Double Game - 40 in Hindi Women Focused by Jyoti Prajapati books and stories PDF | डबल गेम: मर्यादा वर्सेस मक्कारी - 40

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डबल गेम: मर्यादा वर्सेस मक्कारी - 40

भूपेंद्र के जीवन का सूरज अब पूरी तरह अस्त हो चुका था। जिस साहब वाली छवि को बचाने के लिए उसने अपना घर फूँक दिया था, अब वही छवि बाज़ार के चौराहों पर नीलाम हो रही थी। पंद्रह हज़ार की नौकरी में वह दफ्तर के सबसे निचले पायदान पर था। जहाँ पहले उसके नीचे दर्जनों कर्मचारी काम करते थे, आज वहाँ उसे छोटे-छोटे कामों के लिए झिड़का जाता था। फटे हुए कॉलर और घिसी हुई चप्पलों में भूपेंद्र जब दफ्तर की कैंटीन में बैठता, तो लोग उसे देखकर कानाफूसी करते और उसकी कंगाली का मज़ाक उड़ाते।

घर में तो स्थिति और भी भयावह थी। काया ने उसे एक कमाऊ गुलाम बना दिया था। घर पहुँचते ही उसे साहब कहकर ताना मारना और फिर उससे बर्तन धुलवाना या फर्श साफ करवाना काया का रोज़ का मनोरंजन बन गया था।

काया का अगला निशाना मनोरमा थीं। वह चाहती थी कि बुढ़िया उसकी नज़रों के सामने से हट जाए ताकि वह घर में बेरोकटोक अपनी हुकूमत चला सके। एक रात, जब भूपेंद्र दफ्तर से थका-हारा लौटा, काया ने उसे अपना फैसला सुना दिया।

"साहब, ये बुढ़िया अब यहाँ हॉल में नहीं सोएगी। इसकी खाँसी और इसकी बदबू से मुझे घुटन होती है। आज से इनका ठिकाना पिछवाड़े वाला स्टोर रूम होगा," काया ने बड़े ही कठोर स्वर में कहा।

भूपेंद्र ने विरोध करने की हिम्मत जुटाई, "पर काया, वहाँ न हवा है, न रोशनी... माँ कैसे रहेगी?"

काया ने अपनी आँखें तरेरीं, "अगर माँ की इतनी चिंता है साहब, तो खुद भी उसी कालकोठरी में चले जाओ। और याद रखना, अगर तुमने इन्हें बाहर निकाला, तो कल सुबह मैं पुलिस स्टेशन में मिलूँगी।"

भूपेंद्र लाचार था। उसने अपने ही हाथों अपनी माँ को उस अंधेरे, सीलन भरे स्टोर रूम में धकेल दिया। मनोरमा, जिन्होंने कभी वंशिका के मखमली सोफों और एयर-कंडीशनर वाले कमरों में राज किया था, आज फटे कंबल पर लेटकर अपनी ही परवरिश और अपनी ही चुनी हुई बहू के सितम सह रही थीं। उनकी रातें अब वंशिका से माफी माँगने और अपने कर्मों पर रोने में गुज़रती थीं।




समय का पहिया घूमा और तीन साल बीत गए। शहर के सबसे पॉश इलाके में एक बड़ी होर्डिंग लगी थी, जिस पर वंशिका की मुस्कुराती हुई तस्वीर थी। नीचे बड़े अक्षरों में लिखा था— "वंशिका फिटनेस ग्रुप: महिला सशक्तिकरण की नई मिसाल।"

वंशिका का वह छोटा सा जिम अब एक बड़ी फ्रैंचाइज़ी में बदल चुका था। शहर के हर हिस्से में उसकी शाखाएँ थीं। वह अब सिर्फ एक बिजनेसवुमन नहीं, बल्कि एक मज़बूत सामाजिक चेहरा बन चुकी थी। वह उन महिलाओं के लिए कानूनी और आर्थिक मदद का केंद्र बन गई थी, जो कभी उसकी तरह घर के भीतर घुटन महसूस करती थीं।
वंशिका का अपना घर अब खुशियों से भरा था। उसके बच्चे अब स्कूल में अव्वल आ रहे थे और एक सुरक्षित, स्वस्थ माहौल में पल रहे थे। उसने अपनी आज़ादी और स्वाभिमान को अपनी ढाल बना लिया था।

