गाँव की पगडंडियों पर सन्नाटा था, सिर्फ सूखी पत्तियों के उड़ने की आवाज़ आ रही थी। बूढ़ा चित्रकार, जिसे सब 'दादू' कहते थे, अपनी झोपड़ी के बाहर बैठा ज़ोया का इंतज़ार कर रहा था। ज़ोया, जो पास के शहर के एक अस्पताल में अपनी माँ की दवाइयाँ लेने गई थी। दादू की आँखों में मोतियाबिंद उतर आया था, उन्हें अब धुंधला दिखता था, पर उनके हाथों का जादू कम नहीं हुआ था।
दादू ने एक नई कैनवस निकाली। उन्होंने सोचा, "आज ज़ोया आएगी, तो मैं उसे वह आखिरी चीज़ सिखाऊँगा जो मैंने जीवन भर संभाल कर रखी है—कि कैसे रंगों में 'ममता' भरी जाती है।"
शाम ढलने लगी, पर ज़ोया नहीं लौटी। अचानक गाँव के कुछ लोग दौड़ते हुए दादू की झोपड़ी पर आए। उनके चेहरों पर खौफ और आँखों में आँसू थे। एक नौजवान ने हकलाते हुए कहा, "दादू... शहर वाली बस... खाई में गिर गई।"
दादू के हाथ से रंगों वाली ब्रश छूटकर ज़मीन पर गिर गई। वह पत्थर की मूरत बन गए। ज़ोया उसी बस में थी। वह छोटी सी बच्ची, जो दादू की बेरंग दुनिया में इकलौता रंग थी, अब इस दुनिया में नहीं रही।
अगले कई दिनों तक दादू ने न कुछ खाया, न पिया। लोग उन्हें सांत्वना देने आते, पर वह बस अपनी उसी अधूरी पेंटिंग को देखते रहते जिसे उन्होंने ज़ोया के लिए शुरू किया था। एक रात, दादू ने अपनी कांपती उंगलियों से ब्रश उठाया। उनकी आँखों से लगातार आँसू बह रहे थे जो कैनवस पर गिरकर रंगों को धुंधला कर रहे थे।
उन्होंने ज़ोया की एक तस्वीर बनाई, जिसमें वह अपनी फटी हुई गुड़िया को सीने से लगाए हँस रही थी। लेकिन इस बार दादू ने एक बदलाव किया। उन्होंने ज़ोया के हाथों में एक 'दीया' बना दिया, जिसकी रोशनी पूरे गाँव को महका रही थी।
पेंटिंग पूरी करते ही दादू की साँसें उखड़ने लगीं। उन्होंने ज़ोया की उस अधूरी गुड़िया को अपने सीने से लगाया और बुदबुदाए, "बेटा, तूने कहा था न कि तू बड़ी होकर शहर से मेरे लिए उजाला लाएगी... देख, आज तेरी यादों ने मेरी अंधेरी दुनिया को रौशन कर दिया।"
अगली सुबह जब सूरज निकला, तो दादू अपनी कुर्सी पर शांत बैठे थे। उनके चेहरे पर एक अजीब सा सुकून था, जैसे उन्होंने ज़ोया को पा लिया हो। उनके हाथ में वह पेंटिंग थी, जो अभी भी गीली थी—शायद रंगों से नहीं, बल्कि एक बूढ़े इंसान के आखिरी आंसुओं से।
गाँव वालों ने देखा कि उस पेंटिंग के नीचे दादू ने खून से सने रंगों से लिखा था: "फसल कट गई, पर उम्मीद की जड़ें आज भी मेरे सीने में दफन हैं।"
आज भी उस गाँव में जब कोई बच्चा रोता है, तो लोग उस पेंटिंग की ओर देखते हैं। वह तस्वीर सिर्फ एक कला नहीं, बल्कि एक ऐसे प्यार की दास्तान है जिसने मौत को भी हारने पर मजबूर कर दिया।
सीख: कभी-कभी सबसे सुंदर कला सबसे गहरे दुख से ही जन्म लेती है।गाँव के श्मशान में जब दादू की चिता जल रही थी, तो लोगों ने देखा कि उस राख की उड़ती हुई चिंगारियाँ आसमान की ओर नहीं, बल्कि उसी खंडहर नुमा झोपड़ी की ओर जा रही थीं जहाँ दादू और ज़ोया घंटों बैठकर सपनों के रंग बुनते थे। वहाँ दीवार पर लटकी वह आखिरी पेंटिंग हवा के थपेड़ों से हिल रही थी।
अचानक एक चमत्कार हुआ; पेंटिंग में बनी ज़ोया की आँखों के कोने से एक असली आँसू ढलका और ठीक उस जगह गिरा जहाँ दादू ने 'उम्मीद' शब्द लिखा था। गाँव वालों की रूह कांप गई—वह आँसू दुख का नहीं, बल्कि एक बेटी का अपने पिता समान गुरु से मिलन का संकेत था। उस दिन के बाद, उस झोपड़ी से हर रात रंगों की एक धीमी खुशबू आती है, जैसे कोई अदृश्य हाथ आज भी टूटे हुए दिलों में रंग भर रहा हो।