THE PLAYER - 2 in Hindi Motivational Stories by Avnish Sharma books and stories PDF | THE PLAYER - 2

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THE PLAYER - 2

इंजीनियरिंग कॉलेज का पहला दिन।
बड़ा कैंपस।
नई इमारतें।
अजनबी चेहरे।
गुरप्रीत के हाथ में दो चीज़ें थीं —
एक किताबों का बैग,
और एक पुराना क्रिकेट बैट।
क्लास में प्रोफेसर ने पूछा —
“यहाँ कौन-कौन होस्टल में रहेगा?”
गुरप्रीत ने हाथ उठाया।
होस्टल का कमरा छोटा था, पर उसके लिए वह स्वतंत्रता का पहला कमरा था।
दिन में क्लास।
शाम को नेट प्रैक्टिस।
रात को असाइनमेंट।
शुरुआत आसान नहीं थी।
गणित की क्लास में उसे महसूस हुआ कि स्कूल की नींव कमजोर थी।
कई बार वह देर रात तक बैठकर समझने की कोशिश करता।
कभी-कभी थकान में सोचता —
“क्या मैं दोनों संभाल पाऊँगा?”
उसी समय पिता की ट्रेन वाली घटना याद आ जाती।
वह युवक… वह सम्मान… वह सीट।
उसे लगता —
अब यह सिर्फ उसका सपना नहीं,
उसके पिता का विश्वास भी है।
कॉलेज के दूसरे महीने में इंटर-कॉलेज क्रिकेट टूर्नामेंट की घोषणा हुई।
कोच ने उसे देखा और कहा —
“स्टेट प्लेयर हो? फिर तो ओपनिंग तुम ही करोगे।”
गुरप्रीत मुस्कराया।
यह एक नई पारी की शुरुआत थी।
गुरप्रीत बी.टेक के पहले वर्ष में था।
कॉलेज, प्रैक्टिस और घर — जीवन तेज़ रफ्तार से चल रहा था।
राज्य स्तर पर खेलने के कारण उसका नाम अब आस-पास के शहरों में भी जाना जाने लगा था।
एक रविवार वह अपने मामा के घर गया।
घर में किसी छोटे पारिवारिक समारोह का माहौल था।
ड्राइंग रूम में बैठे-बैठे उसकी नज़र दरवाज़े की ओर गई।
वहाँ दो लड़कियाँ अंदर आईं — उनमें से एक ने उसे पहचान लिया।
वह थोड़ी झिझकी, फिर मुस्कराकर बोली —
“आप… गुरप्रीत हैं ना?”
गुरप्रीत थोड़ा असहज हुआ।
“जी… हाँ।”
मामा ने हँसते हुए कहा —
“अरे, यह सिमरन है। मेरी बेटी की सहेली। तुम्हारा मैच देखने गई थी पिछले महीने।”
सिमरन ने हल्के उत्साह से कहा —
“अंडर-19 वाला मैच… आपने 100 रन बनाए थे। आखिरी छक्का लॉन्ग-ऑन के ऊपर से मारा था।”
गुरप्रीत हैरान था कि उसे इतना याद है।
“अच्छा लगा सुनकर,” उसने संक्षेप में कहा।
“मैं क्रिकेट बहुत नहीं समझती,” सिमरन ने मुस्कराकर कहा,
“पर जब कोई अपने सपने के लिए खेलता है, वो दिख जाता है।”
कमरे में और लोग भी थे, इसलिए बातचीत लंबी नहीं हो सकी।
कुछ देर बाद चाय आई।
सिमरन ने जाते-जाते बस इतना कहा —
“अगला मैच कब है?”
“अगले महीने… जिला स्टेडियम में।”
“अगर घरवालों ने इजाज़त दी तो देखने आऊँगी।”
बस इतना ही।
पर जाते हुए गुरप्रीत ने एक बात महसूस की —
कुछ लोग भीड़ में भी चुपचाप आपको देख रहे होते हैं…
और आपकी जीत पर सचमुच खुश होते हैं।
यह मुलाक़ात साधारण थी।
पर कहानी यहीं खत्म नहीं होगी।
मामा के घर वाली मुलाक़ात के बाद सिमरन बस एक परिचित नाम बनकर रह गई।
कभी-कभी त्योहारों पर या किसी शादी-ब्याह में हल्की-सी नमस्ते हो जाती।
न कोई फोन, न कोई संदेश।
बस एक औपचारिक पहचान।
गुरप्रीत अपनी दुनिया में व्यस्त था।
कॉलेज और क्रिकेट का संतुलन
पहला वर्ष कठिन था।
सुबह 6 बजे प्रैक्टिस।
10 बजे क्लास।
शाम को जिम।
रात को असाइनमेंट।
कई बार शरीर जवाब देने लगता।
पर पिता की वह ट्रेन वाली घटना उसे याद रहती।
एक दिन बलदेव सिंह ने पहली बार मिल से छुट्टी लेकर उसका मैच देखने का निर्णय लिया।
मैदान में जब गुरप्रीत ने 84 रन बनाए और टीम को जीत दिलाई,
तो भीड़ में खड़े पिता की आँखें चमक उठीं।
वापसी में उन्होंने मोटरसाइकिल पर बैठते हुए कहा —
“तू सच में अलग है।”
यह चार शब्द गुरप्रीत के लिए किसी ट्रॉफी से कम नहीं थे।
बी.टेक का दूसरा वर्ष
पढ़ाई अब कठिन होती जा रही थी।
मशीन डिजाइन, थर्मोडायनामिक्स, गणित — सब गहराते जा रहे थे।
कभी-कभी वह थककर सोचता —
“क्या मैं सिर्फ क्रिकेट पर ध्यान दूँ?”
पर माँ कहतीं —
“डिग्री हाथ में होगी तो आत्मविश्वास दोगुना होगा।”
गुरप्रीत दोनों रास्तों पर चलता रहा।
राज्य टीम में स्थायी जगह
21 वर्ष की आयु में उसे राज्य की सीनियर टीम में जगह मिल गई।
अब वह छोटे शहर का खिलाड़ी नहीं रहा था।
उसका नाम स्पोर्ट्स कॉलम में नियमित आने लगा।
पिता की चाल में गर्व आ गया था।
मिल के मजदूर अब उन्हें “खिलाड़ी के पिताजी” कहकर बुलाते।