एक शाम, शहर के मुख्य चौराहे पर एक कार्यक्रम चल रहा था जहाँ मुख्य अतिथि के रूप में वंशिका को सम्मानित किया जाना था। भीड़ के एक कोने में, एक अधेड़ उम्र का व्यक्ति खड़ा था, जिसके बाल लगभग झड़ चुके थे, शरीर हड्डियों का ढांचा बन गया था और कपड़ों से दरिद्रता टपक रही थी। वह भूपेंद्र था।

उसने दूर से मंच पर खड़ी वंशिका को देखा। वह सोने की तरह चमक रही थी—आत्मविश्वास से लबरेज और गौरवमयी। भूपेंद्र को याद आया कि यह वही औरत है जिसे उसने बेकार और गलत ठहराया था। उसने अपनी जेब टटोली, उसमें कुल बीस रुपये थे, जो शायद रात की शराब या काया की एक और गंदी फरमाइश में खत्म हो जाने थे।

भूपेंद्र ने अपनी ज़िल्लत भरी ज़िंदगी की तुलना वंशिका की सफलता से की। उसे काया की वे गंदी गालियाँ, अपनी माँ की स्टोर रूम से आती सिसकियाँ और वह साहब वाला ज़हरीला ताना याद आया। उसकी आँखों से खून के आंसू बहने लगे। उसने जिस मिट्टी को ठुकराया था, वह आज पारस बन चुकी थी, और उसने जिस सोने (काया) को गले लगाया था, वह दरअसल पीतल की एक ऐसी बेड़ी थी जो उसे मरते दम तक जकड़ने वाली थी।

वंशिका की नज़र भीड़ में कहीं नहीं रुकी। उसके लिए भूपेंद्र अब अतीत का एक ऐसा काला अध्याय था जिसे वह पढ़कर बंद कर चुकी थी। वह मुस्कुराते हुए अपने बच्चों की ओर बढ़ गई, और भूपेंद्र अपनी अंधेरी दुनिया की ओर, जहाँ काया अपनी अगली बदतमीज़ी के साथ उसका इंतज़ार कर रही थी।

भूपेंद्र घर पहुँचा तो स्टोर रूम से आती माँ की कराहने की आवाज़ और रसोई में काया के ज़ोर-ज़ोर से बर्तन पटकने के शोर ने उसका स्वागत किया। वह अपनी फटी हुई बनियान में सोफे के एक कोने पर बैठ गया और अपनी धुंधली आँखों से उस घर को देखने लगा जो कभी खुशियों से चहकता था। उसका दिमाग अतीत की गलियों में भटकने लगा। उसे याद आया कि कैसे समाज की नज़रों में उसका सम्मान रातों-रात धूल में मिल गया। जब तक वंशिका उसके साथ थी, समाज उसे एक सफल और आदर्श पुरुष मानता था। वंशिका का सलीका, उसकी गरिमा और उसकी मेहनत भूपेंद्र के व्यक्तित्व के लिए एक सुरक्षा कवच थी। लेकिन काया ने उस कवच को उतारकर उसे नंगा कर दिया था।

भूपेंद्र ने ठंडी आह भरी। उसे वह समय याद आया जब मोहल्ले के लोग वंशिका को आधुनिक' और स्वच्छंद कहकर गलत ठहरा रहे थे। लेकिन आज वही लोग काया को घर तोड़ने वाली और कुलटा कह रहे थे। तमाशा तो यह था कि जो लोग कल वंशिका को कोसते थे, आज वे ही उसे याद करते थे। पर इस पूरी जंग में भूपेंद्र ने एक कड़वा सच महसूस किया—समाज ने कभी उसकी गर्दन नहीं पकड़ी। भूपेंद्र को अहसास हुआ कि इस पूरी तबाही का केंद्र वह खुद था, लेकिन समाज की सुई हमेशा औरतों पर ही रुकी रही।  भूपेंद्र ने धोखा दिया, उसने दूसरी शादी की, उसने अपनी माँ को प्रताड़ित होते देखा, लेकिन समाज के लोग आज भी उसे बस बेचारा या भटका हुआ कहकर छोड़ देते थे। किसी ने उसके चरित्र पर वह कीचड़ नहीं उछाला जो वंशिका या काया पर उछाला गया। मर्द का गुनाह अक्सर गलती मान लिया जाता है, जबकि औरत की गलती गुनाह बन जाती है। 
वंशिका अपने आत्मसम्मान की रक्षा करने के कारण बुरी बनी, मनोरमा अपने पुत्र-मोह के कारण लालची कहलाईं, और काया अपनी महत्त्वाकांक्षा और गरीबी के कारण चरित्रहीन करार दी गई। जो कि शायद कहीं न कहीं सच भी था । 

