माँ-बेटी के पवित्र और भावुक रिश्ते पर यह कहानी आपकी रूह को झकझोर देगी:
अधूरी लोरी: ममता का आखिरी रंग
एक छोटे से घर में मीरा अपनी 6 साल की बेटी, परी के साथ रहती थी। मीरा एक मज़दूर थी, जो दिन भर धूप में पत्थर तोड़ती थी ताकि अपनी बेटी को अच्छी शिक्षा दे सके। परी को अपनी माँ के हाथों की दरारें देखना पसंद नहीं था, वह रोज़ उन हाथों पर अपनी छोटी-छोटी हथेलियों से मलाई लगाती और कहती, "माँ, जब मैं बड़ी हो जाऊँगी, तो तुम्हारे हाथ कभी पत्थर नहीं छुएंगे।"
मीरा बस मुस्कुरा देती और रात को परी को गोद में सुलाकर एक लोरी गाती, जो आधी ही थी— "चंदा मामा दूर के, पर माँ तो सदा पास है..."
एक दिन काम के दौरान एक बड़ा हादसा हो गया। मीरा पर एक भारी पत्थर गिर गया। अस्पताल में डॉक्टर ने साफ़ कह दिया कि मीरा के पास अब कुछ ही घंटे बचे हैं। मीरा ने अपनी आखिरी ताकत बटोरी और डॉक्टर से विनती की कि उसकी बेटी को एक आखिरी बार उससे मिलने दिया जाए।
जब परी अस्पताल पहुँची, तो उसकी माँ सफ़ेद चादर में लिपटी थी। परी रोते हुए बोली, "माँ, उठो ना! मेरे पास मलाई है, तुम्हारे हाथ अभी भी बहुत सख्त हैं।"
मीरा ने कांपते हाथों से परी का चेहरा छुआ। उसकी आँखों में न अपने जाने का डर था, न दर्द—बस अपनी बेटी के अकेले रह जाने की फिक्र थी। उसने धीमी आवाज़ में वही लोरी शुरू की, "चंदा मामा दूर के, पर माँ तो सदा पास है..."
लोरी की आखिरी लाइन मीरा कभी पूरी नहीं कर पाई थी, लेकिन आज उसने आखिरी सांस के साथ उसे पूरा किया: "आँख मूँद ले बिटिया मेरी, माँ तेरे एहसास में है।"
मीरा का हाथ परी के गाल से फिसलकर नीचे गिर गया। मॉनिटर की 'पीप-पीप' आवाज़ सन्नाटे में बदल गई। परी चीख-चीख कर रोने लगी, "माँ, लोरी पूरी करो! माँ, उठो ना!"
आज सालों बाद, परी एक बड़ी डॉक्टर बन चुकी है। वह गरीबों का मुफ्त इलाज करती है। जब भी कोई बच्चा रोता है, वह उसे वही लोरी सुनाती है। लोग कहते हैं कि परी के हाथों में जादू है, पर परी जानती है कि जब वह मरीज़ों को छूती है, तो उसे अपनी माँ के उन्हीं सख्त हाथों की गर्माहट महसूस होती है।
सीख: माँ कभी नहीं मरती, वह अपनी संतान की दुआओं और परवरिश में हमेशा ज़िंदा रहती है
मीरा के जाने के बाद परी अकेली पड़ गई थी, लेकिन उसके पास उसकी माँ की वही 'अधूरी डायरी' थी जिसमें मीरा ने अपनी मेहनत का पाई-पाई का हिसाब रखा था। डायरी के आखिरी पन्ने पर एक धुंधला सा निशान था—शायद वह मीरा के पसीने की बूंद थी या उसकी ममता का कोई आखिरी स्पर्श। वहां लिखा था, "मेरी परी, अगर मैं कभी लौट न पाऊं, तो याद रखना कि तू पत्थर तोड़ने के लिए नहीं, बल्कि दूसरों के जख्म भरने के लिए बनी है।"
इन्हीं शब्दों ने परी के अंदर एक नई आग जला दी। अनाथालय के सन्नाटे में जब बाकी बच्चे सो जाते, परी चांदनी रात में बैठकर पढ़ती रहती। उसे अपनी माँ का वह वादा याद आता कि उसके हाथ कभी पत्थर नहीं छुएंगे। परी ने गरीबी को अपनी कमजोरी नहीं, बल्कि अपनी ताकत बनाया।
सालों बाद, जब वह अपनी पहली सर्जरी करने वाली थी, उसके हाथ डर से कांप रहे थे। अचानक उसे महसूस हुआ जैसे कोई अदृश्य साया उसके पीछे खड़ा है और उसके कांपते हाथों को थाम रहा है। उसे हवा में वही पुरानी लोरी की गूँज सुनाई दी। परी की आंखों के आँसू सूख गए और उसके हाथों में वह स्थिरता आ गई जो सिर्फ एक माँ का आशीर्वाद ही दे सकता है।
सर्जरी सफल रही। जब वह ऑपरेशन थिएटर से बाहर निकली, तो उसने आसमान की ओर देखा। आज चंदा मामा पहले से कहीं ज्यादा करीब लग रहे थे। परी ने बुदबुदाते हुए कहा, "माँ, आज तुम्हारे हाथों की दरारें मेरे करियर की लकीरें बन गई हैं। मैं आज जो कुछ भी हूँ, तुम्हारी उसी अधूरी लोरी की वजह से हूँ।"