गुरप्रीत सिंह —
एक समय का उभरता हुआ क्रिकेट खिलाड़ी।
भीड़ उसका नाम जानती थी।
मैदान उसकी पहचान था।
फिर समय ने ऐसी करवट ली कि
धीरे-धीरे उसकी जंग जिंदगी के साथ शुरू हो गई।
पैरों ने साथ छोड़ना शुरू कर दिया।
घर ने भी साथ नहीं दिया
रिश्ते टूटते गए।
आत्मसम्मान रोज़ थोड़ा-थोड़ा घिसता गया।
एक दिन उसने महसूस किया —
जिस पिच पर वह दौड़ता था,
अब उसी पिच पर वह चल भी नहीं सकता।
लेकिन क्या वह हार गया या...... ....................
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भाग 1 – उदय
स्टेडियम में बीस हज़ार लोग खड़े थे।
“गुरप्रीत! गुरप्रीत!”
नाम हवा में गूंज रहा था।
पसीना उसके माथे से बहकर आँखों में जा रहा था,
पर उसने पलक तक नहीं झपकाई।
गेंदबाज़ दौड़ा…
गेंद आई…
और उसने कवर ड्राइव मारा।
गेंद बाउंड्री लाइन के पार जाते ही
पूरा स्टेडियम फट पड़ा।
कमेंटेटर चिल्लाया —
“यह लड़का पंजाब का नहीं, इंडिया का फ़्यूचर है!”
उस पल गुरप्रीत को लगा था…
ज़िंदगी इसी पिच पर खत्म होगी।
उसने कभी नहीं सोचा था कि एक दिन
वही रीढ़ की हड्डी…
जिससे वह सीधा खड़ा होता था…
उसे धीरे-धीरे झुकने पर मजबूर कर देगी।
उस समय उसकी उम्र सिर्फ सत्रह साल थी।
और उसे लगता था…
ज़िंदगी ने उसे चुन लिया है।
सुबह पाँच बजे का समय। मैदान की घास पर ओस की बूंदें जमी थीं। वह नंगे पैर दौड़ता, स्ट्रेचिंग करता और फिर बैट को ऐसे पकड़ता जैसे वही उसकी असली पहचान हो।
उसके पिता, बलदेव सिंह, शहर की एक आटा मिल मशीन के फोरमैन थे।
दिन-भर मशीनों की तेज आवाज, उड़ता आटा और तेल की गंध के बीच उनका जीवन बीतता था।
उनका मानना था —
“ज़िंदगी मेहनत से चलती है, खेल-कूद से नहीं।”
माँ, हरजीत कौर, पढ़ी-लिखी थीं। बी.ए. पास।
वह कम बोलतीं, पर बेटे की आँखों में छिपे सपनों को पढ़ लेती थीं।
स्थानीय टूर्नामेंट का फाइनल मैच
स्कोर 142 पर 6 विकेट।
आखिरी ओवर में 12 रन चाहिए थे।
गुरप्रीत स्ट्राइक पर था।
पहली गेंद — यॉर्कर। उसने बल्ला नीचे लाकर दो रन चुरा लिए।
दूसरी गेंद — छोटी लंबाई। उसने पुल शॉट खेला।
छक्का।
मैदान तालियों से गूंज उठा।
आखिरी गेंद पर 4 रन चाहिए थे।
गेंद ऑफ स्टंप के बाहर थी।
गुरप्रीत ने कवर ड्राइव खेला।
गेंद सीमा रेखा पार कर गई।
टीम जीत गई।
अगले दिन अखबार में खबर छपी —
“फोरमैन का बेटा बना हीरो।”
बलदेव सिंह ने अखबार देखा। कुछ क्षण चुप रहे।
फिर अखबार मोड़कर रख दिया।
ज़िला चयन ट्रायल मैच
सीमा रेखा के पास चयनकर्ता खड़े थे।
गुरप्रीत ने 78 रन बनाए।
तीन कैच पकड़े।
एक सीधा थ्रो मारकर रन-आउट किया।
कोच ने उसके कंधे पर हाथ रखा —
“तुम राज्य स्तर तक जा सकते हो।”
घर पहुँचकर वह उत्साह में भर गया।
पिता ने सख्त आवाज में पूछा —
“और पढ़ाई? बारहवीं के बाद क्या सोचा है?”
