अगली सुबह जब शहर की गलियों में लोग अपने काम के लिए निकल रहे थे, भूपेंद्र अपनी मर्यादा और संस्कारों की पोटली को श्मशान घाट पर छोड़कर सीधे शहर के एक नामी वकील के दफ्तर जा पहुँचा। उसकी आँखों में नींद कम और काया के जिस्म का नशा ज़्यादा था। वह जल्द से जल्द वंशिका के नाम का कांटा अपनी ज़िंदगी से निकाल फेंकना चाहता था।
वकील श्रीवास्तव ने चश्मा ठीक करते हुए भूपेंद्र की बात सुनी। "तलाक? देखिए भूपेंद्र जी, यह इतना आसान नहीं होता जितना फिल्मों में दिखता है। अगर आपसी सहमति है, तो प्रक्रिया थोड़ी तेज़ हो सकती है।"
भूपेंद्र ने अधीरता से पूछा, "प्रक्रिया क्या है और पेपर्स बनने में कितने दिन लगेंगे? मुझे जल्दी है।"
श्रीवास्तव ने कागज़ फैलाते हुए समझाया, "सुनिए, सबसे पहले हम तलाक की याचिका ड्राफ्ट करेंगे। अगर दोनों पक्ष तैयार हैं, तो धारा 13-B के तहत अर्जी लगेगी। पेपर्स तैयार होने में 2 से 3 दिन लगेंगे। लेकिन, याचिका दाखिल होने के बाद कोर्ट 6 महीने का कूलिंग-ऑफ पीरियड देता है। हालाँकि, सुप्रीम कोर्ट के नए आदेशों के तहत अगर स्थिति बहुत गंभीर है, तो हम इस अवधि को माफ कराने के लिए वेवर एप्लिकेशन दे सकते हैं, जिससे प्रक्रिया 2 से 3 महीने में सिमट सकती है। लेकिन अगर आपकी पत्नी ने विरोध किया, तो यह सालों खींच सकता है।"
भूपेंद्र का चेहरा उतर गया, पर उसने कहा, "आप पेपर्स तैयार कीजिये, बाकी मैं देख लूँगा।"
भूपेंद्र जब घर पहुँचा, तो काया उसका इंतज़ार कर रही थी। काया ने उसे कोने में ले जाकर फुसफुसाते हुए एक ऐसी खबर दी जिसने भूपेंद्र की रीढ़ की हड्डी में सिहरन पैदा कर दी। "साहब, संभल जाइये। आज सुबह मैंने सफाई करते वक्त देखा, दीदी ने हॉल के उस फूलदान और बेडरूम की शेल्फ के पीछे छोटे कैमरे छिपाए हैं। वह अब सिर्फ मोबाइल से नहीं, बल्कि रिकॉर्डिंग से हमें फंसाना चाहती हैं।"
भूपेंद्र सतर्क हो गया। उसकी जो निर्लज्जता कल तक दहाड़ रही थी, वह कानून के डर से दुबक गई। उसने काया का हाथ पकड़कर धीरे से कहा, "हमें कुछ दिन दूर रहना होगा काया। मैंने वकील से बात कर ली है, कागज़ तैयार हो रहे हैं। एक बार तलाक की अर्जी कोर्ट में पहुँच जाए, फिर हम पर कोई उंगली नहीं उठा सकेगा। तब तक हमें दुनिया की नज़रों में शरीफ बने रहना होगा।"
काया ने मुँह बनाया, पर वह जानती थी कि शिकार को पूरी तरह फंसाने के लिए थोड़ा इंतज़ार ज़रूरी है।
भूपेंद्र पिछले कई हफ़्तों से ऑफिस के काम को पूरी तरह नज़रअंदाज़ कर रहा था। वह घर पर बैठकर काया के साथ रोमांस करने के लिए आए दिन झूठी छुट्टियाँ ले रहा था। उसका प्रदर्शन गिर चुका था और क्लाइंट्स की शिकायतें अंबार बन चुकी थीं। अभी वह अपनी तलाक की योजना बना ही रहा था कि दरवाज़े की घंटी बजी।
कुरियर वाले ने एक लिफाफा थमाया। भूपेंद्र ने उसे खोला, और उसे लगा जैसे उसके पैरों के नीचे से ज़मीन खिसक गई हो। वह टर्मिनेशन लेटर था।
"लगातार अनुपस्थिति, अनुशासनहीनता और कार्य के प्रति घोर लापरवाही के कारण, कार्यालय प्रबंधन तत्काल प्रभाव से आपकी सेवाओं को समाप्त करता है..."
भूपेंद्र के हाथ कांपने लगे। वह आदमी जो कल तक खुद को अपनी दुनिया का राजा समझ रहा था, आज बेरोजगार हो चुका था। उसके पास ईएमआई भरने, घर चलाने और अब तो वकील की फीस देने के लिए भी पैसे नहीं थे।
काया उसके पास आई और उसकी उखड़ी सांसें देखकर पूछा, "क्या हुआ साहब? किसका पत्र है? कोई बुरी खबर है क्या?"