उस अंधेरे कमरे में बैठकर भूपेंद्र ने आज अपनी ज़िंदगी का हिसाब लगाया: कौन गलत था? कौन ज़्यादा गलत था?

भूपेंद्र (सबसे बड़ा अपराधी): इस पूरी बर्बादी की पहली ईंट भूपेंद्र ने रखी थी। उसने एक वफादार पत्नी को धोखा दिया और वासना को प्रेम का नाम दिया। उसकी सबसे बड़ी गलती उसका अहंकार और झूठा पुरुषार्थ था। उसने अपनी माँ और पत्नी के बीच कभी संतुलन नहीं बनाया और अंत में अपनी वासना के लिए दोनों को बलि चढ़ा दिया। वह ज़्यादा गलत था क्योंकि उसने सत्ता और सुख दोनों चाहे, पर जिम्मेदारी एक की भी नहीं ली।

मनोरमा (गलत चुनाव की शिकार): मनोरमा की गलती उनका अंधा पुत्र-मोह और पितृसत्तात्मक सोच थी। उन्होंने अपनी बहू को बेटी बनाने के बजाय उसे एक प्रतिद्वंद्वी समझा। वंशिका को नीचा दिखाने के लिए उन्होंने काया जैसी नागिन को दूध पिलाया। उनकी सजा यह थी कि जिस बेटे के लिए उन्होंने सब कुछ किया, उसी ने उन्हें स्टोर रूम में धकेल दिया।

काया (लालच और वजूद की लड़ाई): काया गलत थी क्योंकि उसने एक बनी-बनाई गृहस्थी को उजाड़ा। उसकी निर्लज्जता और स्वार्थ ने उसे एक राक्षसी बना दिया। लेकिन उसकी जड़ में उसकी असुरक्षा और अशिक्षा भी थी। उसने सोचा था कि जिस्म के दम पर वह राज करेगी, पर वह यह भूल गई कि जो रिश्ता वासना पर टिकता है, वह कंगाली आते ही दम तोड़ देता है।

वंशिका (जानकर की हुई गलती): वंशिका की गलती यह थी कि उसने अति-विश्वास किया। उसने काया को घर की चाबियाँ और भूपेंद्र को अपना सर्वस्व सौंप दिया, महत्वाकांक्षाओं की अंधी दौड़ में, अपने स्वार्थ में उसने अपनी गृहस्थी को खुद नजरअंदाज कर दिया था... और सबकुछ कया के भरोसे छोड़ दिया था। यह भूलकर कि हर रिश्ते की एक सीमा होती है। उसने अपना वजूद पहचानने में थोड़ी देर कर दी, लेकिन वह अकेली थी जिसने अपनी गलती सुधारी और खुद को नर्क से बाहर निकाला। 

भूपेंद्र ने आईने में अपना चेहरा देखा। उसे अपनी आँखों में एक ऐसा व्यक्ति दिखा जो हार चुका था। उसे समझ आ गया कि गलती किसी एक की नहीं थी, लेकिन सबसे बड़ा पाप उसका अपना मौन और धोखा था। काया ने घर बिगाड़ा, पर भूपेंद्र ने उस घर की आत्मा को मार दिया था।
अब उसके पास पछतावे के सिवा कुछ नहीं था। वह उस समाज का हिस्सा था जहाँ मर्द हमेशा बच निकलता है, लेकिन आज वह अपनी ही नज़रों में इतना गिर चुका था कि उसे खुद से भी छुटकारा नहीं मिल सकता था।




क्रमशः

ज्योति प्रजापति 

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