ने कड़वी हँसी हँसते हुए कहा—
"कहा क्यों नहीं... चीख-चिल्ला रही थी, घर सर पर उठा लिया। मैं गुस्से में घर छोड़कर निकल आया।"

कुछ पल दोनों चुप रहे। फिर विकास ने शालिनी का हाथ थामकर कहा—
"सिचुएशन आसान नहीं होगी... लेकिन हैंडल तो करना ही पड़ेगा। जब प्यार किया है तो डरना कैसा?"

फिर वह शरारती अंदाज़ में हँस पड़ा—
"प्यार किया कोई चोरी तो नहीं... छुप-छुपकर आहें भरना क्या!"

शालिनी उसकी बाँहों में सिमट गई। उसे विकास की यही बातें सबसे ज़्यादा भाती थीं— उसका बेपरवाह अंदाज़, उसका पागलपन, और सबसे बढ़कर उसका सच्चा प्यार।
शालिनी और विकास एक ही ऑफिस में काम करते थे। शुरुआत में बस एक-दूसरे से काम की बातें होती थीं, लेकिन धीरे-धीरे उनकी दोस्ती गहराती चली गई। छोटी-छोटी बातें, दिनभर के किस्से, घर के झगड़े से लेकर ऑफिस की गॉसिप तक—सब कुछ अब दोनों आपस में शेयर करने लगे थे।

दोस्ती में वो अपनापन था, जो कहीं खोया हुआ सा लगता था।
विकास को शालिनी की सादगी और सुंदरता भाती थी, और शालिनी को विकास का बेफिक्र, मनचला स्वभाव।

धीरे-धीरे ये दोस्ती कुछ और ही रंग लेने लगी। नज़रें ठहरने लगीं, हंसी लंबी होने लगी और खामोशियों में भी एक-दूसरे की मौजूदगी महसूस होने लगी।

एक दिन ऑफिस का टूर पड़ा। जगह दूर थी, और सबको एक ही होटल में रुकना था।
कमरे कम थे, इसलिए रूम शेयर करना पड़ा।

रात आई... और उसी के साथ आई अनकही खामोशियाँ।
दोनों का एक ही कमरा... फिर एक ही बिस्तर।
पहली बार दूरी इतनी कम हुई कि साँसों की गर्माहट तक महसूस होने लगी।

उस रात की नज़दीकियों ने उनकी दोस्ती की सीमा लांघ दी।
दोस्ती... अब अफेयर बन चुकी थी।
एक एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर—जिसमें चाहत थी, पागलपन था... और खतरा भी।

पर दिल जब लग जाता है, तो रिश्तों की परिभाषाएँ कौन देखता है...


सुबह की धूप परदों से छनकर कमरे में आ रही थी।
शालिनी चौंककर उठी, उसका दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था। रात की बातें याद आते ही चेहरा गर्म हो गया।
उसने धीरे से देखा — विकास अब भी सो रहा था, चेहरे पर वही मासूम शरारत भरी मुस्कान थी।

शालिनी ने आईने में खुद को देखा।
गिल्ट और ख़ुशी दोनों साथ-साथ झलक रहे थे।
वो जानती थी कि उसने एक लकीर पार कर दी है — एक ऐसा रिश्ता जिसमें लौटकर जाना आसान नहीं।

विकास उठकर बोला —
"डरो मत शालिनी... जो हुआ, वो हमारी चाहत थी। मैं तुम्हारे बिना अब रह नहीं सकता।"

शालिनी ने धीमी आवाज़ में कहा —
"पर सोचो... मेरे घर, तुम्हारा घर... अगर सबको पता चल गया तो?"

विकास ने उसका हाथ पकड़ते हुए कहा —
"हाँ मुश्किल है... पर क्या तुम मुझसे दूर रह सकती हो?"

शालिनी की आँखें भर आईं, पर उसने चुपचाप सिर झुका दिया।

टूर खत्म हुआ, दोनों वापस ऑफिस लौट आए।
अब उनकी नज़रें कॉरिडोर में टकरातीं तो दिल की धड़कन तेज़ हो जाती।
लंच ब्रेक में चोरी-छिपे बातें करना, प्रोजेक्ट के नाम पर देर तक रुकना...
सब धीरे-धीरे आदत बनने लगा।

पर हर खुशी के साथ एक डर भी था—
फोन की स्क्रीन लॉक करने की आदत, घर जाकर झूठी मुस्कान, पति-पत्नी के बीच अचानक बढ़ती खामोशियाँ...

यह अफेयर अब एक नशे की तरह था—
छोड़ना मुश्किल, निभाना और भी मुश्किल।

शालिनी और विकास दोनों बच्चे नहीं थे, समझदार और परिपक्व इंसान थे।
ऑफिस की ऊँच-नीच, ज़िंदगी की ज़िम्मेदारियाँ — सब जानते थे, फिर भी अपने दिल के रास्ते भटक गए थे।

अब उनका रिश्ता केवल दोस्ती या चाहत तक सीमित नहीं रहा।
वो तन-मन से एक-दूसरे के आदी हो गए थे।
विकास को शालिनी की मौजूदगी के बिना चैन नहीं मिलता था और शालिनी को भी लगता था कि विकास ही उसकी अधूरी खुशियों का जवाब है।

एक दिन दोनों ने बैठकर साफ़-साफ़ बात की।
विकास ने गहरी साँस लेकर कहा—
"शालिनी... अब और झूठ नहीं जी सकता। मैं मधु को तलाक दूँगा।"

शालिनी ने उसकी आँखों में देखा, और धीरे से बोली—
"और मैं भी... अपने पति से अलग होकर तुम्हारे साथ रहूँगी। शायद यही हमारा सच है।"

दोनों ने मान लिया कि अब यही रास्ता है।
पर ये फैसला उतना आसान नहीं था जितना कहने में लगता है।

जब इंसान की बुद्धि खराब होने लगे, तो आँखों पर अपने आप पर्दा गिर जाता है।
सही-गलत की पहचान धुंधली पड़ जाती है।
जो दर्द दूसरों को देना है, उसका अंदाज़ा भी नहीं रहता— बस अपनी चाहत ही सबसे बड़ी लगती है।

अब उनकी ज़िंदगी एक ऐसे मोड़ पर आ गई थी, जहाँ एक ओर अधूरी मोहब्बत का डर था, और दूसरी ओर परिवारों का बिखरना।

क्या फैसला होगा दोनो का ??
........continued