“मैं बी.टेक करना चाहता हूँ… और क्रिकेट भी खेलना है।”
गुरप्रीत ने हिम्मत जुटाकर कहा।
पिता ने गहरी सांस ली।
“कल से मिल चलना मेरे साथ। मशीन सीखो। यही काम काम आएगा।”
कमरे में सन्नाटा फैल गया।
राज्य अंडर-19 क्वालीफायर मैच
यह मैच उसके भविष्य का फैसला कर सकता था।
पिच कठिन थी। विरोधी टीम मजबूत थी।
स्कोर 89 पर 4 विकेट।
गुरप्रीत क्रीज़ पर आया।
पहली बीस गेंदों तक सिर्फ बचाव।
फिर धीरे-धीरे लय मिली।
कवर ड्राइव।
स्क्वायर कट।
सीधा छक्का।
उसने शतक पूरा किया।
तालियों की गूंज उसके कानों में देर तक बजती रही।
उस दिन उसका चयन हो गया।
रात का भोजन शांत वातावरण में हो रहा था।
पिता ने थाली एक ओर सरका दी।
“बहुत हो गया क्रिकेट। अब घर की जिम्मेदारी समझो।”
गुरप्रीत ने पहली बार सीधे उनकी ओर देखा।
“पापा, मैं इंजीनियर बनना चाहता हूँ।
और क्रिकेट मेरा सपना है। मैं दोनों संभाल लूंगा।”
बलदेव सिंह की आँखों में गुस्सा कम, चिंता अधिक थी।
“मैंने पूरी ज़िंदगी मशीनों के बीच गुज़ारी है।
तुम्हें वही जिंदगी नहीं देना चाहता…
पर डरता हूँ कि कहीं तुम गिर गए तो?”
उस रात गुरप्रीत देर तक छत को देखता रहा।
उसे समझ आ गया था —
पिता उसके सपनों के दुश्मन नहीं हैं,
वे असफलता से डरते हैं।
राज्य टीम में चयन के बाद गुरप्रीत का नाम छोटे-छोटे अखबारों में आने लगा था।
मोहल्ले के लोग अब उसे “हमारा लड़का” कहकर बुलाने लगे थे।
लेकिन घर के भीतर अभी भी सब पहले जैसा था।
एक दिन बलदेव सिंह को अपने रिश्तेदार के यहाँ दूसरे शहर जाना था।
उन्होंने साधारण टिकट लिया और भीड़ भरी पैसेंजर ट्रेन में चढ़ गए।
डिब्बे में पैर रखने की जगह भी मुश्किल से थी।
गरमी, पसीने की गंध और शोर।
बलदेव सिंह दरवाज़े के पास खड़े हो गए।
हाथ ऊपर की रॉड पकड़कर संतुलन बनाए हुए थे।
तभी एक लगभग बीस-बाइस वर्ष का युवक उन्हें ध्यान से देखने लगा।
कुछ क्षण बाद वह अचानक खड़ा हो गया।
“अंकल, आप बैठ जाइए।”
बलदेव सिंह ने मना किया —
“नहीं बेटा, तुम बैठे रहो।”
युवक मुस्कराया।
“आप गुरप्रीत के पापा हैं ना?”
बलदेव सिंह चौंक गए।
“हाँ… पर तुम कैसे जानते हो?”
“मैं उसका मैच देखने गया था। अंडर-19 वाला।
उसने जो शतक लगाया था… आज भी याद है।
हम सब दोस्तों ने कहा था — एक दिन यह बड़ा खिलाड़ी बनेगा।”
आसपास बैठे कुछ और लोग भी मुड़कर देखने लगे।
युवक ने आदर से कहा —
“आप भाग्यशाली हैं अंकल। ऐसा बेटा सबको नहीं मिलता।
कृपया बैठिए।”
बलदेव सिंह धीरे से सीट पर बैठ गए।
पहली बार उन्हें लगा…
उनका बेटा सिर्फ उनका नहीं रहा,
लोगों की उम्मीद बन चुका है।
ट्रेन की खिड़की से बाहर देखते हुए उनकी आँखें नम हो गईं।
उस दिन घर लौटकर उन्होंने कुछ नहीं कहा।
बस रात के खाने पर धीमे स्वर में बोले —
“कॉलेज की प्रवेश तिथि कब है?”
गुरप्रीत ने आश्चर्य से उनकी ओर देखा।
“अगले महीने, पापा।”
“फॉर्म भर दो। बी.टेक करना है तो ठीक से करना।
और… क्रिकेट भी खेलो।
पर पढ़ाई नहीं छूटनी चाहिए।”
यह पिता की स्वीकृति थी।
शब्द कम थे, पर भरोसा बड़ा।