भूपेंद्र ने एक पल के लिए काया की आँखों में देखा। उसे लगा कि अगर उसने अभी अपनी बेरोजगारी की बात बता दी, तो काया का जो सम्मान उसके प्रति है, वह खत्म हो जाएगा। उसने अपनी घबराहट को एक बनावटी मुस्कान के पीछे छिपाया और कहा, "अरे नहीं... ये तो खुशी की खबर है। सरकार ने मुझे प्रमोशन दिया है और एक बड़े प्रोजेक्ट के लिए कुछ दिन घर से ही काम करने की अनुमति दी है।"
काया खुशी से उछल पड़ी। उसने भूपेंद्र को गले लगा लिया। "देखा साहब! मैंने कहा था न मैं आपके लिए भाग्यशाली हूँ। अब जब प्रमोशन मिल गया है, तो देरी कैसी? कल ही मुझे अपनी पत्नी बना लीजिये।"
भूपेंद्र ने उसे चूमते हुए दिलासा दिया, "बस थोड़े दिन और काया... बस थोड़े दिन।"
अगले कुछ दिन घर में एक अजीब सी शांति रही। काया ने अपनी रणनीति बदल दी थी। वह अब फिर से वही मासूम, भोली और घरेलू नौकरानी बनकर रहने लगी। वह वंशिका के सामने नीची नज़रें रखती, सारा काम समय पर करती, ताकि कैमरों में कुछ भी आपत्तिजनक रिकॉर्ड न हो।
लेकिन भूपेंद्र भीतर ही भीतर मर रहा था। सुबह जब वह ऑफिस के बहाने घर से निकलता, तो वह शहर के पार्कों या सस्ती कॉफ़ी शॉप्स में बैठकर वक्त गुजारता। बेरोजगारी का सदमा उसे खाए जा रहा था। उसे अहसास हो रहा था कि वंशिका की कमाई के बिना अब घर का खर्च चलाना नामुमकिन होगा... क्योंकि अपनी कमाई का मोटा हिस्सा तो वो काया को रिझाने में उड़ा चुका था । अब उसे उस राजा बेटा वाली छवि के टूटने का भी डर था।
मनोरमा भी अपने कमरे में घुट रही थीं। उन्हें लग रहा था कि घर में कुछ बहुत बड़ा होने वाला है, पर भूपेंद्र ने उन्हें भी प्रमोशन वाली झूठी कहानी सुनाकर चुप करा दिया था।
करीब एक हफ़्ते बाद, जब भूपेंद्र एक पार्क की बेंच पर बैठा अपनी बची हुई सेविंग्स गिन रहा था, वकील श्रीवास्तव का फोन आया। "भूपेंद्र जी, तलाक के कागज़ात तैयार हैं। आप आकर साइन कर दीजिये और अपनी पत्नी के हस्ताक्षर ले लीजिये।"
भूपेंद्र घर पहुँचा और यह खबर काया को दी। काया तो जैसे खुशी से पागल हो गई। उसने बेडरूम का दरवाज़ा बंद किया और भूपेंद्र पर दबाव बनाना शुरू कर दिया।
"अब और इंतज़ार नहीं साहब! आज रात ही आप उन पेपर्स पर दीदी के दस्तखत लीजिये। मैं अब और इंतज़ार नहीं कर सकती। मुझे इस घर की मालकिन बनना है। मुझे वो नाम चाहिए, वो रुतबा चाहिए।"
भूपेंद्र ने उसे शांत करने की कोशिश की, "काया, वंशिका इतनी आसानी से साइन नहीं करेगी। वह लड़ेगी।"
काया की आँखों में एक शातिर चमक आई। उसने भूपेंद्र की कमीज़ के बटन खोलते हुए कहा, "तो आप उसे मजबूर कीजिये। उसे बता दीजिये कि अब इस घर में उसका कोई वजूद नहीं है। साहब, आप तो शेर हैं, एक मामूली औरत से क्या डरना?"
भूपेंद्र बेरोजगारी के तनाव और काया के उकसावे के बीच पिस रहा था। उसने तय किया कि आज रात वह यह आर-पार की जंग लड़ ही लेगा। वह नहीं जानता था कि वंशिका पहले ही अपनी बिसात बिछा चुकी है और उसका अगला कदम भूपेंद्र के इस काल्पनिक प्रमोशन और नई शादी के सपनों को चकनाचूर करने वाला है।
भूपेंद्र ने उन कागज़ात को अपने बैग में रखा, उसका दिल तेज़ी से धड़क रहा था। वह विनाश की ओर बढ़ रहा था, और काया उसके विनाश की ढोलक बजा रही थी।
क्रमशः
ज्योति प्रजापति
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