Kiraye Ka Sukoon in Hindi Motivational Stories by Khushbu kumari books and stories PDF | किराये का सुकून

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किराये का सुकून

किराये का सुकून

शहर की भागदौड़ भरी जिंदगी में समीर एक बड़े कॉर्पोरेट ऑफिस में काम करता था। उसकी ज़िंदगी फाइलों, लैपटॉप की स्क्रीन और डेडलाइन्स के बीच सिमट कर रह गई थी। पैसे तो बहुत थे, लेकिन चैन कहीं खो गया था। हर रात जब वह अपने शानदार अपार्टमेंट की बालकनी में बैठता, तो उसे लगता जैसे वह किसी सुनहरे पिंजरे में कैद है।

एक रविवार, वह बिना किसी प्लान के शहर से दूर एक छोटे से गाँव की ओर निकल पड़ा। चलते-चलते वह एक पुराने, खपरैल वाले घर के सामने रुका, जहाँ एक बूढ़ा आदमी नीम के पेड़ के नीचे बैठा बड़े इत्मीनान से लकड़ी का खिलौना तराश रहा था।

समीर ने पास जाकर पूछा, "काका, क्या यहाँ पास में कोई होटल मिलेगा? मुझे बस एक रात रुकना है।"

बूढ़े ने सिर उठाया और अपनी झुर्रियों वाली आँखों से मुस्कुराते हुए कहा, "बेटा, यहाँ होटल तो नहीं, पर मेरा यह छोटा सा घर हाज़िर है। अगर तुम रूखी-सूखी रोटी खा सको, तो रुक जाओ।"

समीर रुक गया। उस रात उसने सालों बाद ज़मीन पर बिछी चटाई पर नींद ली। खाने में उसे मिली मिट्टी के चूल्हे पर बनी मक्के की रोटी और लहसुन की चटनी। उस खाने का स्वाद किसी भी फाइव-स्टार होटल के खाने से कहीं ज़्यादा मीठा था।

रात को खुले आसमान के नीचे तारों को देखते हुए समीर ने बूढ़े काका से पूछा, "काका, आप दिन भर खिलौने बनाते हैं, पर गाँव में तो अब बच्चे प्लास्टिक की गाड़ियों से खेलते हैं। क्या आपके खिलौने बिकते हैं?"

काका हंसे और बोले, "बेटा, मैं खिलौने बेचने के लिए नहीं, अपनी ख़ुशी के लिए बनाता हूँ। जब मैं एक लकड़ी के टुकड़े को नया रूप देता हूँ, तो मुझे लगता है जैसे मैंने अपनी आत्मा को तराशा है। हम लोग शहर वालों की तरह चीज़ों में सुकून नहीं ढूंढते, हम कामों में सुकून ढूंढते हैं।"

अगली सुबह जब समीर वापस जाने लगा, तो उसने काका को कुछ पैसे देने चाहे। काका ने पैसे लेने से मना कर दिया और बोले, "बेटा, सुकून किराये पर नहीं मिलता। यह तो बस दिल की सादगी में छुपा होता है। जब भी शहर की भीड़ तुम्हें थका दे, यहाँ आ जाना।"

समीर अपनी गाड़ी में बैठा, तो उसने शीशे में देखा। उसके चेहरे पर वह तनाव नहीं था जो कल था। उसने महसूस किया कि वह कल एक थका हुआ इंसान बनकर आया था, लेकिन आज एक 'लेखक' और एक 'इंसान' बनकर लौट रहा है। उसने अपनी डायरी निकाली और अपना पहला शब्द लिखा— 'सुकून'।

उसकी तलाश ख़त्म हो चुकी थी। उसे समझ आ गया था कि बड़ी गाड़ियों और ऊँची इमारतों में नहीं, बल्कि नीम की छाँव और कोमल एहसासों में ही असली ज़िन्दगी बसती है।

.उसकी तलाश ख़त्म हो चुकी थी। उसे समझ आ गया था कि बड़ी गाड़ियों और ऊँची इमारतों में नहीं, बल्कि नीम की छाँव और कोमल एहसासों में ही असली ज़िन्दगी बसती है। समीर ने अब मुस्कुराते हुए अपनी कार स्टार्ट की, क्योंकि उसे असली मंज़िल मिल गई थी।"

उसने महसूस किया कि अब उसके पास लिखने के लिए शब्दों की कमी नहीं होगी, क्योंकि उसका दिल अब सुकून की भाषा समझ चुका था।"